Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Charity

दान

491 सूत्र · पृष्ठ 7 / 7

सज्जन को पुत्र मरण का इतना शोक नहीं होता, जितना आहारदान से रहित दिन का शोक होता है।
दान
जैसे बिल में सर्प अकेला ही जाता है, वह घर भी बिल के सामान है जहाँ अतिथि नहीं आते हैं, रोटी, कपड़ा और मकान से मनुष्य पर्याय की सार्थकता नहीं होती है।
दान
दान करने वालों को दवा नहीं खाना पड़ती, जो दान नहीं करता उसका धन दवाखाने में जाता है।
दान
पहले लोग सोचते थे कोई आवे तो हम खावें, अब सोचते हैं ये जावें तो हम खावें, यही संस्कृति में विकृति है।
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रामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मण के साथ वन-वन भटकते हुए एक ऐसे महा एकान्त वन में आये, जहाँ राम-लक्ष्मण और सीता ने स्नान पूर्वक शुद्धि से भोजन तैयार किया और पड़गाहन के लिए बाहर खड़े हुए, तो सीता ने आकाश मार्ग से चारण ऋद्धिधारी दो मुनि आते हुए देखे, राम-सीता ने उनका पड़गाहन कर नवधाभक्ति पूर्वक निरन्तराय आहारदान दिया, वहाँ एक वृक्ष पर गिद्ध पक्षी (जटायु) बैठा था, आहार चर्या देख उसको जातिस्मरण हो गया, महामुनि के दर्शनार्थ वृक्ष से नीचे आया, मुनियों के गन्धोदक के प्रभाव से उसका शरीर महाकान्ति से युक्त हो गया और भक्ति करता हुआ मुनि के आगे नाचने लगा तथा पाप से डरकर श्रावक के व्रत ग्रहण किये और व्रती बना।
दान
सेठ ने धीवर को एक रुपये का दान दिया, उसने जाल खरीद कर मछली मारना शुरू कर दिया, सेठ कङ्गाल हो गया, मुनि से पूँछा तो उन्होंने कहा, तुमने धीवर को दान दिया है, जिससे ऐसा हुआ।
दान
दान से अच्छा कोई धर्म नहीं- कञ्जूस सेठ धर्म कर्म से दूर रहता था, पत्नि धार्मिक थी, एक बार नगर में सन्त आये, दान पर प्रभावी प्रवचन हुआ, सेठजी भी प्रवचन सुनने गये थे, पत्नि ने पूँछा प्रवचन अच्छा लगा? सेठ ने कहा आज के प्रवचन का सार यह है कि दान से अच्छा कोई धर्म नहीं, इसलिये कल से दान माँगने का कार्य प्रारम्भ करूँगा।
दान
गाय का दूध, बगिया के पुष्प, विद्या, कुंए का जल और धन नित्य देते रहने से बढ़ते हैं और नहीं देने से घट जाते हैं।
दान
धर्म की इमारत त्याग की नींव पर खड़ी है, माँगो उसी से, जो दे खुशी से, कहे न किसी से।
दान
समय पर दिया दान, भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, रोगी को औषधि, मूर्खों को ज्ञान ये सबसे अमूल्य दान है।
दान
विना दिये कभी सोना नहीं, देकर कभी रोना नहीं, धर गये सो खो गये, दे गये सो ले गये।
दान
प्रकृति का नियम है कि आज का दिया हुआ कल हजार गुणा होकर लौटता है।
दान
बाँध के अभाव में नदी का जल ठहरता नहीं, बाँध के द्वारा जल को रोकने के बाद यदि उसे छोड़ा न जाय तो खतरनाक स्थिति निर्मित होती है, जो जोड़ते गये, बे डूबते गये, जो छोड़ते गये, वे पूज्य हो गये।
दान
सुरा और सुन्दरी में धन को बहाने वाले बहुत हैं, किन्तु मानव सेवा, धर्म, संस्कृति, देश उत्थान में खर्च करने वाले विरले ही हैं।
दान
कोई मर कर के देता है, कोई देकर के मरता है, जरा से फर्क से बनते ज्ञानी और अज्ञानी। धन की रक्षा है मञ्जूर, तो धन वालों बनो दानी, कुंए से गर नहीं निकला, तो सड़ जायेगा पानी।।
दान
पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम। दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम।।
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भिखारी भीख नहीं माँगते हैं घर-घर जाकर शिक्षा देते हैं कि हे लोगों! दान दो-दान दो मैंने पहले दान नहीं दिया था इसी कारण मुझे आज भीख माँगनी पड़ रही है।
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राजा अरिञ्जय ने दो चारणऋद्धि धारी मुनियों को आहारदान दिया, पञ्चाश्चर्य हुये, सोलहकारण भावना भायी, तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया, वे 16वें तीर्थंङ्कर शान्तिनाथजी बने।
दान
दानवीर की चेरी- दानवीर सेठ की लक्ष्मी रोज सेवा करती थी, किसी ने इसका रहस्य समझना चाहा, लक्ष्मी ने कहा मेरा पति वह है जो मेरा सदुपयोग करता है मैं उसकी चरण चेरी बन जाती हूँ, जो सञ्चित करता है उसके लिये खञ्जर बन जाती हूँ।
दान
लक्ष्मी पुण्य से आती है और पुण्य पात्रदान से होता है, और साधु को केवल आहारदान दिया जा सकता है, इसलिए जिनालय वनवाकर लक्ष्मी का सदुपयोग करना चाहिए, क्योंकि मन्दिर में सारे पवित्र कार्य होते हैं, हजारों वर्ष तक प्रतिमाएँ पूजी जाती हैं।
दान
दान दुर्गति का नाशक है, हित करने वाला है, अतः दान में आलस नहीं करना चाहिए, दान के द्वारा ही गृहस्थी गुणवती मानी गयी है, बुद्धिमानों का प्रयत्न दान के लिए हुआ करता है, दान को छोड़कर कोई उत्तम सुख का देने वाला नहीं है, समझदार ही दान देते हैं, दान ही पात्र के मन को अपनी ओर खींचता है, अतः यही कहना है, कि सब लोग दान जरूर दिया करें।
दान
अकृतपुण्य ने अवधिज्ञान से स्वर्ग का कारण पात्रदान व्रतादि की भावना को जाना।
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सुपात्र दान णमोकार स्मरण आदि उत्तम भावना भाओ।
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देखो दुःखी और दरिद्र अकृतपुण्य केवल दान की भावना से तथा थोड़े से दान के फल से धन्यकुमार हुआ फिर तपकर सर्वार्थसिद्धि गया अतः गृहस्थों को दान की शिक्षा लेना चाहिए।
दान
धन्यकुमार चरित्र- अकृतपुण्य नामक दरिद्र जीव ने पूर्व भव में बलभद्र माँ के घर रहते हुए मासोपवासी सुव्रत मुनि को दान की भावना व नवधाभक्ति सहित खीर का आहार दिया, उसी पुण्य से वह अगले भव में धनपाल वैश्य का पुण्यशाली पुत्र धन्यकुमार हुआ, जिसके पुण्य से निधियाँ प्रकट हुईं; ईर्ष्यालु भाइयों के अनेक उपद्रव णमोकार मन्त्र व पुण्य के प्रभाव से टलते रहे, अन्त में वर्धमान भगवान् के समवसरण में दीक्षा लेकर, बाईस परीषह सहते हुए महामुनि बनकर सल्लेखना पूर्वक मरण कर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ और मोक्षगामी है — यह कथा दान के श्रेष्ठतम फल को दर्शाती है।
दान
बहु धन बुरा हु भला कहिए, लीन पर उपकार सो।
दान
धन को मौज़-शौक में कभी उपयोग न करना, रावण ने मौज़-शौक किया था जनक ने सेवा की थी, धन सदा रहेगा भी नहीं, इसलिये जितने दिन पास में हैं उसका उपयोग सेवा के लिये करो, अपने ऊपर कम खर्च करो, बाकी दुःखियों के दुःख दूर करने में व्यय करना।
दान
सदा यह ध्यान रखना कि तुम्हारा यह धन जनता की धरोहर है, तुम उसे अपने स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं करना।
दान
भरत-बाहुबली ने बन्दर और नेबला की पर्याय में दान की अनुमोदना की थी, उसके बाद उन्होंने कभी दान नहीं दिया, अत: इनको जाति स्मरण नहीं हुआ, राजा श्रेयाँस ने श्रीमति (वज्रजङ्घ की पत्नी) की पर्याय में आहार दान दिया था, इसलिये उनको जाति स्मरण हो गया था।
दान
राजा श्रेयांस-आहारदान- राजा श्रेयाँस के जीव श्रीमति और आदिनाथ जी के जीव वज्रजङ्घ ने दस भव पूर्व चारण ऋद्धि के धारक अपने ही दो पुत्रों के लिए जिस विधि से दान दिया था, वह सब विधि भगवान् के दर्शन करते ही श्रेयाँस की स्मृति में आ गयी, आहार के बाद ऋषभ देव तप की वृद्धि के लिए वन को गये तब देवों ने अभिषेक पूर्वक दान तीर्थङ्कर राजा श्रेयाँस की पूजा की थी। दान, पूजा, तप और शील यह गृहस्थ का चार प्रकार का धर्म शरीर से करने योग्य है।
दान
दान-पूजा श्रावक के लिए मुख्य हैं, ध्यान-अध्ययन साधु के लिए मुख्य हैं, दान से सारभूत चक्रवर्ती के भोग प्राप्त होते हैं, पूजा से देवों द्वारा पूज्य तीर्थंकर पद की प्राप्ति होती है।
दान
क्षायिक सम्यक्त्व, दान व दान की अनुमोदना से भोगभूमि की प्राप्ति होती है (पृ.329)।
दान
भरत क्षेत्र में अठारह कोड़ाकोड़ी सागर तक दाता-पात्र का अभाव था, इतने काल तक भोगभूमि थी, (षट्काल का वर्णन)।
दान
लोग आहार विधि से अपरिचित थे। अठारह कोड़ा-कोड़ी सागर काल का अन्तराल हो गया था, लोग वस्त्र, आभूषण, राज्य, कन्या, आदि वस्तुयें दान में देने के लिए दिखाते थे, लेकिन नवधा भक्ति नहीं जानते थे इसलिये आदिनाथ जी नहीं रुके थे।
दान
राजा श्रेयाँस ने अपने भाई सोम और लक्ष्मीमति से कहा आप हमारे साथ पड़गाहन करने चलो, हम जैसा कहें वैसा करते जाना, राजा श्रेयाँस ने आदिनाथ जी का पड़गाहन किया और हर्ष के आसुओं से पाद प्रक्षालन किया, इक्षुरस से आहार सम्पन्न हुआ। पञ्चाश्चर्य हुये, अक्षीण महानस हो गया, उस दिन सारे नगरवासियों ने इक्षुरस का पान किया था किन्तु समाप्त नहीं हुआ, वह दिन अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। भरतचक्रवर्ती को मालूम हुआ कि भगवान् का आहार हो गया है। तो वे हस्तिनापुर आये, श्रेयाँस के घर गये। वे भगवान् को भेज कर वन से वापस आ रहे थे। भरतचक्रवर्ती वन जा रहे थे, छेवले के वृक्ष के नीचे बैठकर चक्रवर्ती का श्रेयाँस और सोमप्रभ से मिलन हुआ था, चक्रवर्ती ने श्रेयाँस को दान तीर्थंङ्कर की घोषणा की थी।
दान
आदिनाथ जी धर्मतीर्थ के प्रवर्तक हुए थे। श्रेयाँस जी दानतीर्थ के प्रवर्तक हुए थे। भरतजी आदिनाथ जी के केवलज्ञान के समय चक्रवर्ती बने थे।
दान
प्रथम मुनि को प्रथम बार आहार दान देने वाले श्रेयाँस और सोमप्रभ उसी भव से मोक्ष पधारे।
दान
सन्तों की सेवा, पात्र को दान और सन्तान ये स्वयं करना पड़ते हैं नौकर से काम नहीं चलता है।
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आदिनाथ भगवान के परिवार की तरह आचार्यश्री के परिवार ने भी दीक्षा ली, यह कम नहीं, परोपकार के कार्य करके आज भी सैकड़ों जैन बना कर आचार्यश्री द्वारा आहार किया जाता है।
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चादर दान- जबलपुर कमानिया गेट पर चादर दान दी, तीन हजार में बोली गयी और वह राशि आजाद हिन्द की फौज को भेंट कर दी, यह थी देशभक्ति।
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पण्डित गोपालदास जी 1958 में बम्बई में रुई व चाँदी का व्यापार करते थे, एक व्यापारी को पचास हजार की रुई बेची, दूसरे दिन वह सस्ती हो गयी, उसको दस हजार का घाटा लग गया, उसने कहा पण्डित जी हमारा मकान ले लो कर्जा चुक जायगा, पण्डित जी बोले मैं खून पीकर पेट नहीं भरता, मैं तुम्हारा मकान ले लूं और तुम्हारे बच्चे दर-दर फिरें, मैं ऐसा नहीं कर सकता, न हमें मकान चाहिये न रुपया।
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