Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

रत्नत्रयविशुद्धः सन्, पात्रस्नेही परार्थकृत। परिपालितधर्मोऽयं, भवाब्धेस्तारको गुरुः।।

जो रत्नत्रय से विशुद्ध हैं, पात्र पर स्नेह करने वाले हैं, परोपकार करते हैं, धर्म का पालन करते हैं, ऐसे संसार से तारने वाले गुरु होते हैं।

One who is pure in the three jewels, who loves the worthy, does good to others and observes dharma — such a one is a Guru who ferries souls across the ocean of the world.

— आराध्य सूत्र · #1

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हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति