Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 315

कुशील से हानि। शील की नौ बाढ। ब्रह्मचर्य के पाँच अतिचार।

60 सूत्र

गिरि से गिर परवो भलो, भलो पकड़वो नाग। अग्नि में जलवो भलो, बुरे शील को दाग।।
ब्रह्मचर्य
कामिनी के कटाक्ष का निरीक्षण करने में तत्पर मनुष्य के अनेक भव युक्तायुक्त के विचार से शून्य हो जाते हैं, स्त्री की गन्ध मात्र भी, उसका देखना, स्पर्शन और वचन मात्र भी मुनि की सानन्द वीतराग चित्त वृत्ति को तत्काल ही व्यर्थ कर देती है, मुनि को वार्तालाप तो दूर उनके शब्द श्रवण से भी बचना चाहिए क्यों कि उनका नाम भी भूत की तरह भयानक होता है।
ब्रह्मचर्य
जिस नारी को अवैध गर्भ हुआ हो और वह बार-बार गिराने की भावना करे तो लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में उत्पन्न होती है।
ब्रह्मचर्य
धन और स्त्री का राग मन रहित वृक्षों को भी नहीं छोड़ता फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है, जहाँ धन गड़ा हो वहाँ वृक्ष की जड़ें चली जाती हैं और स्त्रियों के पैर मारने आदि से वृक्ष खिल उठते हैं।
ब्रह्मचर्य
शील की नौ बाढ़- 1.गरिष्ट आहार, 2.भड़कीली भेषभूषा, 3.कुसङ्गति, 4.स्त्री आसन, 5.स्त्री कथा, 6.आङ्गोपाङ्ग निरीक्षण, 7.पूर्वभोग स्मरण, 8.स्त्री नृत्य,गीत, 9.स्त्री सह सम्भाषण ये सभी नहीं करना शील की नौ बाढें हैं।
ब्रह्मचर्य
भोगों का चिन्तन ही व्यक्ति को रोगी, कमजोर, पागल तक कर देता है और मृत्यु भी हो जाती है।
ब्रह्मचर्य
योगी नहीं भोगी बूढ़ा होता है, भोग बुरे भव रोग बढावे''।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य व्रत के पाँच अतिचार- 1. दूसरों के विवाह कराना, 2. विवाहित व्यभिचारिणी स्त्री से सम्बन्ध करना, 3. अविवाहित व्यभिचारिणी स्त्री से सम्बन्ध करना, 4. मैथुन सेवन के अङ्गों को छोड़कर भिन्न अङ्गों से मैथुन सेवन करना, 5. मैथुन सेवन में आसक्ति होना।
ब्रह्मचर्य
इन्द्रिय भोग और इन्द्रिय ज्ञान दोनों ब्रह्मचर्य में बाधक हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिये स्वप्न में भी सावधान रहना पड़ता है, सौन्दर्य प्रदर्शन ब्रह्मचर्य का अपमान है।
ब्रह्मचर्य
आज दहेज़ रूपी दानव के कारण कितनी कन्याओं की माँग सूनी हो गयी है तथा हँसती खिलखिलाती जिन्दगी नरक के समान हो गयी है।
ब्रह्मचर्य
एक बार का विषय भोग उपजाऊ जमीन में बट के बीज की तरह फलता है, वह अपना फल जरूर देता है।
ब्रह्मचर्य
जगत की प्रत्येक घटना शिक्षा देती है, किन्तु विषय वासनाओं के कोलाहल में हमें सुनाई नहीं देती है।
ब्रह्मचर्य
मनुष्यों का जीवन असंयमित होने के कारण प्रकृति विरूद्ध हो गयी है, जैसे अतिवृष्टि-अनावृष्टि, अकाल, भूकम्प आदि।
प्रकृति
शोध के अनुसार नौ लाख जीवों की हिंसा एक बार के मैथुन में होती है और आगम में असंख्यात जीवों की हिंसा बतलायी हैं।
अहिंसा
भड़कीला परिधान, बालक बालिकाओं की सह-शिक्षा, अधिक उम्र में शादी, इत्यादि बलात्कार के कारण हैं।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य के अभाव में अल्पायु में ही बाल सफेद हो जाते हैं, स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है, आँखें कमजोर हो जाती हैं, चेहरे का तेज नष्ट हो जाता है, कानों से सुनाई नहीं देता है, दाँत गिर जाते हैं, जिव्हा लड़खड़ाने लगती है, छोटी सी विपत्ति में, मेहनत में, चलने में ही थकान हो जाती है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं एवं अल्पायु में ही मरण हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
ग्लानि, मूर्च्छा, भ्रान्ति, कम्पन, श्रम, पसीना, अङ्गो में विकार तथा क्षय रोगादिक दोष प्राणियों में मैथुन से उत्पन्न होते हैं।
ब्रह्मचर्य
'कं' अर्थात् खोटा 'दर्प' अर्थात् अहङ्कार उत्पन्न करता है, वह कन्दर्प कहलाता है।
ब्रह्मचर्य
अति कामना उत्पन्न करके दुःख उत्पन्न करता है, इसलिए वह काम कहलाता है, अनेक मनुष्य और तिर्यञ्च लड़-लड़ कर मर जाते हैं, इसलिये भी काम कहलाता है।
ब्रह्मचर्य
एक स्त्री के कारण पुरूषों को आरम्भ परिग्रह में फँसना पड़ता है, फिर वहाँ से निकलना मुश्किल होता है।
ब्रह्मचर्य
कामभोग में एकक्षण का सुख, बहुकाल दुःख, सीमित सुख, असीमित दुःख, काम भोग मुक्ति के विरोधी व अनर्थों के मूल हैं।
ब्रह्मचर्य
सूर्पनखा की नाक लक्ष्मण ने नहीं काटी थी, एक विवाहिता होकर भी पर पुरुष की इच्छा की थी इसलिए कट गयी थी।
ब्रह्मचर्य
व्यभिचारी को घृणा, पाप, भ्रम, और कलङ्क इन चारों से छुटकारा नहीं मिलता है।
चरित्र
चाहे तीर्थ पर जाओ, या एक पैर पर खड़े रहो, या जल में डूबो, या पर्वत के शिखर से कूदो, जैसे शिला पर बीज फलता नहीं उसी प्रकार ब्रह्मचर्य से रहित मनुष्य भी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता है।
ब्रह्मचर्य
जिसके कोष में ब्रह्मचर्य नहीं है उसके पास कुछ भी नहीं है।
ब्रह्मचर्य
झगड़े और दुःख भी फ्री में नहीं आते, इन को भी संसारी प्राणी पैसे देकर खरीदता है, जैसे टी.वी. पर अलग-अलग चैनल देखने के लिए बच्चे झगड़ते हैं, मोबाइल की वजह से शान्ति से नहीं बैठ पाते, प्रत्येक बच्चे को अलग-अलग गाड़ी चाहिए एवं गाड़ी रखने की समस्या आदि।
संतोष
प्रदर्शन की भावना विकार के अस्तित्त्व को सूचित करती है।
चरित्र
विषय सुख खाज खुजाने के समान दुःख दायी हैं, जिसके अनन्तर पीड़ा बढ़ जाती है।
ब्रह्मचर्य
तेतीस करोड़ साठ लाख की अल्पसंख्या वाले देश अमेरिका में प्रतिदिन लगभग चौदह सौ चालीस तलाक दिये जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियों के मुख के विकार को 'हाव' कहते हैं, मन में उत्पन्न विकल्पों को 'भाव' कहतें हैं, नेत्रों के चलाने को 'विलास' कहते हैं और दोनों भोहों के चलाने को 'विभ्रम' कहते हैं।
ब्रह्मचर्य
इन्द्र के समान धीर-वीर अचिन्त्य पराक्रम के धारी रावण आदि स्त्रियों के कारण नरक में चले गए हैं।
ब्रह्मचर्य
जो तपस्वी, व्रती, मौनी और जितेंद्रिय हैं अगर वह भी स्त्री की सङ्गति करें तो अपने संयम को कलङ्कित कर लेते हैं।
संगति
जो एक माह के अन्तराल से केवल पानी लेता है, ऐसा साधु भी स्त्री की सङ्गति पाकर मोहित हो जाता है, फिर जो षट् रस भोजन करते हैं उनको कितनी काम की बाधा होगी? घास फूँस तृण जे भखें, तिन्हे सतावे काम। षट् रस भोजन जे करे, उनकी जाने राम।।
ब्रह्मचर्य
माता, बहिन और पुत्री के साथ भी एकान्त में नहीं बैठना चाहिये क्योंकि इन्द्रियाँ विद्वान् को भी पतित कर देती हैं।
ब्रह्मचर्य
जिन्होंने कभी घी नहीं देखा, वे ही तिली के तैल को मीठा कहते हैं, उसी प्रकार जिन्हें परमानन्द प्राप्त नहीं हुआ वे ही विषयों को मनोहर कहते हैं।
ब्रह्मचर्य
विषयासक्त मनुष्य के मनुष्यता, विद्वत्ता, कुलीनता एवं सत्यवचन आदि कौन से गुण नष्ट नहीं हो जाते हैं?
ब्रह्मचर्य
कामी मनुष्य भोजन, संयम, विवेक, वैभव, स्वाभिमान यहाँ तक कि अपना जीवन भी नष्ट कर देता है।
ब्रह्मचर्य
कुशील से आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, विशाल यश, पुण्य एवं प्रीति सब कुछ नष्ट हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र और शत्रु सभी भिन्न स्वभाव वाले हैं फिर भी अज्ञानी मोही इन्हें अपने मानता है।
अनासक्ति
ब्रह्मचर्य के दोष- 1.शरीर संस्कार, 2.गरिष्ठ भोजन, 3.गाना-बजाना-नाचना, 4.स्त्री सङ्गति, 5.स्त्री के विषय में सङ्कल्प करना, 6.अङ्गोपांग निरीक्षण, 7.स्त्री का सम्मान करना, 8.पूर्व के भोगों का स्मरण करना, 9.भविष्य में भोगों की चिन्ता होना, 10.वीर्यक्षरण होना।
ब्रह्मचर्य
हे मूर्ख! मैथुन के सेवन से योनी में उत्पन्न होने वाले करोड़ों जीव (पञ्चेन्द्रिय लब्धि अपर्याप्तक मनुष्य) लिंग के घर्षण से मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। माह में चार पर्वों में भी ब्रह्मचर्य पालने से करोड़ों जीवों को अभयदान मिल जाता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री नरक की घोर आपत्तियों का खुला दरवाजा है, तूने कितनी बार उनका उपकार किया है पर उन्होंने अपकार ही किया है, पुण्य को जलाने के लिए अग्नि स्वरूप स्त्री के शरीर में आप क्यों राग करते हो, यह स्त्री शरीर तो मूर्खों के लिए दुर्लभ लगता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री की सङ्गति से सत्य, सन्तोष, ज्ञान, धन, सुख और लोकमान्यता सभी नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्री रुपी अग्नि की सङ्गति से पुरुषों का धैर्य (वीर्य) के बहाने घी की तरह शीघ्र ही पिघल जाता है और विवेक कपूर की भाँति कहीं चला जाता है।
ब्रह्मचर्य
नारी जने के भक्त जन, के दाता के शूर। नहीं तो बाँझ रहवों भलो, व्यर्थ गमावे नूर।।
ब्रह्मचर्य
वह मार्ग जरूर मनोरम है, पर कण्टक कीरण दुर्गम है। गुजरे जितने जन इस मग से, परिहास हुआ सबका सम है। मत जा मन उस ओर अरे, वह स्वप्न मृगाम्बु तथा भ्रम है।।
ब्रह्मचर्य
परनारी पैनी छुरी तीन ठोर से खाये। धन छीने यौवन हरे मरे नरक ले जाए।।
ब्रह्मचर्य
परनारी पैनी छुरी मति लगाओ अङ्ग। रावण के दस शीश गये परनारी के सङ्ग।।
ब्रह्मचर्य
द्रोपती में आसक्त होकर कीचक ने अपने प्राण गमाये, चारुदत्त ने वेश्या में आसक्त होकर बत्तीस करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ बर्बाद की थीं।
ब्रह्मचर्य
आराम यदि चाहो, तो आ राम के पास। फँदे में फँसना चाहो तो, जा काम के पास।।
ब्रह्मचर्य
भोग बुरे भव रोग बढ़ावे बैरी है जग जीके। बेरस होय विपाक समय अति सेवत लागे नीके।। वज्र अग्नि विष से विषधर से ये अधिके दुःख दायी। धर्म रतन के चोर चपल अति दुर्गति पन्थ सहाई।।
ब्रह्मचर्य
दूल्हा जब घोड़े पर बैठे तब भी यही कहना, अभी भी वक्त है, पत्नि नहीं राम नाम सत्य है।
ब्रह्मचर्य
सदा सुहागन री सखी, निज रोटी अर दार। दाम चौगुने अरु दुखद, पूरी अर परनार।।
ब्रह्मचर्य
शादी के पहले साल वाह-वाह, दूसरे साल आह-आह, तीसरे साल तबाह इसे कहते है विवाह।
परिवार
पहली साल पति बोलता है और पत्नि सुनती है, दूसरे साल पत्नि बोलती है और पति सुनता है, तीसरी साल दोनों बोलते हैं और पड़ोसी सुनता है, ये हैं विवाह के हाल।
परिवार
अत्यन्त तीव्र काम से भी जो वेदना होती है वह अल्पकाल के लिए होती है, परन्तु ब्रह्मचर्य का खण्डन करने से करोड़ों भवों में वेदना प्राप्त होती है।
ब्रह्मचर्य
जिस प्रकार स्वास्थ्य के प्रतिकूल भोजन सेवन करने वाले मनुष्यों का दबा हुआ रोग समूह जागृत हो जाता है, उसी प्रकार स्त्रियों के सङ्ग से पुरुषों का भीतर सोया हुआ भी काम जागृत हो जाता है, स्त्रियों के समस्त अङ्ग कोमल होते हैं पर मन पाषाण के समान कठोर होता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियों के चेहरे लगते बड़े भोले है पर सच मानों ये बारूद के गोलें हैं।
ब्रह्मचर्य
जो कुल, जाति और गुण से भ्रष्ट हैं, निकृष्ट हैं, दुष्ट चेष्टा वाले हैं, छूने योग्य नहीं हैं तथा नीच हैं, ऐसे पुरुष प्रायः स्त्रियों को प्रिय होते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियाँ अञ्जन, तन्त्र, मन्त्र और विनय के विना ही बुद्धिमान मनुष्य को भी क्षणभर में ठग लेती है।
ब्रह्मचर्य