Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 39 / 41

मैनासुन्दरी ने तप के प्रभाव से दसवें स्वर्ग में स्त्रीपर्याय को छेदकर इन्द्र पद को प्राप्त किया, आगे मोक्ष जावेंगी। सिद्धचक्र के प्रभाव से अनन्त संसारी श्रीपाल जी ने मुक्ति पद को पाया था।
कर्म
लोग आहार विधि से अपरिचित थे। अठारह कोड़ा-कोड़ी सागर काल का अन्तराल हो गया था, लोग वस्त्र, आभूषण, राज्य, कन्या, आदि वस्तुयें दान में देने के लिए दिखाते थे, लेकिन नवधा भक्ति नहीं जानते थे इसलिये आदिनाथ जी नहीं रुके थे।
दान
तेरह माह छः दिन व्यतीत हो गये थे, तब हस्तिनापुर के राजा श्रेयाँस को वैशाख शुक्ला द्वितीया के पिछले पहर में स्वप्न आया था, प्रातः काल मालूम हुआ कि आदिनाथ जी का चर्या हेतु नगर प्रवेश हो रहा है।
धर्म
राजा श्रेयाँस ने अपने भाई सोम और लक्ष्मीमति से कहा आप हमारे साथ पड़गाहन करने चलो, हम जैसा कहें वैसा करते जाना, राजा श्रेयाँस ने आदिनाथ जी का पड़गाहन किया और हर्ष के आसुओं से पाद प्रक्षालन किया, इक्षुरस से आहार सम्पन्न हुआ। पञ्चाश्चर्य हुये, अक्षीण महानस हो गया, उस दिन सारे नगरवासियों ने इक्षुरस का पान किया था किन्तु समाप्त नहीं हुआ, वह दिन अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। भरतचक्रवर्ती को मालूम हुआ कि भगवान् का आहार हो गया है। तो वे हस्तिनापुर आये, श्रेयाँस के घर गये। वे भगवान् को भेज कर वन से वापस आ रहे थे। भरतचक्रवर्ती वन जा रहे थे, छेवले के वृक्ष के नीचे बैठकर चक्रवर्ती का श्रेयाँस और सोमप्रभ से मिलन हुआ था, चक्रवर्ती ने श्रेयाँस को दान तीर्थंङ्कर की घोषणा की थी।
दान
षट्कर्म की व्यवस्था के समय, आदिकुमार ने बैल के मुख में मुसीका लगाने का नियम बनाया था, जिसके कारण अन्तराय कर्म का बन्ध किया था, इसलिए उनको तेरह माह छः दिन तक आहार नहीं मिला था।
कर्म
शान्तिसागर जी ने दीक्षा के बाद आगम के अनुसार आहार लेने का नियम लिया था, चार दिन तक आहार नहीं मिला था, तब जनता ने उनके गुरू से पूँछ कर व्यवस्था बनायी थी, आदिनाथ जी के समय बताने वाला कोई नहीं था।
धर्म
ज्ञान जहाँ पर प्रमुख है, लज्जा सहचारिणी है, तप नाशता है, चारित्र पालकी है और बीच में रहने का स्थान स्वर्ग है, गुण रक्षक हैं, सरल मार्ग है, शान्ति रूपी जल है, दया की भावना ही छाया है, ऐसे मार्ग में गमन करने वाले मुनि विना विघ्न के अपने अभीष्ट स्थान मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।
ज्ञान
इन्द्र गर्भ से पहले ही जिनको नौकर की तरह हाथ जोड़कर खड़ा रहता था और जो स्वयं कर्मभूमि में उपदेशक थे और जिनका पुत्र चक्रवर्ती था, ऐसे आदिनाथ भगवान् स्वयं छः माह तक भूखे रहकर पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे, कर्म का चरित्र बड़ा विचित्र है, उसका उल्लङ्घन करने में कोई समर्थन नहीं होता है।
कर्म
जिन्होनें समस्त साम्राज्य को तृण की तरह छोड़कर के निर्वाण के लिए तपस्या की थी, वे भगवान् भी दीन की तरह भोजन के लिए दूसरों के घरों में जाते रहे, लेकिन भोजन नहीं मिला और क्षुधा परीषह सहना पड़ा, फिर दूसरों को तो अपनी कार्य की सिद्धि के लिए परीषह सहन करना ही चाहिये।
पुरुषार्थ
भगवान् महावीर स्वामी से लेकर आचार्य धरसेन के पूर्व तक, आचार्यों का आगम अभ्यास मौखिक होता था, लिपि बद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी, भगवान् महावीर के निर्वाण से छः सौ तेरासी वर्ष बाद धरसेनाचार्य हुए, जो द्वादशाङ्ग के एकदेश के ज्ञाता थे। वे अष्टाङ्गमहानिमित्त के पारगामी और लिपि शास्त्र के ज्ञाता थे। गिरनार की चन्द्रगुफा में बैठे हुये विचार आया, कि अब ज्ञान के क्षयोपशम का निरन्तर ह्रास हो रहा है, यदि उपलब्ध ज्ञान को लिपिबद्ध नहीं किया गया, तो इसका विच्छेद हो जायेगा। ऐसा सोचकर निकट ही महिमा नगरी में हो रहे मुनि सम्मेलन से महासेन आचार्य के दो शिष्यों को बुलाया, पुष्पदन्त और भूतबली मुनिराज धरसेन आचार्य के पास पँहुचे, दो दिन के उपवास के साथ मन्त्राराधन करने को कहा, एक मन्त्र में एक अक्षर कम एवं एक मन्त्र में एक अक्षर ज्यादा था, जिससे एक को कानी देवी और एक को बड़े दाँत वाली देवी प्रकट हुई, जिसे समझ कर दोनों ने मन्त्र को शुद्ध करके आराधना की तब दोनों मुनि उसमें सफल हुये, तब आचार्य श्री ने मेधावी जानकर, श्रुत का उपदेश दिया, तथा अपना उद्देश्य बताकर ज्ञान को लिपिबद्ध करने का आदेश दिया।
ज्ञान
वीरप्रभु के मोक्ष के बाद क्रमशः तीन केवली, पाँच श्रुतकेवली हुये जिनके नेतृत्व में जैन सङ्घ एक सौ बासठ वर्षों तक अविभाजित रहा।
धर्म
केवली काल बासठ वर्ष- श्री गौतमस्वामी बारह वर्ष, श्री सुधर्मास्वामी ग्यारह वर्ष, श्री जम्बूस्वामी उन्तालीस वर्ष। पञ्चम काल में 3 अनुबद्ध केवली के अलावा 700 केवली और मोक्ष गये जो भगवान् महावीर स्वामी के समवसरण में विराजमान थे। उनको केवल ज्ञान भगवान् के समवसरण में हो गया था और 3 अनुबद्ध केवली को भगवान् के मोक्ष जाने के बाद केवलज्ञान हुआ। अतः इनकी प्रसिद्धि हुयी।
विविध
आचार्यश्री का आदेश शिरोधार्य कर पुष्पदन्तजी ने णमोकारमन्त्र के रूप में मंगलाचरण कर, ग्रन्थ लिखना प्रांरभ किया, वीसदि नामक (सत् प्ररूपणा पहली पुस्तक) सूत्रों की रचना की, उनको देखकर भूतबलि जी ने द्रव्य प्रमाणानुगम आदि (शेष पन्द्रह पुस्तक) से ग्रन्थ पूर्ण किया। ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमी के दिन ही इस ग्रन्थ की पूर्णता हुयी, तभी से यह दिन श्रुतपञ्चमी के रूप में मनाया जाता है श्रुतपञ्चमी को ज्ञानपञ्चमी भी कहते हैं। जीवट्ठाण, खुद्दाबन्ध, बन्धस्वामित्वविचय, वेदना, वर्गणा एवं महाबन्ध नामक छह खण्ड होने से षट्खण्डागम कहलाता है, वर्तमान में आठवीं शताब्दि में हुये आचार्य वीरसेन द्वारा लिखित धवला टीका उपलब्ध है।
ज्ञान
श्रुतकेवली काल सौ वर्ष- श्री विष्णुमित्र चौदह वर्ष, श्री नन्दिमित्र सोलह वर्ष, श्री अपराजित बाईस वर्ष, श्री गोवर्धन उन्नीस वर्ष, श्री भद्रबाहु उनतीस वर्ष तक रहे। इस प्रकार श्रुतकेवलियों का काल 100 वर्ष का रहा।
विविध
श्री ब्रम्हदेव सूरी चार सौ वर्ष पूर्व के हैं, श्री जयसेनाचार्य सात सौ-आठ सौ वर्ष पहले के हैं।
विविध
एक मत के अनुसार पाँच अनुबद्ध केवली हुए हैं- इनमें श्रीधर केवली जी अन्तिम हैं।
विविध
शारदा स्तुति- शारदे नमस्कार करता हूँ बार-बार, ज्ञान का तो वरदान एक बार चाहिए। माता जगमाता है तू भाग्य की विधाता है तू, तेरा प्यार मात मुझे एक बार चाहिए। कण्ठ और लेखनी पे होजा तू विराजमान, माथे पे तो हाथ मात एक बार चाहिए। योगी तो है तेरा दास उससे न हो उदास, ज्ञान तो अधूरा मात्र केवलज्ञान चाहिए।।
भक्ति
वर्षा योग की स्थापना प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के दिन होती है यदि किसी कारण वश चातुर्मास स्थल पर नहीं पहुँच पाये तो पाँच दिन बाद तक वर्षायोग की स्थापना होती है अर्थात् श्रावण कृष्णा चतुर्थी तक हो सकती है।
धर्म
वर्षायोग की स्थापना के दिन उपवास होता है, भक्तियों का पाठ होता है। विशेष साधना का संकल्प होता है। चातुर्मासिक प्रतिक्रमण होता है।
धर्म
वर्षायोग निष्ठापन कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन होता है। इसके पूर्व चतुर्दशी को उपवास होता है, कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रातःकाल वर्षायोग निष्ठापन की भक्तियाँ होती है और वीर निर्वाण महोत्सव की भी भक्तियाँ होती है।
धर्म
श्रद्धा है तो गुरु में भी भगवान् के दर्शन कर लेता है, जैसे एकनलव्य ने मिट्टी के गुरु के सामने लक्ष्य प्राप्त कर लिया। नहीं तो रावण के सामने राम, कंस के सामने कृष्ण खड़े थे, पर उन्हीं के निमित्त से दुर्गति प्राप्त कर ली थी।
भक्ति
धर्म में प्रेरणा और अधर्म के निवारण द्वारा इष्ट प्रयोजन को साधता हुआ तथा अनिष्ट प्रयोजन को बाधता हुआ साधुओं का समूह जीवों का जैसा उत्कृष्ट उपकार करता है वैसा तीर्थ, ज्ञान और देव भी नहीं कर सकते हैं।
संगति
किसी साधु में दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीनों ही प्रधानता से रहते हैं। किसी में दो प्रधानता से रहते हैं और किसी में सम्यग्दर्शन के लिए प्रधानता से उद्यम होता है। प्रायः कोई साधु गुणरहित नहीं होता है अतः सभी निर्ग्रन्थ मुद्रा के धारक मुनि सत्पुरुषों के लिए स्तुति करने के योग्य हैं।
भक्ति
साधु सङ्गति होने पर खोटे कार्यों में प्रवृत्ति नहीं होती। खोटी स्त्री, पुत्र तथा स्वामी आदि के दुर्वचन सुनने का दुःख नहीं होता। राजादिक को प्रणाम नहीं करना पड़ता, भोजन, वस्त्र, धन तथा स्थान की चिन्ता नहीं होती। ज्ञान की प्राप्ति होती है, लोक में प्रतिष्ठा बढ़ती है, शान्ति और सुख में प्रीति होती है। मृत्यु के बाद मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है, इस प्रकार श्रामण्य पद के ये गुण हैं अतः हे बुद्धिमान् पुरुषों! उस श्रामण्य पद को प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
संगति
सबसे बड़ा कौन-प्रश्न खड़ा मौन- दो मित्रों में विवाद हुआ कि सबसे बड़ा कौन? पहले ने कहा पृथ्वी। दूसरे ने कहा पृथ्वी बड़ी तो शेषनाग पर क्यों पड़ी? तो पुनः कहा शेषनाग बड़ा। तो पुनः पूँछा शेषनाग बड़ा तो महादेव जी के गले में क्यों पड़ा? तो उसने कहा महादेव जी बड़े। फिर कहा महादेव जी बड़े तो हिमालय पर क्यों पड़े? तो पुनः कहा हिमालय बड़ा। उसने कहा हिमालय बड़ा तो हनुमान जी की हथेली पर क्यों पड़ा? पुनः बोला तो हनुमान जी बड़े। पुनः पूँछा हनुमान जी बड़े तो रामचन्द्र जी के चरणों में क्यों पड़े? तब वह बोला रामचन्द्र जी बड़े। तो पुनः पूँछा रामचन्द्र जी बड़े तो गुरु जी के चरणों में क्यों पड़े? अतः संसार में सबसे बड़े गुरु होते हैं।
भक्ति
तपस्वियों को प्रणाम करने से उच्च गोत्र अर्थात् इक्ष्वाकु आदि वंश में उत्पत्ति होती है, दान देने से भोगों की अर्थात् चक्रवर्ती आदि पद की प्राप्ति होती है, सेवा करने से पूजा की अर्थात् तीर्थंङ्कर आदि पद की प्राप्ति होती है, भक्ति करने से सुन्दर रूप अर्थात् कामदेव आदि पद की प्राप्ति होती है और स्तवन करने से कीर्ति की अर्थात् शलाका पुरुषों आदि में उत्पत्ति होती है।
भक्ति
गुरु के सानिध्य में थूकना, टिक के बैठना, जम्हाई लेना, अङ्गड़ाई लेना, झूठ बोलना, असभ्य हँसना, पैर फैलाना, उपदेशक बनना, ताल ठोकना, ताली बजाना, कटाक्ष करना, अङ्ग संस्कार आदि नहीं करना चाहिये।
विनम्रता
एक अक्षर भी यदि गुरु शिष्य को देता है, तो पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जिसे देकर गुरु के ऋण को चुकाया जा सके, एक अक्षर भी देने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह कुत्ते की सौ योनी प्राप्त करके चाण्डालों में उत्पन्न होता है।
भक्ति
जिसका पिता धैर्य है, माता क्षमा है, स्त्री शान्ति है, पुत्र सत्य है, बहिन दया है, भाई मानसिक संयम है, शैय्या भूमितल है, वस्त्र दिशाएँ है और भोजन ज्ञानामृत है ये जिसके कुटुम्बी हैं, बोलो मित्र उस योगी को किससे भय होगा?
संयम
मुनि निन्दा- एक व्यक्ति साधुओं की बहुत निन्दा करता था, तो एक सेठजी ने कहा कि मैं अष्टान्हिक में मुनि को आहार देकर ही आहार करता हूँ, आप आठ दिन के लिए मुनि बन जाएँ, आपको बहुमूल्य वस्तु का इनाम एवं बढ़िया आहार करायेंगे, वह व्यक्ति लोभ वश तैयार हो गया, पर केश लोंच करने में दाँतों पसीना आ गया एवं उस दिन उपवास करना पड़ा तो दिन में तारे दिख गये, पारणा के दिन हलुआ पूड़ी भर पेट खा लिया, पानी की कमी पड़ गयी, तो नानी याद आ गयी, दूसरे दिन सेठजी से हाथ जोड़ कर बोले ! ये तपस्या हमारे वश की नहीं है और उस दिन से उन्होंने मुनि निन्दा करना छोड़ दिया।
संगति