व्याजेन द्विगुणं द्रव्यं व्यवसायेन चतुर्गुणं। भूम्यां शतगुणं प्रोक्तं पात्रेऽनन्तगुणं भवेत्।।
व्याज से कुछ समय में धन दूना हो जाता है, व्यापार से चौगुना, भूमि में बोने से सौ गुना एवं पात्र को दान देने से अनन्त गुना फल प्राप्त होता है।
By interest wealth doubles in time, by trade it quadruples, sown in the earth it multiplies a hundredfold, but given to a worthy recipient it yields infinite fruit.
— आराध्य सूत्र · #4
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