क्षितिगतमिववटबीजं, पात्रगतं दानमल्पमपि काले। फलतिच्छाया विभवं, बहुफलमिष्टं शरीरभृतां॥
पात्र को दिया हुआ थोड़ा भी दान, समय पाकर प्राणियों को वट वृक्ष की तरह बहुत फल देने वाला होता है।
Even a small gift given to a worthy recipient, in time, yields to beings much fruit—like a banyan seed sown in the earth—along with shade and abundance.
— आराध्य सूत्र · #65
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