Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

उच्चैर्गोत्रं प्रणते, भोगो दानादुपासनात्पूजा। भक्तेः सुन्दररूपं, स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु।।

तपस्वियों को प्रणाम करने से उच्च गोत्र अर्थात् इक्ष्वाकु आदि वंश में उत्पत्ति होती है, दान देने से भोगों की अर्थात् चक्रवर्ती आदि पद की प्राप्ति होती है, सेवा करने से पूजा की अर्थात् तीर्थंङ्कर आदि पद की प्राप्ति होती है, भक्ति करने से सुन्दर रूप अर्थात् कामदेव आदि पद की प्राप्ति होती है और स्तवन करने से कीर्ति की अर्थात् शलाका पुरुषों आदि में उत्पत्ति होती है।

By bowing to ascetics one gains high lineage — birth in the Ikshvaku and such dynasties; by giving, one gains enjoyments — the rank of Chakravarti and the like; by service, one gains worship — the rank of Tirthankar and the like; by devotion, one gains beauty — the rank of Kamadev and the like; and by hymns of praise, one gains fame — birth among the illustrious (shalaka) persons.

— आराध्य सूत्र · #20

इसी विषय के और सूत्र

सभी भक्ति →
हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति