Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

लोग माल उड़ाकर भी बुरा कहते हैं- एक सेठ के चार बेटे थे, उसने पाँच-पाँच लाख रुपए सबको बराबर बाँट दिये, बेटों ने सोचा समाज का मुख मीठा कर दो, छोटे बेटे ने अच्छी नमकीन-मिठाईयाँ खिलाई, खा-पीकर लोग चर्चा करने लगे, बाप का धन तो इसी ने उड़ाया है, तभी तो इतना खर्च कर रहा है, लोग माल भी उड़ा रहे थे और बुराई भी कर रहे थे, दूसरे बेटे ने केवल मिठाई बनायी, खा-पीकर लोग बोले ये तो बदमाश है, तीसरे ने पूड़ी-साग खिलाई तो लोगों ने कहा कञ्जूस है, चौथे ने दाल-रोटी खिलाई तो लोग बोले कि मक्खीचूस है, इसलिए इस जगत में प्रशंसा की दृष्टि से खर्च करना व्यर्थ है क्योंकि महावीर भगवान् की भी सब प्रशंसा नहीं करते हैं।

People criticise even while enjoying your bounty: a merchant had four sons and divided five lakh rupees equally among them. The sons thought to sweeten the mouths of society. The youngest served fine savouries and sweets; after eating, people gossiped that he had squandered his father's wealth. The second served only sweets, and people called him a rogue; the third served puri and vegetables, and they called him a miser; the fourth served plain dal and roti, and they called him a skinflint. So spending for the sake of praise is futile in this world, for not even Lord Mahavir is praised by all.

— आराध्य सूत्र · #16

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
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