एकमेवाक्षरं यस्तु, गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्। पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं, यद् दत्वा ह्यनृणी भवेत्।। एकाक्षरप्रदातारं, यो गुरुनाभिमन्यते। श्वान योनिं शतं लब्ध्वा, चाण्डालेष्वभिजायते।।
एक अक्षर भी यदि गुरु शिष्य को देता है, तो पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जिसे देकर गुरु के ऋण को चुकाया जा सके, एक अक्षर भी देने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह कुत्ते की सौ योनी प्राप्त करके चाण्डालों में उत्पन्न होता है।
If a guru teaches his pupil even a single letter, there is no substance on earth by giving which one could repay that debt; and one who does not honour as guru even the giver of a single letter takes a hundred births as a dog and is then born among the outcastes.
— आराध्य सूत्र · #22
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