Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 29 / 41

मन्दिर बनाने का मान नहीं- हस्तिनापुर में एक सेठ ने मन्दिर बनवाया, जब मन्दिर पूरा बन गया एवं कुछ काम और शेष था, तब सेठजी ने समाज की एक बैठक बुलाई और समाज से कहा कि अब इस मन्दिर का काम पूरी समाज को पूर्ण करना है, आगे मेरी शक्ति नहीं है, पूरा मन्दिर बनवाने के बाद विनाअहम् के मन्दिर समाज को सौंप दिया उस मन्दिर में सेठजी का कहीं पर नाम भी नहीं है, यह मान कषाय के मर्दन करने का तरीका है।
विनम्रता
रुपमद- लक्ष्मीमती नामक एक कन्या रूप गुण का मानों भण्डार ही थी उसने मुनिराज के मलिन शरीर को देखकर भक्ति तो नहीं की किन्तु निन्दा करने लगी, इतना ही नहीं रूप के घमण्ड वश मुनिराज के शरीर पर थूँक भी दिया। इस घोर पाप के फल से उसके शरीर में सात दिन के बाद उदुम्बर कुष्ट हो गया, उसके घृणित शरीर में कीड़े पड़ गये, आर्तध्यान से मरण कर तिर्यञ्चयोनी को प्राप्त हुयी। कई भवों के बाद वह दरिद्रा नाम की एक कन्या हुयी, पाप के उदय से उसके शरीर से बदबू आती थी, उसको कोई अपने पास रखने को तैयार नहीं था, तब नगर के बाहर एक नदी के पास छोड़ दिया, वहाँ से मुनिराज का विहार हुआ उनके दर्शन करके अपने दुःखों के अन्त होने का उपाय पूँछा, महाराज ने धर्मोपदेश दिया पूर्व भवों के दुष्कृत का वर्णन किया, जिसे सुनकर उसे पश्चात्ताप हुआ, एवं अहिंसादि व्रतों के पालन करने का नियम लिया, जिसके फल से अगले भव में श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मणी हुई।
विनम्रता
हमारे हाथ अर्थी के बाहर कर देना- बड़े-बड़े राजा महाराजाओं को भी धर्म की शरण लेना पड़ती है। जब सम्राट सिकन्दर दक्षिण भारत की यात्रा पर आने लगा, तब अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर निकला और माँ से कहता है, हे माता श्री! आपकी कोई इच्छा तो नहीं है? माँ ने कहा बेटा अपने देश में दिगम्बर साधुओं के दर्शन दुर्लभ हैं, इसलिये तुम भारत से दिगम्बर साधु को जरूर लाना। सिकन्दर अपनी यात्रा पूर्ण होने के बाद जब स्वदेश को लौटने लगा तो माँ की बात याद आयी, तब सिकन्दर ने अपने डेरे से एक दूत को दिगम्बर साधु के पास भेजा। दूत ने कहा महाराज हमारे सम्राट ने आपको बुलाया है, मुनि ने कहा हे पथिक! ये बताओ प्यासा कुंए के पास जाता है या कुंआ प्यासे के पास जाता है? मुनिराज के वचन सुनकर दूत सिकन्दर के पास वापस जाता है, और समाचार सिकन्दर को देता है। सिकन्दर शर्मिन्दा होता हुआ मुनि के पास जाकर सविनय निवेदन करता है, हे भगवन्! आप हमारे राज्य को पवित्र करने का कष्ट करें। मुनि ने चलने का मानस बना लिया, किन्तु मुनिराज ने निमित्त ज्ञान से ये जान लिया कि सिकन्दर का जीवन मात्र अन्तर्मुहूर्त का है। सिकन्दर अपने जीवन का अन्त समय सुनकर दुःखी होकर बोला भगवन्! मुझे बचा लिजिये। महाराज ने कहा हे राजन! मणी मन्त्र तन्त्र बहु होई मरते न बचावे कोई। सिकन्दर ने मन्त्री से कहा चाहे मेरा कोई आधा राज्य लेले, पर मुझे बचाले, बहुत ही प्रयास किया लेकिन जब कोई नहीं मिला, तो सिकन्दर कहता है जब मेरी अर्थी निकाली जाय, तब मेरे दोनों हाथ अर्थी के बाहर निकाल देना, ताकि लोगों को ये पता चल सके, कि जिस सिकन्दर ने सारी उम्र बहुत धन लूटा पर अन्तिम समय हाँथ खाली थे। सभी सङ्ग में दौलत, सभी हाली हवाली थे। सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।।
अनासक्ति
जुआँरी, पुजारी, कमाऊ, अंधा चार पूत- एक सेठ के चार लड़के थे, उनमें बड़ा लड़का कमाऊ पूत था, दूसरा ज्वारी, तीसरा पुजारी और चौथा अंधा था, बड़े लड़के की पत्नि ने पति को भड़काया आप कमाते हो सब खाते हैं, हम लोग सभी अलग हो जाते हैं। यह बात पिताजी से कही, पिताजी ने कहा बेटा अलग होने के पहले हम लोग तीर्थ यात्रा कर लेते हैं, सब मिलकर तीर्थ को जाते हैं, पहुँचकर पिताजी ने क्रम-क्रम से बच्चों को दस-दस रुपये देकर रसोई की सामग्री लेने भेजा, बड़ा लड़का व्यापार करके दस के पन्द्रह कर लेता है, और सामग्री ले आता है, जुआरी जुआ खेल कर भाग्य से दस के बीस कर लेता है, और सामग्री ले आता है, तीसरा बेटा दस रूपए का दीपक लेता है और भगवान् की आरती करके कहता है आपको ही हमारी व्यवस्था बनाना है, तो वहाँ का रक्षक देव सोचता है धर्म के प्रति इतनी आस्था है यदि इसकी व्यवस्था नहीं बनायेंगे तो लोगो की धर्म के प्रति आस्था नहीं रहेगी, और वह देव गाड़ी भर सामान भेज देता है, सब बच्चे अपने-अपने पुरूषार्थ से रसोई का सामान लाते हैं, सबके भाग्य की परीक्षा आज होती है, तो बड़े लड़के का अहङ्कार चूर हो जाता है, कि सबसे बड़ा अभागा तो मैं ही हूँ।
विनम्रता
विद्या गुरु को ऊपर बैठाना- एक बार एक भील की स्त्री को दोहला हुआ कि मुझे आम खाने को मिल जाय, लेकिन उस समय आम का मौसम नहीं था, फिर भी तीव्र इच्छा हुयी भील से अपनी भावना व्यक्त की, भील ने सारे जङ्गल को खोज डाला लेकिन कहीं पर भी आम नहीं मिला, भील को मालूम हुआ, कि राजा श्रेणिक के बगीचे में इस समय आम उपलब्ध हैं। वह अन्तर्धान नामक विद्या के माध्यम से बगीचे से आम ले आया, रोज आम लाता लेकिन पहरेदार पकड़ नहीं पाते, एक दिन भील पकड़ा गया, राजा के सामने उपस्थित किया, राजा उसकी विद्या पर प्रसन्न हुआ, और राजा ने कहा कि तू अपनी विद्या हमें सिखा दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा। भील तैयार हो गया। बहुत देर तक विद्या सिखाता रहा लेकिन राजा सफल नहीं हुआ, तभी अभय कुमार निकले उन्होंने कहा, राजन! गुरू को ऊपर विठाओ और आप नीचे बैठों तब विद्या सिद्ध होगी।
विनम्रता
जिनेन्द्रवर्णी जी आचार्यश्री विद्यासागर जी के दर्शन करने के लिए रामटेक आये और पीछे बैठ गये, आचार्यश्री ने पहले कभी उनको देखा नहीं था, सभा के बाद उनका परिचय कराया, तब वर्णीजी आचार्यश्री के चरणों में लोट गये, आचार्यश्री ने कहा थोड़ा आप बोलो तब वर्णीजी ने कहा ''मैं छोटा सा कीड़ा आपके सामने कैसे बोलूँ'' ये उनकी विनम्रता थी।
विनम्रता
जिनेन्द्र वर्णी विनय की मूर्ति- जिनेन्द्रवर्णीजी आचार्यश्री के पास जब सल्लेखना लेने के लिए ईसरी सन् 1983 में आये, उस समय आचार्यश्री स्वाध्याय करा रहे थे, किसी विषय का अर्थ अस्पष्ट था, तब क्षमासागरजी ने वर्णी जी से कहा कि आपके पास इसका समाधान है?, वर्णीजी ने कहा! हाँ, क्षमा सागर जी बोले! फिर आप इतनी देर से मौन क्यों हैं? तब वर्णी जी बोले कि इतने बड़े आचार्य के सामने मैं नगण्य कैसे बोलता।
विनम्रता
खुदा से खुद की पहचान- एक व्यसनी को पत्नि शिक्षा देती है कि तुम व्यसन छोड़ो भगवान् से नाता जोड़ो। एक बार वह बाहर जा रहा था, तब पत्नि ने एक भगवान् की मूर्ति दी और कहा अपने को जानों, वह रोज पूजा करता द्रव्य चढ़ाता था, चूहा द्रव्य को खा जाता था तो वह चूहे की पूजा करने लगा, एक दिन बिल्ली चूहे पर झपटी तो वह बिल्ली की पूजा करने लगा, एक दिन कुत्ता बिल्ली पर झपटा तो वह कुत्ते की पूजा करने लगा, एक दिन पत्नी ने कुत्ते को लाठी मारी तो वह पत्नी की पूजा करने लगा एक दिन उसे गुस्सा आया तो उसने पत्नी को मारा तो उसे लगा कि अरे श्रेष्ठ तो मैं ही हूँ, तब से उसे अपने आत्म तत्व की श्रेष्ठता मालूम हुई।
ज्ञान
जैसे को तैसा- एक राजा लङ्गड़ा था, और अहङ्कारी भी था, एक बार राज दरबार में सूरदास जी भजन सुनाने आये, राजा ने पूँछा तुम्हारा नाम क्या है? उसने उत्तर दिया- दौलत! राजा ने व्यङ्ग किया- क्या दौलत भी अन्धी होती है? सूरदास जी ने कहा यदि अन्धी नहीं होती तो लङ्गड़े के पास क्यों आती, राजा का अहङ्कार चूर-चूर हो गया, अतः किसी को अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए।
विनम्रता
पिता पुत्र यात्रा पर निकले प्यासे बेटे से एक कदम भी चला नहीं जा रहा था, पिता ने धैर्य बँधाया बेटा सामने हवेली दिख रही है, वहाँ पानी अवश्य मिलेगा, किसी तरह वहाँ पहुँचे, पर प्याऊ पर कोई पानी पिलाने वाला नहीं था, बच्चा पानी-पानी चिल्ला रहा था, सेठ जी मस्ती से गद्दी पर बैठे हुए थे, पिता ने साहस करके सेठ जी से कहा सेठ जी पानी पिला दीजिये, सेठ जी ने कहा थोडा इन्तजार करो, पिता ने दुबारा निवेदन किया तो सेठ जी ने कहा अभी आदमी नहीं है, तब पिता ने कहा थोड़ी देर के लिए आप ही आदमी बन जाइए, संसार में सब कुछ है पर आदमियत (इंसानियत) की कमी है, अतः आदमी को पहले आदमियत प्राप्त करना चाहिए बाद में दूसरी चीजें।
दान
'मन में होए सो वचन उचरिये, वचन होए सो तन सो करिये' यह कथन महा मुनियों की अपेक्षा है जिनके मन में हमेशा प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव रहता है, वे अपने मन के भाव वचन से कहते हैं तो प्राणियों का भला होता है, और शरीर से करते हैं, तो प्राणी मात्र का कल्याण होता है, अन्य प्राणियों के लिए इस तरह से है, कि मन में होए सो मन मे रखिये, वचन होए तन सो न करिए, अगर वे अपने मन की बात कहेंगे तो अन्य का अहित होगा, क्योंकि उनके मन में प्रायः दुर्भाव रहता है और करेंगे तो अनेकों का सत्यानाश होगा, दूसरी बात एकेन्द्रियादि के मन के विना भी मायाचारी होती है एवं ध्यान में लीन मुनिराज के आर्जव धर्म होता है तथा तीनों योगों से रहित सिद्धों के भी आर्जव धर्म होता है, अतः आंतरिक वक्रता का नाम माया एवं सरलता का नाम आर्जव धर्म है, मन वचन काय पौद्गलिक हैं और आर्जव धर्म आत्मिक गुण है।
चरित्र
तुम आदमी की नहीं गधे की बात मानते हों- एक दिन पड़ोसी गधा माँगने आया तो बोल दिया गधा जङ्गल चरने गया है, इतने में अन्दर से रेंकने की आबाज आई, पड़ोसी ने कहा कि गधा अन्दर है! तो बोलता है तुम आदमी का नहीं गधे का विश्वास करते हो।
चरित्र
एक ठगिया- एक परिवार को प्रेत की बाधा थी, एक ठगिया ने प्रेत को भगाने के बहाने एक टङ्की बुलवायी उसमें घर का सारा सोना, चाँदी, रूपया आदि भरकर ले गया, उस समय परिवार के लोगों को बाहर निकाल दिया था, परिवार दो दिन बाद घर में आया देखा तो सब कुछ लुट गया था।
चरित्र
बैरिस्टर चितरञ्जनदास मुखर्जी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे, पूरा कम्पार्टमेंट खाली था, वे पेपर पढ़ रहे थे, वहाँ एक युवती आई और बोली मैं यहाँ बैठ जाँऊ? बैरिस्टरजी ने मौन स्वीकृति दे दी, थोड़ी देर अपनी विपत्ति बताई और गाड़ी ने जैसे ही स्पीड पकड़ी तो बोली हमें हजार रुपये दे दो नहीं तो मैं चिल्ला दूंगी कि एकान्त में ये मेरे साथ बदतमीजी कर रहे थे। बैरिस्टरजी ने इशारा किया न मैं बोल सकता हूँ और न ही सुन सकता हूँ। एक कागज में लिखकर दो उसने वही बात लिख दी। बैरिस्टरजी ने अच्छे ढंग से पढ़ा और जेब में रख लिया और गाल पर एक चाँटा मारा और कहा अब चिल्लाओ कितना चिल्लाती हो। वह चुप रह गयी और अपनी ही चाल में फँस गयी, उन्होंने उसे गिरफ्तार करवा दिया।
चरित्र
मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी- एक व्यक्ति बहुत कुटिल था, वह जब मरने लगा तब अपने बेटों से बोला कि मैं जब मर जाऊँ तो मेरे हाथ पैर काटकर पड़ोसी के यहाँ फेक देना मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।
चरित्र
हमने पानी नहीं बेंचा- एक किसान के खेत में कुंआ था, उसने खेत बेच दिया कुछ दिन बाद वह खरीदने वाले को परेशान करने लगा कि हमने खेत और कुंआ बेचा है पानी नहीं बेचा, उसने परेशान होकर कहा कि आपका पानी हमारे कुँए में रहा, अब तुम किराया दो और अपना पानी ले जाओ, और हमारे खेत में एक बून्द भी पानी गिरना नही चाहिए, तब उसने क्षमा माँगी।
चरित्र
श्री कृष्णजी का नेमिनाथजी के साथ छल- श्री कृष्णजी को यह चिन्ता थी, कि कहीं नेमिनाथजी हमारा राज न लेलें, इसलिए छल पूर्वक शादी रचवायी और पशुओं का बन्धन कराया जिसे देखकर श्री नेमिनाथजी ने वैराग्य धारण कर लिया था।
चरित्र
रानी ने जहर पिलाया- राजा यशोधर की रानी अमृतमति कुबड़े नौकर पर मोहित थी, जब राजा को मालूम हुआ तो उसे वैराग्य हो गया। रानी रोने का स्वांग करने लगी, रानी ने कहा आप दीक्षा के पहले एक बार मेरे हाथ का भोजन कर लो, भोजन में जहर मिला दिया, राजा मर गया।
चरित्र
सेठ मरकर मेढक बना- सेठ ने संकल्प किया कि, जब तक दीपक जलेगा तब तक सामायिक करेंगे, सेठ को प्यास की बाधा हुयी, इसी बीच सेठानी ने दीपक में पुनः तैल डाल दिया, सेठ आर्तध्यान से मरण कर मेंढक बना।
चरित्र
कुटिलता का स्वभाव- एक किसान ने खेत की मेड़ पर आम, नीबू, नीम के तीन वृक्ष लगाये धूप, पानी, खाद सबको एक जैसा मिला फिर भी वह खट्टा, मीठा, कड़वा बना, किसी ने भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ा।
प्रकृति
वनविहार में रामचन्द्र जी लक्ष्मण से कहते हैं! सरोवर में बगुले को देखो कितना धार्मिक है, जीव मर न जाए इसलिए धीरे-धीरे पैर रख रहा है, मछली कहती है- हे राम! बगुले की प्रशंसा क्यों करते हो, इसने तो हमारे वंश का ही विनाश कर दिया है, आप नहीं जानते सहवासी की चेष्टा को सहवासी ही जनता है।
चरित्र
दूसरों को खाई, अपने लिए कुँआ- एक दयालु सेठ गरीबों को रोज भोजन देता था, लेकिन सेठानी इस पक्ष में नहीं थी, वह कहती थी, कि मैं भोजन बनाकर परेशान होती हूँ, ये बनाया हुआ भोजन बाँट देते हैं। एक दिन सेठजी व्यापार हेतु किसी गाँव गये और सेठानी से बोल गये कि गरीबों को भोजन दे देना। सेठानी ने अवसर पाकर विषाक्त भोजन बना दिया। उस दिन सिर्फ एक ही गरीब भोजन लेने आया, वह भोजन को अपने घर ले जा रहा था रास्ते में भूख से पीड़ित सेठजी मिल गये, उसने वह भोजन सेठ को दे दिया उसका सेवन करके सेठ की मृत्यु हो गयी मायाचारी का फल तुरन्त मिल गया।
चरित्र
मायाचार से मृदुमति मुनि त्रिलोकमण्डन हाथी बने- नगर के बाहर एक मुनिराज ने चार माह के उपवास किये और विना आहार किये विहार कर गये, उस स्थान पर अन्य मुनिराज आकर विराज मान हो गये, लोगों को मालूम नहीं था कि उपवास वाले ये ही मुनि हैं या नहीं, और मासोपवासी जानकर पूजा की, मुनिराज ने बताया नहीं की हम मासोपवासी नहीं है, इस माया के कारण वे मृदुमति मुनिराज मरकर पहले छठवें स्वर्ग में गये बाद में त्रिलोकमण्डन हाथी बने।
चरित्र
माया का फल स्वयं ने पाया- एक ठाकुर था वह एक व्यापारी से द्वेष करता था, एक दिन व्यापारी उस गाँव में अपनी वसूली करने के लिए गया, तो उस ठाकुर ने अपने एक नौकर को नियुक्त किया कि इस रास्ते से व्यापारी आये तो तुम उसको मार डालना, भाग्य की बात व्यापारी दूसरे रास्ते से अपने घर चला गया। बहुत देर तक जब नौकर नहीं आया तो ठाकुर ने अपने लड़के को भेजा। जैसे ही नौकर को लड़का आता दिखा उसने गोली मार दी, उसने समझा यही व्यापारी है। माया का फल स्वयं को भोगना पड़ा।
चरित्र
गड़रिया ने लोगों को ठगा, अन्त में प्राण गये- एक बालक भेड़ों को चराने नदी के उस पार ले जाता था और रोज चिल्लाता 'शेर आया-शेर आया' लोग उसको बचाने के लिए दौड़कर आते वह हँसने लगता, एक दिन वास्तव में शेर आ गया उसने चिल्लाया पर कोई उसे बचाने नहीं आया और शेर उसे खा गया।
चरित्र
विद्यार्थी ने छल किया- एक लड़के ने चोरी की, गुरूजी ने बच्चों को लकड़ी दी और कहा कि जिस बच्चे ने चोरी की है, उस की लकड़ी दो इञ्च बड़ी हो जाएगी। जिसने चोरी की थी उसने अपनी लकड़ी दो इञ्च तोड़ दी, और वह पकड़ा गया।
चरित्र
घुड़सवार से अपेक्षा- एक बुढ़िया ने जङ्गल में एक घुड़सवार से अपनी पोटली गाँव तक ले जाने को कहा उसने मना कर दिया। बाद में घुड़सवार के मन में आया की इसकी पोटली ले लेता हूँ और भाग जाता हूँ, ठीक यही विचार बुढ़िया के भी मन में आया कि अगर इसको पोटली दे देती और ये लेकर भाग गया होता तो? बाद में घुड़सवार पोटली लेने आया तो, बुढ़िया ने कहा जो तेरे दिमाग में आया वही मेरे दिमाग में आया।
चरित्र
दो चेहरे- एक ही चेहरा समय-समय पर पापी और धर्मात्मा का बनता है, महाराज जयसिंह ने एक बिल्ली पाल रखी थी, वह बिलकुल शान्त बन गयी, राजा के साथ नित्य रहती थी, राजा उसके माथे पर दीपक रखकर पुराण पढ़ते थे, राजा उसकी खूब प्रशंसा करते थे, बिल्ली की परीक्षा करने के लिए मन्त्री ने एक चूहा छोड़ा तो बिल्ली के कान खड़े हो गये, दूसरा छोड़ा तो बिल्ली के रोंगटे खड़े हो गये, तीसरा छोड़ा तो बिल्ली ने छपट्टा मारा, दीपक गिर गया, तैल फैल गया और पुराण गन्दा हो गया, इसी प्रकार दुनिया में एक व्यक्ति के दो चेहरे होते हैं।
चरित्र
गणेशप्रसाद वर्णी जी जब पढ़ते थे, तो एक दिन एक भङ्गेड़ी के चक्कर में पड़ गये, उसने कहा कि भाँग खाने से शिवजी दिखते हैं, वर्णी जी ने सोचा हमें भी अरहन्त भगवान् दिख जायेंगे, तो उन्होंने भाँग खाली, उसका नशा चढ़ गया, और अपने गुरु अम्बादास जी की अविनय कर दी, गुरू ने नशा उतरने पर पूँछा, भाँग खाई थी? तो सही बता दिया, कि अर्हन्त भगवान् के दर्शन के लोभ में खाई थी, अब ऐसी गलती नहीं करेंगे कपट हीन होने पर शिष्य की मूर्खता भी गुरु का हृदय जीत लेती है।
सत्य
मयूर और कछुए की मित्रता- एक दिन मयूर को शिकारी ने पकड़ लिया और बोला राजा बदले में हमें रूपये देगा, कछुए ने पानी में से लाकर हीरा दिया, शिकारी बोला एक और लाकर दो तब छोड़ेंगे, कछुए ने कहा मित्र को छोड़ो और हीरा दो इसी नाप का लाकर देते हैं, मित्र को छूटा हुआ देखा तब बोला-तुम जैसे लोभी, धोके बाज को हीरा नहीं दण्ड मिलना चाहिए, ऐसा बोल कर पानी में चला गया।
चरित्र