सद्यागते किल विपक्ष जनेऽपि सन्तः, कुर्वन्ति मानमतुलं वचनासनाद्यैः। यत्तत्र चारुगुणरत्न निधान भूते, पात्रे मुदावहति किं क्रियते न शिष्टैः।।
घर पर शत्रु के आने पर भी सज्जन लोग मिष्ट वचन आसन आदि के द्वारा सम्मान करते हैं, फिर गुणों के भण्डार साधु के आने पर सज्जन लोग क्या नहीं करते हैं?
Good people honour even an enemy who comes to their home with sweet words and a seat; then what will they not do when a sadhu, a treasury of virtues, arrives?
— आराध्य सूत्र · #9
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