Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 30 / 41

बनारसीदास जी ने चोर की पोटली उठा दी- बनारसी दास जी के घर में चोरी करने आये चोरों ने सारा माल बाँधकर तैयार कर लिया, सब चोरों ने एक दूसरे को पोटली उठा दी, अन्त में एक चोर को पण्डित जी ने स्वयं पोटली उठवा दी, चोर घर पर गये, उनकी माँ ने पूँछा कि आज कहाँ पर डांका डाला, पता चला कि बनारसी दास के घर में डांका डाला है, तो माँ ने कहा की सरल स्वाभावी पण्डित जी का माल अपन को नहीं पचेगा, अतः सारा माल वापस करवा दिया।
चरित्र
डाकू खड़गसिंह ने बाबाभारती का घोड़ा अपाहिज का भेष धारण कर मदद के बहाने छुड़ा लिया, बाबाभारती ने डाकू खड़गसिंह से कहा कि तूने अपाहिज का वेश बनाकर घोड़ा लिया है, ये छल है ऐसा किसी से मत कहना नहीं तो कोई भी गरीब अनाथ अपाहिज लोगों पर विश्वास नहीं करेगा। यह बात सुनकर रात भर डाकू को नींद नहीं आई, और सुबह आकर उसने घोड़ा वापिस कर दिया।
चरित्र
धन की नहीं साफ़ नियत की कमी है- एक किसान बहुत ईमानदार था, इसलिए नगर में उसकी बहुत इज्जत थी, दैवयोग से उसका देहावसान हो गया, उसका लड़का पिताजी की तेरहवी के लिए सेठ जी के यहाँ उधार पैसे लेने गया, सेठ जी ने पिताजी की छवि के कारण पैसे दे दिए, पैसे लेकर उसके मन में आया की यदि मैं सेठ जी के पैसे नहीं दूँगा तो क्या कर लेंगे, और आकर रास्ते में वृक्ष के नीचे सो गया, पैसे टोपी में रक्खे थे वह हवा चलने से उड़ गयी और भेंस ने उसके ऊपर गोबर कर दिया, जब सो कर उठा तो टोपी नहीं मिली तो वह घबरा गया, इधर-उधर ढूँढने लगा, जब नहीं मिली तो परेशान हो गया, निराश हो कर सेठ जी के पास पुनः गया, तो सेठ जी को उसकी हालत देखकर दया आ गयी, और उसको फिर से पैसे दे दिए, तब उसके मन में आया की मैं सेठ के बारे में कितना गलत सोच रहा था, सेठ जी कितने दयालु है, विना कुछ लिए दुबारा पैसे दे दिए, अब मैं सेठ जी का बिलकुल कर्ज नहीं रखूँगा, और कुछ दिन बाद किसी काम से उसी स्थान पर गया जहाँ उसके पैसे गुम हुए थे, वर्षा के कारण गोबर बह गया था जिससे उसकी टोपी मिल गयी, आकर उसने अपनी माँ को सारी बात बताई, तो माँ ने कहा बेटा धन की कमी नहीं साफ़ नियत की कमी है।
सत्य
मगध देश के राजगृह नगर में राजा सङ्ग्रामशूर राज्य करते थे, उनकी रानी का नाम कनकमाला था, उसी नगर में सेठ वृषभदास रहता था, जो महान सम्यग्दृष्टि था, पञ्चगुणों से सहित था, परम धार्मिक था और सम्पूर्ण लक्षणों से सहित था, जैसा कि कहा है- 'पात्रे त्यागी गुणे रागी, भोगे परिजनैः सह। शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा, पुरुषः पञ्च लक्षणः।।'
चरित्र
जो योग्य पात्र में त्याग करने वाला हो, 2.गुणों में राग करने वाला हो, 3.भोग में परिजनों के साथ रहता हो, 4.शास्त्रों का ज्ञाता हो और 5.युद्ध में योद्धा हो वही पाँच गुणों को धारण करने वाला पुरुष कहलाता है। उस सेठ की स्त्री का नाम जिनदत्ता था, वह जिनदत्ता भी परम धार्मिक, सम्यक्त्वादि गुणों से सहित, दक्षता आदि गुणों के समूह से मूर्तिमान, लक्ष्मी के समान तथा समस्त लक्षणों से युक्त थी, जैसा कि कहा है- '1.जो आज्ञा कारिणी हो, 2.सन्तुष्ट हो, 3.दक्ष हो, 4.साध्वी हो, 5.पतिव्रता हो तथा 6.विदुषी हो इन गुणों से युक्त स्त्री लक्ष्मी ही है इसमें संशय नहीं है।' जिनदत्ता यद्यपि इस प्रकार के गुणों से विशिष्ट थी, परन्तु बन्ध्यात्व नामक दोष से युक्त थी, किसी भी उपाय से उसको पुत्र नहीं हुआ था, एक दिन अवसर पाकर उसने अपने पति से कहा! पुत्र के विना कुल सुशोभित नहीं होता है, तथा वंश का विच्छेद भी हो जायगा, इसलिए सन्तान की वृद्धि के लिए आप दूसरा विवाह करने योग्य हैं, जैसा कि कहा है- 'जवानी, लावण्य, प्रेम, आभूषण इत्यादि सभी सुपुत्र के विना भूसा के सामान है।'
परिवार
कड़ा के लोभ में जान गवायी– एक व्याघ्र ने एक राहगीर से कहा कि मेरे पास एक सोने का कड़ा है, वह तुम्हे देना चाहता हूँ। पथिक ने कहा तुम्हारा हमे विश्वास नहीं, तब उसने कहा कि मेरे दाँत टूट गये हैं, नख गिर गये हैं, मैं बूढ़ा हो गया हूँ, अब इस कड़ा को दान देकर मुक्ति चाहता हूँ, पथिक उसके माया जाल में फँस गया, बेचारा जैसे ही निकट आया व्याघ्र ने उसे मार डाला।
धन
दो कदम पहले सूर्य अस्त– राजा ने एक गरीब को वरदान दिया कि जितनी दूर तुम दौड़ सको उतनी जमीन तुम्हारी होगी, लेकिन जहाँ से दौड़ शुरू करते हो, सूर्य अस्त के पहले लौट कर वहीं आना है, लौट के आया लेकिन दो कदम पहले ही जीवन का सूर्य अस्त हो गया।
धन
राजा नीड़ासन ने देवी से वरदान माँगा, कि मैं जिसको छू लूँ वह सोने का हो जाय, वह जिसे छूता था वह सोने का हो जाता था, यहाँ तक स्थिति हो गयी कि खाने की सामग्री भी सोने की हो गयी, तब वह घबराया कि क्या खाएँ, अन्त में उसे वरदान वापस देना पड़ा तब शान्ति हुई।
धन
लोभी भाई ने भाई की आँखें फोड़ी– दो सगे भाई थे, लेकिन गरीब थे, जङ्गल से लकड़ी लाते और बेच कर उदर पूर्ति करते थे, बड़ा भाई ईमानदार था, सरल था उसकी लकड़ी अच्छे दामों में जल्दी बिक जाती थी, लेकिन छोटे भाई को इससे बडा दुःख होता था, एक दिन उसने सोचा कि बड़े भाई को मार डाला जाय, तो फिर मेरी लकड़ी अच्छे दामों में बिकेगी। दूसरे दिन जङ्गल गये, भीषण गर्मी थी छोटे भाई ने कहा भैया पहले आपकी तूमड़ी का पानी खर्च कर लेते हैं, बाद में हम पिलाते रहेंगे। भैया तो भोला था, वह कुछ समझा नहीं और वैसा ही किया लकड़ी इकट्ठी करने के बाद भाई को प्यास लगी, पानी माँगा तो उसने कहा कि हम पहले आपकी एक आँख फोड़ेंगे तब पानी देंगे, बड़े भाई ने तो सोचा भी नहीं था कि ये ऐसा पाप भी कर सकता है, वह आँखें फोड़ कर चला गया, जिससे बड़े भाई को दिखना बन्द हो गया, अन्धा भाई जङ्गल में भटकते–भटकते मर गया।
धन
विप्र का श्रीफल– एक ब्राह्मण को श्रीफल खरीदना था, दुकानदार ने उसका पाँच रुपया बताया, उसने पूँछा इससे कम में नहीं दोगे? दुकानदार ने आगे की दूकान में भेजा, वहाँ पर भी और कम में माँगने लगा, उसने कहा आप श्रीफल के बगीचे में चले जाये, वहाँ निःशुल्क मिल जायेगा, वह श्रीफल से लटक गया, ऊँट वाले से कहा! भैया हम तुम्हें पचास रूपये देगें हमें उतार लो, ऊँट खड़ा किया, उसको पकड़ा इतने में ऊँट आगे बढ़ गया। इसी तरह घोड़ा वाला आया, तो दोनों ने कहा हम दोनों पचास–पचास रुपये देंगे, हम लोगों को उतार लो, और वह भी लटक गया, अब दोनों ने विप्र से कहा, तुम अच्छे से पकड़े रहना, हम दोनों पाँच–पाँच सौ रूपये देंगे, अब विप्र नोटों की खुशी में भूल गया, और हाथ छूट गये तीनों गिरे और, काल के गाल में समा गये।
धन
लोभ पाप का बाप बखाना– एक विप्र बनारस से पढ़कर आया, पत्नि ने प्रश्न किया कि 'पाप का बाप कौन है'? उसने कहा सब कुछ पढ़ा, लेकिन ये पढ़ा ही नहीं, पत्नि ने कहा फिर से जाओ और पढ़कर आओ, रास्ते में वेश्या से पूँछा, उसने कहा मैं इसका उत्तर जानती हूँ मेरे घर चलो, उसने कहा पहले में आपका आतिथ्य करना चाहती हूँ आप भोजन कर लें, विप्र बोला मैं आपके यहाँ भोजन नहीं कर सकता, वेश्या ने कहा मैं आपको सौ रुपए दूँगी आप भोजन सामग्री ले लें, विप्र तैयार हो गया, तब उसने कहा मैं भोजन बना देती हूँ दो सौ रुपए ले लेना, विप्र तैयार हो गया, अन्त में उसने कहा एक ग्रास मेरे हाथ से खा लो पाँच सौ रूपए ले लेना मेरे जीवन के सारे पाप धुल जायेंगे, विप्र ने सोचा इसने बनाया तो है ही अब इसके हाथ से एक ग्रास खाने में क्या जाता है, यहाँ कोई देख भी नहीं रहा है, पैसों के लोभ से विप्र उसके हाँथ से भोजन करने के लिए तैयार हुआ तो वेश्या ने एक चाँटा मारा और कहा यही लोभ, पाप का बाप है।
धन
धूर्त ने कञ्जूस को ठगा– धूर्त ने कञ्जूस सेठ से कहा कि हमारे यहाँ मेहमान आये हैं, बर्तन दे दो, सेठ ने बर्तन दे दिये, धूर्त बर्तन वापस करने आया तो दस के स्थान पर बीस बर्तन ले आया, सेठ ने पूँछा ये कहाँ से आये, उसने कहा ये सब बर्तन गर्भवान थे हमारे यहाँ जाकर इन ने बच्चे दे दिये, सेठ प्रसन्न हुआ और सभी बर्तन रख लिये कुछ समय बाद सोने–चाँदी के बर्तन लेने आया सेठ ने दे दिये, अब कुछ दिन बाद सिर मुड़ाकर आया और बोला सारे बर्तन मर गये, हमने उनका संस्कार किया एक हजार रूपये खर्च हुये। सेठ ने कहा बर्तन मरते हैं क्या? उसने कहा जब बर्तन बच्चे देते हैं तो मरते भी हैं। धूर्त ने सभी सोने–चाँदी के वर्तन भी रख लिए और पञ्चायत बैठाकर एक हजार रूपये भी ले गया।
धन
सोने का बैल चाहिये– एक व्यक्ति के पास समस्त जानवरों के सोने की जोड़ी थी, पर सोने का बैल केवल एक ही था, अतः ठण्ड की परवाह न करता हुआ नदी में लकड़ी पकड़ रहा था, ताकि लकड़ी बेंचकर सोने का बैल बनवा सके, रानी ने महल से देखा इतना गरीब भी हमारे राज्य में है, राजा ने उसे बुलाया और पूँछा क्या चाहते हो, उसने कहा एक बैल, राजा ने कहा जाओ हमारे बैलों में से जो बैल पसन्द हो वह ले लो, वह गया पर कोई भी बैल पसन्द नहीं आया, उसको सोने का बैल चाहिये था, ये है तीव्र लोभ।
धन
बालक का पवित्र हृदय– कौशाम्बी नगरी के राजा जयपाल के राज्य में समुद्रदत्त सेठ और समुद्रदत्ता सेठानी रहती थी, उनका सागरदत्त नाम का एक सुन्दर बालक था, पास में गोपायन दरिद्री पड़ोसी था, उसका सोमक नाम का एक पुत्र था, जो सागरदत्त के साथ हमेशा खेला करता था, एक दिन स्वर्णाभूषणों से युक्त सागरदत्त को देखकर गोपायन ने सागरदत्त को मारकर घर में गाड़ दिया, सेठ सेठानी पुत्र वियोग से बड़े दुःखी हुए, एक दिन सेठानी ने सोमक से पूँछा! बेटा तुम्हारा मित्र सागरदत्त कहाँ है, उसने कहा! हमारे घर में गड़ा है, सेठानी सुनकर मूर्च्छित हो गयी, जाकर देखा तो सागरदत्त का शव मिला, तब गोपायन को मृत्यु दण्ड मिला। मरकर नरक गया।
धन
एक लाख का नाम सुनते ही डॉक्टर को अटैक– एक नगर में धनी सेठ को बीमार देखकर डॉक्टर ने सोचा पैसा निकालने का मौका अच्छा है। डॉक्टर ने कहा सेठ जी यहाँ ठीक नहीं हो सकते, लड़के ने पचास हजार रूपये दिए, डॉक्टर ने कहा इतने में काम नहीं होगा तो उसने पचास हजार और दिये, एक लाख आते देख डॉक्टर को अटैक आ गया, डॉक्टर मर गया सेठ ठीक हो गया।
धन
जवानी का लोभ– लड़का गड्ढे में गिर गया, निकलते नहीं बन रहा था, एक बुड्ढे से कहा कि इस गड्ढे का बड़ा चमत्कार है, जो यहाँ आता है वह जवान हो जाता है, बुड्ढा कूद गया, लड़का उसके कन्धे पर बैठकर बाहर आ गया और बोला आप जवान होते रहिए, इसी तरह ज्ञानी संसार की दशा देखकर निकलता है और अज्ञानी संसार रूपी गड्ढे में पड़ जाता है।
अनासक्ति
भोपाल के चाचा भतीजे– सुन्दर का भतीजा पवन था, जिसकी दुकान अच्छी चलती थी, जिससे दुःखी होकर उसने किराये के गुण्डों से भतीजे को मरवा डाला, और स्वयं जेल में सड़–सड़ कर मर गया।
धन
ईमानदारी की मिसाल– एक व्यक्ति घर बेंचकर अन्य स्थान पर रहने के लिए चला गया, जिसने घर खरीदा था उसे उसी घर में धन मिला, लौटाने आया तो उस व्यक्ति ने कहा अब हमने घर बेंच दिया, हमारे भाग्य में होता, तो हम इतने बरस से यहाँ रह रहे थे, पहले क्यों नहीं मिला, राजा के पास न्याय गया, उसी समय सिकन्दर आया था, वह देखकर सोचने लगा अरे भारत में इतने ईमानदार लोग रहते हैं?
चरित्र
एक व्यापारी ने रायचन्द्र जी से हीरा– जवाहरात का सौदा तय किया, तब भाव गिर गया, व्यापारी अत्यन्त दुःखी होकर मरने लगा तब रायचन्द्र जी ने लोभ छोड़कर व्यापारी को बचाया, और उसका बयाना वापस कर दिया।
संतोष
साधु का उपदेश– राजा के आग्रह से साधु ने उपदेश देने महल में आने को कह दिया। साधु महल में गये, राजा ने बढ़िया खीर आदि तैयार की, साधु के कटोरे में धूल थी, राजा ने कटोरे में खीर नहीं दी, साधु जङ्गल जाने लगे तब राजा ने कहा कि! आपने न उपदेश दिया न आहार किया, तब साधु बोला कि! राजन आपने कटोरे में खीर क्यों नहीं दी, राजा ने कहा! उसमें धूल थी कैसे देता, साधु ने कहा! इसी तरह तुम्हारी आत्मा में कषाय रूपी धूल है, तो उपदेश कैसे दूँ, 'पच्चीस कषाय राग–द्वेष में गर्भित हो जाती है' वे आपके अन्दर हैं।
संयम
एक सेठ अपनी सम्पत्ति का लेखा जोखा कर रहा था, तो सातपीढ़ी तक के लिए सम्पत्ति थी, पर आठवीं पीढ़ी की चिन्ता में सेठ मूर्च्छित हो गया, मूर्छा समाप्त होने पर किसी ने कहा कि अपने गाँव के ब्राह्मण को भोजन सामग्री दे आओ, तो तुम्हारी आठवीं पीढ़ी की चिन्ता समाप्त हो जायेगी, वह भोजन सामग्री देने गया, तो ब्राह्मण बोला की आज के लिए तो मेरे पास भोजन है, तो सेठ बोला कल के लिए काम आएगा, साधु ने कहा! कल पीठ पीछे है, कल के लिए सङ्ग्रह करना पाप है। तब सेठ की आँखें खुली, ये तो कल की चिन्ता नहीं करता और मैं आठवीं पीढ़ी की चिन्ता कर रहा हूँ।
संतोष
आगे-आगे पति जा रहा था और पीछे-पीछे उसकी पत्नी, रास्ते में सोने की मोहरें मिलीं, पति ने उस पर धूल डाल दी, ताकि पत्नी का मन न बिगड़ जाये, पीछे से आ रही पत्नी ने कहा क्या कर रहे हो, क्यों मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो, अर्थात् पत्नी पति से ज्यादा निरीह थी क्योंकि उसकी दृष्टि में सोने और मिट्टी में भेद नहीं था।
अनासक्ति
कडार पिञ्ज– कडार पिञ्ज चोरी की हुई सोने की शलाकाएँ खरीदता था, एक दिन वह अपनी लड़की के यहाँ गया और लड़के से बोल गया कि शलाकाएँ ले लेना, लड़के ने चोरी की जानकर नहीं ली। पिता लड़की के यहाँ से वापस आया शलाकाएँ न देख कर अपने पैर काट लिये और मरकर अपने ही खजाने में सर्प बनकर रक्षा करने लगा, लड़के ने देखा तो उस सर्प को मार डाला, सर्प मरकर नरक में चला गया।
धन
चुगली, निन्दा, हास्य, कठोर, झूठ, प्रलापरूप तथा और भी शास्त्र विरुद्ध वचन निन्द्य कहलाते हैं। हास्यगर्भ– एक अप्रैल को लोग झूठ बोलकर हँसी उड़ाते हैं अथवा जिन वचनों से किसी की हँसी उड़ाई जा रही हो। कर्कश– पवनञ्जय ने अञ्जना से कहा मरजा, मुख न दिखा ये कर्कश वचन कहलाते हैं। प्रलपित– असीमित बोलना। उत्सूत्र-बच्चों को गाली देना, आगम विरुद्ध बोलना। सावद्य– नाक कान आदि के छेदन के वचन कहना। मारण– बच्चों आदि को मारना। वाणिज्य– पाप वर्धक व्यापार के वचन बोलना, जैसे साबुन, माचिस आदि के बेचने को कहना।
वाणी
शेर को गधा कहा– एक लकड़हारा जङ्गल में लकड़ियाँ लेने गया, वहाँ एक शेर को दयनीय स्थिति में देखा, तो डरते–डरते शेर के पास गया, शेर को काँटा लगा था जिससे वह चल नहीं पा रहा था, लकड़हारे ने साहस करके शेर का काँटा निकाल दिया, शेर ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, आप मेरे ऊपर लकड़ी रखकर ले जाया करो, शेर के ऊपर लकड़ी लाने से वह थोड़े ही समय में धनवान बन गया, पड़ोसी ने पूँछा आपकी सम्पन्नता का राज क्या है, लकड़हारे ने कहा मुझे एक गधा मिल गया है, उस पर लकड़ी रखकर लाता हूँ, जिससे मुझे बहुत लाभ हुआ है, ये शब्द शेर ने सुन लिए, दूसरे दिन जब लकड़ी लेने जङ्गल गया, तो शेर ने कहा! आपने मुझसे कल गधा कहा था, अब या तो आप मेरे गले पर कुल्हाड़ी मार दो नहीं तो मैं तुम्हे खा जाऊँगा, लकड़हारे ने अपनी जान बचाने के लिए शेर के गले पर कुल्हाड़ी मार दी जिससे शेर मर गया, शेर कुल्हाड़ी की मार सहन कर गया पर गधा शब्द सहन नहीं कर सका। अतः हमें सोच समझ कर बोलना चाहिए।
वाणी
बोले तो फँसे– कलाकार ने कला से मौत को जीत लिया, एक जैसे सात पुतले बनाये, खुद बीच में बैठ गया, मौत हैरान हो गई, बोली! 'और तो सब ठीक है लेकिन' कलाकार बोला क्या कमी रह गयी है? मौत ने कहा बस तुम बीच में बोल गये, यही कमी रह गयी है।
वाणी
वर्ष में एक झूठ– एक सेठ को एक नौकर मिल गया जिसका वेतन था, भोजन, वस्त्र एवं एक वर्ष में एक झूठ बोलना। वर्ष पूर्ण होने पर वेतन की तिथि निश्चित कर दी गयी। सेठानी से नौकर ने कहा कि आप के सुन्दर और सुशील होने पर भी सेठ कहाँ जाते हैं पता नहीं? मैं दिन भर दुकान चलाता हूँ। सेठानी ने कहा क्यों करें तब नौकर ने कहा सेठ की एक मूँछ निकाल दो, इससे चेहरे की सुन्दरता समाप्त हो जायेगी, जब सेठ जी रात्रि में सो जायें, तब आप छुरी से मूँछ निकाल देना, उधर सेठ से कहा कि आप दिन भर दुकान में रहते हो, सेठानी दिन भर ताला डाल कर पता नहीं कहाँ जाती हैं, आज जब आप सो जाओगे तब वह आपका गला काटेगी, सावधान रहना, सेठ दुकान से आकर चुप चाप सोने का बहाना करने लगे, तभी सेठानी छुरा लेकर आयी, और जैसे ही मुख से वस्त्र हटाया तो सेठ ने उसके हाथ का छुरा छीन कर उसी को मारने तैयार हो गये, तब नौकर ने कहा हुजूर सुनिये, ऐसा मत करिये हमने अपना वेतन लिया है, यानि एक झूठ बोला है। 'जब एक झूठ से प्राणों पर खतरा आ सकता है तो अनेक बार झूठ बोलने पर क्या होगा'।
सत्य
वसु झूठ से ति नरक पहुँचा– राजा वसु, नारद ब्राह्मण और क्षीरकदम्ब ब्राह्मण का पुत्र पर्वत ये तीनों क्षीरकदम्ब ब्राह्मण के पास पढ़ते थे, एक दिन क्षीरकदम्ब अपने शिष्यों के साथ वन में गये, वहाँ चारण ऋद्धिधारी मुनिराज अपने शिष्यों के साथ विराजमान थे, क्षीरकदम्ब ने उनको नमस्कार किया, तब उन मुनिराज ने कहा की इनमें गुरु और एक शिष्य सद्बुद्धि हैं, और दो शिष्य कुबुद्धि हैं, ये शब्द सुनकर क्षीरकदम्ब संसार से डर गये, शिष्यों को वापस भेजा और स्वयं ने मुनि दीक्षा ले ली, ब्राह्मण की पत्नी को बहुत दुःख हुआ, उसने बहुत विलाप किया, नारद ने उसे समझाया, एक दिन नारद और पर्वत में चर्चा चल रही थी, नारद ने कहा कि मुनियों ने 'अजैर्यष्टव्यं' का अर्थ 'जिसमें अङ्कुर शक्ति नहीं है ऐसे शालिधान' हैं, उसी से यज्ञ, विवाह आदि क्रियाओं में होम करना चाहिए। यह कहा है, पर पर्वत ने कहा कि अज का अर्थ 'बकरा' होता है, उसने झूठ कहा कि पिताजी ने यही कहा था, दोनों में विवाद बढ़ गया, और वसु के पास न्याय करने के लिए कहा, क्योंकि वह भी क्षीरकदम्ब के पास पढ़ता था, राजा वसु के सिंहासन के पाये स्फटिक के थे, जिससे सब यही समझते थे, कि उसका सिंहासन सत्य के प्रभाव से आकाश में उठा हुआ है, पर्वत ने एक दिन पहले सारा वृत्तान्त अपनी माँ को सुनाया, माँ को पता था कि पर्वत झूठ बोल रहा है, फिर भी पुत्र मोह में आकर वह राजा के पास गयी, अपनी गुरुमाँ को आता देखकर राजा ने बहुत सम्मान से बैठाया, माँ ने आने का कारण बताया और झूठ को सत्य कहने के लिए कहा, राजा ने दक्षिणा के वचन को याद किया और हाँ कह दिया, दूसरे दिन सभा लगी तो राजा ने पर्वत को सत्य ठहराया, झूठ के प्रभाव से उसके सिंहासन के पाये टूट गये, नारद ने समझाया की राजन्! झूठ के प्रभाव से पाये टूट गये अब भी सच बोल दो, पर राजा ने पर्वत का ही पक्ष लिया, और सिंहासन के नीचे की पृथ्वी फट पड़ी और राजा झूठ के प्रभाव से मरकर 'सातवें नरक' चला गया।
सत्य
सत्यघोष का असत्य जगत प्रसिद्ध- सत्यघोष ने जनेऊ में एक चाकू बाँध रखा था और कहता था कि मैं जरा सा भी झूठ बोलूँगा तो अपनी जीभ काट लूँगा, वह किसी की धरोहर वापस देता था किसी की नहीं, कोई–कोई राजा के पास जाकर उसकी शिकायत भी करते थे, लेकिन सत्यघोष के प्रभाव के कारण राजा भी किसी की नहीं सुनता था, एक दिन दूसरे गाँव का समुद्रदत्त व्यापारी रत्नद्वीप में व्यापार करने के लिए गया, उसने सत्यघोष के पास पाँच रत्न जमा कर दिए, लौटते समय जहाज डूबने से सारा धन समुद्र में डूब गया, वह सत्यघोष के पास गया, और अपने पाँचों रत्न वापिस माँगे, तो सत्य घोष उसे पागल कहकर भगाने लगा, राजा के पास भी न्याय न मिलने से वह दिन–रात सबसे यही कहता फिरता था की 'सत्य घोष मेरे पाँच रत्न नहीं देता है' रानी ने यह सुना तो राजा से न्याय करने के लिये कहा, रानी ने सत्यघोष और समुद्रदत्त दोनों की परीक्षा ली, और न्याय किया, राजा ने सत्य घोष को तीन सजा बताई उनमें
सत्य
वाणी से व्यक्ति की पहचान- एक बार जङ्गल में राजा, मन्त्री, कोतवाल, और सिपाही ये चारों भटक गये, उन्हें रास्ते में एक अन्धा व्यक्ति दिखा, राजा ने उससे पूँछा क्यों सूरदास जी क्या यहाँ से हमारे मन्त्री, कोतवाल, सिपाही निकले हैं? सूरदास ने कहा नहीं राजन्। थोड़ी देर में वहाँ से मन्त्री निकला, तो उसने पूँछा, क्यों सूरदास क्या यहाँ से हमारे राजा निकले हैं? सूरदास ने कहा हाँ मन्त्री जी। थोड़ी देर में कोतवाल निकला, तो वह भी अन्धे से पूँछता है, क्यों रे सूरदास क्या यहाँ से हमारे राजा, मन्त्री निकले हैं? उसने कहा हाँ कोतवाल जी। थोड़ी देर में वहाँ से सिपाही निकला, उसने भी अन्धे से पूँछा क्यों वे अन्धे क्या यहाँ से हमारे राजा निकले हैं? उसने कहा हाँ सिपाही। अन्धें ने वाणी से राजा, मन्त्री, कोतवाल, सिपाही को जाना।
वाणी