Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 28 / 41

चिरोञ्जाबाई का क्रोध- चिरोञ्जाबाई की ननद से कोई गलती हो गई, यह देखकर बाईजी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने उनका शिर पकड़ कर दीवाल से दे मारा लेकिन पीछे हाथ लगा लिया कहीं शिर में चोट न लग जाए।
क्षमा
महावीरस्वामी पर उपसर्ग- महावीर भगवान् दीक्षा के बाद विहार करते हुये उज्जयिनी नगरी पँहुचे और वृक्ष के नीचे बैठकर तप करने लगे, वहाँ के लोगों ने समझा कि ये यहाँ की भूमि पर अधिकार करने आयें है, इसलिये लोगों ने उन पर घोर उपसर्ग किया, लेकिन उन्होंने अपने क्षमा भाव को नहीं त्यागा और केवलज्ञान को प्राप्त किया।
क्षमा
गाँधी जी को गाली-एक अंग्रेज गाँधी जी से बहुत चिढ़ता था, उसने एक कागज में गाँधी जी के लिए गालियाँ लिखीं और गाँधी जी की टेबल पर रखकर चला गया, गाँधी जी ने जब खोला तो गुस्सा न करके, उसका पिन निकाल कर डिब्बे में रख लिया, और कागज को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।
क्षमा
बनारसीदास जी ने रास्ते में पेशाब करदी चौकीदार ने दो-तीन थप्पड़ मार दिये अगले दिन उन्होंने नौकर की ईमानदारी की प्रशंसा करके उसका वेतन बढ़वा दिया।
क्षमा
पार्श्वनाथ जी- कमठ का जीव पूर्व अवस्था में पार्श्वनाथ का भाई था, लेकिन क्षमा के अभाव में दस भव तक घोर उपसर्ग करता रहा, किन्तु पार्श्वनाथ जी ने क्षमा को नहीं छोड़ा और केवलज्ञान को प्राप्त किया था।
क्षमा
बिच्छू का आतङ्क- नदी किनारे पर बैठे हुये एक साधु ने देखा कि नदी के तीव्र प्रवाह में एक बिच्छू बहता जा रहा है, उसे देखते ही हृदय में अनुकम्पा का प्रवाह हुआ तत्काल नदी में उतर गये, बिच्छू को हाथ में उठा लिया, उसने हाथ में डङ्क मार दिया, पीड़ा के कारण बिच्छू हाथ से छूट गया, पुनः उठाया पुनः उसने हाथ में डङ्क मार दिया, लोगों ने कहा जब वह आपको बार-बार डङ्क मार रहा है तो उसको बहने दो, साधक ने इस बात को सुनकर उत्तर दिया, जब वह अपना स्वभाव नहीं छोड़ रहा है तब हम उसे बचाने का स्वभाव कैसे छोड़ें ?
अहिंसा
ईसामसीह को शूली- जब निरपराध ईसामसीह को लोगों ने शूली पर चढ़ाया तब उन्होंने कहा कि हे भगवन् ! ये अज्ञानि प्राणी नहीं समझते कि हम क्या कर रहे हैं और इसका फल क्या होगा? हे भगवन् ! इनका अपराध क्षमा हो।
क्षमा
सौ बार गङ्गा स्नान- एक व्यक्ति का प्रतिदिन गङ्गा स्नान करने का नियम था, उसके क्षमा भाव और त्यागादि की बहुत चर्चा थी, उस नगर के पहलवान ने उस व्यक्ति की परीक्षा लेनी चाही, पहलवान का घर गङ्गा के रास्ते में था, व्यक्ति गङ्गा स्नान करके लौट रहा था, तब पहलवान ने उसके ऊपर पान का पीक थूक दिया, व्यक्ति विना कुछ कहे गङ्गा स्नान करने चला गया, पुन स्नान करके लौटा तो फिर थूक दिया, यह क्रम सौ बार चला, एक सौ एक वी बार व्यक्ति स्नान करके लौटा तब पहलवान उसके चरणों में गिरकर रोने लगा, अपनी गलती की क्षमा माँगी, व्यक्ति ने कहा ! भाई मैं तो आपका उपकार मानता हूँ, कि प्रतिदिन एक बार स्नान करता था आज आपकी वजह से एक सौ एक बार स्नान का अवसर मिला, अभी तक तन धोया था अब क्रोध न आने से मन भी धुल गया है।
क्षमा
उद्दण्ड बालक पर क्षमा-एक सेठ ने पाठशाला खुलवाई, उसमें एक बालक बहुत उद्दण्ड था, प्रतिदिन विद्यालय में कुछ न कुछ तोड़-फोड़ करता रहता था, शिक्षक ने सेठ जी से कहा, कि मैं इस बालक को नहीं पढ़ाऊँगा, सेठजी उस बालक को घरले गये, वह ऊधम करता सेठजी शान्ति से सहन कर लेते, काँच, प्लास्टिक मिट्टी आदि के बर्तनों को तोड़ता सेठजी कुछ न कहते, एक दिन सेठजी की घड़ी फोड़ दी तब भी सेठजी ने कुछ नहीं कहा, अबकी बार बालक को स्वयं पश्चात्ताप हुआ सेठजी से क्षमा माँगी आगे चलकर वह बहुत बड़ा विद्वान बन गया था।
क्षमा
पण्डित टोडरमल जी की क्षमा- किसी शरारती ने पण्डितजी के पास एक पागल व्यक्ति लाकर खड़ा कर दिया और कहा कि ये आपके साढू भाई आये हैं, पण्डितजी उसे देखकर कुपित नहीं हुये बल्कि उन्होंने स्वीकार कर लिया, अपने पास रख लिया एक दिन उस व्यक्ति ने देखा कि पण्डितजी उसकी अच्छी सेवाकर रहे हैं वास्तव में ये इनके साढू हैं क्या ? पण्डितजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि हाँ, एक माँ की दो बेटियां थीं एक साता और दूसरी असाता उनमें से हमारी शादी साता से हो गई और इनकी शादी असाता से हो गई इसलिऐये हमारे साढू ही तो हैं।
क्षमा
अभी तक गरजती थी-पण्डित गोपालदास जी की धर्मपत्नी ने उनका अनेक बार अपमान किया किन्तु पं. जी ने समता नहीं त्यागी, एक रात्रि को पण्डितजी घर आये, पत्नी ने दरवाजे नहीं खोले, कुछ देर बाद गुस्से में उठी और जनवरी माह की ठण्ड में छत से ही एक घड़ा ठण्डा पानी पण्डितजी के ऊपर डाल दिया, पण्डितजी बोले, हे देवि अभी तक तो तू गरजती थी, पर बरसी आज ही है।
क्षमा
सर्प की क्षमा-एक सर्प ने मुनिराज से नियम ले लिया कि अब हम किसी को नहीं काटेगें, लोग उसको सताने लगे, वह महाराज के पास नियम वापिस करने गया तब महाराज ने कहा तुम्हे काटना छुड़ाया है फुड्ढारना नहीं।
क्षमा
द्रोपदि की क्षमा- महाभारत के समय द्रोपदि के पाँचों बेटों को अश्वत्थामा ने मार डाला द्रोपदि शोक सागर में मग्न थी तभी अर्जुन अश्वत्थामा को युद्ध से पकड़ कर द्रोपदि के सामने खड़े कर देते हैं, भीम बोले इसके टुकड़े-टुकड़े करके कौओं को खिला दो तब द्रोपदि ने कहा इसकी माँ को भी इतना ही कष्ट होगा जितना मुझे हो रहा है, इसलिए इसको छोड़ दो।
क्षमा
गुरूजी ने कौरव-पाण्डव को क्रोध त्याग का पाठ याद करने को दिया, सबने याद करके सुना दिया युधिष्ठिर को याद नहीं हुआ, चार-पाँच दिन बाद गुरुजी ने पूँछा पाठ याद हो गया ? युधिष्ठिर ने कहा नहीं, गुरुजी ने पिटाई कर दी, जब क्रोध नहीं आया तब बोले अब याद हो गया, युधिष्ठिर ने सोचा यह पाठ आचरण में लाने का है, रटने का नहीं है।
क्षमा
सूक्ष्मदर्शीदूरदर्शी यन्त्र- (सोच की वजह से एक को लाभ दूसरे को हानि)दो मित्र मेले से सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी यन्त्र लेकर आते है, एक मित्र तो सूक्ष्म दर्शी यन्त्र से सोने-चाँदी का मेल देखकर खरीदता जिससे व्यापार में कई गुना लाभ होने लगा एवं जब व्यापार से थक कर घर में आता और दूरदर्शी यन्त्र से दूरवर्ती बाग बगीचों को देखकर मनोरञ्जन करता और मौज मनाता, दूसरा मित्र रोटी के छोटे चिट्ठों को सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखता वे बड़े दिखाई देते तो पत्नी को डाँटता, इसी प्रकार घर के सूक्ष्म कचरे को देखता ज्यादा दिखाई देता तो नौकरों को डाँटता और दुःखी रहने लगा, वस्तु के सदुपयोग की कला न आने से व्यक्ति दुःखी होता है और सोच सही होने से सुखी होता है।
विवेक
मेरा देश महान, सौ में से सौ भगवान- एक बार द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से सूची देकर कहा ! जाओ नगर में कितने दुर्जन हैं देखकर आओ और इसी प्रकार दुर्योधन को सूची देकर कहा ! जाओ नगर में कितने सज्जन हैं देखकर आओ, दोनों खाली सूची लेकर आ गये, धर्मराज बोले हमें एक भी दुर्जन नहीं मिला, और दुर्योधन बोले कि हमें एक भी सज्जन नहीं मिला, बस यही सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टि-कोण में अन्तर होता है।
विवेक
अभिनन्दन आदि पाँच सौ मुनियों की क्षमा- दण्डक राजा ने कारण जाने विना रानी के कहने से मुनियों को पाखण्डी जानकर घानी में पेल दिया, लेकिन मुनियों ने क्षमा भाव धारण कर आत्म कल्याण किया था।
क्षमा
देवरानी जिठानी को पन्द्रह लड्डुओं ने श्मशान तक भेज दिया- एक बार देवरानी जिठानी ने पन्द्रह लड्डू बनाये, उनमें से एक को सात एक को आठ मिल रहे थे, उनमें से कोई सात लड्डू लेने को तैयार नहीं था तब निर्णय लिया, कि कल जो सुबह पहले उठकर मौन खोलेगा वह सात लड्डू लेगा दूसरे दिन दोनो नहीं उठीं, लोगों ने सोचा की दोनों मर गई, तब एक ही अर्थी पर दोनों को श्मशान ले गये, जैसे ही आग लगाने को तैयार हुए तब एक बोली 'तू आठ खा लेना हम सात खा लेंगे' जो लोग जलाने ले गये थे वे भी पन्द्रह लोग थे, लोगों ने समझा की दोनों मरकर डाकिनी-शाकिनी बन गयी हैं अतः हम लोगों को खाने को कह रहीं हैं, इसलिए लोग भागे, पीछे-पीछे दोनों भाग रहीं थीं, सारे नगर में अशान्ति फैल गयी, लोगों को वास्तविकता का पता चलने पर दोनों बहुत शर्मिन्दा हुईं।
संतोष
सुकोशल स्वामी-('जा सुत विरह मरी हुई बाघिन, ता सुत देह विदारी')माता सहदेवी पुत्रवियोग में मर कर व्याघ्री हुई उसी के द्वारा अपने प्रिय पुत्र का भक्षण किये जाने पर भी उपसर्ग समता से सहन किया और सर्वार्थसिद्धि गये।
समाधि
रामचन्द्रजी ने आभार- जब रामचन्द्रजी दिग्विजय करके अयोध्या को वापस आये तब उन्होंने सब सहयोगियों के लिये कृतज्ञता ज्ञापित की, जब हनुमानजी का क्रम आया, तब रामचन्द्रजी ने कहा-हे हनुमन्त ! तुमने जो आज तक उपकार किया है उसके लिये मैं आभारी हूँ लेकिन मैं चाहता हूँ आपका उपकार न करूँ, इस वाक्य को सुनकर लोग आश्चर्य चकित हुये, किन्तु हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुये, तब लोगों ने हनुमान जी से पूँछा आप लोगों की भाषा हम लोगों के समझ में नहीं आयी कृपया कर समाधान करें, तब हनुमान जी ने कहा कि रामचन्द्र जी यह कह रहे हैं कि आपको कभी कष्ट ही न आये।
विनम्रता
तुंकारी की क्षमा- राजा की लड़की को कोई तू करके नहीं बोल सकता था, उसका घर में तो निर्वाह हो गया, लेकिन उसकी ऐसी तीव्र कषाय देखकर कोई शादी करने को तैयार नहीं होता था, बड़ी मुश्किल से एक राजकुमार को तैयार किया कि आप मेरी लड़की से कभी तू करके नहीं पुकारना, शादी हो गयी। अचानक एक दिन उस लड़के ने भूल से तू बोल दिया वह इतनी कुपित हुयी कि घर छोड़कर चली गयी। जङ्गल में अकेली जा रही थी भीलों ने उसे पकड़ लिया बहुत कष्ट दिया, शील से गिराने की कोशिश की लेकिन वह अपने में अडिग रहीं, अन्त में भीलों ने उसे एक कपड़ा रङ्गने वाले को बेच दी, वहाँ भी भयङ्कर कष्ट उठाने पड़े वह तुंकारी के माथे से खून निकालता और कपड़े रङ्गता था लेकिन थोड़ी देरमें जड़ी बूटी लगाकर घाव भर देता था। ऐसे कष्टों को सहन करने से अब जीवन में क्षमा गुण आ गया। एक नगर में श्मशान घाट पर मुनि तप कर रहे थे, एक तन्त्र वादी वहाँ आया और उसने मुर्दे इकट्रे किये चूल्हा बनाया, उसे ये नजर नहीं आया कि ये मुनिराज ध्यान मग्न हैं, उसने आग लगाकर कढ़ाही रखी मुनि सहन करते रहे, लेकिन बीचमें शरीर वेदना से हिल गया, कढ़ाही गिर गई उसने सोचा यहाँ कोई भूत आ गया, डर कर भाग गया। मुनि वहीं पड़े रहे, प्रातः काल एक सेठ उस ओर अपने कार्य से आया मुनि की ऐसी अवस्था देख घबराया, अपने घर ले गया इलाज किया, वैद्य ने लाक्षादि तैल लगाने को कहा और वह तुङ्कारी के यहाँ मिलेगा लेने गया भाग्य से सात घड़े तैल के सेठ से फूट गये लेकिन उसने क्रोध नहीं किया, सेठ ने उससे इसका राज पूँछा तब तुङ्कारी ने अपनी सारी कहानी बतायी।
क्षमा
आचार्य शान्तिसागर जी पर उपसर्ग- एक बार धौलपुर नगर में आचार्य श्री का सङ्घ आया तो आचार्य श्री को भावी दुर्घटना का पूर्वाभास हो गया था, अतः उन्होंने पूरे सङ्घ को अन्दर सामायिक करने का आदेश दिया, उपसर्ग करने वाले आये और बाहर ही घेर कर बैठ गये, जैन बन्धुओं ने राजा से शिकायत की तो राजा ने दुष्टों को गिरफ्तार करके कहा की आचार्य महाराज जो सजा कहेंगे वही सजा इन्हें दी जाएगी, महाराज ने तीन बार वचन लिया कि 'जो हम कहेंगे वही सजा दोगे'? राजा ने कहा कि जो आप कहेंगे वही सजा दी जाएगी, तब आचार्य श्री ने कहा कि इन्हें छोड़ दो, तब वे उपसर्ग करने वाले महाराज के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगे, महाराज ने कहा हम अपराधी को नहीं अपराध को समाप्त करते हैं, अपराधियों ने प्रण किया कि ऐसी गलती अब हम कभी नहीं करेंगे।
क्षमा
दुर्जन, क्रूर, कुमार्ग रतों पर-दुर्जन- जयद्रथ ने कषाय के वश पाण्डवों को लोह मयी गर्म आभूषण पहनाये पर पाण्डवों ने क्षमा धारण की और तीन पाण्डव मोक्ष पधारे और दो सर्वार्थसिद्धि गये। क्रूर- स्यालनी ने सुकोशल मुनि को खाया मुनि ने क्षमा धारण की और सर्वार्थसिद्धि गये। कुमार्गरत- भगवान् आदिनाथ के समय चार हजार मुनि भ्रष्ट हो गये, पर आदिनाथ भगवान् ने मौन नहीं तोड़ा और समता रस के स्वादी बने रहे।
क्षमा
बल का मान कियो रावण ने, सोने की लंका नशानी। तन का मान किया दुर्योधन ने, मिट्टी में मिल गई जवानी।। तप का मान कमठ ने कीना, नरक की राह दिखानी। ज्ञान का मान किया गौतम ने, झुकने पड़ो ऋषिज्ञानी।। दान का मान कियो बलि राजा, पीठ पड़ी नपवानी। काहु को मान रहो न पुजारी, काहे करे लघु प्राणी।।
विनम्रता
कर्तृत्व बुद्धि, भोक्तृत्वबुद्धि और स्वामित्वबुद्धि- अज्ञानी अपने को पर पदार्थ का कर्ता मानता है। जैसे कुत्ता गाड़ी के नीचे चलता है तो मानता है कि 'मैं गाड़ी चला रहा हूँ', पर उसे नहीं मालूम कि गाड़ी चलाने वाला कोई दूसरा है यही कर्तृत्व बुद्धि कहलाती है। इसी प्रकार पर पदार्थ का अपने को भोक्ता मानता है, मकान, दुकान आदि का अपने को स्वामी मानता है, जैसा की छः ढाला में कहा है 'मैं सुखी-दुःखी मैं रङ्क राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव' इत्यादि।
विनम्रता
जङ्गल में तप कर रहे साधु से पथिक ने रास्ता पूँछा, साधु ने उत्तर दिया इस रास्ते में मत जाओ, वहाँ मौत है। मानी पथिक नहीं माने, चले गये। आगे चलकर जङ्गल में उनकों स्वर्ण मुद्राओं का ढेर मिला, वे प्रसन्न हो गयें। चारों ने मुद्राएँ बाँट लीं एवं एक को मिठाई लेने भेजा। उसके मन में आया कि, 'मिठाई में जहर मिला देते हैं, वे तीनों खाकर मर जायेंगे और मुझे सारी मुद्राएँ मिल जायेंगी'। वहाँ उन तीनों ने सोचा कि 'जैसे ही वह मिठाई लेकर आयेगा और हम लोग उसको मार डालेंगे, जिससे कि चार नहीं तीन हिस्से करने पड़ेंगे'। जैसे ही वह मिठाई लेकर आया और तीनों ने उसे मार डाला और मिठाई खाकर स्वयं भी मर गये, इस प्रकार अहङ्कारी लोग गुरुजनों की बात को ठुकरा कर दुर्दशा को प्राप्त होते हैं।
धन
जिसने अपने को कुछ माना सो पिटा- एक राजभवन में शिष्यों सहित साधु का आगमन हुआ, गुरू जी ने समझाया कि आज यहाँ विश्राम करना है, कोई आये तो कुछ बोलना नहीं, गुरूजी ध्यान में लीन हो गये, उसी वक्त राजा की सवारी आयी, राजा ने शिष्यों को पूँछा-तुम कौन हो ? उत्तर आया-साधु हैं, राजा ने उनको बाहर कर दिया, अन्त में गुरू के पास गये तो वे मौन हो गये कुछ बोले नहीं, राजा ने उनको कुछ नहीं कहा और चला गया।
विनम्रता
भरत चक्रवर्ती की प्रशस्ति- दिग्विजय के बाद भरत चक्रवर्ती अपने प्रथम चक्रवर्ती होने की प्रशस्ति लिखने के लिए वृषभाचल पर्वत के पास जब गये, तो वहाँ उन्होंने देखा कि पूरा पर्वत...
विनम्रता
ज्ञान मद- बनारस से पढ़कर आया युवक नाव पर सवार होकर स्वगृह की ओर जाते हुये नाविक से पूँछने लगा 'आपने इंग्लिश पढ़ी है'? नाविक ने कहा 'नहीं', युवक ने कहा 'तब तुम्हारी पच्चीस प्रतिशत जिन्दगी बेकार' है, युवक ने पुनः पूँछा 'आपने संस्कृत पढ़ी है?' नाविक ने कहा 'नहीं', युवक बोला 'तब तो तुम्हारी पचास प्रतिशत जिन्दगी बेकार' है, नाव आगे बढ़ी तूफान आया, नाविक ने पूँछा 'आप तैरना जानते हो?', युवक ने कहा 'नहीं', नाविक बोला 'तब तो आपकी सौ प्रतिशत जिन्दगी बेकार है', इसलिये किसी भी विद्या का अहङ्कार नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
अहङ्कार रुपी लङ्गर नही खोला- भूले भटके शराबी रात भर नाव खेते रहे किन्तु सुबह देखा तो वहीं थे, नाविक ने कहा नाव का लङ्गर नहीं खोला, अतः आगे नहीं बढ़े, इसी तरह मानव ने अहङ्कार रूपी लङ्गर नहीं खोला, इसलिए संसार में ही भटक रहा है।
विनम्रता