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कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 40 / 41

चैत्र मास- ना हो दीक्षा प्रयास-चैत्र में दीक्षा स्वीकार करना बहुत दुःख रूप फल को देने वाला है, वैशाख में रत्नलाभ, ज्येष्ठ में मरण, आषाढ़ में बन्धुनाश, श्रावण में शुभदायक, भाद्रपद में प्रजाहानि, आश्विन में सर्वत्र सुख, कार्तिक में धनवृद्धि, मार्गशीर्ष में शुभदायक, पौष में ज्ञानहानि, माघ में बुद्धि की वृद्धि और फाल्गुन में सर्वत्र सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मासों में दीक्षा लेने का शुभ-अशुभ फल कहा है।
समय
शिष्य लक्षण- जो खेल व कौतूहल से रहित हो, लज्जावान हो, अधिक और अतिमधुर आहार करने वाला न हो, दयालु हो, छलरहित हो, ब्रह्मचारी हो, विनय एवं नीति से सहित हो, ज्ञान का उपयोग करने वाला हो, प्रमाद रहित हो, समीचीन उच्चारण करने वाला हो, कृतज्ञ हो, अनेक बार गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला हो, शान्त हो, एकाग्रचित्त हो, मधु के समान मधुरभाषी हो तथा अभिमानी न हो वह उत्तम शिष्य माना गया है।
चरित्र
विवेकी शिष्य को जोर-जोर से पढ़ना, गाते हुए पढ़ना, हास-परिहास, स्त्रियों के निवासस्थल में रहना, उनके शरीर को देखना, साथ-साथ वार्तालाप करना, उनके शरीर का स्पर्श करना, उनके पुत्रों को निरन्तर खिलाना, उनके आगे पति की अत्यधिक प्रशंसा करना, ज्योतिष, मन्त्र, निमित्त ज्ञान, औषध, सञ्चित धन और शरीर का पोषण करना इत्यादिक छोड़ देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
जैसे बकरे को सुगन्धित तेल पिलाने पर भी वह दुर्गन्ध रहित नहीं होता है, वैसे ही भ्रष्ट साधु संयमी होने पर भी विषय कषाय का त्याग नहीं करता, जैसे पशु को उत्तम भोजन मिलने पर भी वह घास ही खाता है, उसी प्रकार दीर्घ काल तक दीक्षित होकर भी भ्रष्ट साधु इन्द्रिय विषय और कषाय के परिणाम ही करता है।
संयम
वैशाख शुक्ला दशमी के दिन वीर जिन को केवलज्ञान हुआ था, गणधर के अभाव में देशना नहीं खिर रही थी, तब इन्द्र का आसन कम्पित हुआ, गणधर बनने योग्य व्यक्ति को इन्द्र ने अपने अवधि नेत्र से देखा, तब इन्द्रभूति गौतम के पास जाकर प्रश्न किया- तीन काल, छह द्रव्य, नौ पदार्थ, छह जीवनिकाय, छह लेश्या, पाँच अस्तिकाय, पाँच व्रत, पाँच समिति, चार गति, पाँच ज्ञान, पाँच चारित्र, ये जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे गए हैं, इनका जो श्रद्धान करता है वह सम्यग्दृष्टि होता है। इन्द्रभूति गौतम इनका उत्तर नहीं दे सके, अहङ्कार वश महावीर भगवान् के समवसरण में आये और मानस्तम्भ को देखकर सम्यक्त्व हो गया था।
धर्म
तब लों तुम ध्यान हिये बरतों, तब लों श्रुत चिन्तन चित्त रतों, तब लों व्रत चारित चाहतु हों, तब लों शुभ भाव सु गाहत हों, तब लों सत्सङ्गति नित्य रहों, तब लों मम सञ्जम चित्त गहों। जब लों नहिं नाश करों अरि को, शिव नारि वरों समता धरि को।।
ध्यान
भील से भगवान् और मारीच से महावीर- जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी के मधु नामक वन में 'पुरूरवा' नामक भीलों का राजा हुआ, उसकी कलिका नाम की स्त्री थी। उसी वन में सागरसेन मुनि ध्यान मग्न थे। भील ने उनको मारना चाहा। स्त्री ने रोका, भील ने प्रभावित होकर मुनि से मद्यादि का त्याग किया। भील मरकर सौधर्म स्वर्ग में उत्पन्न हुआ, स्वर्ग से अयोध्या में भरत चक्रवर्ती की रानी अनन्तमति से ज्येष्ठ पुत्र मारीच हुआ। भगवान् आदिनाथ के साथ दीक्षित हुआ, फिर भ्रष्ट होकर परिव्राजक बनकर स्वर्ग गया, वहाँ से आकर करीब पाँच भव तक परिव्राजक होता रहा और स्वर्ग जाता रहा। उसके बाद असंख्यात भव तक त्रस-स्थावरों में भटककर ब्राह्मण हुआ, फिर परिव्राजक होकर पाँचवे स्वर्ग गया। सुरम्या देश के पौदनपुर में त्रिपृष्ठनारायण हुआ, वहाँ से मरकर सात वे नरक गया, वहाँ से सिंह बनकर प्रथम नरक गया, वहाँ से निकल कर फिर सिंह हुआ। अजितञ्जय, अरिञ्जय नामक रिद्धिधारी मुनियों के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्त किया, 'दस' भव बाद में तीर्थंङ्कर होंगे 'ऐसा श्रीधर तीर्थंङ्कर से मैंने सुना है'। मुनिराज ने शेर से कहा, शेर ने श्रावक के व्रत लिये और सन्यास पूर्वक मरणकर, पहले स्वर्ग में सिंहकेतु नामक देव हुआ, चौथे भव में धातकी खण्ड की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा सुमित्र और मनोरमा रानी के प्रियमित्र नाम का चक्रवर्ती हुआ। दो हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो बारहवे स्वर्ग गया, छत्रपुर में नन्दिवर्धन राजा के नन्द नामक पुत्र हुआ। सोलह कारण भावना भाकर तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया, फिर सोलहवें स्वर्ग गया, भरत क्षेत्र में विदेह देश के कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ की प्रियकारिणी (त्रिशला) रानी ने सोलह स्वप्न देखे। फल पूँछा, गर्भकल्याणक, रत्नवृष्टि, नगरी रचना, आश्विन शुक्ल षष्ठी को, छप्पन कुमारी देवियों ने आकर सेवा की।
कर्म
कल्पवासी के यहाँ घण्टा, ज्योतिष देव के सिंहनाद, भवनवासी देव के यहाँ शङ्खनाद, व्यन्तरों के यहाँ अनहद बाजे बजने लगे। जन्म कल्याणक के समय सौधर्मेन्द्र एक लाख योजन के ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर आता है। इन्द्र हजार हाथ, हजार पैर बनाकर ताण्डव नृत्य करता है एवं सुमेरूपर्वत पर आठ योजन गहरे, चार योजन चौड़े, एक योजन मुख वाले एक हजार आठ कलशों द्वारा क्षीरसागर के जल से अभिषेक करता है, बालक्रीडा के लिए देवों को नियुक्त करता है। इन्द्र ने जन्म के समय वीर और वर्धमान नाम रखे, सञ्जय-विजय मुनि का सन्देह दूर हुआ तो सन्मति नाम रखा, सङ्गम देव ने सर्प बनकर परीक्षा ली निर्भय रहे तो महावीर नाम रखा। भोजन-वस्त्र, वाहन सभी स्वर्ग से आते थे, तीर्थंङ्कर सत्ताईस लड़ी का हार पहनते हैं, जो चक्रवर्ती की सारी सम्पदा से भी अधिक कीमती होता है। आठ वर्ष में अप्रत्याख्यानावरण कषाय का क्षयोपशम हो जाता है जिससे वे देशव्रती हो जाते हैं, माँ ने आग्रह किया पुत्रवधु को देखना है, वीर ने कहा मुक्ति वधु का वरण करना है। मित्रों से पिता ने कहा वर्धमान नीचे है, माँ ने कहा ऊपर हैं, तब वीर ने बच्चों को अनेकान्त से समझाया कि बीच में होने से पिता की अपेक्षा नीचे माँ की अपेक्षा ऊपर है। तीस वर्ष में वैराग्य हो गया, लौकान्तिक देवों ने आकर वैराग्य की अनुमोदना की। चन्द्रप्रभ पालकी पर आरूढ़ हो षण्डवन में चले गये, एक बार उज्जयिनी के श्मशान में प्रतिमा योग धारण किया, तब महादेव रूद्र के द्वारा घोर उपसर्ग होने पर भी अचल रहे, तब अतिवीर नाम रखा गया था। राजा चेटक की बेटी 'चन्दना' (महावीर की छोटी मौसी) के यहाँ आहार हुआ, पञ्चाश्चर्य हुए, बारह वर्ष घोर तप कर अन्त में जृम्भिका ग्राम में ऋजुकूला नदी के तट पर वैशाख शुक्ला दशमी को केवलज्ञान हुआ।
धर्म
छियासठ दिन तक गणधर के अभाव में देशना नहीं हुयी, भगवान् महावीर को केवलज्ञान होने के पैंसठ दिन बाद, आज गौतम गणधर ने वीर प्रभु का शिष्यत्व स्वीकार किया था, इसलिए वीर शासन जयन्ती पर्व महावीर प्रभु की देशना से प्रारम्भ हुआ।
धर्म
भारत को ब्रिटिश शासन से सन् 1947 में मुक्ति प्राप्त हुयी थी, भारत की स्वतन्त्रता के अङ्कुर 1857 में प्रकट हुये थे, नब्बे वर्ष तक स्वतन्त्रता के अङ्कुर की रक्षा नहीं हो सकी, इस पौधे को अपने रक्त से सींचकर बड़ा करने वाले बलिदानियों की लम्बी पङ्क्ति है, जैसे महारानी लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे, टीपूसुल्तान, बालगङ्गाधर तिलक, लाला लाजपतराय, महात्मागाँधी, मोतीलाल नेहरू, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुखदेव आदि अनेक क्रान्तिकारी नवयुवकों ने इस पौधे की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है।
विविध
आज का दिन बड़ी कठिनाई से देखने को मिला था, दुर्भाग्य यह रहा कि हमारी खुशी आधी रह गयी, भारत को खण्डित स्वतन्त्रता प्राप्त हुयी थी, भारत के एक भू भाग को काटकर, पकिस्तान का निर्माण कर दिया गया था।
विविध
नदी पर बुढ़िया आधी धोती पहनकर धो रही थी, उसकी गरीबी देखकर गाँधी जी ने खादी और घुटने तक धोती पहनने का नियम लिया था।
चरित्र
विदेश जाने पर माँ के द्वारा दिये मांस, मदिरा, अण्डे को सेवन न करने के नियमों का पालन किया था।
आहार
क्षमा- एक अंग्रेज ने गाँधी जी के गाल पर चाँटा मारा तो गाँधीजी ने अपना दूसरा गाल आगे कर दिया, तो इसे देखकर वह पानी पानी हो गया था।
क्षमा
जलिया वाला बाग अमृतसर सभा में स्थित दो हजार लोगों को अंग्रेजों ने मौत के घाट उतार दिया था। दो हजार लाशों की रुधिर नदी के बीच, एक नारी अपने पति की दिया जलाये पूरी...
विविध
समवसरण में ग्यारह गणधर, चौदह हजार मुनि, छत्तीस हजार आर्यिका, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकायें थीं। महावीर का शुभ सन्देश जियो और जीने दो था।
अहिंसा
ढोल की पोल-नरतन बड़ा अनमोल- सब कुछ डांवा डोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के भीतर पोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को। दाने गिनकर दाल मिलेगी, गेहूँ की बस छाल मिलेगी, पानी के इञ्जेक्शन होंगे, घोषित रोज इलेक्शन होंगे। हलवाई हैरान मिलेंगे, विन चीनी मिष्ठान्न मिलेंगे, जलने वाला खेल मिलेगा, बस मिट्टी का तैल मिलेगा। शीशी में पेट्रोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के भीतर पोल..।। रोते हुए बाजार मिलेंगे, हँसते हुए सियार मिलेंगे, धन्धे केवल काले होंगे, जमकर के घोटाले होंगे। ऊसर होंगे, बञ्जर होंगे, सूखे हुए समन्दर होंगे, पेड़ न होंगे, हवा न होगी, अस्पताल में दवा न होगी। कटा-फटा भूगोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के अन्दर पोल.....।। भारी-भारी बस्ते होंगे, आँसू सबसे सस्ते होंगे, बच्चे बौने हो जायेगें, स्वयं खिलौने हो जायेगें। पढ़े-लिखे बेकार मिलेंगे, हाथों में हथियार मिलेंगे, पुण्य न होगा, पाप ही होगा, राम-नाम का जाप न होगा। मारकाट का बोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढोल के भीतर पोल.....।। सारे कवि स्वच्छन्द मिलेंगे, विना भाव के छन्द मिलेंगे, गीत न होंगे, गले न होंगे, आँख किसी की सजल न होगी। मञ्चों पर लफ्फाजी होगी, सिर्फ चुटकुले बाजी होगी, जो सस्तें में बिक जायेंगे, उतने ज्यादा टिक जायेंगे। मात्र यही किल्लोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।। राजनीति में तन्त्र मिलेगा, इक गहरा षडयन्त्र मिलेगा, न सुभाष न गाँधी होगें, खादी में अपराधी होंगे। जनता गूँगी-बहरी होगी बेबस कोट-कचेरी होगी, गुण्डों को संरक्षण होगा, संसद में आरक्षण होगा। हर क्षेत्र में राजनीति का रोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।। प्यासों की भी रैली होगी, गङ्गा बिल्कुल मैली होगी, घरों-घरों में फैक्स लगेगा, सांसों पर भी टैक्स लगेगा। कम्प्यूटर की माया होगी, बेकारी की छाया होगी, चादर नीचे पड़ी मिलेगी, खटिया सबकी खड़ी मिलेगी। सबका बिस्तर गोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।। बाहर से डॉलर आयेंगे, उनको वही देख पायेंगे, जो अंग्रेजों के प्यारे होंगे, भारत के हत्यारे होंगे। आज हँस रहे कल रोओगे, पता नहीं कितना खोओगे, आजादी की लाश मिलेगी, जनता बहुत उदास मिलेगी। मातम का माहौल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को, ढ़ोल के भीतर पोल.....।।
Misc.
आचार्यश्री का प्रथम दीक्षा दिवस मनाने के लिए आचार्य ज्ञानसागरजी से अनुमति ली, उन्होंने कहा विद्या से पूँछ लो, लोगों ने उनसे पूँछा कल आपका दीक्षा दिवस मनायेंगे, आशीर्वाद दे दो, आचार्यश्री ने कहा! देख लो, दूसरे दिन तैयारी हो गयी, आचार्य श्री ध्यान में बैठ गए उठे ही नहीं, लोगों ने पूँछा महाराज आपने दीक्षा दिवस नहीं मनाया, आचार्य श्री ने कहा हमने तो ध्यान में बैठकर अच्छे से मनाया।
ध्यान
दीक्षा एक लड़ाई है- दीक्षा एक लड़ाई है, जिसको लड़ने में ही भलाई है। जो खुले मैदान में, बाहर नहीं वालों से, भीतर वालों से लड़ी जाती है। गुरू चरणों में सिर कर, आत्म समर्पण अदृश्य कर्म शत्रुओं से लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है... दिगम्बरत्व को धार कर, अम्बर को त्याग कर। विषय सरिता पार कर, कटीले रास्ते को पार कर लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है... यह एक खुली किताब है, जिसमें अनन्त का हिसाब है। जो मौन होकर, चर्म चक्षुओं को बन्द कर, ज्ञान चक्षुओं से लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है...
संयम
मोह मुक्ति का फार्मूला- सच्चाई के पत्ते एक ग्राम, ईमानदारी की जड़ तीन ग्राम, परोपकार के बीज पाँच ग्राम, सङ्गठन के बहेड़े तीन ग्राम, करुणा का छिलका ग्यारह ग्राम, मिलाप के आँवले दस ग्राम, सत्सङ्ग का रस एक ग्राम, स्वदेश प्रेम का रस पाँच ग्राम इन सब को मिलाकर, परमात्मा की हाण्डी में डालकर, भक्ति के चूल्हे पर रखकर, प्रेम की अग्नि में पकायें, अच्छी तरह पक जाने पर नीचे उतार कर ठण्डा करें, फिर शुद्ध मन के कपड़े से छानकर, मस्तिष्क की शीशी में भर लें। सेवन विधि- इस औषधि को प्रति दिन सन्तोष के गुलकन्द के साथ, इन्साफ की चम्मच से सेवन करें, परहेज- क्रोध की मिर्च, अहङ्कार का तेल, लोभ की मिठाई, धोके के पापड़, दुराचार के मसाले से बचें।
अनासक्ति
मान्यताएँ भले ही अलग-अलग हैं पर दीपावली पर्व सभी जाति के लोग मनाते हैं- प्रथम मान्यता- जैन परम्परा में प्रत्यूष बेला में महावीर भगवान् को निर्वाण प्राप्त हुआ था, उसके उपलक्ष्य में लड्डू चढ़ाते हैं, उसी दिन शाम को गौतम गणधर को केवलज्ञान हुआ था, इस कारण दीप प्रज्वलित करते हैं। द्वितीय मान्यता- हिन्दु परम्परा में रावण का वध करके रामचन्द्र जी अयोध्या लौटे थे, जनता को इच्छित राजा प्राप्त हुआ था, इसलिये दीप जलाते हैं। तृतीय मान्यता- आज कृष्ण जी ने नरकासुर का वध किया था और हजारों लोगों को उसके चङ्गुल से मुक्त किया था, इसलिए दीप जलाते हैं। चतुर्थ मान्यता- इस दिन समुद्र मन्थन हुआ जिससे लक्ष्मी जी प्रकट हुयी थीं, इसलिये देवताओं ने लक्ष्मी जी की पूजा की थी। पञ्चम मान्यता- सिक्खों के अनुसार उनके छठवें गुरू हरगोविन्ददास जी ने जेल से मुक्ति पायी थी।
धर्म
भगवान् पार्श्वनाथ जी वैशाख कृष्णा दूज के दिन प्राणत स्वर्ग से वाराणसी में राजा अश्वसेन-वामादेवी के गर्भ में आये, उग्रवंश में पौष कृष्णा ग्यारस को जन्म हुआ, इन्द्र ने अपने वैभव के साथ आकर पाण्डुक शिला पर अभिषेक किया, पौष कृष्णा ग्यारस पौर्वाण्ह बेला में दीक्षा ली, विमला पालकी से वन में पधारे, देवदारू वृक्ष के नीचे दो उपवास के साथ दीक्षा ली, साथ में तीन सौ राजा दीक्षित हुये, धन्यराजा के यहाँ क्षीरान्न का प्रथम आहार हुआ, धव वृक्ष के नीचे चैत्र कृष्णा त्रयोदशी को केवलज्ञान हुआ, सवा योजन का समवसरण, दस गणधर, प्रथम गणधर स्वयम्भू, प्रथम आर्यिका सुलोका, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ, मुख्य श्रोता महासेन, श्रावण शुक्ला सप्तमी को स्वर्णभद्र कूट सम्मेदशिखर जी से छत्तीस मुनिराजों के साथ एक माह तक योग निरोध कर खड्गासन से मोक्ष पधारे थे।
धर्म
गाँव के लोग आबाद रहें- साधु ने सज्जनों की भक्ति पर प्रसन्न होकर बर्बाद होने का आशीर्वाद दिया, अर्थात् सज्जन जहाँ जायेंगे वहाँ धर्म की प्रभावना होगी इसलिए वे फैल जाएँ और प्रमादियों को आबाद होने का आशीर्वाद दिया, अर्थात् प्रमादी लोग जहाँ रहेंगे वहाँ धर्म का ह्रास होगा इसलिए वे एक ही जगह पर रहें।
संगति
शरीर सिकुड़ गया, गति नष्ट हो गई, दाँत गिर गये, दृष्टि चली गई, अन्धेरी बढ़ने लगी, मुख लार से भर गया, बाँधव जन कहा नहीं मानते और स्त्री सेवा नहीं करना चाहती, हाय बड़े कष्ट की बात है कि बुढ़ापे के कारण वृद्ध मनुष्य का पुत्र भी उसके शत्रु के समान हो जाता है।
समय
बारह वर्ष की सल्लेखना- क्षपक प्रथम के चार वर्षों में काय क्लेश तप करता है, आगे चार वर्षों में षट् रसों का त्याग करता हुआ शरीर कृश करता है, आगे दो वर्ष काँजी का भोजन, स्वाद रहित भोजन करता है, आगे एक वर्ष आचाम्ल भोजन, आगे छह माह मध्यम तप से, अन्तिम छह माह उत्कृष्ट तप करता है।
समाधि
शराबियों ने खेई नाव-बढ़ी नहीं एक पाँव- शराबियों ने रातभर नाव चलाई, रस्सा खोला नहीं इसलिए वहीं के वहीं रहे, इसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी रस्सा नहीं खोला एवं समाधि मरण नहीं किया इसलिए संसार में ही रुल रहे हैं।
समाधि
पिता का मरण न बिगड़ जाय- अतः प्रेम का अभिनय किया जाय- पति-पत्नी में बहुत दिन से विवाद चल रहा था, इस कारण वे अलग-अलग रहते थे, कुछ दिनों में तलाक होने ही वाला था। एक दिन पत्नी के पिताजी का पत्र आया कि 'बेटा अब हम काशी जाकर सन्यास मरण करना चाहते हैं, इसके पहले हमारी इच्छा है कि कुछ दिन तुम्हारे पास रह लें और देख लें कि तुम सुख से रहती हो, तो हमारा सन्यास मरण अच्छे से हो जायेगा', पत्नी पति के पास आई और बोली 'पिताजी आ रहे हैं इसके बाद उन्हें काशी सन्यास मरण के लिए जाना है, कहीं उनका मरण न बिगड़ जाए इसलिए हम लोग कुछ दिन साथ-साथ रहते हैं', पिताजी आये पति-पत्नी प्रेम पूर्वक रहे, जब जाने लगे तो दोनों पिताजी को छोड़ने रेल्वे स्टेशन गये, जब लौटे तो पुनः अलग-अलग जाने लगे, तो पति ने कहा कि 'पिता का मरण न बिगड़ जाए इसके लिए हम लोग साथ-साथ रह सकते हैं, पर हम लोगों का मरण न बिगड़ जाए इसके लिए हम साथ-साथ नहीं रह सकते?' पत्नी ने कहा जब बनती नहीं तो साथ-साथ कैसे रहें, पति ने कहा कि हम प्रेम से रहने का अभिनय करेंगे तो धीरे-धीरे प्रेम हो ही जायेगा, फिर वे मरण बिगड़ने के डर से साथ-साथ रहने लगे।
परिवार
दुनिया को जीता-किन्तु मौत से हार गए- जिनके शरीर में नाखून की खरोंच तक नहीं थी, जिन्होंने अनेक राजाओं को जीता था, जो तीन खण्ड के अधिपति थे, जिनके पास सात रत्न थे, एक-एक रत्न की हजार-हजार देव सेवा करते थे, तो भी मृत्यु को नहीं जीत सके, ऐसे लक्ष्मण चाचा की मौत देखकर लव-कुश को वैराग्य हो गया, पिता बलभद्र श्री रामचन्द्रजी को नमस्कार किया और दीक्षा के लिए वन की ओर चले गये।
समाधि
चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर जी- शक् संवत् 1784/विक्रम संवत् 1929, अश्विन कृष्णा षष्ठि (25 जुलाई 1872 बुधवार की रात) को भोजग्राम में पिता भीम गौड़ा, माता सत्यवती के यहाँ जन्म हुआ, आपका नाम सत्यगौड़ा एवं दामोदर भी था। नौ वर्ष की उम्र में सात वर्ष की कन्या के साथ विवाह हुआ, सोलह माह बाद पत्नी की मृत्यु हो गयी, पुनः विवाह कराने से इनकार कर दिया, बैल बीमार होने पर अनुकम्पा वश स्वयं हल जोता एवं मुनि सिद्धसागरजी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। बत्तीस वर्ष की उम्र में वृद्धा माँ को पीठ पर बैठाकर सम्मेदशिखर जी की वन्दना करायी एवं स्वर्णभद्रकूट पर आजीवन घी और तैल का त्याग किया। सैंतीस वर्ष की उम्र में पिता का वियोग हुआ, उसी दिन से एक आहार एक उपवास का नियम लिया। आचार्य देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा का निवेदन किया, फिर उत्तूर ग्राम में विक्रम संवत् 1972 (सन् 1915) में क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त हुई। मार्च मङ्गलवार सन् 1920 यरनाल कर्नाटक में मुनि देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा, आठ अक्टूवर सन् 1924 बुधवार को समडोली में आचार्य पद, गजपन्था जी सन् 1937 में चारित्र चक्रवर्ति की उपाधि एवं अठारह सितम्बर सन् 1955 रविवार को कुन्थल गिरी सिद्ध क्षेत्र में भाद्र शुक्ला द्वितीया के दिन समाधि हुयी। मुक्ता गिरी, श्रवण बेलगोला एवं सोनागिर में क्रमशः तीन बार शेर निकट आया, जङ्गल के मन्दिर में रात भर चींटियों का उपसर्ग हुआ, अठारह करोड़ जप किये, छत्तीस बार भगवति आराधना का स्वाध्याय किया, नौ हजार नौ सौ अड़तीस उपवास किये, छत्तीस दिन सल्लेखना चली, शिथिलाचार परिहार हेतु गुरू ने शिष्य से पुनः दीक्षा ली, आचार्य विद्यानन्दी जी कहते थे कि आचार्य शान्तिसागर जी की साधना के आगे हमारी साधना कुछ भी नहीं है।
समाधि
आचार्य ज्ञानसागर जी का व्यक्तित्व कर्तृत्व- जन्म वि.सं. 1951 माघ-मास, छाबड़ा-गोत्र, पिता-चतुर्भुज, माँ-घृतवरीदेवी, ग्राम-राणोली, जिला-सीकर राजस्थान, खण्डेलवाल जाति, पाँच भाई, आप दूसरे नम्बर के थे, आठ वर्ष में पिता की मृत्यु, आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में, बाद में बड़े भाई छगनलाल जी के साथ 'गया' (विहार) नौकरी हेतु गये, पुन अध्ययन हेतु बनारस गये, गङ्गा घाट पर गमछा बेचकर आजीविका चलाते थे, शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की, आजीवन ब्रह्मचर्य लिया, दयोदय, भद्रोदय, सुदर्शनोदय, वीरोदय, जयोदय, विवेकोदय आदि कवि कालीदास के ही जैसी रचनायें की।
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