Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
दान

द्रव्य भाव शुद्धि- द्रव्य से शुद्ध भोजन भी भाव के अशुद्ध होने से अशुद्ध हो जाता है, क्योंकि अशुद्ध भाव बन्ध के लिए और शुद्ध भाव मोक्ष के लिए है, नव कोटि से विशुद्ध दान बहुत फल दायक होता है, दाता की विशुद्धता देय-भोज्य को और पात्र को पवित्र करती है, देय की शुद्धता दाता और पात्र को पवित्र करती है और पात्र की शुद्धि दाता और देय को पवित्र करती है।

Purity of substance and intention: even substantially pure food becomes impure when the intention is impure, for impure intention leads to bondage and pure intention to liberation. Charity pure in the nine ways yields much fruit; the donor's purity sanctifies the gift and the recipient, the gift's purity sanctifies the donor and recipient, and the recipient's purity sanctifies the donor and the gift.

— आराध्य सूत्र · #30

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परोपकार में सर्वदा संलग्न रहने वाला सज्जन व्यक्ति विनाश के अवसर पर भी विनाश करने वाले से भी शत्रु भाव नहीं रखता है जैसे चन्दन का वृक्ष काटने वाले कुल्हाड़े का भी मुख सुगन्धित कर देता है।
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