रे खर्जूरानोकह!, किमेवमुत्तुङ्गमानमुदवहसि। छायापि ते न भोग्या, पान्थानां किं फलैरेभिः॥
हे खजूर के वृक्ष! तू अपने ऊँचे होने का अहङ्कार क्यों करता है, फल तो दूर तेरी छाया भी तो राहगीरों के काम नहीं आती है, यहाँ खर्जूर अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! तू अपने सम्पन्न होने का अहङ्कार क्यों करता है क्योंकि, धन की तो बात दूर तेरा तन भी तो किसी के काम नहीं आता है।
O date-palm! Why be so proud of your height? Not to speak of your fruit, even your shade is of no use to travelers. By this date-palm allegory it is said: O wealthy, why be proud of your affluence, for—let alone your wealth—even your body is of no use to anyone.
— आराध्य सूत्र · #58
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