Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Charity

दान

491 सूत्र · पृष्ठ 5 / 7

अनाकुलता का मूल प्रसिद्धि नहीं आत्म विशुद्धि है, मंदिर की द्रव्य थाली भर चढ़ाते हैं, पुण्य झोली भर चाहते हैं और दान एक रुपया नहीं देना चाहते, जो ऐसा करते हैं वे मंदिर से लोन लेते जाते हैं किन्तु जमा कुछ नहीं करते हैं।
दान
बरसात न अच्छी होती न खराब जरूरत पर निर्भर है, उसी प्रकार दान जहाँ, जितना, जो आवश्यक है वहाँ उतना, वही महत्त्वपूर्ण हैं।
दान
कल एक इंसान रोटी माँगकर ले गया और करोड़ों कि दुआयें दे गया, पता नहीं चला कि गरीब वो था कि मैं।
दान
किसी गरीब की झोली में १ रुपया डाला तब पता चला कि मँहगाई के इस दौर में आज भी 'दुआएँ' कितनी सस्ती हैं और दुआएँ असंभव को संभव बनाती हैं।
दान
कभी आप दूसरों के लिए भगवान् से कुछ माँग कर देखे, तुम्हें अपने लिए कुछ माँगने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
दान
दान गरीबी को खत्म करता है, अच्छा आचरण दुःख को मिटाता है, विवेक अज्ञान को मिटाता है, जानकारी डर खत्म करती है।
दान
गरीबी को दान से हटाएँ, पुराने कपड़े स्वच्छ रखें, कुरूपता अच्छे व्यवहार से हटायें।
दान
आपको यदि देने में खुशी होती है तो आपको कोई उदास नहीं कर सकता है और यदि आपको सिर्फ लेने में खुशी होती है तो आपको कोई हमेशा खुश नहीं रख सकता है।
दान
अतिथि सत्कार से विमुख होना ही बड़ी दरिद्रता है और मूर्खों की असभ्यता को सह लेना ही बड़ी वीरता है।
दान
दया दो तरफी कृपा है, इसकी कृपा दाता पर भी होती है और पात्र पर भी।
दान
संसार का सर्वश्रेष्ठ दान ज्ञान है क्योंकि इसे चोर चुरा नहीं सकते न कोई इसे नष्ट कर सकता है, यह निरंतर बढ़ता रहता है और लोगों को स्थाई सुख देता है।
दान
आभारी बनाने की इच्छा से रहित होकर जो दया की जाती है, स्वर्ग और पृथ्वी दोनों मिलकर भी उसका बदला नहीं चुका सकते हैं।
दान
दानी को राजा और त्यागी को महाराज कहा जाता है।
दान
त्याग का स्वभाव दयालु है तो दान का स्वभाव ममतामय है।
दान
जिसके कर-कमल में दानरूपी अमृत है, मुख कमल में वचन रूपी अमृत है और हृदयकमल में दया रूपी अमृत है वह मनुष्य सभी को प्रिय होता है।
दान
स्त्री, बालक, रोगी, दास, पशु, धन, विद्याभ्यास, साधु पुरुषों की सेवा की एक क्षण भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए।
दान
सेवा से बढ़कर कोई सुख नहीं, प्रेम से बढ़कर कोई प्रार्थना नहीं, सहानुभूति से बढ़कर कोई सौन्दर्य नहीं होता है।
दान
दरिद्रों में दरिद्र वह है जो अतिथि सत्कार न करें।
दान
ज्ञानदान तत्काल आनन्द देने वाला है,उससे प्राणी सांसारिक सुखों से तृप्त होकर मोक्ष में सदा आनन्द करता है, अत: चारों दानों में सर्वश्रेष्ठ ज्ञानदान है।
दान
जिसके कर-कमल में दानरूपी अमृत है, मुख कमल में वचन रुपी अमृत है, हृदय कमल में दया रुपी अमृत है वह मनुष्य किस को प्रिय नहीं होता है? अर्थात् सभी को प्रिय होता है।
दान
जिसने दोनों हाथ दान की विधि में, मन जैनमत में, वचन सत्य और प्रिय भाषण में, प्राण सब मनुष्यों का उपकार करने में और धन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा महोत्सवों में सैकड़ों बार लगाया है, ऐसा तीन लोक का अद्वितीय तिलक भाग्यशाली श्रावक पञ्चम काल में भी होता है।
दान
धार्मिक कार्यों में कञ्जूसी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कञ्जूसी के दोष से मनुष्य नियम से दरिद्र होता है।
दान
जिसका जन्म गुरुसेवा में, मन समीचीन ध्यान की चिन्ता में और धन का उपयोग सत्पात्र दान में जाता है, वह पण्डित है।
दान
श्रावक दान के द्वारा उत्तम भोग को, पूजा के द्वारा जगत् के स्वामित्व को, ब्रह्मचर्य के द्वारा कुल के ऐश्वर्य को और उपवास के द्वारा निर्वाण सुख को प्राप्त होता है।
दान
आप जितना देते हैं उससे अधिक पाते हैं, आप अपना ज्ञान दूसरों को देकर अधिक ज्ञानवान बनते हैं, खुशी देकर प्रसन्न बनते हैं, धन देकर सम्पन्न बनते हैं, इसलिए दूसरों को देने में उदार बनो क्योंकि जो देते हैं वे बचाते हैं, जो बचाते हैं वे खो देते हैं।
दान
दूसरों से आशा मत रखिये- किसी को दी गयी सहायता के बदले जैसे ही कुछ पाने का विचार मन में आता है, और यह शुद्ध कार्य व्यापारिक लेन-देन में बदल जाता है।
दान
बेझिझक सहायता दीजिए और लीजिए- यदि कोई सहायता न दे या न ले तो द्वेष न करें, जितना आप देते हैं, उससे अधिक आपको मिलता ही है।
दान
आप जो भी देते हैं, वह कई गुना होकर आपके पास वापस आता है, सलाह दें या भावना दें, यदि वापस कभी नहीं भी मिलते हैं तो आत्म सन्तोष का परम सुख दायक उपहार आप प्राप्त करते हैं।
दान
घूँस कानून को मोल ले लेती है, दान से कोई कङ्गाल नहीं बनता, दया वह भाषा है जिसे बहरे भी सुन सकते हैं और गूँगे भी समझ सकते हैं।
दान
परोपकार करना चाहिए परन्तु अध्यक्ष नहीं बनना चाहिए, हर कार्य की शुरुआत मुस्कान से कीजिए।
दान
अपनी कला दूसरों को सिखाइए, आपकी सफलता विश्वव्यापी हो जाएगी।
दान
उदारता का पहला अधिकारी अपना भाई है बाद में पडोसी या पात्र दान है।
दान
जीवन की सर्वोच्च शैली का सूत्र- 'न्यूनतम लेना, अधिकतम देना और श्रेष्ठतम जीना' है।
दान
उदारता का हर कार्य स्वर्ग की ओर एक कदम रखता है।
दान
जन्मदिन होटल में दोस्तों को पार्टी देकर या पर्यटन स्थल की सैर करके, मोमबत्ती बुझाकर और केक काटकर नहीं, बल्कि किसी गरीब को पढ़ा लिखाकर योग्य बनाने से मनाना सार्थक होगा।
दान
भलाई करना एक व्यापार है, जिसका फल ब्याज सहित अवश्य मिलता है।
दान
दान परिग्रह का प्रायश्चित्त है इसमें अभिमान करने की क्या बात है। मन भर चर्चा से कण भर आचरण श्रेष्ठ है।
दान
नदी का जल, वृक्ष का फल, सूर्य की तपन, दीपक का प्रकाश, सन्त का अनुभव व आशीर्वाद सबको प्राप्त होता है।
दान
परोपकार को मित्र बनायें, बहुत सम्पत्ति होने पर भी नियमों का पालन करें, दरिद्र हो कर भी दान करें।
दान
स्वर्गगामी- गरीबों को दान देने वाला, शक्ति होने पर भी क्षमा करने वाला, युवावस्था में तप करने वाला, ज्ञानी होने पर भी मौन रहने वाला, सुख सम्पन्न होने पर भी वैराग्य धारण करने वाला एवं दयावान ये स्वर्गगामी होते हैं।
दान
सौ में एक शूरवीर, हजार में एक ज्ञानी, दस हजार में एक वक्ता, लाखों में एक दानी होता है।
दान
तीन सफलता- धन की सफलता दान में, शक्ति की सफलता सेवा में, विद्या की सफलता विवेक में है।
दान
खुशियाँ समेटो नहीं बाँटो, खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं।
दान
गरीब लोग प्रेम और सहानुभूति के भूखे होते हैं।
दान
दूसरे को कुछ देना यह भी एक कला है, इसे सीखने का प्रयत्न करें।
दान
सबसे बड़ा उपहार प्रेम बाटने से मिलता है उससे सङ्कट का निवारण होता है।
दान
क्या दुःखियों की सेवा करने में आपको आनन्द आता है?
दान
क्या आप दीन-दुखियों की मदद करते हैं?
दान
प्रकृति, विकृति, संस्कृति- भूख लगने पर खाना प्रकृति है, बिना भूख के खाना विकृति है, अतिथि को खिलाकर खाना संस्कृति है।
दान
नष्ट हुआ कूप, वंश, कुल, तालाब, वापी, राज्य, शरणार्थ आये व्यक्ति, गौ, विप्र और विशीर्ण जिनालय इन का उद्धार करने से चार गुणा फल प्राप्त होता है।
दान
सच्चा धर्मात्मा वह नहीं जो भगवान को दो-दो थाली द्रव्य चढ़ाता है, किन्तु सच्चा धर्मात्मा तो वह है जो भोजन करने बैठता है और उसे पता चले कि पड़ोसी भूखा है, तो अपनी आधी थाली उसके घर दे आता है।
दान
मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका की आहार-औषधि आदि के द्वारा प्रशंसनीय सेवा करना दिव्य वात्सल्य कहलाता है।
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जिसका जो धन अथवा शरीर साधर्मी जनों के उपयोग में आता है यथार्थ में वही उसका धन है, जो समर्थ होकर भी आपत्ति के समय सम्यग्दृष्टि की उपेक्षा करता है, उस कठोर हृदय की जिन शासन में क्या भक्ति हो सकती है?
दान
वैय्यावृत्ति- प्रतिकार करने में समर्थ होकर भी रोग से दुःखी सम्यग्दृष्टि की जो उपेक्षा करता है, वह पापी सम्यग्दर्शन का घाती है। जो सम्यग्दृष्टि साधर्मी की भक्ति नहीं करता, वह झूठ-मूठ का विनयी बना फिरता है।
दान
पण्डित पन्नालाल जी सागर वालों का बेटा बीमार हो गया, इन्दौर ले गये, भोजन अपने हाथ से बनाते थे, तो माचिस खरीदने बाजार गये, कहीं माचिस नहीं मिली, पण्डित जी ने पूँछा, तो दुकानदारों ने कारण बताया, कि हमारे यहाँ एक गरीब है, उससे माचिस बिकवाते हैं, ताकि वह भी सम्पन्न हो जाय, यदि हम लोग रुपये देते तो उसको हीनता महसूस होती।
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उपकार करके धन्यवाद न लेकर बदले में दूसरों का उपकार करने की प्रेरणा देना चाहिए।
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अतिथि को पानी, मीठी वाणी, आसन और छाया देने में कृपणता न करें।
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मर जाऊँ माँगू नहिं अपने तन के काज। परोपकार के कारणे मोय न आवे लाज।।
दान
पाप में लीन पुरुष कापुरुष है, पाप से निवृत्त पुरुष पुण्यवान् पुरुष है, निज-पर के हित में संलग्न पुरुष सत्पुरुष है और जिसका परहित करना ही कार्य है वह महापुरुष है।
दान
परोपकार के लिए नदियाँ बहती हैं, गायें दूध देती हैं, वृक्ष फल देते हैं और परोपकार के लिए सज्जनों की प्रवृत्ति होती है।
दान
बदले की आशा विना, सन्त करें उपकार। बादल का बदला भला, क्या देता संसार।।
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स्वार्थ त्याग के साथ में जो होवे उपकार। जलधि से वह अधिक है उसकी शक्ति अपार।।
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परहित सरस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।
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ग्राम वृक्ष के फूल फल, भोगें जैसे लोग। उन्नत मन के द्रव्य का, वैसा ही उपयोग।।
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उपकारी निज को तभी, माने धन से हीन। याचक जब ही लौटते, होकर आशा हीन।।
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अहसान- तुम किसी पर अहसान करो तो भूल जाना, कोई तुम्हारा अहसान करे तो मत भूलना।
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छ: प्रकार के लोग- आत्मम्भरी, कुटुम्बम्भरी, समाजम्भरी, प्रदेशम्भरी, राष्ट्रम्भरी, वसुधैवकुटुम्बकम्।
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नारियल ने प्रथम अवस्था में पानी पिया था, उसका उपकार चुकाने के लिये अपने सिर पर पानी धारण किये रहता है।
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चन्द्रमा समस्त संसार को तो धवल करता है परन्तु अपने में स्थित निज कालिमा को क्यों नहीं साफ करता? इससे पता चलता है कि प्रायः परहित में लीन सज्जनों का अपने कार्य में आदर नहीं होता है।
दान
गरीब गली में एवं धनी मन्दिर में दीप जला रहा था, गरीब को अधिक सुख मिला, धनी को कम सुख मिला, क्योंकि अन्धेरी गली में प्रकाश की जरूरत थी, मन्दिर तो स्वभाव से जगमगा रहा था, मन्दिर में दीपक रखना स्वार्थ है, गली में दीपक रखना परोपकार है, इसलिए दोनों के सुख एवं पुण्य में अन्तर है।
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डबल परीक्षा-पेपर दूँ या जान बचाऊँ- परीक्षा देने जा रहे बच्चे ने रास्ते में पड़ी घायल बुढ़िया का इलाज करवाया, जब चिकित्सक ने कहा अब कोई खतरा नहीं है तब वह विद्यालय गया, तो प्राचार्य ने प्रवेश नहीं दिया, उसने रास्ते का सारा हाल सुनाया, प्राचार्य ने फ़ोन पर चिकित्सक से पूँछा, चिकित्सक ने कहा हाँ मैं आपको धन्यवाद देने ही आ रहा था, क्योंकि आपके विद्यालय में परोपकार की शिक्षा दी जाती है, बाद में बच्चे ने परीक्षा दी, परिणाम में वह प्रथम आया, प्राचार्य ने समस्त विद्यार्थियों के सामने उसका सम्मान किया और कहा ये हमारे विद्यालय की शान है।
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महात्मा ने घायल पड़े सिपाही से कहा शास्त्र सुनोगे? सिपाही बोला नहीं, पानी पीऊँगा, महात्मा पानी ले आया, कहा सिर ऊँचा करोगे? कर दिया, सेवा से द्रवीभूत होकर मरणोन्मुख सिपाही की आँखों में आँसू आ गये और उसने कहा महाराज मैंने धर्म ग्रन्थ नहीं पढ़े लेकिन आपके सेवा भाव से धर्म ग्रन्थों का रहस्य समझ में आ गया है कि परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है और पर को पीड़ा देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।
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परोपकार से स्वोपकार भी होता है, कीचड़ में फँसे हुए गधे को देखकर न्यायाधीश अपनी गाड़ी से उतर कर उसे बाहर निकालने लगे, ड्राईवर ने कहा अरे साहब आप क्या कर रहे हैं मैं निकाल देता हूँ, उन्होंने नहीं सुना और गधे को निकाल दिया, कपड़े गन्दे हो गये थे, किन्तु समय नहीं था कि कपड़े बदल सकें, उसी हालत में अदालत पहुँच गये, मित्रों ने पूँछा कि आपको आज क्या हो गया इतने गन्दे कपड़े क्यों हैं? नौकर ने सारा समाचार सुनाया और कहा साहब बड़े दयालु हैं, जज ने कहा! नहीं भैया मैंने कुछ नहीं किया, मैंने अपनी ही पीड़ा कम की है।
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एक बहुत गरीब परिवार था, एक बार जङ्गल में एक भविष्य वक्ता सन्त आये थे, माँ ने बेटे से कहा! तुम जाकर पूँछो हमारे दुःख के दिन बीतेंगे या भूखे ही मरते रहेंगे, माँ के आग्रह से बेटा सन्त के पास चला, चलते-चलते शाम हो गयी, एक गाँव में सेठानी की कोठी के पास जाकर पूँछा क्या हम यहाँ रात व्यतीत कर सकते हैं? स्वीकृति दे दी, सेठानी ने पूँछा कहाँ जा रहे हो? लड़का बोला! माँ का प्रश्न पूँछने सन्त के पास जा रहा हूँ, सेठानी ने कहा एक प्रश्न मेरा भी पूँछ आना, मेरी बेटी गूँगी है, वह कभी बोलेगी या नहीं, शादी होगी या नहीं? आगे बढ़ा तो जङ्गल में प्यास बुझाने तापस की झोपड़ी में गया, तापस ने पानी पिलाकर पूँछा कहाँ जा रहे हो? सन्त के पास प्रश्न का उत्तर लेने, तापस ने कहा, एक प्रश्न मेरा भी पूँछ आना, मुझे पच्चीस वर्ष तप करते हो गये परमात्मा का दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? आगे बढ़ा भूख से पीड़ित हुआ तो हल जोत रहे किसान से भोजन माँगा, उसने भोजन करा दिया और पूँछा कहा कहाँ जा रहे हो? उसने बताया तो किसान बोला हमारा भी एक प्रश्न पूँछ आना, मेरे खेत में फसल होती है पर फल नहीं लगते क्या कारण है? सन्त के पास पँहुच कर अभिवादन कर कहा कृपया हमारे चार प्रश्नों का समाधान करें, सन्त ने कहा! हम एक दिन में तीन प्रश्नों का ही समाधान करते हैं, उसने सोचा किसका प्रश्न छोड़ दूँ? माँ का प्रश्न छोड़कर सबसे पहले सेठानी का प्रश्न पूँछा, सन्त ने कहा! जिसको देखकर लड़की बोलने लगेगी, वही उसका वर होगा, तापस के प्रश्न के उत्तर में कहा! तापस की दाढ़ी में जब तक मणि रहेगी तब तक परमात्मा का दर्शन नहीं होगा, किसान के खेत में जब तक सोने-हीरे के घड़े गढ़े रहेंगे, तब तक फसल नहीं आयगी, उत्तर लेकर वापस चला, किसान को बताया तो उसने घड़े निकाल कर उसी को दे दिये, तापस ने भी मणि उसी लड़के को दे दी, सेठानी की लड़की उसी लड़के को देखकर बोलने लगी, तो उसने उसी के साथ शादी कर दी, माँ के पास गया माँ आश्चर्य में थी, उसने कहा माँ परोपकार करने वाले का उपकार स्वयं हो ही जाता है।
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पिता पुत्र यात्रा पर निकले प्यासे बेटे से एक कदम भी चला नहीं जा रहा था, पिता ने धैर्य बँधाया बेटा सामने हवेली दिख रही है, वहाँ पानी अवश्य मिलेगा, किसी तरह वहाँ पहुँचे, पर प्याऊ पर कोई पानी पिलाने वाला नहीं था, बच्चा पानी-पानी चिल्ला रहा था, सेठ जी मस्ती से गद्दी पर बैठे हुए थे, पिता ने साहस करके सेठ जी से कहा सेठ जी पानी पिला दीजिये, सेठ जी ने कहा थोडा इन्तजार करो, पिता ने दुबारा निवेदन किया तो सेठ जी ने कहा अभी आदमी नहीं है, तब पिता ने कहा थोड़ी देर के लिए आप ही आदमी बन जाइए, संसार में सब कुछ है पर आदमियत (इंसानियत) की कमी है, अतः आदमी को पहले आदमियत प्राप्त करना चाहिए बाद में दूसरी चीजें।
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