Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 19

धन दान में, मन ध्यान में, समय प्रभु गुणगान में।

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परेशानी में एकदम प्रतिक्रिया न करें- उत्तेजित अवस्था में मन की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है, लोगों के माँगने पर ही अपनी सफाई दीजिए, अपने निर्दोष होने को लोगों पर थोपिये नहीं, सलाह या उत्तर देते समय आपकी आवाज हमेशा नम्र, आदर पूर्ण और नियन्त्रित होनी चाहिए, आपकी चाहे कितनी भी आलोचना की जाए या दोष लगाया जाय, आपको कभी अनियन्त्रित तरीके से व्यवहार नहीं करना चाहिए और जबाव देते समय कभी चीखना या चिल्लाना नहीं चाहिए।
क्षमा
भूत का चिन्तन, भविष्य की चिन्ता- संसार के लिए सर्वाधिक महत्त्व इस बात का है, कि आप इस समय क्या हैं, न कि आप क्या थे और क्या होंगे, वर्तमान का सदुपयोग करें व भूत की घटना से शिक्षा लें।
समय
आप अपने भाग्य के निर्माता हैं- जीवन के प्रति स्वयं को जिम्मेदार समझना चाहिए, क्योंकि विचार, शब्द और कार्य ही आपके भविष्य के आधार हैं, जीवन के प्रति आपका सही दृष्टिकोण मुख्य परिवर्तन ला सकता है।
पुरुषार्थ
दूसरों की सन्तुष्टि से पहले आत्म सन्तुष्टि होना चाहिए- ध्यान रखिये आपके लिए यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप अपने सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, बजाय इसके कि दूसरे आपके सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, आपके बारे में दूसरे का निर्णय आवश्यक नहीं कि सही हो, क्योंकि निर्णय उसके मानसिक स्तर के अनुसार होता है, इसकी चिन्ता किये विना कि दूसरे आप के बारे में क्या विचार रखते हैं, सदा सरल-सुन्दर जीवन शैली से जीवन जीते हुए अपनी स्वभाविक स्थिति में रहिए और दूसरों को कृत्रिम रूप से प्रभावित करने का प्रयत्न मत कीजिए, आप जो नहीं है वैसा दिखाने का प्रयत्न करना मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण होता है।
संतोष
धन का उपार्जन उस प्रकार करना चाहिए जिस प्रकार धर्म नष्ट न हो और सुख भी क्षीण न हो, परस्पर सापेक्ष रहने वाले धर्म और सुख की सेवा करनी चाहिए, अर्थात् गृहस्थ को धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ का परस्पर विरोध न करते हुए पालन करना चाहिए।
धन
कल्पवृक्ष माँगने पर देता है, चिन्तामणी रत्न चिन्तन मात्र से देता है, पर धर्म विना माँगे और विना चिन्तन के ही सब कुछ दे देता है।
धर्म
स्वभाव की पवित्रता, मित्रता, त्याग, सत्य, कृतज्ञता, ब्रह्मचर्यता और शूरता ये गुण सम्पत्ति के कारण हैं।
समृद्धि
यदि एक सत्य गुण है, तो अन्य बहुत से गुणों की क्या आवश्यकता है? अर्थात् सत्य के साथ सभी गुण रहते हैं।
सत्य
महापुरुषों की कार्यसिद्धि धैर्यगुण (पुरुषार्थ) में निवास करती है, केवल उपकरण या साधन-सामग्री में नहीं।
पुरुषार्थ
मानव उतनी ही नकल करता है, जितनी उसमें बुद्धि की कमी होती है, जब कोई निर्धन धनवान की नकल करता है, तो वह बर्बाद हो जाता है।
विवेक
बच्चों को जङ्गल के पौधे की तरह स्वाश्रित बनायें न कि घर के गमले की तरह पराधीन, ताकि उन्हे कोई पानी भी न दे तब भी वे अपने बलबूते फल-फूल सकें। केवल अच्छी बातें नहीं अच्छे काम भी करना चाहिए।
परिवार
विद्वान् के आगे अपने गुण नहीं कहना चाहिए क्योंकि वह स्वयं जानता है, और मूर्ख के आगे भी अपने गुण नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वह विद्वानों के द्वारा कहे हुए गुणों को समझता ही नहीं है।
विनम्रता
निन्दा और नुकसान होने पर भी चेहरे की सौम्यता बनाये रखने वाला और जीवन की सबसे बड़ी घटित घटनाओं को भूलने वाला सदा सुखी रहता है।
क्षमा
अज्ञानी मनुष्यों का जीवन शून्य है, बन्धुहीन मनुष्यों की दिशाएँ शून्य हैं, पुत्ररहित का घर शून्य है और दरिद्रता सर्व गुणों से शून्य होती है।
Misc.
जिसका जन्म गुरुसेवा में, मन समीचीन ध्यान की चिन्ता में और धन का उपयोग सत्पात्र दान में जाता है, वह पण्डित है।
दान
वेषधारी साधु को, गुरु को, गौ को, ब्राह्मण को, राजा को, स्त्री को, मूर्ख को, बालक को और सर्प को ज्ञानीजन नाराज नहीं करते हैं।
विवेक
महापुराणों के ज्ञाता सत्पुरुष प्रिय पदार्थ के चले जाने पर विषाद नहीं करते हैं और आ जाने पर हर्ष नहीं करते हैं क्योंकि ज्ञान का फल सन्तोष है।
संतोष
पड़ोसी से प्रेम करने वाला व्यक्ति विपत्ति में भी सुखी रहता है, क्योंकि पड़ोसी सहयोग करता है और पड़ोसी से बैर रखने वाला व्यक्ति सम्पत्ति में भी दुःखी रहता है क्योंकि पड़ोसी परेशान करता है।
संगति
जो व्यक्ति गुस्से के समय गूंगा, निन्दा सुनने के समय बहरा, बुरे दृश्यों को देखने के समय अन्धा बन जाता है वह मुसीबतों से बच जाता है।
संयम
इंसान का दिमाग कभी बूढ़ा नहीं होता पर आवेश, आग्रह और आशङ्का दिमाग को बूढ़ा कर देते हैं।
मन
मनुष्यों का मन ही बन्ध व मोक्ष का कारण है, घर में आसक्त मन बन्ध के लिए और तप में स्थित मन मोक्ष के लिए होता है।
मन
लोक में ज्ञानी पुरुष स्वयं तरते हैं और जहाज के समान दूसरों को भी तारते हैं।
ज्ञान
मोक्ष के लिए प्रयास करने वाला ज्ञानी जीव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त रहता है और ब्रह्मचर्य, व्रत, ध्यान, तप, दया में राग भाव करता है, तथा कषायों को बीमारी के समान देखता है।
अनासक्ति
जो होने वाला है वह होता ही है और जो नहीं होने वाला है वह नहीं होता है, इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले मनुष्यों को चिन्ता कहीं बाधा नहीं पहुँचाती है।
संतोष
अन्य पुरुष के रहने पर चिन्ता होती है, चिन्ता से कर्मबन्ध होता है और उससे संसार बढ़ता है इसलिए मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य को 'सब चिन्ताओं से रहित मैं एक हूँ, निश्चिन्त हूँ' ऐसा चिन्तन करना चाहिए।
अनासक्ति
श्रावक दान के द्वारा उत्तम भोग को, पूजा के द्वारा जगत् के स्वामित्व को, ब्रह्मचर्य के द्वारा कुल के ऐश्वर्य को और उपवास के द्वारा निर्वाण सुख को प्राप्त होता है।
दान
'हाव-भाव से, इशारे से, गति से, चेष्टा से, साथ-साथ बात करने से, नेत्र तथा मुख के विकार से' इतनी बातों से मनुष्य के मन की बातों का अनुमान हो जाता है।
विवेक
स्वादिष्ट और रोग हरने वाली औषधि की तरह, हित चिन्तक और बुद्धिमान मनुष्य दुर्लभ होते हैं।
संगति
जो विद्वान् दूसरों को सम्बोधित करते हैं, यथार्थ में वे ही सब को जानने वाले हैं, अन्य लोग जो घट में रखे हुए दीपक के समान किसी के काम नहीं आते हैं, वे मूर्ख हैं।
ज्ञान
सर्पों के द्वारा डसे हुए मनुष्यों का शरीर ही नष्ट होता है, परन्तु दुर्जन के द्वारा डसा हुआ मनुष्यों का वंश, वैभव, पाण्डित्य, क्षमा तथा कीर्ति आदि गुण क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
संगति
मैं मानता हूँ कि समय अमूल्य है, पर आपको भी मानना पड़ेगा कि जीवन बहुमूल्य है।
समय
सड़क से गुजरती किसी की अर्थी को देखकर यह मत कहना कि बेचारा चल बसा, अपितु उस अर्थी को देखकर सोचना, कि किसी दिन मेरी अर्थी भी इन्हीं रास्तों से यूं ही गुजर जायेगी और लोग सड़कों के दोनों ओर खड़े देखते रह जायेगें, दूसरे की मौत से अपनी मृत्यु का बोध ले लेना चाहिए।
समाधि
ज्ञानी बुजुर्गों की सङ्गति करो, क्योंकि उनकी एक-एक झुर्री पर हजार अनुभव लिखे होते हैं, उनके काँपते हाथ, हिलती गर्दन, लड़खड़ाते कदम, मुरझाया चेहरा सन्देश देता है कि जो भी शुभ करना है, आज ही कर लो कल नही कर पाओगे, बूढ़ा इंसान धरती का सबसे बड़ा शिक्षालय है, क्योंकि उसे देखकर उगते सूरज की डूबती कहानी का बोध होता है।
संगति
कुछ लोग पैसे के मालिक होते हैं, कुछ लोगों का पैसा मालिक होता है, आप क्या हैं?
धन
स्नेह असंयम का मूल होने से स्नेह युक्त व्रत, तप व संयम प्रशंसनीय नहीं है, पाप ज्ञान का वध करता है।
अनासक्ति
स्वार्थसिद्धि के अभाव में परमोपकारी भी कट्टर शत्रु हो जाता है, उपकार से शत्रु भी मित्र बन जाता है।
संगति
अनादि अशुभ परिणामों का नाश करने के लिये रात-दिन समता का अभ्यास आवश्यक है।
ध्यान
अग्नि वायु से और कषाय असहिष्णुता से भड़कती है।
क्षमा
जो पर की निन्दा कर अपने को गुणी सिद्ध करता हैं, वह दूसरों को कटु औषधि पिलाकर स्वयं नीरोग होना चाहता है।
चरित्र
सौभाग्य को ठुकरा देना भी दुर्भाग्य है।
Misc.
आँख, कान, नाक, हाथ, पैर दो दो हैं किन्तु इन सबका कार्य एक एक हैं और रसना एक है पर काम दो है खाना और बोलना अतः रसना इन्द्रिय में खाने और बोलने दोनों का संयम अत्यावश्यक है।
संयम
पुण्य का बन्ध इच्छा रहित व्यक्ति को होता है।
कर्म
'ये वस्तुएं मेरे भोगने योग्य हैं, मैं भोक्ता हूँ' यह अशुभ भाव 'सङ्कल्प' कहलाता है।
अनासक्ति
संयम लेकर निदान करना अर्थात् शिला पर सुख से बैठने के लिये कन्धे पर बड़ी शिला धारण कर ले जाना है।
संयम
अति प्रिय मनुष्य भी क्रोध करने से शत्रु बन जाते हैं, अयोग्य कार्य से यश भी अपयश रूप परिणमन कर जाता है।
क्षमा
घर में सर्प होने पर निकाले विना शयन करना मुश्किल है, उसी तरह संसार रूपी वन को पार किये विना सुखी होना मुश्किल है।
अनासक्ति
संसारी प्राणी ने जगत में नारायण, प्रतिनारायण, चक्रवर्ती, सौधर्में न्द्रादि दक्षिणेन्द्र पद, लोकपाल, सौधर्मेन्द्र की शची, पञ्चानुत्तरवासी देव और लौकन्तिकदेव के सुखों को प्राप्त नहीं किया, बाकी सब सुख प्राप्त किये हैं।
संतोष
मन को वश में करने पर राग-द्वेष-मोह आदि सब नष्ट हो जाते हैं, अनियन्त्रित मन संसार का कारण है।
मन
मन्द या तीव्र गति से शास्त्र न पढ़े। ज्ञानाभ्यास में रुचि नहीं होती है तो कषाय और आरम्भ में प्रवृति होती है।
ज्ञान
मानसिक दृष्टिकोण ही जीवन में सब कुछ है। सफलता के लिए भय मुक्त होना आवश्यक है।
मन
शारीरिक व्यायाम जिस प्रकार शरीर की शक्ति को बढ़ाता है, उसी प्रकार एकाग्रता मन की शक्ति को बढ़ाती है, कठिन विषयों पर भी अपना ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास करना चाहिए ताकि मन पर सच्चा नियन्त्रण पाया जा सके, एकाग्रता का अर्थ वर्तमान क्षण में जीना है, अर्थात् प्रत्येक कार्य मन लगा कर करना है।
ध्यान
गुस्सा कमजोरी की निशानी है- आप गुस्से की बजाय अपने व्यक्तित्त्व के बल पर कार्य करवा सकते हैं, किसी व्यक्ति द्वारा कोई कार्य करवाने के लिए आपका गम्भीरता पूर्वक कहना ही पर्याप्त होना चाहिए, आपके शब्दों और भावों में महान शक्ति है।
क्षमा
अनाशक्ति और भूलने की क्षमता- किसी कार्य या वस्तु में ध्यान लगाने और उससे ध्यान हटाने का अभ्यास आपको साथ-साथ करना है, जीवन में सफलता पाने के लिए पुरानी अनावश्यक बातों को भुला देना महत्त्वपूर्ण गुण है, याद रखना कभी-कभी महत्त्वपूर्ण है जबकि भूल जाना ज्यादा उपयोगी होता है।
मन
आध्यात्मिक उन्नति के लिए मौन, एकान्त और आत्मनिरीक्षण से शारीरिक, मानसिक शक्ति का सञ्चय होता है।
ध्यान
समय बर्बाद मत कीजिए अन्यथा समय आपको बर्बाद कर देगा।
समय
हीन भाव से दूर रहें जो काम दूसरे लोग कर सकते हैं वह आप भी कर सकते हैं बस सोई हुयी शक्तियों को जगाना है।
पुरुषार्थ
हर क्षण हम मृत्यु के समीप पहुँच रहे हैं, न्यूनतम समय में अधिकतम काम करना है, मानसिक वेगों को नियन्त्रित करिए आपको हर जगह इस प्रकार का धीरज अपनाना चाहिए और सांसारिक विषयों और इन्द्रियों के सुखों को पाने के लिए बैचेनी और उत्सुकता से बचना चाहिए, पानी की शक्ति जिस प्रकार बाँध बनाने से बढ़ जाती है ठीक उसी प्रकार मन की शक्ति मन को नियंत्रित करने से बढ़ जाती है।
समाधि
कमजोरियों को स्वीकारिये- अपनी कमजोरियों को जान लिया तो समझ लीजिए कि आपने उनको दूर करने का पहला कदम उठा लिया है, अपने आपको अपनी आँखों से देखिए दूसरों की आँखों से नहीं अर्थात् आत्मनिरीक्षण स्वयं कीजिए।
विवेक
चेतन मन को गन्दगी से न भरिये- सकारात्मक सोच सदैव नकारत्मक सोच पर विजयी होती है, विना माँगे सलाह न दीजिए, टीका-टिप्पणी करने से बचिए, आप जो उपदेश देना चाहते हैं उसे शब्दों में देने के बजाय अपने व्यवहार द्वारा देना उचित है, वह अधिक असर कारक व वजन दार होगा।
मन
कर्म करने में अहङ्कार की भावना का त्याग- कर्तव्य समझकर उपकार करें, बदले में अपेक्षा न रखें।
विनम्रता