Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
धन

धन का उपार्जन उस प्रकार करना चाहिए जिस प्रकार धर्म नष्ट न हो और सुख भी क्षीण न हो, परस्पर सापेक्ष रहने वाले धर्म और सुख की सेवा करनी चाहिए, अर्थात् गृहस्थ को धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ का परस्पर विरोध न करते हुए पालन करना चाहिए।

Wealth should be earned in such a way that neither dharma is destroyed nor happiness diminished; one should serve dharma and happiness as mutually dependent — that is, a householder should pursue dharma, wealth and desire without letting them conflict with one another.

— आराध्य सूत्र · #98

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लक्ष्मी हिंडोले की तरह चंचल है। विषयों से उत्पन्न हुआ सुख अंततः दुःखप्रद है। देह विपत्ति का घर है। अत्यधिक धन मृत्यु का प्रचुर साधन है। संसार अत्यधिक शोकपूर्ण है। स्त्रियाँ अनर्थ की जड़ हैं। फिर भी लोग इस घोर संसार में ही रत रहते हैं। आत्मा में रत नहीं होते यह आश्चर्य है।
धन