Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
दान

आत्म वित्त परित्यागात्, परैर्धर्म विद्यापने। अवश्यमेव प्राप्नोति, पर भोगाय तत् फलं॥

जो अपने धन का स्वयं दान न करके दूसरों से करवाता है, वह भोगों को अवश्य प्राप्त होता है पर उसका भोग दूसरे करते हैं।

One who, instead of giving his own wealth himself, has others give it, will surely obtain enjoyments—but others will enjoy them.

— आराध्य सूत्र · #70

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परोपकार में सर्वदा संलग्न रहने वाला सज्जन व्यक्ति विनाश के अवसर पर भी विनाश करने वाले से भी शत्रु भाव नहीं रखता है जैसे चन्दन का वृक्ष काटने वाले कुल्हाड़े का भी मुख सुगन्धित कर देता है।
दान