Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 22 / 41

भरतचक्रवर्ती ने जैसे राजा श्रेयाँस को आहार दान के समय, जयकुमार को स्वयंवर के समय प्रोत्साहित किया वैसे ही बाहुबली को प्रोत्साहित करते तो शायद युद्ध नहीं होता।
संगति
छिलका और चावल- 'जिस शरीर में धर्म के साधक जीव का निवास है, उस शरीर की रक्षा बड़े यत्न से करना चाहिए' इस प्रकार की शिक्षा जिनागम का ऊपरी छिलका है, और 'देह त्यागने योग्य ही है' यह शिक्षा जिनागम का चावल है, असली बाह्य परिग्रह तो शरीर ही है, उससे भी जो ममत्व नहीं करता वही परम निर्ग्रन्थ है और इन्द्रियों की विषयाभिलाषा अन्तरङ्ग परिग्रह है।
अनासक्ति
व्यक्ति को दूसरों से नहीं अपनों से खतरा होता है, गाँधीजी को गोडसे ने मारा, सीता को राम ने वन में छोड़ा, रावण की मौत का कारण विभीषण हुआ, अञ्जना को घर से सास ने निकाला और विपत्ति में पिता ने छाया तक नहीं दी, पाण्डवों को मारने का प्रयास कौरवों ने किया, आदिनाथ को मारीच ने बदनाम किया, भरत ने बाहुबली से युद्ध किया।
संगति
आप खुश होंगे तो लोग आपके पास आयेंगे, आप दुखी होंगे तो लोग आँख चुरायेंगे, लोग आपकी खुशियां बाँटना चाहते हैं, आपका दुःख नहीं बाँटना चाहते हैं, जिन्दगी के कड़वे घूँट आपको अकेले ही पीना पड़ेंगे।
संगति
जिद खराब होती है- सीता ने सोने का मृग पाने की जिद की, जिससे राम का वियोग एवं भयङ्कर युद्ध हुआ। रावण ने सीता को पाने का जिद की तो प्राणों की आहूति कर दी, पर सीता को वापस नहीं कर सका। पवनञ्जय ने अञ्जना को देखने की जिद की जिससे बाइस वर्ष द्वेष रखना पड़ा।
संयम
जो साधर्मी पर आपत्ति आने पर भी सोता रहता है, कुछ प्रतिकार नहीं करता है, वह समस्त सम्पत्ति से वञ्चित रहता है, क्योंकि अर्हन्तदेव ने वैय्यावृत्य को बाह्य और अभ्यन्तर तपों का हृदय कहा है, अर्थात् शरीर में जो स्थिति हृदय की है वही स्थिति तपों में वैयावृत्य की है।
धर्म
स्वाध्याय के लाभ- तर्कणा, ब्रह्मचर्य, बुद्धि का उत्कर्ष, परमागम की परम्परा पुष्ट होती है, मन, इन्द्रियाँ और आहारादि संज्ञाओं का निरोध होता है, क्रोधादि कषायों का भेदन होता है, दिनों-दिन तप में वृद्धि होती है, संवेग भाव बढ़ता है, परिणाम प्रशस्त होते हैं, समस्त दोष दूर होते हैं, अन्य वादियों का भय नहीं रहता, जिनशासन की प्रभावना करने में समर्थ होता है।
ज्ञान
जैसे न चाहते हुए भी संसार के जीवों को गरीबी आदि का कष्ट भोगना पड़ता है, वैसे ही कर्म से पीड़ित ज्ञानी को भी न चाहते हुए भी भोग भोगना पड़ता है, अतः सम्यग्दृष्टि जीव भोगों का सेवन करते हुए भी उनका सेवन नहीं करता है, क्योंकि विना इच्छा के किया गया कर्म विरागी होता है।
कर्म
राग-द्वेष के त्याग को साम्यभाव कहते हैं। अतः मैं जीवन में राग और मरण में द्वेष का त्याग करता हूँ, लाभ में राग अलाभ में द्वेष का त्याग, इष्ट संयोग में राग और इष्ट वियोग में द्वेष का त्याग, उपकारक मित्र में राग और अपकारक शत्रु में द्वेष का त्याग, सुख में राग दुःख में द्वेष का त्याग करता हूँ, क्योंकि साम्य भाव समस्त सदाचार का शिरोमणि है।
संयम
किससे क्या खराब- अनुचित आहार से पेट खराब होता है, आलस्य से दिन खराब होता है, कर्कशा स्त्री से रात खराब होती है, मूर्ख पुत्र से कुल खराब होता है, झूठ बोलने से बात खराब होती है, कटु भाषण से सम्बन्ध खराब होते हैं, लोलुपता से नियत खराब होती है, अनियमितता से स्वास्थ्य खराब होता है, जरुरत से ज्यादा धन हो तो बुद्धि खराब होती है और अपने कर्तव्यों का पालन न किया जाय तो पूरा जीवन खराब होता हैं। कर्तव्य ही धर्म है, कर्त्तव्य ही पूजा है, कर्तव्य से ही उज्ज्वल भविष्य बनता हैं।
चरित्र
जीवन एक युद्धक्षेत्र है, हम सब योद्धा हैं, यहाँ सभी को जीवन से लड़ना होता है। जीवन में मुसीबतें भी आती हैं, उनसे लड़ना सीखो मुसीबतों के सामने झुकने और घुटने टेकने से काम नहीं चलेगा। जीवन में आयी चुनौतियां भी एक चुनाव हैं, चुनाव का सामना तो करना ही होगा। हालांकि यह पैराशूट लेकर विमान से कूदने जैसा भारी काम है। तुम्हे इस निराशा के चक्र से बाहर निकलना होगा, कि 'मैं कुछ नहीं कर सकता' अपने साहस को मजबूत बनाइये और चलना शुरू कीजिए। सफलता आपका इन्तजार कर रही है, ईश्वर यद्यपि आपके साथ हर पल है, लेकिन पहला कदम आपको ही उठाना होगा।
पुरुषार्थ
धर्म केवल ग्रन्थों, पन्थों और सन्तों के पास नहीं बल्कि हर एक के दिल से होना चाहिए। धर्म का सम्बन्ध दीवारों से नहीं दिल से होना चाहिए। लोगों को प्रभावित नहीं प्रकाशित करें। सूर्य दिन में प्रकाश करता है और चन्द्रमा रात में लेकिन सन्त ऐसे ज्योति पुरुष हैं जो दिन-रात दोंनो को प्रकाशित करते हैं,
धर्म
जीवन एक युद्ध है, जीवन में लड़ना पड़ता है चिकित्सक बीमारी से लड़ता है, वकील अन्याय से लड़ता है, शिक्षक अज्ञान से लड़ता है और मुनि कर्मों से लड़ते हैं। श्रावक को अपने क्रोध से लड़ना चाहिए, क्योंकि जीवन का असली शत्रु तो क्रोध ही है। लड़ना ही है तो शेर से लड़ो गधे से लड़ने में क्या फायदा, पड़ोसी से लड़ना यानि कि गधे से लड़ना है। जीवन का असली शेर तो क्रोध है इसे जीतना सच्ची विजय है।
क्षमा
सत्ता और सत्य यूँ ही सीधे-सीधे नहीं मिलते हैं, दोनों के लिए तप जरूरी है। सत्ता दूसरों को सता-सता कर मिलती है और सत्य स्वयं को तपा-तपा कर प्राप्त किया जाता है। सत्ता शाश्वत नहीं है, सत्ता का पत्ता कभी भी कट सकता है, लेकिन सत्य शाश्वत है, सत्ता और सत्य दोनों के बीच युद्ध होता है, लेकिन महाभारत का उदाहरण साक्षी है कि युद्ध के अठारहवें दिन जीत सत्य की ही हुई थी।
सत्य
कञ्जूस अन्धा होता है, क्योंकि उसे धन के सिवाय कुछ भी दिखाई नहीं देता हैं। फिजूल खर्ची भी अन्धा होता है, वह आज को देखता है कल की नहीं सोचता। रिझाने वाली नारी अन्धी होती है वह बुढ़ापे की झुरियां नहीं देखती। अज्ञानी भी अन्धा होता है क्योंकि उसे कुछ समझ में नहीं आता है।
विवेक
लोभी को धन से, मानी को विनय से, मूर्ख को उसका मनोरथ पूरा करके, पण्डित को सच बोलकर, विनय से मित्र को, सम्मान से बाँधवों को, दान-मान से स्त्री व सेवकों को, तथा चतुराई से सबको वश में करना चाहिये।
विवेक
चैसठ प्रहरी पीपल- बाजार में नहीं मिलता, पीपल को चैसठ पहर तक घोटते रहो, उसके एक-एक कण को कई बार घोटने के बाद चैसठ प्रहरी बनता है, उसका सेवन करने से हड्डी का बुखार निकल जाता है, इसी तरह एक-एक भावना को बार-बार घोटने पर संसार का रोग समाप्त हो जाता है।
ध्यान
जो असुर और सुरेन्द्रों के भोगों से तृप्त नहीं हुआ वह मनुष्यों के अल्प भोगों से किस प्रकार तृप्त हो सकता है? समुद्र का जल पीने से जो सन्तुष्ट नहीं हो सका, वह तृण के अग्रभाग पर स्थित पानी के पीने से क्या तृप्त हो सकता है?
संतोष
न मुझे भक्तों की भीड़ से, न शिष्यों के समूह से, न पुस्तकादिक से, न शरीरादि से और न किसी कार्य से प्रयोजन है, विशुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा में ही मेरी सदा लीनता रहे।
ध्यान
सफलता के दस सूत्र- 1.जीवन भर सीखते रहें, 2.थोड़ा कार्य करें किन्तु श्रेष्ठ करें, 3.स्वयं एवं दूसरों के प्रति ईमानदार रहें, 4.अपने शरीर और स्वास्थ्य का ध्यान रखें, 5.सन्तोषी बने, 6.दूसरों को सम्मान देना सीखें, 7.जितनी बड़ी चादर उतने पैर फैलायें(आय से व्यय कम करें), 8.सुने अधिक बोले कम, 9.वचन को पूरा करें, 10.भविष्य की चिन्ता छोड़ें, भूत को भूल जाएँ, वर्तमान में जीना सीखें।
समृद्धि
पहले लोग दरवाजे पर लिखते थे- 'शुभ लाभ', 'बाद में लक्ष्मी जी सहाय करें' फिर 'वेलकम' अब 'कुत्ते से सावधान रहें' लिखने लगे हैं, अर्थात् हृदय की विशालता एवं विशुद्धि कम होती जा रही है।
चरित्र
पाँच बातें- 1.कभी किसी का दिल दुःखाने वाली बात मत कहो, 2.जो भी तुम्हारा भला करे उसकी बात मानो, 3.अधिक योग्य बने विना बड़ों की बराबरी का दावा मत करो, 4.जहाँ ज्ञान की दो बातें मिलें, ध्यान से सुनो, 5.जब किसी से द्वेष हो तब सोचो ये अपना ही तो है क्योंकि अपने से कभी घृणा और द्वेष नहीं होता है।
क्षमा
वैराग्य के पाँच सूत्र- 1.जीव यम के दाँतों के बीच रहकर भी जीने की इच्छा करता है, 2.संसारी प्राणी मोह उदय के कारण संसार से निकलने का उपाय नहीं करता है, 3.सारा संसार अज्ञान रुपी अन्धकार में जी रहा है, 4.पदार्थों के देखते ही राग या द्वेष रुपी जहर चढ़ता है, 5.पैर रखते ही पाप होना शुरू हो जाता है।
अनासक्ति
स्वास्थ्य, शान्ति एवं दीर्घायु के शिक्षा सूत्र- 1.खाओं कम चबाओ ज्यादा, 2.बोलो कम, विचारो ज्यादा, 3.बैठो कम, चलो ज्यादा, 4.लेना कम, देना ज्यादा, 5.पहनों कम, खुले वदन रहो ज्यादा, 6.उपदेश कम आचरण ज्यादा, 7.आज्ञा कम, सेवा ज्यादा, 8.खेद कम, प्रसन्न ज्यादा, 9.सोओं कम, जागो ज्यादा।
स्वास्थ्य
क्यों व्यर्थ रोते हो? तुम्हारा क्या गया जो रोते हो? तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था जो नाश हो गया? तुम न कुछ लेकर आये थे, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं पर दिया, खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाओगे, जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, आगे किसी और का होगा, तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो, बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुःख का कारण है।
अनासक्ति
सकारात्मक और नकारात्मक सोच-चार मिलने वालों ने कहा 'आप अस्वस्थ्य दिख रहे हैं' मन ने स्वीकार कर लिया और व्यक्ति बीमार हो गया, तब अस्वस्थ व्यक्ति अपने को स्वस्थ मानेगा, तो स्वस्थ क्यों नहीं होगा? इसके लिए चार की नहीं अकेले की आवश्यकता है।
मन
सोच बदले विना चारित्र नहीं बदलता है, अभी तो उजाला दिख रहा है ऐसा मानकर भोजन कर लेते हैं, आलू का त्याग है झोल का नहीं, ऐसा मानकर झोल ले लेते हैं, जब तक चारित्र के प्रति दृढ़ता नहीं होती तब तक चारित्र नहीं पलता है।
चरित्र
मन प्रायः गलत दिशा की ओर प्रेरित करता है, मौज-मस्ती के लिए, पाप-पाखण्ड के लिए, भोग-विलासिता के लिए, धन-वैभव के लिए, नाम-यश के लिए। एक बार मन की हो जाए तो उसकी माँग बढ़ जाती है, मन की मानोगे तो पाप में फँसोगे और दुर्गति में जाओगे। अतः मन को मनाने की कला सीखें। जो मन की मानता है वह आँसू बहाने को विवश होता है और जो मन को मना लेता है वह मुस्कुराने की कला सीख लेता है। धर्म शिक्षा की लगाम से दुष्ट मन रूपी घोड़े को नियन्त्रित कर सकते हैं।
मन
मन की गति- एक प्रश्न पूँछा कि वायु से भी अधिक चञ्चल क्या है? तब उत्तर में कहा- चञ्चल गिलहरी को पकड़ना, समुद्र की लहरों को गिनना, आकाश की ऊँचाई को मापना, सागर की गहराई को मापना आसान है, किन्तु मनुष्य के मन की गति को मापना आसान नहीं है।
मन
मन को मोड़ना- मन को मनाकर दिशा बदल दो, समस्या को समाधान के रूप में देखो, समस्या के पहाड़ को रास्ता बदल कर पार करो, संसार में ऐसा कोई कल्पवृक्ष नहीं जो आपकी इच्छा पूरी कर दे, अतः मन को तोड़ने की अपेक्षा इच्छायें खत्म करें।
मन