Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

तपस्वी व्रती मौनी, संवृतात्मा जितेन्द्रियः। कलङ्कयति निश्शङ्कं, स्त्री सखा सोऽपि संयमं।।

जो तपस्वी, व्रती, मौनी और जितेंद्रिय हैं अगर वह भी स्त्री की सङ्गति करें तो अपने संयम को कलङ्कित कर लेते हैं।

Even one who is an ascetic, vow-keeper, observer of silence and conqueror of the senses, if he keeps the company of women, defiles his self-restraint without doubt.

— आराध्य सूत्र · #32

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति