Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 5 / 41

ऐसा कोई काम मत करो जिससे स्वयं के या दूसरे के परिणाम खराब हो। जो खतरों से डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने में भय लगता है, जिन्हें कठोर परिश्रम करना नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करना चाहिए।
पुरुषार्थ
आप खाली हाथ आये और खाली हाथ जाओगे, जो आज आपका है वह कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा, आप इसे अपना समझकर प्रसन्न हो रहे हो, बस यही प्रसन्नता आपके दुःखों का कारण है।
अनासक्ति
रत्नत्रय धर्म को पाकर विषय सुख में रंजित होना भस्म के लिए चंदन को जलाने के समान निष्फल है। विषय विरक्त होने पर भी तप भावना, धर्म भावना सुखपूर्वक मरणादि रूप समाधि अति दुर्लभ है।
धर्म
जब आपका तन भी आपका साथ नहीं देगा तो फिर तन के सम्बन्धी कैसे आपका साथ दे सकते हैं, जिसके लिए कमाया वह तन भी आपके साथ नहीं जायेगा। पाप कर्म के उदय से घर में भी बहुत दुःख होता है।
अनासक्ति
किसी को दुबारा बुलाने के लिए 'आना' शब्द का प्रयोग करने के स्थान पर 'आइये' शब्द का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि आना में 'आ' के साथ 'ना' शब्द लगा हुआ है जो नहीं का सूचक है, ऐसे ही 'भोजन करो न' के स्थान पर 'भोजन कीजिए', 'बैठो न' के स्थान पर 'बैठिये' आदि शब्द बोले।
वाणी
जिस पुण्य के आवेग में जीव धर्म कार्य को भूल जाये, अहिंसा को भूल जाये, धर्मात्माओं की अवहेलना करने लग जाये, पुण्य क्रिया को भूल जाये वह पुण्य सर्वथा हेय है।
कर्म
यदि धीरता और कायरता में भी मृत्यु होती है तो तू कायरता को छोड़कर धीरता से ही मरण कर। जो मनुष्य दो कोस गाँव को जाता है तो नाश्ता ले जाता है वह दुर्बुद्धि परलोक में जाते हुए क्या धर्म रूपी नाश्ता नहीं ले जायेगा ?
समाधि
कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें नहीं करना चाहिए, उन्हें यदि तुम करोगे तो नष्ट हो जाओगे तथा कुछ काम ऐसे है कि जिन्हें करना ही चाहिए, यदि तुम उन्हें नहीं करोगे तो भी नष्ट हो जाओगे। जिसका तुम्हें उपकार करना है उसके स्वभाव का यदि तुम ध्यान न रखोगे, तो तुम भलाई करने में भी भूल कर सकते हो।
विवेक
निश्चित समय पर चलने वाली गाड़ी के लिए भी जब पहले से सावधानी रहती है तो फिर मौतरूपी गाड़ी का कोई समय निश्चित नहीं है, उसके लिए तो हरदम सावधानी रहनी ही चाहिए।
समाधि
सिनेमा या टी.वी. देखने से चार हानियाँ होती हैं— १. चरित्र की हानि, २. समय की हानि, ३. नेत्र-ज्योति की हानि और ४. धन की हानि।
चरित्र
मकान यहाँ बना रहे हो, सजावट यहाँ कर रहे हो, संग्रह यहाँ कर रहे हो, पर खुद मौत की तरफ भागे चले जा रहे हो। जहाँ जाना है पहले उस परलोक की तैयारी तो करो।
समाधि
दुनिया में राय देने वाले बहुत हैं पर सन्मार्ग पर चलाने वाले बहुत कम हैं, सलाहकार बहुत हैं पर सहयोगकार बहुत कम है, आदर्श की बातें करने वाले बहुत हैं पर आचरण करने वाले बहुत कम हैं।
चरित्र
मेहनत के बिना दौलत, अंतरात्मा के बिना आनंद, चारित्र के बिना ज्ञान, त्याग के बिना धर्म, सिद्धान्तों के बिना राजनीति, नैतिक मूल्यों के बिना व्यापार और इंसानियत के बिना विज्ञान व्यर्थ है, पाप है।
चरित्र
दिन में वही कार्य करें जिससे रात में सुख से सो सकें। आठ माह में वह कार्य कर लें जिससे बरसात के चार माह धर्मध्यान से व्यतीत कर सकें। जवानी में तपस्या-साधना, दान-पुण्य कर लें जिससे वृद्धावस्था में प्रसन्न रह सकें। जीवन को सदाचार से जियें जिससे मरण समय में हँसते हुए विदा हो सकें। पूरे जीवन ऐसा काम करें जिससे भविष्य उज्ज्वल हो जाये।
चरित्र
इन पाँच प्रकार के मनुष्यों को समाज में न तो धन प्राप्त होता है और न ही यश— १. मलिन वस्त्र पहनने वाले, २. मलिन दाँत रखने वाले, ३. सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सोने वाले, ४. कड़वी बात करने वाले, ५. अधिक भोजन करने वाले।
चरित्र
जिनके अभिमान, काम क्रोधादि कषाय शान्त नहीं हुई है, जिनको इन्द्रियजन्य विषय भोगों से विरक्ति नहीं हुई है, जो जन्म-मरणादि के दुःख से भयभीत नहीं हैं जिन्हें शरीर सम्बन्धी सुख आदि से अभी वैराग्य नहीं हुआ है ऐसे प्राणियों की दीक्षा संसार में मात्र उदर पूर्ति के लिए ही है, मुक्ति प्राप्ति के लिए नहीं है, अतः ऐसे गुरुओं को तो दूर से ही त्याग देना चाहिए।
धर्म
भलाई करने की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी बुराई का त्याग करने की आवश्यकता है। बुराई का त्याग करने से भलाई अपने आप होगी, करनी नहीं पड़ेगी।
चरित्र
जिसको हम अच्छा समझते हैं उसका पूरा-का-पूरा पालन करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर नहीं है, परन्तु जिसको हम बुरा समझते हैं उसका पूरा-का-पूरा त्याग करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है और उसके त्याग का बल, योग्यता, ज्ञान, सामर्थ्य भी भगवान् ने हमें दिया है।
चरित्र
जीवन जीने के सात सूत्र– १. धीरे बोलिए शान्ति मिलेगी। २. भक्ति करो मुक्ति मिलेगी। ३. सेवा कीजिए शक्ति मिलेगी। ४. दान कीजिए मान मिलेगा। ५. संतोष कीजिए सुख मिलेगा। ६. सहन कीजिए साथ मिलेगा। ७. अहम् छोड़ो अर्हं बनोगे।
विविध
मनुष्य के मार्ग पर नहीं प्रभु के मार्ग पर चलो, यह मत कहो कि हमें अमुक व्यक्ति के मार्ग पर चलना है बल्कि यह कहो कि हमें सत्य के मार्ग पर चलना है क्योंकि मनुष्य कितना भी महान् हो सदा अपूर्ण ही हैं।
सत्य
जब तक साधक को अपनी स्थिति पर असन्तोष नहीं होता, तब तक उसकी उन्नति नहीं होती है। साधक वह होता है, जो चौबीसों घण्टे साधना करता है।
पुरुषार्थ
प्रायः समस्त प्रकार की उपाधि का मूल यह शरीर है, यह ही संसार में भटकाने वाला है, सभी को सबसे अधिक ममत्व अपने शरीर से होता है, साधु बनकर शरीर का गुलाम बनने वाले जीव के लिए नरक व पशु ये ही दो गतियाँ हैं।
अनासक्ति
मात्र व्यापार करने से लाभ नहीं होता है बल्कि समझदारी से जो व्यापार करता है उसे लाभ होता है अन्यथा मूलधन भी खो बैठता है। इसी प्रकार साधु बनने मात्र से कल्याण नहीं होता, साधु बनने के बाद साधुपने के प्रति वफादार रहने से व साधुपने का पूर्ण पालन करते रहने से ही कल्याण होता है।
संयम
प्रसन्नता के सूत्र–संतोषी बनें, आशावादी बनें, हमेशा खुश रहें, हमेशा सकारात्मक एवं अच्छी सोच रखें, हमेशा चिन्ता मुक्त रहें, परोपकार की भावना रखें, विपत्ति में सोचें जो होगा सो देख लेंगे इत्यादि।
मन
साधु लोग यदि अपने आलस्य को दूर कर मठों, धर्मस्थानों में रखा धन सार्वजनिक सेवा में खर्च करें, तो उनके विरुद्ध जो शिक्षितों में भावना है वह अविलम्ब दूर हो सकती है।
दान
''नाच न जाने आँगन टेढ़ा'', नाचना सीखो आँगन को टेढ़ा मत कहो, त्याग करना सीखो काल को दोष मत दो, टेढ़े आँगन में भी व्यक्ति नाचा जा सकता है, जो परमात्म भाव से भरा है वह पंचम काल में भी भावलिंगी मुनि बन सकता है।
पुरुषार्थ
दरिया ने झरने से पूछा तुझे समन्दर नहीं बनना है क्या? झरने ने बड़ी नम्रता से कहा बड़ा होकर खारा होने की अपेक्षा छोटा रहकर मीठा होना अच्छा है।
विनम्रता
समृद्धि के क्षणों में पिच्छी जैसी मृदुता और विपत्ति के क्षणों में कमण्डलु जैसी कठोरता होनी चाहिए, मयूर-पिच्छी को देखकर जिसका मन मयूर नाच उठे कमण्डलु को देखकर आभामण्डल चमक उठे वही श्रावक है।
चरित्र
एक बार इंसान ने कोयल से कहा—तू काली न होती तो कितनी अच्छी होती? फिर सागर से कहा तेरा पानी खारा न होता तो कितना अच्छा होता, फिर गुलाब से कहा—तुझमें काँटे न होते तो कितना अच्छा होता? तब तीनों एक साथ बोले हे इंसान! तुझमें दूसरों की कमियाँ देखने की आदत न होती तो तू कितना अच्छा होता?
विवेक
स्त्री आलिंगन किसी अन्य का करती है, वचन से किसी अन्य को बहलाती है, किसी अन्य को देखती है, किसी अन्य के कारण रोती है, किसी अन्य को शपथों द्वारा अभिप्राय प्रकट करती है, किसी को वरती है, किसी अन्य के साथ शयन करती है, शयन को प्राप्त होकर भी किसी अन्य का चिंतन करती हैं।
चरित्र