Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 23 / 41

पञ्चमकाल में उनञ्चास विपरीतताएँ- 1.राजा-लोभी, 2.मित्र-विश्वासघाती, 3.पुत्र-अर्थलोभी, 4.नारी-दुश्चरित्र, 5.भाईबन्धु-विपरीत, 6.मन्त्री-असन्तुष्ट, 7.विद्वान-धनहीन, 8.पापीलोग-सुखी, 9.कुदेवों की पूजा, 10.पति-क्रोधी, 11.नगरी-प्रजाहीन, 12.देह-व्याधि पीड़ित, 13.गँवार-सर्वकलावान, 14.कायर-सुभट, 15.क्षमावान-निर्दयी, 16.शूद्र-बलवान, 17.अकाल मृत्यु, 18.मूर्ख-अहङ्कारी, 19.स्नेही-दुर्जन, 20.वैश्य-कपटी, 21.राजा-नीच, 22.सज्जन-विरोधी, 23.राजा-स्व स्थान हीन, 24.वर्षा-अल्प, 25.मनुष्य-वचनहीन, 26.मन्त्री-बुद्धिहीन, 27.तापसी-दया हीन, 28.भट्टारक-तामसी, 29.वृक्ष-फल रहित, 30.कुंवारी कन्या-चञ्चल, 31.दासी-आज्ञाहीन, 32.राजपुत्र-विवेकहीन, 33.शूद्र-विवेकी, 34.किसान-दुःखी, 35.पुरूषार्थ-हीन-सुखी, 36.अकाल, 37.विपरीत ऋतुयें, 38.स्वप्रशंसा, 39.परनिन्दा, 40.वेश्या-लज्जालु, 41.राजा-गजहीन, 42.अशुद्धपाठ, 43.लोभी-विप्र, 44.माता-कुटिल, 45.कुटिलता पूर्ण दया, 46.अनङ्ग क्रीड़ा, 47.उच्चकुलीन-निर्लज्ज, 48.भीलों के गाँव में व्यापार और 49.नीच जाति के लोग भजन गायेंगे।
समय
पञ्चम काल में मनुष्य में बीस दोष- 1.कुण्ठित, 2.लोभी, 3.क्रोधी, 4.कृतघ्न, 5.पापिष्ट, 6.दुष्ट, 7.रूखे, 8.क्रूर, 9.जड़, 10.मूर्ख, 11.मर्यादा रहित, 12.अधार्मिक, 13.हिंसा, 14.चोरी, 15.असत्यवादी, 16.कातर, 17.परनिन्दक, 18.चुगलखोर, 19.मानी और 20.धूर्त।
समय
मनुष्य कृश, रोगाक्रान्त, बाधाओं से युक्त, इस काल में ईति-भीति, चोरों का भय रहेगा, पृथ्वी रूखी रहेगी, व्याधों द्वारा नारी हरण, सर्प, कीड़े, मृगादि का भय होगा।
समय
(जीवन में परिवर्तन) आयु कम है, काम बहुत है, शरीर क्षीण हो रहा है, ऊर्जा कम हो रही है, तेज घट रहा है, तुमको जो कुछ भी जप, तप, व्रत, उपवास, ध्यान, ज्ञानार्जन, परोपकार, दान, पुण्य करना है जल्दी कर लो वरना समय बीतने पर पश्चात्ताप के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा, जीवन प्रदर्शन से नहीं बदलेगा, रोने-धोने से नहीं बदलेगा, ध्यान रखो जीवन जब भी बदलेगा तुम्हारे दृढ़ सङ्कल्प, समर्पण, श्रद्धा एवं कठोर परिश्रम से बदलेगा, सत्य एवं साधना से बदलेगा। कुछ सङ्कल्प लीजिए और अपने जीवन को परिवर्तन की दिशा में बढ़ाने का प्रयास कीजिए।
समय
यह विवेक का नहीं विज्ञापन का युग है, चिन्तन का नहीं चाटुकारिता का युग है। चारित्रवान मनीषियों का नहीं चारित्रहीन चमचों का युग है। सत्य शोधकों का नहीं सत्ता लिप्सुओं का युग है। आचार का नहीं प्रचार का युग है। दूरदृष्टि का नहीं दूर दर्शन का युग है। शब्द साधना का नहीं शब्द जाल का युग है। प्रज्ञा पुरूषों का युग नहीं पण्डितों का युग है। परमेष्ठियों का युग नहीं पाखण्डियों का युग है।
समय
सेठ जी ने गाड़ी खरीदी पन्द्रह दिन ड्राईवर के पास बैठकर देख लिया कैसे चलाता है और ड्राईवर की छुट्टी कर दी और स्वयं चलाने लगे, जङ्गल में गाड़ी बिगड़ गयी, कुछ जानते नहीं थे, अतः दूसरे से मदद लेकर घर पहुँचे, इसी प्रकार जब तक मोक्ष मार्ग के सच्चे ड्राईवर न बन जायें, तब तक गुरुओं की सङ्गति में रहना चाहिए।
संगति
पृथिवी पर नीम के वृक्ष बहुत दिखाई देते हैं परन्तु चन्दन कहीं-कहीं प्राप्त होता है, पत्थरों से पृथिवी भरी पड़ी है परन्तु चिन्तामणि रत्न दुर्लभ है, कौओं की काँव-काँव सदा सुनायी पड़ती है परन्तु कोयल की कूक यदा-कदा ही सुनायी पड़ती है, इससे पता चलता है कि यह जगत् दुर्जनों से व्याप्त है सज्जन तो पृथिवी पर थोड़े ही हैं।
संगति
राजकुमार वज्रबाहु की शादी मनोरमा राजकन्या से हुई थी, जब उनका साला उदयसुन्दर पहली बार बहिन को लेने आया, तो वज्रबाहु ने इस शर्त पर ले जाने की स्वीकृति दी कि हम भी साथ में चलेंगे, हाथी पर सवार होकर तीनों जा रहे थे, जङ्गल में पहुँचते ही मुनिराज के दर्शन हो गये, देखते ही वज्रबाहु के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया, उदयसुन्दर साले ने हँसी में कहा, जीजाजी आप दीक्षा ले लोगे तो हम भी दीक्षा ले लेंगे और छब्बीस राजाओं के साथ तीनों दीक्षित हो गये, वज्रबाहु मनोरमा के राग मे ससुराल जा रहा था क्षण भर की साधुसङ्गति से जीवन बदल गया था।
संगति
बुजुर्गों की सङ्गति करो उनकी एक-एक झुर्री पर हजार-हजार अनुभव लिखे होते हैं, काँपते हाथ, हिलती गर्दन, लड़खड़ाते कदम, मुरझाया चेहरा यह सन्देश देता है कि जो भी शुभ करना है आज कर लो, कल नहीं कर पाओगे, बूढ़ा इंसान धरती का सबसे बड़ा शिक्षालय है, उसे देखकर उगते सूरज की डूबती कहानी का बोध होता है।
संगति
देश और विदेश के भेद से संसार दो भागों में बँटा है- देश में भगवत्ता है, विदेश में भौतिकता है। देश में पवित्रता है, विदेश में पतन है। देश में वीतराग विज्ञान की शिक्षा दी जाती है, विदेश में भौतिक निर्माण की शिक्षा दी जाती है। देश धर्म को लेकर आगे बढ़ता है, विदेश धन के पीछे भागता है। देश में आत्मा को शुद्ध करने का उपदेश दिया जाता है, विदेश में देह को सम्भालने का उपदेश दिया जाता है। देश में मन्दिर हैं, जिससे संस्कार मिलते हैं, विदेश में सिनेमा घर हैं, जिनमें भौतिक जीवन जीने की शिक्षा मिलती है।
धर्म
स्त्री दुःख-1.परतन्त्रता का दुःख 2.पति के दुर्लभ होने पर शरीर को व्यर्थ समझती है 3.सपत्नि के होने का दुःख 4.मासिक धर्म से होने का दुःख 5.बन्ध्या होने का दुःख 6.विधवा होने का दुःख 7.प्रसूति होने का दुःख 8.अन्धी सन्तान होने का दुःख 9.पति के नहीं चाहने का दुःख 10.भाग्य हीन पति मिलने का दुःख 11.लड़की-लड़की ही गर्भ में आने का दुःख, 12.बार-बार मृत सन्तान होने का दुःख 13.बिल्कुल अनाथ हो जाने का दुःख 14.गर्भ धारण करने का दुःख, 15.पति के जीवित रहते हुये वियोग होने का दुःख 16.हृदय पीड़ा कारक रोग होने का दुःख।
विविध
कुम्भकार मिट्टी का घड़ा बनाकर उसे तपने के लिये भट्टा में रख देता है, पकने के पहले उसमें पानी की एक बून्द भी नहीं पड़ने देता, और पकजाने पर जल घड़े का कुछ बिगाड़ नहीं पाता, उसी प्रकार माता-पिता बच्चों को कठोर अनुशासन में रखते हैं, तो वे बड़े होने पर बिगड़ नहीं पाते हैं।
परिवार
आप की संस्कृति वस्त्रों पर हमारी संस्कृति चरित्र पर- विवेकानन्दजी अमेरिका गये, लोगों ने देखा, ये एक चोला पहन कर आये हैं, क्या यही विवेकानन्द हैं? हम लोग समझते थे कि ये टिप-टॉप होंगे, फिर एक व्यक्ति ने पूँछ लिया कि आपके देश की यही संस्कृति है? विवेकानन्दजी ने कहा आप की संस्कृति वस्त्रों पर टिकी है, हमारी संस्कृति चरित्र पर टिकी है, वस्त्र तो दर्जी बना सकता है पर चरित्र का निर्माण सिर्फ गुरू ही कर सकते हैं।
चरित्र
जीवन में मिठास चाहिए तो अपने व्यवहार, विचार, आचार में माधुर्य लाओ, चाय में चीनी डालना भूल जाओं तो कोई बात नहीं, मगर बोली में चीनी डालना मत भूलो, विना चीनी की चाय तो डायबिटीज के मरीजों के काम आती है, विना मिठास की वाणी किसी के काम में नहीं आती है।
वाणी
न कोई प्यार, न कोई प्रशंसा- ईमानदार व्यक्ति किसी विद्वान के पास पहुँचा, बोला मैं ईमानदारी से जीवन यापन करता हूँ, पर कोई मेरी प्रशंसा नहीं करता और न प्यार, विद्वान ने कहा ईमानदारी अच्छी बात है, पर उसके साथ मधुर व्यवहार और सेवाभाव भी जुड़ा रहना चाहिये, यदि आप इतना करते हो तो फिर प्रशंसा की कमी नहीं रहेगी और न प्यार पाने की शिकायत करना पड़ेगी।
चरित्र
देश के प्रति ईमानदार- जापान में दो भारतीयों ने सिगरेट पीकर सड़क पर डाल दी, कुछ बच्चों ने उठाकर कचरादान में डाल दी, पूँछा आप क्या कर रहे हैं? बच्चों ने कहा! हम अपने देश की सड़कों को गन्दा नहीं देख सकते, आप अतिथि हैं इसलिये आपका स्वागत है।
चरित्र
एक भारतीय विदेश इलाज कराने गया, उसको दूध की आवश्यकता थी, दूध वाले से माँगा, उसने कहा आज नहीं मिल सकता, कण्ट्रोल का दूध है, तुम चाहों तो मकान मालिक से लेलो, भारतीय ने कहा तुम पानी क्यों नहीं मिला लेते, उसने कहा तुम देश के गद्दार हो, विवाद हो गया, मकान मालिक ने उसको घर से निकाल दिया, गद्दार को हमारे देश में स्थान नहीं है।
चरित्र
अच्छे इंसान बनाने की योजना- आइंस्टीन से किसी ने पूँछा संसार में इतना दुःख कलह क्यों है, जबकि विज्ञान ने एक से बढ़कर एक सुख-साधन दिये हैं, उत्तर मिला कि बस एक कमी रह गयी कि अच्छे मनुष्य बनाने की योजना नहीं बनी, देश व सम्प्रदाय के पक्षधर सभी दिखते हैं, पर ऐसे लोग नहीं दिखते जो अच्छे इंसान बनाने की योजना बनाये।
चरित्र
घड़ी (WATCH) का रहस्य- W=Word-शब्द-हर समय जो शब्द बोलते हो वह हित-मित-प्रिय हो। A=Action-चेष्टा- हर समय जो कार्य करते हो उसे ठीक और सहजता से करो। T=Time-समय-हाथ से निकला समय वापस नहीं आता, हर क्षण का महत्व समझें। C=Character-चरित्र- अपना चरित्र अच्छा रखो कमाने में समय लगता है खोने में नहीं। H=Health-स्वास्थ्य-स्वास्थ अच्छा रखों।
समय
संस्कार हीन जैनी- उड़ान भरते हुये वायुयान खराब हो गया, परिचारकों ने घोषणा कर दी कि सुरक्षा असम्भव, उसमें 73 व्यक्ति यात्रा कर रहे थे, घोषणा सुनते ही ईसाईयों ने बाइबिल पढ़ना शुरू कर दिया, मुसलमानों ने कुरान की आयतें बोलना शुरू कर दीं, कोई गीता का पाठ करने लगा, उसी वायुयान मे तीन जैनी भाई थे वे कुछ भी स्मरण न कर दरवाजे की ओर देख रहे थे, कि दरवाजा खुले और नीचें कूदें, उनके पास न पाठ करने को कुछ था न भगवान का स्मरण, क्योंकि वे संस्कार हीन थे।
भक्ति
कुत्ते को काँच का महल- कुत्ते को काँच के महल में रात को छोड़ दिया वह अपने ही प्रतिबिम्ब को देखकर रातभर भौंकता रहा कोई दूसरा कुत्ता नहीं था, स्वयं की छाया थी, ये संसारी प्राणी भी पर को नहीं निज को भोग कर स्वयं मर रहा है।
मन
पेड़, पशु और मनुष्य में अन्तर- पेड़ के पास न तो गति है और न ही दिशा, पशु के पास गति तो है लेकिन दिशा नहीं, पर मनुष्य के पास गति भी है और दिशा भी, अतः मनुष्य सम्पूर्ण है, पशु कभी उसी जीवन में इंसान नहीं बन सकता, पर इंसान कभी भी उसी जीवन में पशु बन सकता है, मनुष्य में प्रभु और पशु दोनों बनने की सम्भावना है, मनुष्य एक सीढ़ी है, एक ही सीढ़ी ऊपर चढ़ने के भी काम आती है और नीचे उतरने के भी काम आती है।
ज्ञान
उताबला सो बाबला- एक दिन कड़ाके की ठण्ड थी, उस दिन रानी चेलना का हाथ रजाई के बाहर रह गया, ठण्ड के कारण हाथ अकड़ गया, रानी की नींद खुली और हाथ की दशा देखकर मुँह से निकल गया, उनका क्या होगा? राजा ने आवाज सुनी लेकिन अभिप्राय नहीं समझ सका, उसने सोचा चेलना का सम्बन्ध किसी और से भी है, इसीलिए उसको याद कर रही है, राजा क्रोध में तमतमा उठा, म्यान से तलवार खींचकर रानी को मारने तैयार हो गया, उसको सामने एक पङ्क्ति लिखी दिखी 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः...' अर्थात् अचानक कोई काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'अविवेक' आपत्तियों का बहुत बड़ा स्थान है, जो सोच विचार कर काम करते हैं, उन्हें गुणों की लोभी सम्पत्तियाँ स्वयं प्राप्त हो जाती हैं, यह पढ़कर राजा सहम गया, सोचा मारने के पहले पूँछ लें ये किसको याद करती है? राजा ने चेलना को जगाया और पूँछा तुम किसको याद कर रही हो? चेलना ने कहा स्वामिन्! कल अपन लोगों ने जङ्गल में नदी किनारे विराजमान मुनिको देखा था, वे ऐसी ठण्ड में वहाँ रहते हैं, मैं तो महल के अन्दर रजाई में हूँ, आज रजाई के बाहर हाथ रहा तो ये दशा हो गयी, तब मैंने सोचा उन मुनि का क्या होगा? राजा ने कहा ओहो! इसको स्वप्न में भी साधु दिखाई देते हैं, विना पूँछे तलवार चला देता तो मैं अपनी प्राण प्रिया को खो देता।
विवेक
बुद्धि, लज्जा, हिम्मत, तन्दुरुस्ती का निवास कहाँ- एक यात्री को यात्रा में क्रमशः चार स्त्रियाँ मिलीं, सबसे पहले खूबसूरत स्त्री मिली, यात्री ने पूछा! तुम कौन हो और कहाँ रहती हो? स्त्री ने जबाव दिया मैं बुद्धि हूँ और मनुष्य के दिमाग में रहती हूँ। दूसरी ने कहा मेरा नाम लज्जा है, और मैं मनुष्य की आँखों में रहती हूँ, शालीनता और सद्व्यवहार मेरा स्वभाव है। तीसरी स्त्री ने कहा मेरा नाम हिम्मत है, और मैं मनुष्य के हृदय में रहती हूँ। चौथी स्त्री ने कहा मेरा नाम तन्दुरुस्ती है और मैं मनुष्य के पेट में रहती हूँ। वह व्यक्ति बढ़ा और उसे चार पुरूष मिले, पहले पुरूष ने कहा मेरा नाम क्रोध है और मैं मनुष्य के दिमाग में रहता हूँ। यात्री ने कहा वहाँ बुद्धि रहती है तुम कैसे रह सकते हो? क्रोध ने कहा जब तक मैं नहीं आता हूँ तभी तक बुद्धि रहती है, और मेरे आते ही बुद्धि वहाँ से भाग खड़ी होती है। दूसरे पुरूष ने कहा मेरा नाम लोभ है और मैं पुरूष की आखों में रहता हूँ, यात्री ने कहा वहाँ लज्जा रहती है, लोभ ने कहा कुछ धन सम्पत्ति रखकर देखिये कि लज्जा किस प्रकार लोभी की आँखों से भागती है। तीसरे पुरूष ने कहा मेरा नाम भय है, और मैं लोगों के हृदय में रहता हूँ, यात्री ने कहा वहाँ हिम्मत रहती है तुम कैसे रह सकते हो? भय ने कहा लोग अन्तःकरण की आवाज नहीं सुनते और गलत कार्य करते रहते हैं और भयभीत भी रहते हैं, परिणाम स्वरूप हिम्मत वहाँ से चली जाती है, चौथे पुरूष ने कहा मेरा नाम रोग है और मैं मनुष्य के पेट में रहता हूँ। यात्री ने टोका लेकिन वहाँ तन्दुरुस्ती रहती है, पुरूष ने कहा बिल्कुल गलत, जब तक लोग सात्विक, सुपाच्य आहार की जगह गरिष्ठ भोजन, मांस, मदिरा, तम्बाकू आदि का सेवन करते रहेंगें और नियमित जीवन नहीं जियेंगे तब तक तन्दुरुस्ती वहाँ रह ही नहीं सकती, वहाँ फिर मैं ही रह सकता हूँ, यात्री स्त्री-पुरूषों के रूप में मिले सत्य के प्रकाश में आगे बढ़ गया।
ज्ञान
बूढ़े को घण्टी का सहारा-चौथी मञ्जिल पर बूढ़े पिताजी को रुका दिया एक घण्टी रख दी, छाती के ऊपर छप्पर पर एक रस्सी बाँध दी, उठना हो तो रस्सी का सहारा ले कर उठ जाना, खाने की इच्छा हो तो घण्टी बजा देना, चार साल का बच्चा घण्टी उठा लाया, तीन दिन तक किसी को ख्याल नहीं आया, चौथे दिन बूढ़े पिता की लाश मिली।
परिवार
लोभी और मात्सर्य- एक व्यक्ति पर देवी प्रसन्न हो गयी, प्रकट होकर बोली जो मांगना हो मांग लो, जो माँगोगे उससे दूना नहीं माँगने वाले पड़ोसी को मिलेगा, पहले अब कौन मांगे, जो माँगे वो घाटे में, ईर्ष्यालु बोला मेरी एक आँख फूट जाय, और मेरे आँगन में एक कुँआ खुद जाय, विना माँगने वाले की दोनों आँखें फूट गयी, दो कुआं खुद गये, बेचारा अन्धा कुए में गिर कर मर गया, दूसरों को दुःखी करने से हम दुःख उठाते हैं।
संतोष
लोग भगवान् को भी दोष देने से नहीं मानते, एक व्यक्ति बोला मैं ईश्वर से परेशान हूँ, लता में बड़े कद्दू लगाए और पेड़ में छोटे आम लगाए, जब आम के पेड़ के नीचे सोया और नाक पर आम गिरा तब समझ में आया कि भगवान् ने ठीक किया है। लोग अज्ञानता वश किसी की भी समीक्षा करने लगते हैं।
विवेक
'अभ्यास', रानी बछड़े के पास- राज महल के छत पर बैठे राजा ने रानी से कहा कि अपन अपने बल का परीक्षण करें कि अपन दोनों में कौन बलवान है? दोनों तैयार हो गये, बल का कैसे पता लगायें, राजा ने कहा! वह गाय खड़ी है उसके छोटे से बछड़े को वहाँ से यहाँ तक लाया जाए, पहले रानी गयी और पहले खण्ड तक बछड़े को ले आयी, फिर राजा गया वह भी वहाँ तक ले आया, दोनों समान एक बल वाले हुये, अब रानी छः महीने तक उस बछड़े को रोज लाती रही, राजा ने उस दिन से कोई अभ्यास नहीं किया, छः माह बाद रानी बोली अपने बल की पुनः परीक्षा कर लें, उसी बछड़े को लाने की बात हुयी, रानी तो बछड़े को उठाकर तत्काल विना थके ऊपर ले आयी, राजा उस बछड़े को उठा ही नहीं सका, राजा को बडा खेद हुआ सोचने लगा मेरी शक्ति कैसे क्षीण हुयी, तब रानी ने कहा हे राजन्! खेद मत करो यह अभ्यास की शक्ति है।
पुरुषार्थ
पहले बाल परीक्षा फिर वैसी शिक्षा- पूर्व में बच्चे पाँच वर्ष के हो जाते थे, तव उनके सामने तलवार, माला, तराजू, आदि रख देते थे, उससे कहते उठाओ तुम्हें क्या पसन्द है, यदि तलवार उठाई तो सैनिक बनेगा, माला उठाई तो माला जपेगा, तराजू उठाई तो व्यापारी बनेगा, वैसी ही शिक्षा उसको देते थे।
ज्ञान
कपूत का जबाव, माँगा माँ से दवा का हिसाब- बेटा बोला, माँ मैंने तुम्हारी साड़ी और दवाई में इतना खर्च किया है उसका बिल दो, माँ ने कहा बेटा तुम्हें याद नहीं मैंने तुम्हारे लिये कितना खर्च किया, नौ माह पेट में रखा, गर्मी, ठण्डी, वर्षा में स्वयं न सोकर तुम्हें सुलाया भूखे रहकर तुम्हे खिलाया, मैं गीले में तुम्हे सूखे में सुलाया, सभाओं में अपमान सहा, मैंने तुमसे कभी बिल नहीं माँगा?
परिवार