Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 41 / 41

1978 में अजैन छात्रा किरण टण्डन ने आचार्य ज्ञानसागरजी के व्यक्तित्व-कर्तृत्व पर कुमायु विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आचार्यश्री ने वि.सं. 2004 में सात प्रतिमा ग्रहण की थी, वि.सं.2012 में क्षुल्लकदीक्षा और वि.सं.2014 में शिव सागर जी से मुनि दीक्षा जयपुर खानियाजी में ग्रहण की थी और बाद में आचार्य पदारोहण हुआ। 30 जून 1968 को अजमेर में कन्नड़ भाषी विधाधर बालक को मुनि दीक्षा दी। 75 वर्ष की उम्र में चार-पाँच घण्टा न्याय, व्याकरण, साहित्य सिद्धान्त आदि पढ़ाते थे। 22 नवम्बर 1972 को नसीराबाद में आचार्यपद अपने शिष्य विद्यासागर जी को देकर, समाधि की याचना की। 1 जून 1973 को नसीराबाद में समाधिमरण हुआ।
समाधि
जिनेन्द्र वर्णी- व्यक्तित्व कर्तृत्व-जिनेन्द्र वर्णी जी का जन्म पानीपत हरियाणा में हुआ था। पिता का नाम भगवानदास एडवोकेट था। इनकी शिक्षा पिताजी से हुयी थी। स्वयं इञ्जीनियर थे, पहले आचार्य विमलसागरजी से क्षुल्लक दीक्षा हुयी थी। पिता विद्वान् थे, गणेशप्रसाद वर्णीजी भी पानीपत में विराजमान थे, वहाँ पर आर्यसमाज से संस्कृत में शास्त्रार्थ हुआ। जैनी संस्कृत नहीं जानते नहीं थे, तब वर्णी जी ने एक बच्चे को द्रव्य सङ्ग्रह रटा दिया था। जब शास्त्रार्थ हुआ तो सबसे पहले बच्चे को खड़ा कर दिया, आर्य समाज प्राकृत नहीं जानती थी। वे उसका उत्तर नहीं दे सके, भगवानदास जी सभा में खड़े हो गये कि तुम हार गये एवं वर्णीजी ने समर्थन कर दिया, सभा के लोगों ने नारे लगा दिये, जैन समाज की जीत हो गयी थी।
ज्ञान
शरीर और कषाय का कृश करना सल्लेखना है, जिनेन्द्र वर्णीजी का एक फेफड़ा था, डॉक्टर ने दूसरी बार पानी लेने को कहा, तब सारे समाचार पत्रों में निकलवाया एवं व्रत खेद पूर्वक छोड़े, बाम्बे हास्पिटल में डॉक्टर ने कहा आपको सूप लेना पड़ेगा, वर्णी जी से पिताजी ने कहा डॉक्टर ऐसा कह रहा है, वर्णीजी डॉक्टर के पास स्वयं गये और कहा कि क्या आप दावा कर सकते हैं कि मैं सूप लेकर जिन्दा रह सकता हूँ? किन्तु मैं दावा करता हूँ कि मैं शाकाहार से जिन्दा रह सकता हूँ। एवं वर्णी जी ने जैनेन्द्र सिद्धान्त कोष की रचना कर जैन संस्कृति को अद्भुत धरोहर समर्पित की है। आचार्य श्री विद्यासागर जी से बाद में पुनः व्रत ग्रहण कर सल्लेखना शुरू की, क्षमासागर जी समयसार सुनाते थे, पन्द्रह गाथा सुनाने के बाद पूँछा और सुनाऊँ? तो हाथ जोड़ कर बोले इतना उतर जाये तो पर्याप्त है, आचार्य श्री ने कहा वो महान साधक थे वर्णीजी की सन् 1983 ईसरी में सल्लेखना पूर्ण हुयी थी।
समाधि
अनुकम्पा- गणेशप्रसाद वर्णी जी सागर मोराजी से वेदान्ती के आगे नदी तक लड़कों के साथ घूमने जाते थे, नदी के पास एक लकड़ी का गट्ठा लिए बुढ़िया बैठी रो रही थी, वर्णीजी ने पूँछा क्या हो गया? उसने कहा पैर में काँटा लग गया है, चलते नहीं बन रहा, शाम हो गयी, वर्णी जी ने लुहार के यहाँ से संसी मँगायी, उसने नहीं दी, वर्णीजी रोष में बोले! ''छीन कर ले आओ'' और काँटा निकाला, एक-एक लकड़ी लड़कों को देकर बुढ़िया को उसके घर भेज दिया था।
अहिंसा
संस्मरण- खुरई में विद्वान् से पढ़ने की भावना व्यक्त की, उन्होंने पूँछा जैन क्यों बनना चाहते हो? वर्णीजी ने कहा विशेषता यह है कि जैन लोग पानी छान कर पीते हैं, रात्रि में भोजन नहीं करते, शुद्ध भोजन करते हैं, देवदर्शन करते हैं आदि, तब पण्डित जी बोले- यहाँ अच्छा-अच्छा खाने को मिलता है, इसलिये जैन बनना चाहते हो, वचन रूपी बाण हृदय में लगे, लेकिन सङ्कल्प लिया कि पढ़कर ही मिलूंगा।
पुरुषार्थ
ग्रन्थ की समाप्ति सिद्ध क्षेत्र या अतिशय क्षेत्र पर करते थे, धर्म के प्रति अगाढ़ श्रद्धा थी, एक बार सोनागिर जी गये, दर्शन स्तुति के बाद, एक पद बड़ी मधुर वाणी में पढ़ना प्रारम्भ किया 'नाथ सुधि लीजो जी म्हारी भव-भव दुखिया जानके' इस पद को पढ़ते जाते अविरल अश्रु धारा बहती गयी, ऐसी भक्ति देख लोग गद-गद हो गये थे।
भक्ति
सत्य निष्ठ- पण्डित गोपालदास जी ने बम्बई यात्रा में बेटे माणिक का टिकट नहीं लिया, वहाँ पहुंचने पर याद आया कि बच्चे की उम्र तीन वर्ष छः दिन हो गयी, इसलिये टिकट लेना चाहिये था, रेलवे की चोरी का खेद हुआ, घर आकर मनि ऑर्डर से रेलवे आफिस को आधे टिकट का पैसा क्षमा माँगते हुए भेज दिया, अङ्ग्रेज था उसने सोचा भारत में इतने प्रमाणिक लोग रहते हैं, उसने पण्डितजी का एड्रेस लेकर सूचना प्रसारित की कि पण्डित गोपालदास जी बरैया, मुरैना न्याय प्रिय व्यक्ति है, यात्रा में इनकी टिकट और लगेज में पूँछताछ न की जाये।
सत्य
पण्डित गोपालदास जी ने कुर्ते सिलवाये जब बाहर जाने लगे तो, एक-एक कुर्ता पहनते जाते और उतारते जाते, लोगों ने पूछा क्या कर रहे हो? तो कहा इनको पुराने कर रहा हूँ, नये कपड़ों पर टेक्स देना पड़ता है, पण्डितजी सरकारी नियम का उल्लङ्घन नहीं करते थे।
सत्य
पण्डित गोपालदास जी 1958 में बम्बई में रुई व चाँदी का व्यापार करते थे, एक व्यापारी को पचास हजार की रुई बेची, दूसरे दिन वह सस्ती हो गयी, उसको दस हजार का घाटा लग गया, उसने कहा पण्डित जी हमारा मकान ले लो कर्जा चुक जायगा, पण्डित जी बोले मैं खून पीकर पेट नहीं भरता, मैं तुम्हारा मकान ले लूं और तुम्हारे बच्चे दर-दर फिरें, मैं ऐसा नहीं कर सकता, न हमें मकान चाहिये न रुपया।
दान
सुधारक- विद्यालय के बच्चों ने एक दिन किसी के खेत के चने चुरा लिये, पण्डित गोपालदास जी को पता चला उस दिन भोजन नहीं किया, पण्डितजी को बहुत मनाया पर वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि चोरी ही सीखना थी तो संस्था में क्यों आये, मीटिंग हुयी बच्चों ने चोरी के त्याग की प्रतिज्ञा ली, तब पण्डितजी ने शाम को भोजन किया।
चरित्र
ईमानदार- ट्रेन में पन्द्रह किलो लगेज फ्री में जाता था, पण्डित गोपालदास जी ने छात्रों के साथ लगेज स्टेशन पर भेजा और कहा इसको तुलवा लेना, लगेज बनवा लेना, छात्रों ने लगेज तुलवाया सत्रह किलो निकला, छात्रों से पण्डितजी ने पूँछा लगेज दे दिया, नहीं! पण्डितजी टी.टी. के पास गये, कहा लगेज बनाओं, टी.टी. ने कहा इतना तो चलता है, पण्डितजी ने टी.टी. से कहा तुम चोरी करते हो और करवाते हो, इतने में गाड़ी चल दी, पण्डितजी ने नास्ते का डिब्बा छात्रों को बापस पकड़ा दिया जो ढाई किलो का था।
सत्य
पुरुषार्थी- पण्डित गोपालदास जी का स्वास्थ खराब था, बम्बई से प्रवचनार्थ निमन्त्रण आया, पण्डित जी जाने को तैयार हो गये लोगों ने रोका मत जाओं, तब पण्डितजी ने कहा- जैसे युद्ध में शूर और जुआ में जुआरी को निमन्त्रण मिलने पर रुकता नहीं, ऐसा ही विद्वान् भी होता है।
पुरुषार्थ
निरपेक्षवृत्ति- पण्डित गोपालदास जी की पत्नी ने एक बार विद्यालय के बढ़ई से बच्चे को एक खिलौना बनवा लिया, पण्डित जी को पता चला तो पण्डितजी ने काष्ठ की कीमत, दो घण्टे कारीगर की मेहनत का पैसा विद्यालय में जमा कर दिया, विद्यार्थियों को निरपेक्ष वृति से पढ़ाते थे, उनके पढ़ाये बच्चे सभी ठोस विद्वान् निकले जो समाज के कर्णधार बने।
चरित्र
पण्डित गोपालदास जी की पत्नी का तेज स्वभाव था, अपशब्दों के साथ कभी-कभी मार-पीट भी कर देती थी, लोगों ने कहा पण्डितजी इनका स्वभाव ठीक कर दो, पण्डितजी कहते थे भैया, ये हमारे परिणामों की परीक्षिका है, हममें कितना आत्म बल है, ये परीक्षा लेती हैं, मुझे क्रोध करने का क्या अधिकार है।
क्षमा
पण्डित गोपालदास जी की पत्नी ने गोमटेश की भक्ति की और भाव विभोर हो बाहुबली भगवान को साष्टाङ्ग नमस्कार किया, आधा घण्टा तक लेटी रही, पण्डितजी ने समझा शायद बेहोश हो गयी, ठण्डा पानी मँगाकर चेहरे पर छींटे मारे, वैसी ही रही, दुबारा अधिक पानी डाला, जल्दीं उठी और बोली! क्या होली मचा रखी है, मुझे आनन्द से दर्शन भी नहीं करने देते, पण्डितजी को लगा कि काँटों में भी फूल होते हैं, कठोर हृदय में भी कहीं-कहीं मृदुता छिपी होती है।
भक्ति
प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाएं- जल चिकित्सा, योग, व्रत, मिट्टी, मालिश, एक्युप्रेशर, सूर्यचिकित्सा, सात्विक भोजन, शान्ति दायक सफ़ेद आदि रङ्गों का प्रयोग करें, आपातकाल में एलोपेथिक का प्रयोग कर सकते हैं। उचित रङ्गों का चुनाव- नीला रङ्ग शीतलता, हरा रङ्ग सन्तुलन, सफ़ेद रङ्ग शुद्धता व आध्यात्मिकता, लाल व पीला रङ्ग सुस्त मन पर प्रेरक प्रभाव, उत्साह व शक्ति भरते हैं, काला रङ्ग घृणा द्वेष को दर्शाता है और मस्तिष्क को सुस्त, मन्द तथा निष्क्रिय बनाता है। हँसिये और हँसाइये- स्वयं प्रसन्न रहें एवं अपने सानिध्य में रहने वालों को प्रसन्न रखें।
स्वास्थ्य
सूर्योदय से पूर्व का समय ही सर्वाधिक उपयोगी होता है, जब आप प्राणवायु से भरपूर लाभ प्राप्त करते हैं। श्वाँस एवं हृदय रोगों से भी मुक्ति मिलती है। प्राणायाम प्राचीन तकनीक है, इससे ऋषियों ने सैकड़ो वर्षों की उम्र पायी थी और अपने मस्तिष्क को बुद्धिमत्ता का अक्षय कोष बनाया था। प्राणायाम वह उत्तम विधि है, जिससे आप एक पन्थ दो काज नहीं तीन काज वाली उक्ति चरितार्थ करते हैं। एक तो हृदय एवं फैफड़ों का व्यायाम जो हृदय और श्वाँस सम्बन्धी रोगों को व्यक्ति के पास फटकने भी नहीं देता है, दूसरे मस्तिष्क को ऋणायन से भरपूर प्राणवायु रूपी पर्याप्त भोजन मिलता है, तीसरा प्राणायाम से आप अद्भुत शान्ति का अनुभव के साथ मानसिक तनाव से मुक्ति प्राप्त करते हैं।
स्वास्थ्य
रोगी पूरब सिर जो सोए, तन मन का सुख चैन संजोए। शयन करो ले बाँयी करवट, उठो सदैव दाँहिनी करवट।। पश्चिम मुख मज्जन कर आना, पूर्व मुखी हो सदा नहाना। पढ़ने उत्तर मुख हो जाना, भोजन दक्षिण मुख न पकाना।। पूर्व मुखी होकर जो खाता, लम्बे जीवन का सुख पाता। दक्षिण मुख होकर जो खाता, भारी नाम बढ़ाई पाता।। श्वेत वस्त्र उत्तर मुख धारो, पूर्वोत्तर मुख जाप सम्हारो। उत्तर दक्षिण मुख निहारा, दिशा बोध यह सीखो सारा।।
स्वास्थ्य