साक्षात् मनो-वचन-काय विशुद्धि शुद्धः, पात्राय यच्छति जनो ननु भुक्ति मात्रं। यस्तस्य संसृति समुत्तरणैक बीजे, पुण्ये हरि र्भवति सोऽपि कृताभिलाषा॥
जो मनुष्य मन-वचन-काय की विशुद्धि से शुद्ध होकर पात्र के लिए आहार मात्र देता है, जो कि संसार समुद्र से तैरने के लिये बीज के सामान है, उसके पुण्य के लिए इन्द्र भी अभिलाषा करता है।
The man who, purified in mind, speech and body, gives even just food to a worthy recipient—which is like a seed for crossing the ocean of samsara—even Indra craves his merit.
— आराध्य सूत्र · #60
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