Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 7 / 7

हे भगवन्! आप भक्तों को कैसे तारते हैं? वे ही आपको अपने हृदय में धारण करके पार उतर जाते हैं अथवा ठीक है मशक जो पानी में तैरती है, उसका कारण उसके अन्दर रहने वाली हवा है, उसी प्रकार संसार से पार होने में भगवान् आप ही कारण हैं।
भक्ति
हे जनबान्धव! मैंने आपका नाम सुना, पूजा दर्शन भी किये, किन्तु भक्ति पूर्वक हृदय में धारण नहीं किया, इसलिए दुःखों का पात्र हुआ हूँ, क्योंकि भाव शून्य क्रिया पूर्ण फलदायी नहीं होती है।
भक्ति
साधु का पिच्छी कमण्डल देखकर यदि श्रावक का आभामण्डल नहीं चमकता है तो समझ लो वह श्रावक मिथ्या दृष्टि है।
भक्ति
ग्रन्थ की समाप्ति सिद्ध क्षेत्र या अतिशय क्षेत्र पर करते थे, धर्म के प्रति अगाढ़ श्रद्धा थी, एक बार सोनागिर जी गये, दर्शन स्तुति के बाद, एक पद बड़ी मधुर वाणी में पढ़ना प्रारम्भ किया 'नाथ सुधि लीजो जी म्हारी भव-भव दुखिया जानके' इस पद को पढ़ते जाते अविरल अश्रु धारा बहती गयी, ऐसी भक्ति देख लोग गद-गद हो गये थे।
भक्ति
इस पंक्ति को पढ़ते ही पण्डित पन्नालाल जी साहित्याचार्य की आँखों में आँसु आ जाते थे, जब महावीर भगवान की पूजा की जयमाला में 'घनननं घननं घन घण्ट बजे' इसको पढ़ते तो मुख कमल खिल जाता था।
भक्ति
पण्डित गोपालदास जी की पत्नी ने गोमटेश की भक्ति की और भाव विभोर हो बाहुबली भगवान को साष्टाङ्ग नमस्कार किया, आधा घण्टा तक लेटी रही, पण्डितजी ने समझा शायद बेहोश हो गयी, ठण्डा पानी मँगाकर चेहरे पर छींटे मारे, वैसी ही रही, दुबारा अधिक पानी डाला, जल्दीं उठी और बोली! क्या होली मचा रखी है, मुझे आनन्द से दर्शन भी नहीं करने देते, पण्डितजी को लगा कि काँटों में भी फूल होते हैं, कठोर हृदय में भी कहीं-कहीं मृदुता छिपी होती है।
भक्ति