भुक्ति मात्र प्रदाने तु, का परीक्षा तपस्विनां। ते सन्तः सन्त्वसन्तो वा, गृही दानेन शुद्ध्यति॥
आहार मात्र देने के लिए साधु की परीक्षा नहीं करना चाहिए, वे भावलिंगी हो या न हो गृहस्थ तो दान देने से शुद्ध होता है।
For merely giving food one should not test the monk; whether or not he is a true (bhavalingi) ascetic, the householder is purified by the very act of giving.
— आराध्य सूत्र · #67
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