Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 24 / 41

संस्कारित शिला- उद्यान में लतायें अपनी सुगन्धी दशों दिशाओं में फैला रही थी, वहीं एक विशाल शिला पड़ी थी, लतायें उसको देखकर हँसती और कहती की तुम इतने विशालकाय होकर भी पैरों से रौंदे और ठुकराये जाते हो, वह लज्जित होता था, उस उद्यान में एक शिल्पी आया, उसने संस्कारित करके मूर्ति बना दी, पुष्प मूर्ति के चरणों में पड़ा था, पुष्प ने पूँछा आपकी ये अवस्था कैसे हुयी कि मैं लोगों के सिर पे बैठने वाला, आज आपके चरणों में पड़ा हूँ? उत्तर दिया! शिल्पी ने 'अनावश्यक कलेवर हटाकर' संस्कारित कर दिया गुरु ने प्राणप्रतिष्ठा करके मुझे पूज्य बना दिया, 'जन्मतो जायते शूद्रः संस्कारात् द्विजमुच्यते' अर्थात् जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कार से ही उच्च कुलीन माने जाते हैं।
चरित्र
मिट्टी का घड़ा, महिला के शिर पर खड़ा- जमीन में पड़ी मिट्टी ने घड़े से पूँछा, तुम्हारा और हमारा अंश और वंश एक है, फिर तुम सिर पर विराजे हो और मैं पैरों के नीचे पड़ी हूँ? घड़े ने कहा बहिन सत्य है किन्तु हमने खूब संस्कार रूप यातनाएँ सही हैं, कुम्हार ने सबसे पहले परिवार से जुदा किया, खोदा, पानी में गलाया, फिर रौंदा, लौंदा बनाकर चाक पर रखकर घुमाया, चीवर(कपड़े) से काटा, लकड़ी से पीटा, धूप में सुखाया, अवा में पकाया, इतने कष्ट सहे, तब सुन्दरी के सिर का सिंहासन मिला है, इसी प्रकार मानव को संस्कार मिलता है, तो पूज्य बनता है, गर्भ में भी संस्कार मिलता है, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश करना गर्भ में ही सीख लिया था, किन्तु सुभद्रा को नींद आने से चक्रव्यूह से निकलना नहीं सीख पाया था, संस्कार से मुनि या राजा बनते हैं, राजरानी मदालसा ने अपने बैटों को मुनि के संस्कार डाले, खिलाती, सुलाती, झुलाती, पिलाती तब 'सिद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि, संसार माया परिवर्जितोऽसि। संसारस्वप्नं तज मोहनिद्रां, मदालसा वाक्यमुवाच पुत्र!॥' हे पुत्र! तु सिद्धों के समान है, केवलज्ञानियों के समान है, कर्म कलुषता से रहित है, संसार की माया से रहित है, तु संसार को स्वप्न के समान समझकर मोह रूपी निद्रा को छोड़ इत्यादि संस्कारों से सात बेटे मुनि बन गये, तब ससुरजी ने कहा बेटा एक पुत्र ऐसा दो, जो राज्य को चला सके, तब मदालसा ने उसको राजा बनने के संस्कार डाले 'त्वं शूरोऽसि (तुम शूर हो), त्वं वीरोऽसि (तुम वीर हो)' इत्यादि संस्कार देने से वह राजा बना।
चरित्र
डॉक्टर या डाकू- माँ बेटे को डाकू भी और डॉक्टर भी बना सकती है, घड़ा जब तक कच्चा है, तब तक चोट सहता है, पकने के बाद नहीं, एक बच्चे ने स्कूल से पेन चुरा लिया, घर आया तो माँ ने मुस्करा दिया, माँ की मुस्कराहट से वह आगे चलकर डाकू बन गया, फाँसी की सजा हुयी, अन्तिम इच्छा माँ के दर्शन की प्रकट की, माँ जैसे ही पास में आयी लड़के ने उसकी नाक काट दी, पूँछा ऐसा क्यों किया? उसने कहा मुझे माँ ने डाकू बनाया है, इसलिये फाँसी मेरी नही इनको होना चाहिए, जिस दिन मैं पेन चुराकर लाया था, तब माँ ने डाँटा नहीं मुस्कराया था, अगर उसी दिन डांटा होता तो मैं दुबारा चोरी करने का साहस नहीं कर सकता था।
परिवार
घुड़साल का तोता- राजा ने दो तोते पलवाये एक घुड़साल में, एक रनवास में रखा, राजा एक दिन घुड़साल गया तो तोता बोला! रे बदमास पीछे हट जा, राजा को सुनकर क्रोध आया मेरा नमक खाकर मेरा अपमान करता है, इसको मरवा दो, राजा रनवास गया वहाँ का तोता राजा को देखकर दूर से ही मीठे नम्र स्वर में बोला, हे महाराज साहब स्वागत है, पधारिये, आसन ग्रहण कीजिये हे रानी, राजा साहब पधार रहें है, स्वागत करों, इसका व्यवहार देखकर राजा आश्चर्य में पड़ गया, एक माँ के दो बच्चे, एक भद्र दूसरा अभद्र ऐसा क्यों, मन्त्री जी ने जवाब दिया राजन्! ये सङ्गति व संस्कार का फल है, अपने आचरण से लोग आचरण सीखते है, गाँधी जी ने पहले अवगुण छोड़े फिर दूसरों से छुड़वाये।
संगति
युग के आदि में भरत-बाहुबली लड़े थे, इसलिए हमने लड़ना सीखा, बाद मे उन्होंने संयम लिया, पर हमने संयम लेना नहीं सीखा, महाभारत सुनकर आये किसी व्यक्ति से पूँछा कि क्या सीखा? बोला! चाहे लड़ मरो, मगर किसी को पाँच पैसा भी मत दो, अर्थात् व्यक्ति बुराई ग्रहण करता है अच्छाई नहीं यह उसकी कमी है।
चरित्र
मिट्टी के बर्तन- पत्नी के कहने से बेटे ने माँ-बाप को खेत में रखा, एवं उनको मिट्टी के बर्तनों में भोजन देता था, जब उसके बेटे ने देखा, तो वह भी अपने पापा के लिए एक साथ मिट्टी के वर्तन ले आया, पापा के पूँछने पर उसने कहा! आपके लिए जरुरत पड़ेगी इसलिए ले आया हूँ, सुन कर वह डर गया, एवं अपने माँ-बाप को घर लाकर प्रेम से सेवा करने लगा।
परिवार
आप कुछ भी पढ़ लो, अपनी भाषा सीखो, माँ की भाषा समझो। लड़का पढ़ लिख कर आया, माँ ने गले लगाया, आँसु बहाये, आशीर्वाद दिया, लड़का ट्राँसलेटर से पूँछता है, ये क्या कह रहीं हैं? उसने समझाया 'my dear son'। इतनी योग्यता तो हो कि अपनी माँ की भाषा को समझ सके।
परिवार
योगत्रय का संस्कार-मन का संस्कार- सीता ने राम से कहा, कि लोगों के कहने से मुझे छोड़ा, पर धर्म नहीं छोड़ना। सीता रावण के यहाँ रही पर रावण का रूप और वैभव देखकर भी अडिग रही यह मन का संस्कार है। वचन का संस्कार जैसे- अंधे व्यक्ति से 'हे सूरदास जी! यहाँ से कोई निकला है'? मन सन्तुष्ट करने वाले वचन बोलना वचन का संस्कार है। काय का संस्कार- लोह मयी आभूषण पहनाने पर भी पाण्डव अडिग रहे, सुकौशल स्वामी को व्याघ्री ने खाया पर वे अडिग रहे।
चरित्र
मैं रिश्वत वालों का अन्न नहीं लेता- एक थानेदार के पड़ोस में एक भिखारी भीख माँग रहा था, पड़ोसी ने दुत्कार दिया, वह आगे बढ़ गया, थानेदार को दया आई, भिखारी को आवाज देते हुये कहा! ठहरो मैं खाना भेजता हूँ, भिखारी अनसुनी करके आगे बढ़ गया, थानेदार ने समझा इसने सुना नहीं, उसने नौकर से कहा उसे रोटी दे आओ, नौकर ले गया, तो भिखारी ने मनाकर दिया, कहा! मैं रिश्वत लेने वाले का अन्न-जल ग्रहण नहीं करता, नौकर ने भिखारी को चार गालियाँ सुनाई और वापस आ गया, उसने थानेदार को बताया, थानेदार सुनकर सन्न रह गया, बहुत गुस्सा आई दर-दर का भिखारी होकर मेरी उपेक्षा करता है, लेकिन मन आत्म ग्लानि से भर गया, सब कुछ होने के बाद भी थानेदार को उथल-पुथल मच गई, उसने रिश्वत लेना छोड़ दिया, एक वर्ष बाद वही भिखारी दरवाजे पर खड़ा भीख माँग रहा था, 'दाता रोटी दे दो' थानेदार ने कहा मेरे जैसे रिश्वत खोर का तुम अन्न कैसे खाओगे? भिखारी ने हँसकर कहा! आप रिश्वत नहीं लेते, आपकी चरण रज माथे, थानेदार ने उसके चरण पकड़ लिए, और कहा! तुम मेरे सच्चे शिक्षक हो।
चरित्र
जुँआ- छोटा सा जुँआ सिर पर चढ़ जाये तो बैचेन होते हैं, यदि जुआ व्यसन शिर पर चढ जाये तो तन, मन, परिवार बैचेन होता है, जुआ हारने वाले को मृगमरीचिका की डोर में बाँध कर सर्वनाश के कगार पर लाता है, जीतने वाला लालच के मकड़जाल में फँसकर मारा जाता है, जुआ का खेल आग का खेल है, बर्बादी का अड्डा है, घर फूँककर देखा जाने वाला तमाशा है, देता कुछ है और लेता सब कुछ है, प्रलोभन का विष देता है और कुप्रवृत्तियों और विनाश को देता है।
चरित्र
कोई कहता है कि मांस जीव का शरीर है और फल-शाक आदि भी जीव का शरीर है, फिर मांस अखाद्य है और फल आदि खाद्य क्यों है? इसके उत्तर में कहा गया है कि मांस तो जीव का शरीर है पर जीव का शरीर मांस हो, ऐसा नियम नहीं है, त्रस जीव का शरीर मांस है पर स्थावर का शरीर मांस नहीं है, जैसे पिता पुरुष ही है पर सब पुरुष पिता नहीं होते हैं।
आहार
जिस पदार्थ के खाने से त्रस जीवों का घात होता है, उसे त्रस हिंसाकारक अभक्ष्य कहते हैं, जैसे पञ्च उदम्बर फल, घुना अन्न, अमर्यादित वस्तु जिनमें बरसात में फफूँदी लग जाती है, चौबीस घण्टे के बाद का मुरब्बा, अचार, बरी, पापड़ और द्विदल आदि के खाने से 'त्रस जीवों का घात' होता है, दूध में या दूध से बने हुए दही आदि में दो दाल वाले मूँग, उड़द, चना आदि अन्न की बनी चीज मिलाने से द्विदल बनता है।
आहार
विस्तार से अभक्ष्य के बाईस भेद भी हैं- ओला घोर बड़ा निशि भोजन, बहुबीजा बैंगन संधान। बड़, पीपर, ऊमर, कठऊमर, पाकर फल जो होय अजान। कन्दमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान। फल अतितुच्छ तुषारचलित रस, ये बाईस अभक्ष्य बखान।। ओला, दहीबड़ा, रात्रि भोजन, बहुबीजा, बैंगन, चौबीस घण्टे बाद का अचार, बढ़, पीपल, ऊमर, कटूमर, पाकर, अजानफल (जिसको हम पहचानते नहीं ऐसे कोई फल, पत्ते आदि फास्ट फूड भी अजान फल जैसे ही हैं), कन्दमूल (मूली, गाजर आदि जमीन के भीतर लगने वाले), मिट्टी, विष (शङ्खिया, धतूरा आदि), आमिष(मांस), शहद, मक्खन, मदिरा, अतितुच्छ फल (जिसमें बीज नहीं पढ़े हों ऐसे बिल्कुल कच्चे छोटे-छोटे फल), तुषार-बर्फ और चलित रस (जिनका स्वाद बिगड़ जाये ऐसे फटे हुए दूध आदि) ये सब अभक्ष्य हैं। दहीं बिलोने के बाद मक्खन को निकाल कर तत्काल गर्म कर लेना चाहिए अन्यथा वह अभक्ष्य हो जाता है अथवा कच्चे दूध से भी जो यन्त्र से मक्खन निकाला जाता है, उसमें भी कच्चे दूध की मर्यादा 48 मिनट की है, उसी मर्यादा के अन्दर मक्खन निकाल कर जल्दी से गर्म करके घी बना लेना चाहिए। बाजार की बनी हुई चीजों में मर्यादा का विवेक न रहने से और अनछने जल आदि से बनाई जाने से सब अभक्ष्य हैं, अर्क, आसव (शीरा), शर्बत आदि भी अभक्ष्य हैं, चमड़े में रखे घी, हींग, पानी आदि भी अभक्ष्य हैं, इसलिए इन अभक्ष्यों का त्याग कर देना चाहिए।
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुंआ-लीख जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है, इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य संसार में उत्कृष्ट प्रताप से युक्त, नगरों के स्वामी, नाना प्रकार के वाहनों से सहित, सामन्तों से पूजित, भवनवासी देव, वैमानिक देव, चक्रवर्ती के वैभव से सहित और उत्कृष्ट लक्षणों से सम्पन्न होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य उन नगरियों में ऐसे विद्याधर राजा होते हैं, जो कलाओं में निपुण हैं, जिनके शरीर, नेत्र और हृदय में स्नेह उत्पन्न करने वाले हैं, जो अमृत झराने वाली वाणी से समस्त जगत् को आह्लादित करते हैं तथा उत्साह से युक्त होते हैं, दिन में भोजन करने से मनुष्य नारायण, बलदेव, चक्रवर्ती, बिजली और लाल कमल के समान कान्ति वाले देदीप्यमान सुन्दर कुण्डलों से युक्त एवं राजाओं से सम्बन्ध करने वाले होते हैं।
आहार
जिन्होंने पहले रात्रि भोजन का त्याग किया था वे स्त्रियाँ यान तथा हाथी आदि वाहनों पर लीलापूर्वक गमन करती हैं और सुन्दर भवनों में निवास करती हैं, वे स्त्रियाँ स्वर्ग में इच्छानुकूल भोग को प्राप्त होती हैं, तथा मस्तक पर हाथ रख आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाले परिवार से घिरी रहती हैं।
आहार
जिन पुरुषों ने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया है, वे सुरीली आवाज वाले, निर्मल शरीर से युक्त तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों से सहित मनुष्य होते हैं, इस लोक में जो सुन्दर राजा दिखाई देते हैं, वह सब निःसन्देह रात्रिभोजन त्याग का ही फल है।
आहार
रात्रि में भोजन करने से पुरुष स्त्री वेद को प्राप्त होते हैं, और वे स्त्रियाँ अनाथ, सौभाग्यहीन, माता-पिता तथा भाई से रहित, शोक एवं दरिद्रता से युक्त होती हैं, जिनके हाथ-पैर आदि अङ्ग रूक्ष तथा फटे हुए हैं, जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि को उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से भरे हैं, जिनके लक्षण दुष्ट हैं, जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती है, जिनके होठ कटे तथा मोटे हैं, जिनके कान विरूप हैं, जिनके केश पीले तथा रूक्ष हैं, जिनके दाँत तूमड़ी के बीज के समान हैं, शरीर सूखा है, जो कानी, लंगड़ी और कान्ति रहित हैं, विरूप हैं, कठोर चमड़ी वाली हैं, अनेक रोगों से सहित हैं, मलिन हैं, फटे वस्त्र वाली हैं, खराब भोजन से जीवित हैं, दूसरों के कार्य पर आश्रित हैं, दुःखों के भार से दबी हुई हैं, बाल्यावस्था में ही पति के मरण के दुःख से दुःखी हैं, पानी भरती हैं, लकड़ियाँ ढोती हैं, बड़े दुःख से पेट भर पाती हैं, सब लोगों से तिरस्कृत हैं, कुवचन रूप वसूला से जिनका मन नष्ट हो गया है, तथा शरीर सैकड़ों घावों का आधार है, ऐसी स्त्रियाँ रात्रिभोजन करने से ही होती हैं।
आहार
रात्रिभोजन में तत्पर लोग कटेकान, कटीनासिका, धन तथा बन्धुओं से रहित पति को प्राप्त होते हैं, जो रूक्ष शरीर वाले दास दासी आदि हैं, जो पुत्र, पत्नि और पति आदि से रहित हैं और जो दुर्भाग्य रूपी ग्रह से ग्रस्त हैं, वे रात्रिभोजन से ही होते हैं।
आहार
रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ-पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।
आहार
भोजन की तीव्र लालसा रखने वाला जो पापी जीव सूर्य के अस्त हो जाने पर भी भोजन करता है, वह दुर्गति को नहीं जानता, यह नहीं समझता कि इस रात्रिभोजन के पाप से मुझे नरकादि
आहार
जो रात्रि में खाता है उसने कुत्ता, चूहा, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ खाया, अथवा व्यर्थ के विस्तार से क्या? इतना ही कहा जाता है, कि रात्रि में खाने वाले ने सब अपवित्र पदार्थ खाये, रात्रि में दीपकों के ऊपर जो चींटी आदि जीव पड़ते हैं, रात्रि में खाने वाले पुरुष ग्रासों के साथ उन्हें भी निगल जाते हैं।
आहार
रात्रिभोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यञ्च तथा नरकादि गतियों में अन्धे, बौने, अत्यन्त विकलाङ्ग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःख से परिपूर्ण, कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता से पीड़ित अत्यन्त चञ्चल और अल्प आदर वाले नियम से होते हैं।
आहार
वायु से ताड़ित, पत्थर तथा घटीयन्त्र से ताड़ित एवं सूर्य की किरणों से सन्तप्त वापिका के जल को मुनि प्रासुक मानते हैं, यद्यपि उपर्युक्त लक्षण वाला जल आगम में प्रासुक कहा गया है तथापि अत्यावश्यकता वश उससे स्नान ही करना चाहिए, उसे विना छाने पीना नहीं चाहिए।
अहिंसा
बन्धु विरोध करे सगरे, झगरे नित होत सुधारस चाँटत, मित्र करे करनी रिपु की, धरणीधर देखत न्याव न पाटत। पूत कपूत का कार्य करे, नारी सती पति सो चित पाटत, या विधिना प्रतिकूल भये तब, ऊँट चढ़े पे कूकर काटत।। — अर्थात् 'पाप के उदय में' बन्धु विरोध करने लग जाते हैं, अमृत चाँटते हुए भी झगड़े होते हैं, मित्र शत्रु जैसा व्यवहार करने लग जाता है, राजा देखते हुए भी न्याय नहीं करता है, पुत्र कुपुत्र का काम करने लग जाता है, सती स्त्री भी पति से विरक्त हो जाती है, ऊँट पर सवारी करने पर भी कुत्ता काट देता है।
कर्म
प्रमाद युक्त चर्या, परिणामों की मलिनता, विषयों की लोलुपता, दूसरे को कष्ट देना, परनिन्दा करना, आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ये चार संज्ञाएँ, कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्यायें, इन्द्रियों की पराधीनता, आर्त-रौद्र ध्यान, ज्ञान का दुरुपयोग और मोह ये सभी 'पाप आस्रव के कारण' हैं।
कर्म
एकान्त आदि पाँच मिथ्यात्व, क्रूर परिणाम, पच्चीस कषाय, पन्द्रह प्रमाद, कुटिलता में तत्पर पन्द्रह योग, आठ मद, चार संज्ञाएँ, पञ्चेन्द्रियों के सत्ताईस विषय, चार आर्तध्यान, चार रौद्रध्यान, सात व्यसन, व्रत धारण कर विषाद करना, पाँच पाप, बारह अविरति, राग-द्वेष, मिथ्यात्व, सात भय, तीन वेद और शोक पच्चीस क्रियाओं में सम्यक्त्ववर्धिनी क्रिया को छोड़कर शेष चौबीस क्रियाएँ और मायाचार ये सब पाप बन्ध के लिए होते हैं अर्थात् उपर्युक्त कारणों से पाप बन्ध होता है।
कर्म
हिंसादि पाँच पाप क्रोधादि चार कषाय, मिथ्याज्ञान, पक्षपात, मात्सर्य, आठ मद, दुरभिनिवेश, तीन अशुभ लेश्याएँ, चार विकथा, चार आर्तध्यान, चार रौद्रध्यान, ईर्ष्या, असंयम और तीन शल्यों में जो प्रवृत्ति है वह अशुभ भाव है।
कर्म
चन्द्रमा आकाश में विहार करता है, अन्धकार को दूर करता है, हजारों किरणों का धारक है, ज्योतिर्विमानों के मध्य में चलने वाला चन्द्रमा भी भाग्य के योग से राहु द्वारा ग्रस लिया जाता है, क्योंकि हो ललाट पर लिखी हुयी रेखा मिटाने में कौन समर्थ है। कौन टाल सकता है?
कर्म