Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 4 / 41

'आशा' एक नदी है जिसमें मनोरथ रूपी जल है, तृष्णा रूपी तरंगें उठ रही हैं, राग रूपी मगरमच्छ है, वितर्क रूपी पक्षी है, यह नदी धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फेंकने वाली है, इसमें अज्ञान रूपी भँवर हैं, जिनके पार जाना कठिन है और जो अतिगहन हैं, इसके चिन्ता रूपी तट बहुत ऊँचे हैं, इसके पार जाकर विशुद्ध मन वाले योगीराज ही आनन्दित होते हैं।
अनासक्ति
योगी विरक्ति रूपी स्त्री के साथ बड़े वैभवशाली राजाओं की तरह सुख और शान्तिपूर्वक सोता है, पृथ्वी ही उसकी सुन्दर शय्या है, हाथ ही बड़ा तकिया है, आकाश ही चंदोबा है, अनुकूल पवन ही उसका पंखा है, चन्द्रमा ही उसका प्रकाशमान दीपक है।
अनासक्ति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति
जिसने प्रथम बाल्यावस्था में विद्या का अर्जन नहीं किया, द्वितीय युवावस्था में धन का अर्जन नहीं किया और तृतीय प्रौढ़ अवस्था में तप का अर्जन नहीं किया, वह चतुर्थ वृद्धावस्था में क्या करेगा? जीवन को कल्याण मय और सुन्दर बनाने से ही मृत्यु भी शुभ बन सकती है।
पुरुषार्थ
'तृष्णा' सबसे बढ़कर पापिष्ठ तथा नित्य उद्वेग करने वाली बताई गई है, उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है, वह अत्यन्त भयंकर पाप रूपी गड्ढे में डालने वाली है, जहाँ-जहाँ 'तृष्णा' है वहाँ-वहाँ संसार है।
संतोष
पानी छानकर पीने वाले दहेज के लिए जीवित बहु-बेटियों का खून पी रहे हैं। धूप जलाने में हिंसा देखने वाले अब दहेज के लिए बहु-बेटियों को जला रहे हैं, प्याज से पेट न भरने वाले गरीबों का पेट काटकर ब्याज से पेटी भर रहे हैं।
अहिंसा
बुद्धि व विवेक उसी का साथ देता है जो स्पर्शन, रसना इन दोनों काम इन्द्रियों को जीत लेता है। ब्रह्मचर्य-व्रत पालन के चार उपाय हैं– १. उसकी आवश्यकता को अच्छी तरह समझना तथा सत्संगति करना। २. इन्द्रियों को धीरे-धीरे वश में करना तथा मन में बुरे विचार न आने देना। ३. शुद्ध साथी, शुद्ध मित्र, शुद्ध पुस्तकें रखना और शुद्ध सात्त्विक आहार करना। ४. नित्य योगाभ्यास करना।
ब्रह्मचर्य
जिन साधकों ने स्त्रियों के संसर्ग से पीठ फेर ली है वे साधक समस्त उपसर्गों में स्थिर रहते हैं। विष खाना अच्छा है किन्तु विषय सुख का सेवन करना अच्छा नहीं है क्योंकि विष खाने से तो जीव एक ही बार मरण का कष्ट पाता है किन्तु विषय रूपी स्त्री के सेवन से मनुष्य नरक के गड्ढे में गिर कर बार-बार कष्ट पाता है अरे! विष तो खाने से ही मनुष्य को मारता है लेकिन विषय तो स्मरणमात्र से मनुष्य के संयमी जीवन की हत्या कर डालते हैं।
ब्रह्मचर्य
माता, बहन, पुत्री के साथ भी एकान्त में नहीं बैठना चाहिए क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी बलवती होती हैं, वे तपस्वी पुरुषों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं। अरे जिस प्रकार लाख का घड़ा आग के पास रखते ही पिघल जाता है, वह शीघ्र ही चारों ओर से तपकर गलकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य भी स्त्री के साथ निवास करने से भ्रष्ट, शिथिलाचारी हो जाता है, अरे संसर्ग तो दूर रहा, स्त्री के स्मरण मात्र से ब्रह्मचारी का संयम नष्ट हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री के साथ भोजन न करें, भोजन करती, छींकती, जंभाई लेती, एकान्त में सुखपूर्वक बैठी स्त्री को न देखें, नेत्रों में काजल या अंगों में उबटन लगाती हुई, नग्न बैठी हुई, स्नान करती हुई या प्रसव करती हुई स्त्री को तेजस्वी होने की इच्छा वाला साधक न देखें।
ब्रह्मचर्य
दिन में अनुराग बुद्धि से युवती (स्त्री) के साथ हर्षित होकर संभाषण करने वाले की अन्यजन हँसी मजाक किया करते हैं और दूसरे कितने ही जन उसकी निन्दा भी करते हैं, अतः साधु को स्त्री चर्चा छोड़ देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
सभी नकारात्मक भावनाओं का एक ही समाधान है कि इस हालात और हकीकत को स्वीकारें जब भी दुःखी हो अपने आप से एक प्रश्न पूछे ''मैं क्या स्वीकार कर रहा हूँ'' यदि यह समझ में आ गया तो कभी दुःखी नहीं होंगे।
मन
कामी पुरुष सुख-दुःख, हित-अहित, पुण्य-पाप, वध-बन्धनादि, मरण की समीपता और दुर्गति को नहीं जानता है तिल बराबर सुख के लिए सुमेरु बराबर इस लोक-परलोक में दुःख भोगता है। संयमित जीवन ही जिनशासन की प्रभावना का प्रतीक है।
ब्रह्मचर्य
मोती की कीमत चमक, साधना की कीमत ब्रह्मचर्य है। जीवन में करोड़ों उपवास, लाखों जप कर लेना लेकिन शीलहीन का जप-तप कार्यकारी नहीं होता है। सील की कीमत होती है, यदि सील खुल गयी तो बाजार में कीमत कम हो जाती है।
ब्रह्मचर्य
जिस प्रकार स्विच ऑन करने पर लोहे के तारों में तुरन्त विद्युत प्रवाहित होने लगती है उसी प्रकार हमारे जीवन में वासनाओं की स्थिति है। भोगसम्बन्धी चर्चा, वार्ता, क्रिया, स्मरण, दर्शन, चिन्तन आदि से वासनाएँ सक्रिय हो जाती हैं।
संयम
स्त्रियाँ मनुष्यों को जन्म देने वाली हैं किन्तु प्राणों को हरने वाली भी हैं, ये भीरु स्वभाव वाली भी हैं तथा अग्नि में प्रवेश भी कर सकती हैं, ये अत्यन्त कठोर भी हैं, साथ ही पल्लव के समान कोमल अंगों वाली भी हैं, वे सहज ही मुग्ध हो जाने वाली भी हैं किन्तु विद्वानों को भी ठग सकती हैं।
ब्रह्मचर्य
विंध्यपर्वत के वन में भूख-प्यास से पीड़ित होकर मर जाना अच्छा है, सर्पों से भरे हुए तथा घास-फूस के घिरे कुँए में गिरना अच्छा है, गड्ढे और भँवर वाले गहरे जल में डूब जाना अच्छा है परन्तु समझदार कुलीन का शील से भ्रष्ट होना अच्छा नहीं है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री के संग से मन में शीघ्र ही विषय वासना उत्पन्न हो जाती है, उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होने से पुरुष उत्तम तपस्या से भ्रष्ट हो जाता है अतः तपस्वियों को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह विषय-कषाय की जड़ है एवं ज्ञान वैराग्य का विनाश करने वाली है।
ब्रह्मचर्य
असंयमी व्यक्ति जानवरों से भी गया बीता है। जानवर भी भोजन और वासनापूर्ति में कुछ संयम रखते हैं किन्तु इंसान बुद्धिमान होकर भी आहार-विहार में बड़े असंयमी होते हैं जिससे वे बीमार पड़ते हैं, संयम एक ऐसा अंकुश है जो हमें विवेक और सत्य के पथ पर आरूढ़ रखता है।
संयम
वेश्या जब अपने प्रेमी का दृढ़ आलिंगन करती है, तो वह ऊपर से यह प्रदर्शन करती है कि वह उससे प्रेम करती है; परन्तु मन में तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे कोई बेगारी अन्धेरे कमरे में किसी अज्ञात लाश को छूता है।
ब्रह्मचर्य
नाग के द्वारा आधा निगले जाने पर भी मेंढ़क मक्खियों को खाता रहता है, उसी तरह तृष्णांध पुरुष अवस्था के ढल जाने पर भी विषय-सेवन करता रहता है।
अनासक्ति
भोगों की भट्टी में अनंत भव भस्म हो चुके हैं। ''मदन का दमन तन से नहीं मन से करें'' तिल के बराबर जमीकन्द में अनन्त जीव होते हैं, जमीकन्द खाने से मिथ्यादृष्टि जीवों द्वारा वे सब जीव खा लिए जाते हैं।
आहार
जीने का आनंद संघर्ष में नहीं समर्पण में होता है संघर्ष में हमेशा पुरस्कार नहीं तिरस्कार ही मिलता है और समर्पण में सदा आदर-सत्कार मिलता है, इतिहास में हनुमान का समर्पण और रावण का संघर्ष दोनों दृष्टान्त हैं।
भक्ति
विज्ञान मानववादी है और महावीर मानवतावादी थे, आतंकी दुर्घटनाओं, बड़ी-बड़ी बीमारियों में भी वर्तमान विज्ञान के उपकरण कारण बन रहे हैं लोगों का जीवन-अस्त व्यस्त हो रहा है, लाभ कम हानि ज्यादा हो रही है।
Misc.
अपने मिलने वालों के संग जैसा हम व्यवहार करेंगे, वही बीज बनकर पनपेगा, वैसा वे हमारे साथ व्यवहार करेंगे। अपने साथियों को पद, आयु के अनुसार आदर-सम्मान स्नेह दें, उनके अभिवादन का समुचित उत्तर दें, बात के दौरान अशिष्ट और अश्लील भाषा का प्रयोग न करें, उपकार के बदले धन्यवाद देना न भूलें, किसी रुग्ण से बात करें तो सदा हौसला बढ़ायें, रोग की भीषणता का आभास न होने दें। हर्ष-विषाद न करके समता की रक्षा करना भी तपस्या है।
चरित्र
सोचना आस्रव है, सोचना ही है तो आत्मा परमात्मा का चिंतन करो। बोलना आस्रव है, बोलना ही है तो जिससे वैराग्य का विकास हो वही बोलो। चेष्टा आस्रव का कारण है, करना पड़े तो इन्द्रिय संयम, प्राणी संयम के संयमरूप चेष्टा हो।
संयम
उम्र के बड़े हो गये तो अब भावनाओं के भी बड़े होना चाहिए, लड़के वालों से लड़की ने कहा, ''रामायण तो आप अभी सुन लीजिए, महाभारत घर आकर सुनाऊँगी।''
परिवार
तोता पिंजड़े को नहीं सजाता, आप तन पिंजड़े को कैसे सजाने में लगे हो, तोता मुक्त होना चाहता आप क्यों नहीं, तोता पराधीनता के कारण दुःखी, आप स्वतंत्र होकर क्यों दुःखी जीवन जी रहे हो। धर्म का ह्रास पापियों से नहीं ढोंगी/पाखण्डी धर्मात्माओं से होता है।
अनासक्ति
ईर्ष्या, लोभ, काम, क्रोध आदि का कोई भी वेग हो, आप उस वेग में तात्कालिक कोई भी निर्णय मत लेना क्योंकि आवेग में विवेक खो जाता है और आवेग में लिया गया निर्णय कभी भी यथार्थ नहीं होता। कार्य दिख रहा है कारण खोजो।
विवेक
किसी भी रोते या मुस्कुराते को देखकर प्रभावित मत होना क्योंकि ज्ञानी कार्य को नहीं कारण को देखता है, अश्रुपात देखकर न्यायालय में न्याय नहीं दिया जाता, हेतु देखकर न्याय दिया जाता है, अश्रु देखकर निर्णय मत करना, चेहरा और भाव भी देखना जरूरी है।
विवेक