Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 3 / 41

मुझे ईर्ष्या नहीं, ईश्वर चाहिए, मैं प्रसिद्धि के लिए विशुद्धि नहीं खोना चाहता हूँ, मैं शल्य में नहीं वात्सल्य में जीना चाहता हूँ, मैं हर काम में आऊँ जरूरी नहीं, मैं हर एक के काम आऊँ ऐसी मेरी भावना है, मैं जीत कर हारना नहीं, हारकर भी जीतना चाहता हूँ अर्थात् हारकर भी दूसरों का दिल जीतना चाहता हूँ।
विनम्रता
धर्म के बल से मनुष्य, देव, विद्याधर और धरणेन्द्र के सुख प्राप्त होते हैं, इस लोक, पर लोक में चन्द्रमा के समान यश तथा पूजा, सम्मान आदि प्रतिदिन प्राप्त होते हैं। पाप के द्वारा दुर्गति सम्बन्धी दुःख नरकगति तथा असहनीय निन्दा और अपयश प्राप्त होते हैं इसलिए हे भाई! जो इष्ट हो वही करो।
धर्म
जिसने वैराग्य रूपी तलवार के द्वारा इन्द्रियरूपी चोरों को नष्ट कर दिया उसको स्वर्ग मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। वैराग्य के बिना शरीर को दण्डित करना व्यर्थ है। जब चित्रादि में निर्मित स्त्री मन में क्षोभ उत्पन्न करती है तब स्त्री के संसर्ग और वार्तालाप में मन एकाग्र कैसे रह सकता है?
ब्रह्मचर्य
ज्ञान एंटीना के समान है चारित्र टेलीविजन के समान है एंटीना तरंगें पकड़ता है, टेलीविजन चित्र दिखाता है। ऐसे ही जिनवाणी की तरंगों को पकड़ना ज्ञान का विषय है, परन्तु जिनवाणी में प्रसारित वर्गणाओं का दृश्य चारित्र ही प्रकट करता है।
ज्ञान
कठिनता से प्राप्त धर्म को पाकर विषय सुख में रंजित होना, भस्म के लिए चंदन को जलाने जैसा है। विषयों से विरक्त होने पर भी तप भावना, धर्म भावना, समाधि भावना अति दुर्लभ है। जिसको सहना आ गया उसको रहना आ गया।
धर्म
धर्म कोई वाशिंग पाउडर नहीं, जिसे पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो। धर्म तो जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी जीवन बीमा कम्पनी की तरह लाभदायक ही है।
धर्म
यदि किसी को अपना बनाना चाहते हो तो उसका नाम लो, नाम सभी को प्रिय होता। जितने भी भूतल पर सो गये, सोयेंगे वे सब नाम के राग में निज को खो गये। बाहर की ख्याति अन्दर से खाली कर देती है।
अनासक्ति
जिसका यश:कीर्ति नाम कर्म का उदय होता है, उसके नाम को रोकने वाला कोई नहीं है। नव नारायण नव बलभद्र में सिर्फ राम-लक्ष्मण, कृष्ण बलराम का ही नाम प्रसिद्ध है। १२ चक्रवर्तियों में भरत ही प्रसिद्ध हुए, ११ रुद्रों में सिर्फ शिव ही प्रसिद्ध हुए बाकी क्यों नहीं? प्रशंसा मुक्ति नहीं बंधन है।
कर्म
जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा, जो होगा अच्छा होगा, तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया ? तुमने क्या पैदा कर दिया, जो नष्ट हो गया? तुमने जो लिया यही से लिया, तुमने जो दिया यही पर दिया; जो आज तुम्हारा है, वह ''कल किसी और का था, कल किसी और का होगा, परिवर्तन संसार का नियम है'' तुम इसे अपना मान रहे हो, बस यही तुम्हारे दुःख का कारण है।
अनासक्ति
ईर्ष्या अपनी हीनता के बोध से जन्म लेती है और ईर्ष्या उस हीनता को दूर नहीं करती सिर्फ दबाती है। ईर्ष्या रखने वाले मनुष्य को इतना दुःख अपनी असफलता पर नहीं होता जितना दुःख दूसरे की सफलता देखकर होता है।
क्षमा
मन की पवित्रता से चारित्र में पवित्रता आती है। चारित्रवान के साथ दुनिया होती है। अपरिग्रही अनगार को जो आनंद होता वह अहमिन्द्र को भी नहीं होता है, चक्रवर्ती को उसके अनंतवें भाग भी नहीं होता है।
चरित्र
जब परमात्मा का राग परमात्मा नहीं बनने देता तब पाप का राग परमात्मा कैसे बनने देगा? एक लाख शिखर बंद जिन मंदिर की सुरक्षा करना सरल है, परन्तु एक क्षण के विशुद्ध परिणामों की सुरक्षा करना कठिन है।
अनासक्ति
पाँच व्रतों को संयम माना है। शौच, तप, सन्तोष, स्वाध्याय और देव का स्मरण इन पाँच को नियम माना। करण आसन को कहते हैं, श्वासोच्छ्वास की स्थिरता प्राणायाम है तथा विषयों से इन्द्रियों की निवृत्ति करना प्रत्याहार है, संसार की असारता का चिंतन समाधि है और चिंतन में मन का लगना धारणा और मन का स्थिर हो जाना ध्यान है। ये ८ प्रकार का योग मुक्ति के लिए कारण है।
संयम
जीवन में किसी से राग और किसी से द्वेष भी मत करना, माँ के तीव्र राग ने सुकौशल मुनि को व्याघ्री बनकर खाया था और भाभी के द्वेष ने स्यालिनी बनकर सुकुमाल मुनि को खाया था।
अनासक्ति
दिगम्बर मुनि से भगवान् पारसनाथ के जीव ने हाथी की पर्याय में अणुव्रत धारण किए थे और महावीर के जीव ने शेर की पर्याय में मांस का त्याग किया था और आप उनके भक्त मनुष्य पर्याय में भी व्रत नहीं लेते तो फिर कैसे कल्याण हो सकता है?
धर्म
जैसे बहुत समय से दुर्गन्धित मल-मूत्र वाले घड़े से दुर्गन्ध नहीं छूटती, वैसे ही सम्यक्त्व रूपी जल से धोने पर भी ज्ञानामृत से पूर्ण होने पर भी अनादिकालीन दुर्वासना आसानी से नहीं छूटती है। जैसे खोटे बर्तन में खीर सुरक्षित नहीं रहती वैसे ही विषय-कषाय से खट्टी आत्मा में जिनवाणी नहीं रहती। विषयों में प्रवृत्ति भूल से नहीं राग से होती है।
अनासक्ति
अपनी हंस दृष्टि रखो, काग दृष्टि नहीं। कौआ मोती में भी मल को देखता है परन्तु हंस पानी में भी क्षीर को देखता है, ऐसे ही भेद विज्ञानी पुरुष मल के पिण्ड में लिप्त होने पर भी भगवान् आत्मा को ही देखता है।
विवेक
संघ में स्वाध्याय गौण वैय्यावृत्ति प्रधान होती है क्योंकि वैय्यावृत्ति करने वाला उपगूहन, वात्सल्य, स्थितिकरण और निर्विचिकित्सा इन चार अंगों से मंडित होता है। यदि ये गुण नहीं है तो कोई वैय्यावृत्ति नहीं कर सकता, जो तीर्थंकर प्रकृति की सोलह कारण भावनाओं में से एक है।
धर्म
दीपक में जब तक स्नेह/तेल रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब स्नेह/तेल समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है-बुझ जाता है, इसी प्रकार संसारी जीव स्नेह-प्रीति के कारण दुःखी होता है और प्रीति त्यागकर निर्वाण-मोक्ष को प्राप्त होता है। स्नेह रहित को इष्टवियोग और अनिष्ट संयोग से उत्पन्न दुःख नहीं होता।
अनासक्ति
आपने घी खाया, दूध पिया फिर भी सिर के बाल सफेद हो गये, आप अपने बालों को झड़ने से नहीं रोक पाये, तो फिर दूसरों को अपनी इच्छा से कैसे परिणमन करा सकते हो? जब निज देह का परिणमन अपने वश में नहीं है तो फिर पर का परिवर्तन कैसे कर सकते हो? क्योंकि कण-कण स्वतंत्र है।
अनासक्ति
जो तीन लोक के नाथ के सामने, गुरु के सामने 'सम्मान' करवाता है वह सम्माननीय नहीं हो सकता है। जिस जगह खड़े होकर निर्वस्त्र होने के भाव होने चाहिए थे, उस जगह शाल ओढ़ रहा है, जिस भूमि पर बैठकर माला फेरने के भाव होने चाहिए थे, वहाँ पर माला पहन रहा है इसका तात्पर्य अभी भव-भ्रमण की माला बाकी है। जिन्होंने मान और मालायें छोड़ी हैं, उनके चरणों में भवसागर तिरने आना था वहाँ सम्मान कराने लगे हैं। अरे जब तक भव (शरीर) का सम्मान चलता रहेगा तब तक भवातीत नहीं हो सकते हैं। कहते हो आज अष्टमी को हरी का त्याग है और उन्हीं पुष्पों की जिसमें करोड़ों कीड़े भरे हैं, उनकी माला पहन रहे हो, भले ही प्लास्टिक के फूलों की हो, ध्यान रखना जब पाषाण के परमात्मा की वंदना करने से निर्बन्ध हो सकते हो, तो फिर फूलों के नाम पर प्लास्टिक के फूलों की माला पहनने से कर्म बंध क्यों नहीं होगा? क्योंकि संकल्प तो पुष्प माला का ही किया है।
विनम्रता
दूध की मीठी चम्मच बच्चे का मुख तो मीठा कर ही देती है दूध पियेगा तो पेट भरेगा, उसी प्रकार देशना के शब्द अन्दर गये तो कल्याण होगा ही बाहर रहे तो भी पुण्य बंध होगा ही एवं उतने समय पाप से बचेंगे।
धर्म
साधना का लक्ष्य है–एक ओर तो वासनाओं का नाश करना और दूसरी ओर सद्वृत्तियों का विकास करना-वासनाओं के नष्ट होते ही हृदय दिव्य भावों से परिपूर्ण हो जायेगा और हृदय में दिव्य भावों के प्रवेश करते ही समस्त दुर्बलतायें भाग जाएंगी।
धर्म
विद्वत्ता, विद्या और विद्वान् की कद्र विद्वान् ही करते हैं मूर्खों के बीच विद्वान् की दशा वैसी ही होती है जैसे अंधों के बीच किसी सुन्दरी की और नास्तिकों के बीच किसी धर्म ग्रन्थ की होती है। पुस्तकों के ज्ञान में तुम चतुर हो, फिर भी तुम्हें चाहिए कि तुम अनुभव जन्य ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुसार व्यवहार करो।
ज्ञान
लक्ष्मी हिंडोले की तरह चंचल है। विषयों से उत्पन्न हुआ सुख अंततः दुःखप्रद है। देह विपत्ति का घर है। अत्यधिक धन मृत्यु का प्रचुर साधन है। संसार अत्यधिक शोकपूर्ण है। स्त्रियाँ अनर्थ की जड़ हैं। फिर भी लोग इस घोर संसार में ही रत रहते हैं। आत्मा में रत नहीं होते यह आश्चर्य है।
धन
भोग में रोग का भय है, कुल आचार में भ्रष्टता का भय है, धन में राजा का भय है, अभिमान में दीनता का भय है, सामर्थ्य में शत्रु का भय है, सौन्दर्य में वृद्धावस्था का भय है, शास्त्रज्ञान में तर्कशील विवादी का भय है, गुण में दुष्ट का भय है और शरीर में मौत का भय है, इस संसार में सभी वस्तुएँ भययुक्त हैं, वैराग्य ही अभय है।
अनासक्ति
संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
असावधानी विनाश को शीघ्र बुलाती है। सावधान रहो, जीवन महल के किसी भी दरवाजे से काम-क्रोध रूपी किसी भी चोर को अन्दर न घुसने दो और सावधानी के साथ जो पहले से घुसे बैठे हों, उन्हें दृढ़ता और शूरता के साथ निकालने की प्राणपन से चेष्टा करते रहो, सावधानी ही साधना है।
पुरुषार्थ
प्रमाद से बढ़कर इस संसार में मनुष्यों के लिए दूसरी कोई मृत्यु नहीं। प्रमादी मनुष्य को सारे अर्थ सब ओर से त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं और ध्यान रहे आलस का अभाव अमर बनाने वाला है।
पुरुषार्थ
मनुष्य की आयु सौ वर्ष की अवधि में सीमित है, उसका आधा रात्रि में बीत गया, शेष का आधा बालत्व और वृद्धत्व में बीत गया शेष भाग रोग वियोग, दुःखादि के साथ सेवा आदि में बीत गया जल की तरंग के समान अत्यधिक चंचल जीवन में प्राणियों को सुख कहाँ मिलता है?
समय