Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 27 / 41

कल्याण सागर जी महाराज गृहस्थ अवस्था में यात्रा के दौरान बीमार हो जाने पर एक व्यक्ति ने सहयोग किया था बदले में पैसे न लेकर कहा आप भी परोपकार करना उसका प्रभाव यह हुआ कि उन्होंने मुनि दीक्षा लेकर भी 'णमोकार द्वारा पर का कल्याण किया था।
णमोकार
धर्मात्मा में, व्रतों में, स्वाध्याय में, जिन पूजन में वात्सल्य करो, वात्सल्य गुण के प्रभाव से ही समस्त द्वादशाङ्ग विद्या सिद्ध होती है, सिद्धान्त सूत्र (ज्ञान) में और सिद्धान्त के उपदेशक उपाध्याय (ज्ञानी) में सच्ची भक्ति के प्रभाव से ज्ञानावरण कर्म का रस सूख जाता है जिससे समस्त विद्याएं सिद्ध होती हैं, वात्सल्य गुण के धारक को देव भी नमस्कार करते हैं और वात्सल्य से ही अठारह प्रकार की बुद्धि ऋद्धि, दो प्रकार की आकाश गामिनी ऋद्धि, अनेक प्रकार की चारण ऋद्धि, अनेक प्रकार की विक्रिया ऋद्धि, तीन प्रकार की बल ऋद्धि, सात प्रकार की तप ऋद्धि, छ: प्रकार की रस ऋद्धि, आठ प्रकार की औषध ऋद्धि, दो प्रकार की क्षेत्र ऋद्धि इत्यादि अनेक ऋद्धियाँ प्रकट होती हैं।
भक्ति
गरीब गली में एवं धनी मन्दिर में दीप जला रहा था, गरीब को अधिक सुख मिला, धनी को कम सुख मिला, क्योंकि अन्धेरी गली में प्रकाश की जरूरत थी, मन्दिर तो स्वभाव से जगमगा रहा था, मन्दिर में दीपक रखना स्वार्थ है, गली में दीपक रखना परोपकार है, इसलिए दोनों के सुख एवं पुण्य में अन्तर है।
दान
सर्प ने काटा चूहा दिखा- जिसे सर्प ने काटा था सर्प बिल में अन्दर खिसक गया उसी समय चूहा निकला अतः उसने समझा चूहे ने काटा है तो कुछ नहीं हुआ और जिसे चूहे ने काटा था, चूहा बिल में घुस गया उसी समय सर्प निकला, अतः उसने समझा सर्प ने काटा है तो वह डरकर मर गया, एक मिनट में सारी कोशिकाएँ मर गयीं, सकारात्मक सोच से शक्ति बढ़ती है, परोपकार की भावना से आत्मा को सिंह जैसा बल प्राप्त होता है, नकारात्मक सोच से शक्ति घटती है।
मन
डबल परीक्षा-पेपर दूँ या जान बचाऊँ- परीक्षा देने जा रहे बच्चे ने रास्ते में पड़ी घायल बुढ़िया का इलाज करवाया, जब चिकित्सक ने कहा अब कोई खतरा नहीं है तब वह विद्यालय गया, तो प्राचार्य ने प्रवेश नहीं दिया, उसने रास्ते का सारा हाल सुनाया, प्राचार्य ने फ़ोन पर चिकित्सक से पूँछा, चिकित्सक ने कहा हाँ मैं आपको धन्यवाद देने ही आ रहा था, क्योंकि आपके विद्यालय में परोपकार की शिक्षा दी जाती है, बाद में बच्चे ने परीक्षा दी, परिणाम में वह प्रथम आया, प्राचार्य ने समस्त विद्यार्थियों के सामने उसका सम्मान किया और कहा ये हमारे विद्यालय की शान है।
दान
सेठ छिदामीलाल जी से फिरोजाबाद में आयकर अधिकारी ने पूँछा सेठजी इतना पैसा इस मन्दिर में लगाया, इसके बदले में नई फैक्ट्री खुल जाती सेठजी ने उत्तर दिया यदि एक फैक्ट्री और लगाता, तो मुर्दाबाद के नारे लगते, मन्दिर बन गया तो सब धन्यबाद देते हैं, फिर मैं कौन सा मन्दिर बनाने वाला हूँ, मैंने तो इस फैक्ट्री के मजदूरों से प्राप्त पैसे को मन्दिर बनाने वाले शिल्पियों मजदूरों को बाँट दिया, मैं तो इधर का पैसा उधर वितरित करने वाला हूँ, यह निरभिमानता है।
विनम्रता
महात्मा ने घायल पड़े सिपाही से कहा शास्त्र सुनोगे? सिपाही बोला नहीं, पानी पीऊँगा, महात्मा पानी ले आया, कहा सिर ऊँचा करोगे? कर दिया, सेवा से द्रवीभूत होकर मरणोन्मुख सिपाही की आँखों में आँसू आ गये और उसने कहा महाराज मैंने धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़े लेकिन आपके सेवा भाव से धर्म ग्रन्थों का रहस्य समझ में आ गया है कि परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है और पर को पीड़ा देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।
दान
बुढ़िया को कूबड़ हो गया, लोग चिढ़ाते थे, वह दुःखी थी, एक व्यक्ति ने कहा माँ दुःखी मत होओ इसका समाधान मैं जानता हूँ, बुढ़िया ने पूँछा क्या ठीक करना जानता है? व्यक्ति ने कहा हाँ, तो ठीक कर दूँ? बुढ़िया बोली जब ठीक करना जानता है, तो लगाना भी जानता है? व्यक्ति बोला हाँ जानता हूँ, तब बुढ़िया ने कहा, मेरी कूबड़ रहने दे, जो मेरी मजाक करते हैं, उनकी पीठ पर एक-एक कूबड़ लगा दे, बस मेरा दुःख खत्म हो जायेगा, व्यक्ति दूसरों के दुःख को देखकर सुखी होना चाहता है जो असम्भव है।
चरित्र
परोपकार से स्वोपकार भी होता है, कीचड़ में फँसे हुए गधे को देखकर न्यायाधीश अपनी गाड़ी से उतर कर उसे बाहर निकालने लगे, ड्राईवर ने कहा अरे साहब आप क्या कर रहे हैं मैं निकाल देता हूँ, उन्होंने नहीं सुना और गधे को निकाल दिया, कपड़े गन्दे हो गये थे, किन्तु समय नहीं था कि कपड़े बदल सकें, उसी हालत में अदालत पहुँच गये, मित्रों ने पूँछा कि आपको आज क्या हो गया इतने गन्दे कपड़े क्यों हैं? नौकर ने सारा समाचार सुनाया और कहा साहब बड़े दयालु हैं, जज ने कहा! नहीं भैया मैंने कुछ नहीं किया, मैंने अपनी ही पीड़ा कम की है।
दान
1978 में आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास जापान से एक दल आया, आचार्य श्री ने उन्हें एक पुस्तक दी उन्होंने पूँछा ये पुस्तक किस धर्म की है? आचार्य श्री ने कहा जैन धर्म की, उन्होंने कहा हम नौजवान हैं धर्म नहीं मानते, आचार्य श्री ने कहा! दुनिया में ऐसा कोई नहीं जो धर्म को न मानता हो, आप कैसे कह रहे हैं? तब आचार्य श्री ने कहा, आपके शिर में कोई लाठी मारे तो कैसा लगेगा, युवक बोला! बुरा लगेगा, और कोई पट्टी बाँधे तो कैसा लगेगा? युवक बोला! अच्छा लगेगा, आचार्य श्री बोले! बस यही तो अधर्म और धर्म है, तब युवक बोला कि धर्म ऐसा है तो हम मानते हैं, आचार्य श्री ने कहा धर्म विशाल है, मात्र विधि विधान को ही धर्म नहीं कहते हैं।
धर्म
एक बहुत गरीब परिवार था, एक बार जङ्गल में एक भविष्य वक्ता सन्त आये थे, माँ ने बेटे से कहा! तुम जाकर पूँछो हमारे दुःख के दिन बीतेंगे या भूखे ही मरते रहेंगे, माँ के आग्रह से बेटा सन्त के पास चला, चलते-चलते शाम हो गयी, एक गाँव में सेठानी की कोठी के पास जाकर पूँछा क्या हम यहाँ रात व्यतीत कर सकते हैं? स्वीकृति दे दी, सेठानी ने पूँछा कहाँ जा रहे हो? लड़का बोला! माँ का प्रश्न पूँछने सन्त के पास जा रहा हूँ, सेठानी ने कहा एक प्रश्न मेरा भी पूँछ आना, मेरी बेटी गूँगी है, वह कभी बोलेगी या नहीं, शादी होगी या नहीं? आगे बढ़ा तो जङ्गल में प्यास बुझाने तापस की झोपड़ी में गया, तापस ने पानी पिलाकर पूँछा कहाँ जा रहे हो? सन्त के पास प्रश्न का उत्तर लेने, तापस ने कहा, एक प्रश्न मेरा भी पूँछ आना, मुझे पच्चीस वर्ष तप करते हो गये परमात्मा का दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? आगे बढ़ा भूख से पीड़ित हुआ तो हल जोत रहे किसान से भोजन माँगा, उसने भोजन करा दिया और पूँछा कहा कहाँ जा रहे हो? उसने बताया तो किसान बोला हमारा भी एक प्रश्न पूँछ आना, मेरे खेत में फसल होती है पर फल नहीं लगते क्या कारण है? सन्त के पास पँहुच कर अभिवादन कर कहा कृपया हमारे चार प्रश्नों का समाधान करें, सन्त ने कहा! हम एक दिन में तीन प्रश्नों का ही समाधान करते हैं, उसने सोचा किसका प्रश्न छोड़ दूँ? माँ का प्रश्न छोड़कर सबसे पहले सेठानी का प्रश्न पूँछा, सन्त ने कहा! जिसको देखकर लड़की बोलने लगेगी, वही उसका वर होगा, तापस के प्रश्न के उत्तर में कहा! तापस की दाढ़ी में जब तक मणि रहेगी तब तक परमात्मा का दर्शन नहीं होगा, किसान के खेत में जब तक सोने-हीरे के घड़े गढ़े रहेंगे, तब तक फसल नहीं आयगी, उत्तर लेकर वापस चला, किसान को बताया तो उसने घड़े निकाल कर उसी को दे दिये, तापस ने भी मणि उसी लड़के को दे दी, सेठानी की लड़की उसी लड़के को देखकर बोलने लगी, तो उसने उसी के साथ शादी कर दी, माँ के पास गया माँ आश्चर्य में थी, उसने कहा माँ परोपकार करने वाले का उपकार स्वयं हो ही जाता है।
दान
माँ की महिमा वरणी न जाय- विवेकानन्द जी से किसी ने पूछा आप अपनी माँ के गीत क्यों गाते रहते हो, उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी और कहा, उस पत्थर को पगड़ी में बाँध कर नौ घण्टे पेट में बाँधो और घूम कर आओ, वह घबरा गया, मैं तो नौ मिनट भी नहीं बाँध सकता, तब उसे माँ की महिमा समझ में आई।
परिवार
सेठ हरजस राय दिल्ली वालों ने विधान के बाद पूरी समाज को लड्डू बँटवाये, एक गरीब ने लड्डू नहीं लिये, मुनीम ने सेठ को खबर दी, कि गरीब ने कहा है कि हम सेठ को खिला नहीं सकते तो उनकी भेंट कैसे लेवें? सेठ जी दूसरे दिन बग्घी पर सवार होकर उसकी दुकान की ओर गये, वह हाथ ठेला पर चना-मूंगफली बेचता था, सेठ ने उसकी बरनी में से चना-मूंगफली निकाल कर खा लिये, पानी पिया और कहा भैया अब हमारी भेंट स्वीकार करो, हमने तुम्हारे यहाँ खा लिया, यह उदारता कहलाती है।
विनम्रता
प्रेम पूर्ण आहार-सबसे बड़ा उपहार- बनारस में महावीर जयन्ति के अवसर पर श्री जी की शोभा यात्रा निकलती थी किंतु कुछ वर्षों से विरोधी तत्त्वों के कारण रथ नहीं निकाल सकते थे, महावीर जयन्ती के अवसर पर पण्डित जगनमोहनलाल जी कटनी वालों को बुलाया, उनके कहने से सबसे पहले विरोधियों को प्रीति भोज दिया गया, चल समारोह के कार्य उन्हीं को सौंप दिये, रथ निकाला गया, चौराहे पर भोजक ने आलाप भरकर राग गाया 'दौलत पक्षपात तज देखो, साँचो देव कौन है इनमें' सुनते ही सबकी दुकानें खुल गयीं थी।
संगति
भैंस और खेती को लेकर आलसी मित्रों में विवाद-दो मित्र आपस में बैठे-बैठे चर्चा छेड़ देते हैं, एक कहता है 'हम इस साल खेती करेंगे' दूसरा कहता है 'हम इस साल भैंसें खरीदेंगे', पहला कहता है आपकी भैंसे मेरे खेत में नहीं आना चाहिए, दूसरा कहता है पशु हैं आयेंगे तो हम क्या करेंगे, इसी बात को लेकर दोनों में झगड़ा हो जाता है, और आपस में एक दूसरे का सिर फोड़ देते हैं, अतः व्यर्थ की चर्चा नहीं छेड़ना चाहिए।
वाणी
पुत्र को लेकर पति-पत्नि में विवाद हो गया- पत्नि कहती मैं बेटे को डॉक्टर बनाऊँगी, पति कहता मैं बेटे को वकील बनाऊँगा। जज ने कहा! बच्चे से पूँछो वह क्या बनना चाहता है, बोले! बच्चा तो अभी हुआ ही नहीं।
क्षमा
यशोधर का यशवर्धन- श्रेणिक ने अपने शिकार में बिघ्न जान यशोधर मुनिराज के गले में सर्प मारकर डाल दिया, तीन दिन बाद चेलना से कहा तो चेलना श्रेणिक को लेकर मुनिराज के पास पहुँची, मुनिराज के ऊपर सेकड़ों चींटियों का उपसर्ग हो रहा था। चेलना ने उपसर्ग दूर किया। मुनिराज ने ध्यान खोला तो दोनों ने नमोस्तु किया। मुनिराज ने दोनों को धर्म वृद्धि का आशीर्वाद दिया। श्रेणिक को पश्चाताप हुआ, कि मैंने मुनिराज को तीन दिन भूखा रखा, उपसर्ग किया, उसके बाद भी ये हमारा कल्याण चाहते हैं। मेरे स्थान पर यदि कोई दूसरा होता तो मैं उसे मृत्यु दण्ड देता। अब मैं स्वयं राजा हूँ और स्वयं अपराधी हूँ, अतः मुझे स्वयं आत्मघात कर लेना चाहिए। मुनिराज मनःपर्यय ज्ञानी थे अतः वे श्रेणिक के मन की बात जान गये, और बोले राजन्! आत्मघात करना तो पाप है ही आत्मघात की बात सोचना भी पाप है। ऐसा सुनकर श्रेणिक को आश्चर्य हुआ और सोचा ये तो साक्षात् भगवान् हैं, और अत्यधिक पश्चात्ताप करते हुए मुनि से क्षमा माँगकर प्रणाम किया, जिससे सम्यक्त्व को प्राप्त कर, बाद में भगवान महावीर के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व और तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया, जिसके प्रभाव से सप्तम नरक की तेंतीस सागर की आयु घटकर पहले नरक की मात्र चौरासी हजार वर्ष शेष रह गयी, यह था क्षमा का प्रभाव।
क्षमा
क्रोधान्ध राजा- प्यास से पीड़ित राजा जङ्गल में भटक गया था, थककर एक वृक्ष के नीचे लेट गया, थोड़ी देर बाद आँख खुली तो उसने देखा कि वृक्ष की खोह से कुछ-कुछ पानी बह कर आ रहा है, राजा ने पत्तों का दोना बनाया पानी भरने को रख दिया दोना भरा था कि एक तोते ने दोने को नीचे गिरा दिया, बड़ी खिन्नता हुयी, पुनः पानी इकट्ठा किया तोते ने फिर गिरा दिया
क्षमा
विद्युच्चर मुनि की क्षमा- उग्र तप के धारी विद्युच्चर नामक मुनिराज को चामुण्डा नामक व्यन्तरी ने घोर उपसर्ग किया, उस उपसर्ग को समता से सहनकर मोक्ष को प्राप्त हुए हैं।
क्षमा
उपकारी नेवला- (क्रोध के समय विवेक खो जाता है) किसान की पत्नी पानी भरने गयी थी, उसका बालक पालने में सो रहा था, इतने में सर्प आया, नेवले ने सर्प को मारकर बच्चे की रक्षा की, नेवले के मुँह पर खून लगा देख कर महिला ने सोचा इसने बच्चे को मार डाला होगा और विना सोचे पानी का घड़ा नेवले के ऊपर पटक दिया, नेवला मर गया, अन्दर आकर देखा तो बालक सो रहा था और नीचे सर्प मरा हुआ पड़ा था, उसने विना सोचे परमोपकारी नेवले को मार डाला था।
विवेक
चिलाती मुनि- चिलाती मुनि ने पूर्व अवस्था में एक कन्या को विवाह मण्डप से हरण किया, तो राजा श्रेणिक के सेनिकों ने उसका पीछा किया, अन्त में चिलाती ने उस कन्या की गर्दन काटकर फेंक दी, वह कन्या मरकर व्यन्तरी हुई, चिलाती मुनि बनकर तप करने लगे, तब व्यन्तरी ने चिलाती मुनि की आँखें फोड़ दी, उन्होंने समता पूर्वक इस उपसर्ग को सहन किया व सर्वार्थसिद्धि को प्राप्त हुये।
क्षमा
अजनबी व्यक्ति ने आचार्य विद्यासागरजी से अटपटा प्रश्न किया-What is your busines. आचार्य श्री ने शान्ति से उत्तर दिया- Busy nes is my busines. अर्थात् धर्म ध्यान में व्यस्त रहना ही हमारा व्यापार है।
क्षमा
क्षमा तीन प्रकार की होती है स्वार्थ वश, मजबूरी वश और वास्तविक। स्वार्थ वश क्षमा- ग्राहक अनेक चीजों को देखने के बाद भी नहीं खरीदता है तो भी दुकानदार उसे क्षमा कर देता है ऐसा मानकर कि आज न सही फिर कभी खरीदने आयेगा। मजबूरी वश क्षमा- घमण्डी पहलवान रोड से जा रहा था, छत से दूसरे पहलवान ने ईंट फेक कर मारी, वह सोचता है आज किसकी मौत मण्डरा रही है, हाथ में ईंट लेकर ऊपर जाता है देखता है, वहाँ तो कोई महा पहलवान अभ्यास कर रहा है, उसे देखकर पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी, कहा ! भाई साहब आपकी ईंट वापस करने आया हूँ। वास्तविक क्षमा- दुष्टों ने नाव में बैठकर साधु को परेशान किया लोगों ने कहा आपके पास शक्ति है आप नाव को पलट दो, साधु ने कहा हम नाव पलटने की जगह बुद्धि पलटते हैं।
क्षमा
श्रावक बनूँ या श्रमण-दर्शक ने पूँछा था गृहस्थ बनूं या साधु? जब तक साधु बनने की क्षमता नहीं है तब तक पति पत्नि में समन्वय करने की कला होनी चाहिए, एक व्यक्ति ने पत्नि से कहा लालटेन जला लाओ, पत्नि दिन में बारह बजे लालटेन जलाकर आंगन में ले आयी, उसने नहीं पूँछा कि दिन में लालटेन की क्या आवश्यकता है? भोजन करने बैठे, भोजन में नमक नहीं था शान्ति से भोजन करके आ गये, गृहस्थी में इस तरह रहो और बाद में साधू बनकर समता की साधना करो, प्रश्न का उत्तर मिल गया।
क्षमा
गजकुमार मुनि-कौन जल रहा था ? गजकुमार मुनि के उपसर्ग की वार्ता सुनकर एक सज्जन बोल उठे, कैसी बिडम्बना है, गजकुमार मुनि का शिर जल रहा था और उनका ससुर हँस रहा था, देखो संसार की दशा, तब एक ने कहा भाई ! मुनिराज तो समता रुपी अमृत का पान कर रहे थे, अपूर्व आनन्दप्राप्त कर रहे थे, अरे ! कषाय की भट्टी में तो उनका ससुर जल रहा था, मुनि का शरीर जल रहा था आत्मा हँस रही थी, ससुर की आत्मा जल रही थी, शरीर हँस रहा था, देखो यह स्वभाव दृष्टि का बल है।
क्षमा
लात का जबाव लात से-लात का जबाव लात से गधा ही देता है, आप गधे तो नहीं है न ? भौंकने का जबाव भौंककर कुत्ता ही देता है, आप कुत्ते तो नहीं है न ? क्रोध का जबाव क्रोध से क्रोधी ही देता है, आप क्रोधी तो नहीं है न ? घृणा का जबाव प्रेम से सन्त ही देता है, आप सन्त के अनुयायी है न ? तो फिर गुस्सा क्यों करते हैं ? सामने वाला गुस्सा करे तो आप चुप रहें, क्रोधी वक्ता बने तो आप श्रोता बनें, थोड़ी देर में अपने आप शान्त हो जायेगा, दरअसल क्रोध तात्कालिक पागलपन है, बच्चा गलती करता है तो आप उसे क्षमा कर देते हैं, क्योंकि नादान है अरे भाई ! क्रोध करने वाले भी तो नादान हैं अतः उन्हे भी क्षमा कर देना चाहिए।
क्षमा
आदमी देवता न बने कोई गम नहीं, आदमी दानव न बने यह भी कम नहीं। न जिये दूसरों के लिए कोई गम नहीं, दूसरों को जीने दे यह भी कम नहीं ॥1॥ सत्सङ्ग सर्वोत्तम न मिला हो कोई गम नहीं, खराब सङ्गत से दूर रहें यह भी कम नहीं। न बन सके सहारा दूसरों का कोई गम नहीं, दूसरों का जबरन सहारा न छीनें यह भी कम नहीं ॥2॥ गिरे को न उठायें, कोई गम नहीं, दूसरों को न गिरायें यह भी कम नहीं ॥3॥
चरित्र
पत्थर के टूटने पर जिस प्रकार फिर नहीं जुड़ता है, उसी प्रकार जिसका बैर(क्रोध) संख्यात, असंख्यात व अनन्त भव तक रहता है वह नरक गति में जाता है, पृथ्वी की दरार के समान जिसका बैर(क्रोध) है अर्थात् छह माह से अधिक बैर रहता है वह पशु गति मे जाता है, धूल पर बनी रेखा के समान जिसका बैर(क्रोध) होता है अर्थात् पन्द्रह दिन मे जिसका बैर मिट जाता है, वह मनुष्य गति को प्राप्त होता है और जल पर फेरी हुई रेखा के समान अन्तर्मुहूर्त जिसका क्रोध होता है वह देव गति में जाता है।
क्षमा
किसान का प्रतिशोध- किसान अपनी पत्नि को पीटना चाहता था, लेकिन वह बहुत चतुर थी, उसने अपने जीवन में ऐसा काम नहीं किया जिससे उसको कोई पीट सके, किसान ने एक दिन उसको पीटने के उद्देश्य से खेत में हल चलाते समय पत्नि को आते देख कर हल में बैल उल्टे नह दिये, उसने सोचा ऐसा देखकर पत्नि कुछ कहेगी तभी मैं उसको पीट दूँगा, लेकिन पत्नि ने चुप-चाप नास्ता दिया और घर की ओर चली गई, पूँछने पर बोली कि चाहे आप उल्टा नहो या सीधा खेत जोतना आपको है मेरा काम नास्ता देना है, पति देखता रह गया।
क्षमा
दुकानदार की क्षमा- शैतान लड़के ने दुकानदार से साड़ी की कीमत पूँछी, सौ रुपए बताया, साड़ी को बीच में से फाड़ दिया और पूछा आधी साड़ी कितने की ? दुकानदार ने कहा पचास रुपये की, इस प्रकार साड़ी के टुकड़े-टुकड़े कर कहा यह साड़ी हमारे काम की नहीं है और साड़ी की कीमत दिये विना जाने लगा तो दुकानदार ने कहा साड़ी तो पुनः बन सकती है, किन्तु जीवन बिगड़ गया तो फिर नहीं बनेगा तो उसने चरणों में गिरकर क्षमा मांगी।
क्षमा