Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Diet & Ratri-bhojan

आहार

166 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

वनमाला और लक्ष्मण का संवाद आगम सम्मत– लक्ष्मण ने कहा! ''मुझे छोड़ दो'' कार्य हो जाने पर मैं तुम्हें लेने आऊँगा, मुझे देव आदि की शपथ है, लेकिन वनमाला को उनके आने में संदेह हुआ, तब लक्ष्मण ने कहा कि, सुनो यदि मैं न आऊँ तो मुझे रात्रि भोजन का पाप लगे। (धर्म संग्रह श्राव. अधिकार-३] श्लोक २८/२९) रामचन्द्र जी को अच्छी तरह व्यवस्थित करके यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो मुझे (लक्ष्मण को) गौ हत्या, स्त्री हत्या आदि का पाप लगे। इस प्रकार अन्य शपथों के करने पर भी वनमाला ने लक्ष्मण से एक ही शपथ करायी कि आपको रात्रिभोजन का पाप लगे।
आहार
वैष्णव साधु मार्कण्डेय महर्षि ने भी कहा है कि सूर्य के अस्त हो जाने पर पानी खून कहलाता है और अन्न मांस के समान कहा गया है।
आहार
वर्षा ऋतु में जो रात्रिभोजन करता है उसकी सैकड़ों चन्द्रायण व्रतों से भी शुद्धि नहीं हो सकती है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला की तरह एक-एक ग्रास घटाना शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाना इस प्रकार एक माह में एक चन्द्रायण व्रत होता है। ''सूर्य के अस्त हो जाने से हृदय और नाभि में स्थित कमल भी बंद हो जाता है इसलिए रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।''
आहार
नरक के चार द्वार रात्रिभोजन, परस्त्रीगमन, अचार भक्षण और जमीकंद भक्षण।
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुँआ जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार
अहिंसा व्रत की रक्षा और मूलगुण की शुद्धि के लिए धीर पुरुष मन-वचन-काय से रात्रि में चारों प्रकार के आहारों का त्याग करें।
आहार
जो स्वभाव से रात्रिभोजन का त्याग करता है, वह अपने कुल के आभूषण तथा तीन जगत् के स्वामियों की सम्पदा को प्राप्त होता है।
आहार
रत्नत्रय से परिपूर्ण तथा अणुव्रतों को धारण करने में तत्पर भव्य जीव सूर्योदय होने पर दोष रहित भोजन करते हैं।
आहार
जो दयालु पुरुष रात्रि में भोजन नहीं करते, वे विमानों के स्वामी अर्थात् वैमानिक देव होते हैं और वहाँ उत्कृष्ट भोगों को प्राप्त करते हैं।
आहार
स्वर्ग से च्युत होकर प्रशंसनीय मनुष्य पर्याय प्राप्त कर चक्रवर्ती आदि के वैभव से प्राप्त सुख का उपभोग करते हैं।
आहार
जगत् में जो धनवान्, गुणों से उदार, सुन्दर, दीर्घायु, सम्यग्ज्ञान से सहित और प्रधान पद पर स्थित हैं, वे सब दिन में भोजन करने से हुए हैं।
आहार
जो दिन में भोजन करने में उद्यत हैं, वे सूर्य के समान प्रभा वाले, चन्द्रमा के समान सौम्यदर्शन तथा स्थायी भोगों से युक्त होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य संसार में असह्य प्रताप से युक्त, नगरों के स्वामी, नाना प्रकार के वाहनों से सहित, सामन्तों से पूजित, भवनवासी देव, वैमानिक देव, चक्रवर्ती के वैभव से सहित और महान्-उत्कृष्ट लक्षणों से सम्पन्न होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य उन नगरियों में ऐसे विद्याधर राजा होते हैं, जो कलाओं में निपुण हैं, जिनके शरीर और नेत्र हृदय में स्नेह उत्पन्न करने वाले हैं, जो अमृतस्रावी वाणी से समस्त जगत् को आह्लादित करते हैं तथा उत्साह से युक्त होते हैं, दिन में भोजन करने से मनुष्य नारायण, बलदेव, चक्रवर्ती, बिजली और लाल कमल के समान कान्ति वाले दैदीप्यमान, सुन्दर कुण्डलों से युक्त एवं राजाओं से सम्बन्ध करने वाले होते हैं।
आहार
जो दया में तत्पर रहने वाली स्त्रियाँ रात्रि में भोजन नहीं करती हैं, उन्हें सेवकों के द्वारा तैयार किया हुआ इच्छानुकूल भोजन प्राप्त होता है।
आहार
जो स्त्रियाँ रात्रिभोजन से विरत रहती हैं, वे शान्त हृदय, शील सहित तथा साधु समूह के लिए हितकारी होती है।
आहार
दिन में भोजन करने से स्त्रियाँ श्रीकान्ता, सुप्रभा तथा सुभद्रा के समान लक्ष्मी तुल्य कान्ति वाली होती हैं।
आहार
जिन्होंने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया था, वे स्त्रियाँ यान तथा हाथी आदि वाहनों पर लीलापूर्वक गमन करती हैं और सुन्दर भवनों में निवास करती हैं, वे स्त्रियाँ स्वर्ग में इच्छानुकूल भोगों को प्राप्त होती हैं तथा मस्तक पर हाथ रख आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाले परिवार से घिरी रहती हैं।
आहार
जिन पुरुषों ने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया है, वे सुरीली आवाज वाले, निर्मल शरीर से युक्त तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों से सहित मनुष्य होते हैं, वह सब रात्रिभोजन त्याग का ही फल है, इसमें संशय नहीं है।
आहार
जो मनुष्य सूर्यास्त हो जाने पर भोजन करते हैं, वे विद्वानों के द्वारा मनुष्यता से युक्त पशु कहे गये हैं।
आहार
जो रात्रि में भोजन करता है, वह अल्प आयु तथा अल्प धन से युक्त, रोग से पीड़ित शरीर वाला और परभव में सुख से हीन होता है।
आहार
जो दुर्बुद्धि रात्रि में भोजन करता है, वह हजारों उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल तक खोटी योनियों में दुःख को प्राप्त होता है।
आहार
रात्रि में भोजन करने से स्त्रियाँ अनाथ सौभाग्यहीन, माता-पिता तथा भाई से रहित, शोक एवं दरिद्रता से युक्त होती हैं, जिनके हाथ-पैर आदि अंग रूक्ष तथा फटे हुए हैं, जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि को उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से भरे हैं, जिनके लक्षण दुष्ट हैं, जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती है, जिनके होठ कटे तथा मोटे हैं, जिनके कान विरूप है, जिनके केश पीले तथा रूक्ष हैं, जिनके दाँत तूमड़ी के बीज के समान हैं, शरीर सूखा हैं, जो कानी, लंगड़ी और कान्ति रहित हैं, विरूप हैं, कठोर चमड़ी वाली हैं, अनेक रोगों से सहित हैं, मलिन हैं, फटे वस्त्र वाली हैं खराब भोजन से जीवित हैं, दूसरों के कार्य पर आश्रित हैं, दुःखों के भार से दबी हुई हैं, बालावस्था में ही वैधव्य
आहार
रात्रिभोजन में तत्पर स्त्रियाँ कटे कान, कटी नासिका, धन तथा बन्धुओं से रहित पति को प्राप्त होती हैं, जो रूक्ष शरीर वाली दासी आदि है, जो पुत्र और पति से रहित हैं और जो दुर्भाग्य रूपी ग्रह से ग्रस्त हैं, वे रात्रिभोजन से ही होती हैं।
आहार
रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।
आहार
भोजन की तीव्र लालसा रखने वाला जो पापी जीव सूर्य के दृष्टि अगोचर हो जाने पर भोजन करता है, वह दुर्गति को नहीं जानता, यह नहीं समझता कि इस रात्रिभोजन के पाप से मुझे नरकादि दुर्गति में जाना पड़ेगा।
आहार
अन्धकार के समूह से जिसके नेत्र आच्छादित हो रहे हैं तथा पाप में जिसकी बुद्धि लग रही है, ऐसा पापी जीव मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि को खा जाता है।
आहार
जो रात्रिभोजन करता है, वह डाकिनी–शाकिनी तथा भूत–प्रेतादि निन्द्य प्राणियों के साथ खाता है। जो रात्रि में खाता है उसने कुत्ता, चूहा, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ खाया अथवा व्यर्थ के विस्तार से क्या? इतना ही कहा जाता है कि रात्रि में खाने वाले ने सब अपवित्र पदार्थ खाये, रात्रि में दीपकों के ऊपर जो पिपीलिका आदि जीव पड़ते हैं, रात्रि में खाने वाले पुरुष ग्रासों के साथ उन्हें भी निगल जाते हैं।
आहार
जिन लोगों ने रात्रिभोजन रूप अधर्म को धर्म मान रखा है, उन पाप कर्म से क्रूर मनुष्यों को समझाना कठिन है।
आहार
सूर्य की किरणों से अछूता भोजन प्रेतों के समूह से (उच्छिष्ट) जूठा हो जाता है तथा सूक्ष्म जीवों से युक्त होता है, अतः रात्रि में खाना उचित नहीं है।
आहार
जो रात–दिन खाता है, वह जिनधर्म से विमुख है, व्रतरहित है तथा नियम से दूर है, ऐसा मनुष्य परभव में सुखी कैसे हो सकता है?
आहार
रात्रिभोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यञ्च तथा नरकादि गतियों में अन्धे, बौने, विकलांग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःख से परिपूर्ण, कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता से पीड़ित अत्यन्त चञ्चल और अल्प आदर वाले निश्चित रूप से होते हैं।
आहार
रात्रि में अन्न के बर्तन तथा अग्नि आदि में अनेक जीव पड़ते हैं, जिससे मांस खाने का दोष तथा हिंसा होती है, अतः रात्रिभोजन छोड़ने के योग्य है।
आहार
एक बार रात्रि में लाइट में भोजन बना, खाने बैठा तो लाइट चली गयी, उसने सोचा उजाले में तो बनाया, अब अंधेरे में खाने से क्या बाधा है, इसलिए जिसे वह अचार समझकर खा रहा था इतने में लाइट आ गयी देखा तो वह मेंढक था। इसी प्रकार बारात में रात्रि में खीर बनी, उसमें एक छिपकली गिर गयी थी, उसी खीर को खाने से अनेकों की मौत हो गयी, रात में नहीं खाने वाले जिनकी हंसी उड़ाई जा रही थी केवल वे ही बचे थे।
आहार
भावशुद्धि के लिए भोजन शुद्धि अनिवार्य है।
आहार
आहार के लिए निन्दनीय कर्म नहीं करना चाहिए, आहार भी प्राण धारण करने के लिए करना चाहिए, प्राणों को तत्त्व विज्ञान के लिए धारण करना चाहिए तत्त्व इसलिए जानना चाहिए कि पुनर्जन्म न हो।
आहार
शाकाहार से हिंसात्मक विचार नहीं उठते हैं।
आहार
तामसिक अन्न खाने वाले व्यक्ति की सन्तान दुर्गुणों का भंडार होती है।
आहार
भोगों की भट्टी में अनंत भव भस्म हो चुके हैं। ''मदन का दमन तन से नहीं मन से करें'' तिल के बराबर जमीकन्द में अनन्त जीव होते हैं, जमीकन्द खाने से मिथ्यादृष्टि जीवों द्वारा वे सब जीव खा लिए जाते हैं।
आहार
रात्रि में 'पानी' पीना खून एवं भोजन व द्रव्य खाना 'मांस' के समान माना गया है, तब रात्रि में अभिषेक पूजन कैसे करें?
आहार
वही भोजन पान, रस ग्रहण करो, जितने से समिति पालन और स्वाध्याय आदि संयम के साधन के योग्य शारीरिक शक्ति रहे।
आहार
अज्ञानी सधर्मी व ज्ञानी विधर्मी के द्वारा शोधित व पकाया भोजन ग्रहण न करें।
आहार
प्रतिदिन यथायोग्य निर्दोष आहार करना अच्छा है परन्तु मासोपवास के बाद सदोष आहार करना अच्छा नहीं है।
आहार
शराब से बढ़कर मनुष्य का नाश करने वाली कोई पेय वस्तु नहीं हो सकती है।
आहार
शराब पर ही नहीं, सभी प्रकार की नशीली वस्तुओं के सेवन का निषेध होना चाहिए।
आहार
शाकाहार से शक्ति उत्पन्न होती है मांसाहार से उत्तेजना बढ़ती है।
आहार
खाली पेट कोई व्यक्ति बुद्धिमान नहीं हो सकता है।
आहार
इस जीव ने स्वाद के चक्कर में पूरा जीवन स्वाहा कर दिया है।
आहार
यह तो असीम मूर्खता और अपात्रता है कि मदिरा में अपना धन खर्च करें और बदले में विस्मृति और विभ्रम मोल लेवें तथा धर्म व यश नष्ट करें।
आहार
थोड़ा भोजन करने वाले को ये गुण प्राप्त होते हैं स्थिर आरोग्य, आयु बल और सुख की प्राप्ति होती है, उसकी सन्तान उत्तम होती है और लोग उस पर यह बहुत खाने वाला है ऐसा आक्षेप भी नहीं करते हैं।
आहार
यदि तुम मांस खाओगे तो नरक का द्वार तुम्हारे बाहर निकलने के लिए कभी नहीं खुलेगा।
आहार
रात्रि भोजन से यह मनुष्य इस लोक में कुष्ठ तथा पित्त के प्रकोप आदि समस्त रोगों के समूह को और परलोक में नरकादि गतियों को पाता है।
आहार
अंतिम समय में वासना, कामना नहीं सताती है, रसना इन्द्रिय सताती है अतः नियंत्रण रखो।
आहार
भगवान् तक आवाज तभी पहुँचती हैं, जब हृदय पवित्र हो और हृदय पवित्र करने का उपाय पवित्र भोजन करना है। मांस–मछली, अण्डे, शराब आदि गलत वस्तुओं का सेवन करते हो, तो आपकी आवाज प्रभु के पास तक नहीं पहुँच पाएगी।
आहार
आपके खान-पान से पता लग जाएगा कि आप किस तरह के इंसान है।
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जो खाने में विवेक नहीं रखते वे मरने के बाद चींटी बनते हैं क्योंकि चींटी दुनिया में सर्वभक्षी हैं, जो मिश्री से लेकर मांस तक सब खाती है, उसकी कषाय इतनी तीव्र होती है कि यदि वह चिपक जाये तो प्राण दे देंगी पर छोड़ती नहीं है।
आहार
चन्द्रनाड़ी में भोजन करने से बीमारी बढ़ती है, अतः सूर्य नाड़ी में भोजन और चन्द्र नाड़ी में भजन करना चाहिए।
आहार
पश्चिम दिशा में मुख कर भोजन करने से रोग होते हैं, पूर्व या उत्तर में मुखकर भोजन करें, दक्षिण दिशा में मुख करके भोजन करने से शीघ्रमरण होता है।
आहार
मल-मूत्र वमन आदि के समान निन्दनीय मधु सेवन, जब भोजन में पड़ी हुई मक्खी को देखकर व्यक्ति उस भोजन को सेवन नहीं करता तो फिर मधुमक्खियों के घृणित वमन को कैसे खा सकता है?
आहार
संसार में धन, गुणों से उदार, सुन्दर, दीर्घायु, सम्यक् ज्ञान से सहित और प्रधान पद आदि दिन में भोजन करने वाले प्राप्त करते हैं।
आहार
पहले रसदार चीजें खायें, बीच में गरिष्ठ चीजें और अन्त में तरल पदार्थ ग्रहण करें, इससे बल और आरोग्य लाभ होता है।
आहार
भूख लगने पर भोजन करना प्रकृति है, छीनकर खाना विकृति है और मिल बाँटकर खाना भारतीय संस्कृति है।
आहार
पीता थोड़ी छाछ जो, करके भोजन रोज। नहीं जरूरत वैद्य की, चेहरे पर भी ओज ॥
आहार
मट्ठा सेवन करने वाला कभी पीड़ित नहीं होता, मट्ठे द्वारा शान्त किए गये रोग पुनः उत्पन्न नहीं होते, जिस प्रकार देवताओं को अमृत हितकर है, उसी प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों को मट्ठा हितकारी है।
आहार
दिन के अंत में दूध पीना चाहिए, रात्रि के अंत में जल, भोजन के अंत में मट्ठा पीना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को वैद्य की जरूरत नहीं होती है।
आहार
जब शराब अन्दर होती है तब बुद्धि बाहर हो जाती है।
आहार
बहुत बार भोजन करने से पुष्टि, कांति, उत्साह और बल में कमी आती है।
आहार
भोजन ऐसा करो जिससे शरीर स्वस्थ और मन शुद्ध रहे।
आहार
मात्र पेट भरना ही महत्त्वपूर्ण नहीं है किन्तु कब, कैसे, कितना और किससे भरना यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।
आहार
भोजन स्वाद के लिए नहीं स्वास्थ्य लाभ के लिए होना चाहिए।
आहार
शाकाहार मनुष्य को निरोग और दीर्घ जीवी बनाता है।
आहार
भोजन की मात्रा से नहीं गुणवत्ता से स्वास्थ्य ठीक रहता है।
आहार
भोजन के ४० मिनट पहले और एक घंटे बाद पानी पियें, पानी चाय की चुस्की की तरह घूंट-घूंट कर पियें, कभी भी ठंडा पानी न पियें, सुबह उठते ही २-३ गिलास पानी पियें, पानी का सही उपयोग अमृत है गलत उपयोग विष के समान है।
आहार
अन्न नष्ट न हो इसलिए हम इस मानव शरीर का उपयोग कूड़े दान या कचरा पेटी की तरह करते हैं, संतुलित आहार लेना आवश्यक है।
आहार
मानव शरीर का सब बीमारियों से बचने का एक ही सर्वश्रेष्ठ उपचार है आहार पर नियंत्रण। शरीर से ज्यादा चिंता ढाई इंच की जिह्वा की क्यों? हमें खाने की जरूरत है जीने के लिए, लेकिन हम जीते हैं खाने के लिए।
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