Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Charity

दान

491 सूत्र · पृष्ठ 6 / 7

दान इसलिए कि प्रतिष्ठा प्राप्त हो, लोग धनिक समझें, दुआ प्राप्त हो जाय, भोगभूमि या स्वर्ग सुख मिले।
दान
जब तक दान दिया जाता है तभी तक कीर्ति होती है।
दान
वैयावृत्य- निश दिन वैयावृत्य करैया सो निश्चय भव नीर तरैया।
दान
त्याग अपने को रिक्त नहीं पूर्ण करने के लिए होता है।
दान
किसान जब बीज त्यागता है तब फल की प्राप्ति होती है, इसी प्रकार कुंआ पानी देता है तो और आता है, वृक्ष पुराने पत्ते त्यागता है तो नये पत्ते आ जाते हैं, गाय दूध त्यागती है तो स्वस्थता महसूस करती है एवं पुनः दूध आ जाता है। इसी प्रकार त्याग से आत्म वैभव प्राप्त होता है।
दान
दवा दो प्रकार की होती है पहली ऊपर से लेप करने वाली और दूसरी पीने वाली, दान लेप की तरह होता है, त्याग पीने वाली औषधि की तरह होता है।
दान
दान वृक्ष की पत्ति तोड़ने के समान है, त्याग वृक्ष को जड़ से उखाड़ने के समान है। राग की नहीं त्याग की पूजा होती है। आहार लेते समय साधु के भी हाथ नीचे होते हैं, श्रावक का ऊँचा होता है, दानी स्वर्ग पाता, त्यागी मोक्ष पाता है।
दान
दान प्रशंसनीय है त्याग पूज्यनीय है, स्वयं की भलाई के लिये रसादि का त्याग और परोपकार के लिये रसादि का दान होता है, दानी गद्दी पर, त्यागी सिंहासन पर बैठता है।
दान
त्याग निश्चय धर्म है, दान व्यवहार धर्म है तथा त्याग धर्म है, दान पुण्य है, बुरी व अच्छी दोनों वस्तुओं का त्याग होता है, दान अच्छी वस्तु का होता है, दान में परोपकार, त्याग में स्वोपकार होता है।
दान
मेघ जल त्यागते हैं इसलिये ऊपर हैं, समुद्र ग्रहण करता है इसलिये नीचे होता हैं, मेघ जल ग्रहण करते हैं तो काले हो जाते हैं, त्यागने के बाद सफेद हो जाते हैं, मेघ जल त्यागता है इसलिए उसका जल मीठा है, समुद्र ग्रहण करता रहता हैं, इसलिए उसका जल खारा है।
दान
जिनालय के लिए, जिन बिम्ब के लिए, पूजा विधान के लिए, जीर्णोद्धार के लिए और शास्त्रों के प्रकाशन के लिए कल्याणार्थ धन देना चाहिए।
दान
दान के सात क्षेत्र हैं, 1.चतुर्विधसङ्घ, 2.मन्दिर, 3.प्रतिमा, 4.जीर्णोद्धार, 5.रथयात्रा, 6.तीर्थयात्रा, 7.शास्त्र प्रकाशन।
दान
गृहस्थों को देश, समय, आगम, सम्पत्ति और पात्र के अनुसार दान देना चाहिए।
दान
यदि न्यायोपार्जित थोड़ा भी पदार्थ दिया गया है तो वह कल्याण के लिए होता है, इसके विपरीत अन्यायोपार्जित प्रचुर पदार्थ भी दिया गया हो तो वह निष्फल होता है।
दान
ग्रीष्मकाल में जल, शीतकाल में शीत निवारक पदार्थ, वर्षाकाल में आवास देना चाहिए और भोजन सदा देना चाहिए।
दान
भक्ति पूर्वक दान देने से भोग सहित लक्ष्मी और अनादरपूर्वक दान देने से लक्ष्मी तो प्राप्त होती है पर स्वयं भोग नहीं कर पाता है।
दान
जहाँ कहीं से पात्र को आता हुआ देख कर दाता, ''जिनेन्द्र के समान'' उन्हें पड़गाहन करता है वह प्रतिग्रह कहलाता है।
दान
आदिनाथजी ने अपने बेटे को दान का उपदेश दिया होता एवं फल बताया होता तो तेरह माह क्यों भटकना पड़ता, चार हजार मुनि क्यों भ्रष्ट होते?
दान
झूमर, छत्र, चामर, ध्वजा और दर्पण आदि से जिनमन्दिर को सुशोभित करने वाला मनुष्य आश्चर्यकारी 'लक्ष्मी' को प्राप्त होता है।
दान
स्वयं का पेट भरने से नहीं, दान देने से राजा और रङ्क का भेद जाना जाता है।
दान
जो श्री जिनेन्द्रदेव के मन्दिर में घण्टा दान करते हैं, वे घण्टा आदि से सहित वाहन पर आरूढ़ होकर गमन करते हैं।
दान
जो मनुष्य सुन्दर जिनमन्दिर में चँदोवा देता है, वह पुण्योदय से एकच्छत्र(अखण्ड) विशाल राज्य को प्राप्त होता है।
दान
मुनियों को आवास दान देने से रत्ननिर्मित विस्तृत और चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल आवास प्राप्त होता है।
दान
दो व्यक्ति स्वर्ग में भी ऊँचा स्थान पाते हैं, पहला वह जो निर्धन होने पर भी दान करता है, दूसरा वह जो समर्थ होने पर भी क्षमा करता है।
दान
कञ्जूस की अपेक्षा कौआ अच्छा है, साथियों को बुला कर खाता है।
दान
सत्पुरूषों का दान कल्पवृक्ष की शोभा की तरह है, लोभी का दान शव के विमान की शोभा की तरह है।
दान
द्रव्य भाव शुद्धि- द्रव्य से शुद्ध भोजन भी भाव के अशुद्ध होने से अशुद्ध हो जाता है, क्योंकि अशुद्ध भाव बन्ध के लिए और शुद्ध भाव मोक्ष के लिए है, नव कोटि से विशुद्ध दान बहुत फल दायक होता है, दाता की विशुद्धता देय-भोज्य को और पात्र को पवित्र करती है, देय की शुद्धता दाता और पात्र को पवित्र करती है और पात्र की शुद्धि दाता और देय को पवित्र करती है।
दान
गणेश प्रसाद वर्णीजी ने एक गरीब को ठण्ड में अपना गद्दा दे दिया था, तब से गद्दा छोड़ दिया था, बरुआ सागर से आ रहे थे, रास्ते में एक गरीब को चादर दे दिया था, एक बार गरीब को पानी पिलाया, लोगों ने कहा, तुमने लोटा खराब कर दिया, तो लोटा भी उसी गरीब को दे दिया था।
दान
औषधि दान- जो औषध दान करने वाले का फल वचनों से कहता है, वह मानों अञ्जुलि के द्वारा समुद्र के जल को नापता है।
दान
कृष्णजी ने मुनिराज के रोग को दूर करने का निश्चय किया, वैद्य की सलाह से औषधि के लड्डू पूरे नगर के चौकों में भेजे, साधु स्वस्थ हो गये इसके फल स्वरूप कृष्ण जी ने तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया था।
दान
सोला-सोलह प्रकार का- द्रव्यशुद्धि- 1. अन्न 'सड़ा, घुना न हो', 2.जल शुद्ध हो 3. ईंधन शुद्ध हो, 4. भोजन बनाने वाला शुद्ध हो। क्षेत्र शुद्धि- 1. प्रकाश हो, 2.वायु हो, 3.दुर्गन्ध न हो, 4.चौके में शौचालय न हो। काल शुद्धि- 1.ग्रहण न हो, 2.शोक न हो, 3.रात्रि न हो, 4.जिस काल में प्रभावना हो उस काल में दान देना। भाव शुद्धि- 1.दान देने का भाव हो, 2.करुणा सहित हो, 3.वात्सल्य सहित हो, 4.विनय सहित हो।
दान
सप्त धातुओं से भरा यह शरीर तीर्थंङ्कर मुनियों को आहार देने का पात्र है, देवों का शरीर नहीं।
दान
आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका तथा ब्रह्मचारी को वस्त्र देने से उज्ज्वल वस्त्र तथा शुक्ल ध्यान की प्राप्ति होती है।
दान
दान की महिमा- आहारदान से भोगभूमि, ज्ञानदान से केवलज्ञान, आवासदान से स्वर्ग, औषधिदान से कामदेव के पद की प्राप्ति होती है।
दान
हे गुणवान् मेघ! तुम अशरण चातक पक्षी को छोड़कर पर्वत पर एवं समुद्र में क्यों बरसते हो? अर्थात् मेघान्योक्ति के द्वारा कहा गया है की हे धनवानों! जिन्हें पैसों की आवश्यकता है उन्हें छोड़कर तुम धनवानों के लिए धन क्यों लुटाते हो?
दान
हे चन्दन के वृक्ष! तू अपने समीप बैठे साँपों को दूर कर, जिससे कि ये जगत तेरी श्रेष्ठ सुगन्धी को ले सकें, यहाँ भी चन्दनपादपान्योक्ति के माध्यम से कहा गया है कि हे धनवान! तू अपने समीप बैठे साँपों के सामान इन दान में अन्तराय डालने वाले लोगों को हटा, जिससे कि तेरे धन का सदुपयोग हो सके।
दान
हे रोहण पर्वत! तेरे रत्नों को लोग ले गये हैं, तो तू शोक मत कर, शीघ्र ही बादलों की ध्वनि से तुझे बहुत सारे रत्नों की प्राप्ति हो जायगी, यहाँ रोहणगिरी अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! तू दान देकर पश्चाताप मत कर तुझे पुण्य के उदय से बाद में अनन्त गुना धन प्राप्त होगा।
दान
प्यास रुपी दानव से पीड़ित विपत्ति को प्राप्त मनुष्य को देखकर चञ्चल लहरों के बहाने नृत्य करते हुए हे समुद्र! तू लज्जित क्यों नहीं होता है, यहाँ पर समुद्र अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! दरिद्रता रुपी दानव से पीड़ित मनुष्य को देखकर अपने धन का अनाप-शनाप दुरुपयोग करते हुए तुझे लज्जा क्यों नहीं आती है?
दान
हे खजूर के वृक्ष! तू अपने ऊँचे होने का अहङ्कार क्यों करता है, फल तो दूर तेरी छाया भी तो राहगीरों के काम नहीं आती है, यहाँ खर्जूर अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! तू अपने सम्पन्न होने का अहङ्कार क्यों करता है क्योंकि, धन की तो बात दूर तेरा तन भी तो किसी के काम नहीं आता है।
दान
जो मनुष्य मन-वचन-काय की विशुद्धि से शुद्ध होकर पात्र के लिए आहार मात्र देता है, जो कि संसार समुद्र से तैरने के लिये बीज के सामान है, उसके पुण्य के लिए इन्द्र भी अभिलाषा करता है।
दान
इस लोक सम्बन्धी फल की अपेक्षा से रहित, क्षमा, निष्कपटता, ईर्ष्या रहित, खेद रहित, प्रसन्नता सहित और अहङ्कार रहित होना ये आहार दाता के सात गुण हैं।
दान
पड़गाहन करना, उच्चासन देना, पाद प्रक्षालन, पूजन, नमोस्तु, मन-वचन-काय की शुद्धि एवं आहारजल की शुद्धि ये नवधा भक्ति मानी गई है।
दान
साधु को वही आहार देना चाहिए जिससे राग, द्वेष, असंयम, मद, दुःख, भय आदि उत्पन्न न हो एवं स्वाध्याय और तप की वृद्धि हो।
दान
मुनि उत्कृष्ट पात्र हैं, अणुव्रती मध्यम पात्र है, अविरत सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र है, सम्यग्दर्शन रहित और व्रत सहित कुपात्र है सम्यग्दर्शन और व्रत दोनों से रहित अपात्र हैं।
दान
पात्र को दिया हुआ थोड़ा भी दान, समय पाकर प्राणियों को वट वृक्ष की तरह बहुत फल देने वाला होता है।
दान
अन्नदान के समान कोई दान नहीं, समता के समान कोई तप नहीं, वीतरागता के समान कोई देव नहीं और दया के समान कोई धर्म नहीं है।
दान
आहार मात्र देने के लिए साधु की परीक्षा नहीं करना चाहिए, वे भावलिंगी हो या न हो गृहस्थ तो दान देने से शुद्ध होता है।
दान
भोगने योग्य पदार्थ, भोजन, शक्ति, रतिशक्ति, श्रेष्ठ स्त्रियाँ, वैभव, दान देने की शक्ति, ये सब स्वयं दान देने से प्राप्त होते हैं।
दान
जो अपने धन का स्वयं दान न करके दूसरों से करवाता है, वह भोगों को अवश्य प्राप्त होता है पर उसका भोग दूसरे करते हैं।
दान
बिन माँगे दे दूध बराबर, माँगे दे सो पानी। वह देना है खून बराबर, जिस में खींचा तानी॥
दान
सच्चा दान वही है, जिसमें छिपी नहीं है फल की चाह। सच्चा धर्म वही है जिसमें रहे निरन्तर एक प्रवाह॥
दान
तन से सेवा कीजिए, मन से भले विचार। धन से इस संसार में, कीजे पर उपकार॥
दान
वृक्ष की उदारता- धरती ने वृक्ष से कहा मैं तुम्हें रस प्रदान करती हूँ, तुम यूँ ही बर्बाद कर देते हो, किसी को दिया मत करो, अपने पास रखो, वृक्ष बोला नहीं माँ मैं देता हूँ तभी फलता हूँ, देने...
दान
राजा के बेटे के भाग्य में काला घोड़ा और पाँच रुपये थे, उसने दान देना प्रारम्भ किया तो भाग्य बदल गया और वह राजा बन गया।
दान
सुपात्र दान के फल से उत्तम कुल, रूप, सुलक्षण, बुद्धि, शिक्षा, स्वभाव, गुण, चरित्र तथा सकल सुखों का अनुभव प्राप्त होता है।
दान
गृहस्थों को दान के आलम्बन के विना अन्य कोई सुदृढ़ साधन संसार कूप से निकालने वाला नहीं है।
दान
जो उत्तम पात्र विशेष के लिए उत्तमभक्ति से एक दिन भी दान देता है, उसका वह दान उसे इन्द्र का उत्तम सुख देता है।
दान
लोक में भोजन कराने से कौन मनुष्य वश में नहीं होता? क्योंकि आटे के लेप से मृदङ्ग भी मधुर शब्द करता है।
दान
गृहत्यागी साधुओं को दिया हुआ दान घर के कार्यों से संचित पापों को उस तरह धो देता है, जैसे पानी खून को धो देता है।
दान
मुनि को दान देकर जो भोजन करता है वह उत्तम श्रावक है, जो मुनि के आहार को देखकर भोजन करता है वह मध्यम श्रावक है और जो मुनि के आहार की बेला टालकर भोजन करता है वह जघन्य श्रावक माना जाता है और जो मुनि के आहार के पहले भोजन करता है, वह जघन्य से भी जघन्य श्रावक माना जाता है।
दान
मयूरपिच्छि देने वाला सपरिवार दीर्घायु होता है और कमण्डलु देने से निर्मल शरीर तथा निर्दोष व्रत का धारक होता है।
दान
वर्तमान में जितना मिला वह पूर्व दान का ही फल है।
दान
व्याज से कुछ समय में धन दूना हो जाता है, व्यापार से चौगुना, भूमि में बोने से सौ गुना एवं पात्र को दान देने से अनन्त गुना फल प्राप्त होता है।
दान
दाता निम्न कुल में भी हो तो भी लोग उसके पास जाते हैं, कञ्जूस उच्च कुल वाला भी हो तो भी लोग उसके पास नहीं जाते जैसे समुद्र के पास कोई नहीं जाता और कुंए के पास सब लोग जाते हैं।
दान
जो मोक्षमार्गी साधु का नाम मात्र लेता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं तब जो भोजन, औषध और आश्रय आदि देकर उपकार करता है वह मनुष्य संसार समुद्र से पार हो जाता है इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
दान
घर पर शत्रु के आने पर भी सज्जन लोग मिष्ट वचन आसन आदि के द्वारा सम्मान करते हैं, फिर गुणों के भण्डार साधु के आने पर सज्जन लोग क्या नहीं करते हैं?
दान
मिथ्यादृष्टि की भी आहार दान में रुचि होती है दान की अनुमोदना से पशु भी भोगभूमि में जाता है, वहाँ पर कल्पवृक्ष सदा मनोरथों को पूर्ण करते हैं, फिर सम्यग्दृष्टि के कौन से मनोरथ पूर्ण नहीं होंगे अर्थात् सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं?
दान
सेठ की सम्पत्ति बीस हजार- धनी सेठ से साधु ने पूँछा तुम्हारी कितनी सम्पति है सेठ ने कहा बीस हजार क्योंकि हमने इतना ही दान दिया है, बाकी की सम्पत्ति परिवार की है, अर्थात् जितना दान देते हैं उतना ही अपना मानना चाहिए।
दान
आहार का दाता- इस अवसर्पिणी में दान तीर्थ के कर्ता राजा श्रेयाँस हुये, जिनकी यश चन्द्रिका लोक में फैली है, तीर्थंङ्कर या ऋद्धिधारी मुनि को आहार देने से पञ्चाश्चर्य होते हैं, तीर्थंङ्कर का प्रथम आहारदाता तद्भव मोक्षगामी होता है, राजा श्रेयाँस का दस भव पूर्व का संस्कार था, भरत चक्रवर्ती राजा श्रेयाँस के दर्शनार्थ आये, छेवले के वृक्ष के नीचे राजा श्रेयाँस का सम्मान किया था, उसी दिन से अक्षय तृतीया पर्व प्रारम्भ हुआ था।
दान
अतिथि को खिलाकर खाओंगे तो वह भोजन भी पूजन बन जायेगी, अर्जन के साथ विसर्जन जरूरी है।
दान
दान तो हजार गुणा होकर लौटता है, इतना दान भी मत करो कि किराये के मकान में रहना पड़े और इतना सङ्ग्रह भी मत करो कि नरक जाना पड़े।
दान
मन में नवधा भक्ति लेकर, तू जो दान करेगा। ऊपर वाला तेरा खजाना, रातों रात भरेगा।। जञ्जीरों में बँधी चन्दना, दान नहीं बँध पाये, इक्षु रस देकर श्रेयाँस भी दान तीर्थ कहलाये, अञ्जुलि भर देने वाले, दरिया (समुद्र) भरके मिलेगा।। ऊपरवाला।। पुण्य कोश तेरा रिक्त हो रहा, कुछ तो सञ्चय कर ले, नादानी को छोड़ रे मानी, दान को अक्षय करले। पद रज श्री चरणों की ले ले, शिवपद तुझको मिलेगा।। ऊपरवाला।। जिसने दिया उसी ने पाया, जो जोड़े सो छोड़े, खाता-वही सही रख पगले, कलम काहे को तोड़े, कैसे मिलेगा वक्त पड़े जब, जमा ही कुछ न करेगा।। ऊपरवाला।।
दान
पूरी दुनिया को आहार कराने का पुण्य एक तरफ और एक मुनि को आहार कराने का पुण्य एक तरफ।
दान
हजार मिथ्यादृष्टि के बराबर एक जैनी, हजार जैनी के बराबर एक सम्यग्दृष्टि, हजार सम्यग्दृष्टि के बराबर एक व्रती ब्रह्मचारी, हजार व्रती ब्रह्मचारी के बराबर एक क्षुल्लक जी, हजार क्षुल्लक जी के बराबर एक आर्यिका, हजार आर्यिका के बराबर एक मुनि, हजार मुनियों के बराबर एक ऋद्धिधारी मुनि, हजार ऋद्धिधारी मुनियों के बराबर एक तीर्थंङ्कर को आहार देने में उत्तरोत्तर ज्यादा पुण्य होता है।
दान
राजा भोज बहुत दानी थे, मन्त्रियों को चिन्ता हुई कि राज्य का सञ्चालन कैसे होगा, अतः उन्होंने राजा से कहा, 'आपदार्थे धनं रक्षेत्' आपत्ति काल के लिए धन की रक्षा करना चाहिए, राजा भोज ने कहा, 'श्रीमतां कुत आपदा' भाग्यवानों को विपत्ति कहाँ से आ सकती है, मन्त्रियों ने कहा, 'दैवात् क्व चित् समायाति' दुर्भाग्य से कहीं से आ गयी तो, राजा ने कहा, 'सञ्चितोऽपि विनश्यति' पाप के उदय से सञ्चित धन भी नष्ट हो जाता है।
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