Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 34 / 41

परमात्मा के दर्शन- शिष्य ने गुरू से कहा 'गुरू चरणों में रहते वर्षों बीत गये किन्तु परमात्मा के दर्शन नहीं हुए' गुरू ने कहा! चलो आज उस पहाड़ी पर इन पत्थरों को लेकर परमात्मा का दर्शन करायेगें ।गुरू पहाड़ी पर पहुँच गये, किन्तु पत्थर के बोझ से शिष्य पीछे रह गया, बोझ से थक कर एक-एक पत्थर फेकना शुरू कर दिया, पहाड़ तक जाते-जाते सारे पत्थर फेंक दिये, ऊपर जाकर जब गुरू से मिले तब गुरु ने पूँछा, पत्थर कहाँ हैं? शिष्य ने कहा पत्थर के बोझ से चल नहीं पा रहे थे, इसलिये फेंक दिये, तब गुरू ने कहा बाहरी बोझ की अपेक्षा अन्दर का बोझ कम करो, अर्थात् क्रोध, मानादि पत्थरों को जिस दिन फेंक दोगे उस दिन परमात्मा के दर्शन हो जायेंगे।
अनासक्ति
अज्ञान- किसी ने कहा तुम्हारी पत्नि विधवा हो गयी, वह रोने लगा, तीसरे ने सुना तो कहा आप जीवित हैं तो आपकी पत्नी विधवा कैसे हुई? इसी तरह जब तक मेरे पन तेरे पन की बुद्धि है, तब तक अज्ञान है।
ज्ञान
भ्रान्ति टूटी- किसी व्यक्ति ने स्वप्न में देखा, मकान में आग लग गयी, दरवाजे, परदे आदि जलने लगे हैं, उस व्यक्ति के मकान को बुझाने के लिये कितने बाल्टी पानी की आवश्यकता है? अर्थात् एक बूँद की भी नहीं, मात्र उसे जगाने की आवश्यकता है, उसके जागते ही आग अपने आप बुझ जायेगी, वस्तुतः आग लगी ही कहाँ थी, भ्रान्ति टूटने की आवश्यकता थी उसी प्रकार, ये जगत भी एक सपना है, मात्र सजग होने की आवश्यकता है।
ज्ञान
एक व्यक्ति मुनि महाराज के पास गया और बोला हमारे कुंए का पानी गन्दा हो गया आप कोई मन्त्र दे दीजिये, पन्द्रह दिन जाप करने के बाद देखा तो कुंए का पानी और ज्यादा गन्दा था, महाराज को उलाहना देने के लिए आया, तो महाराज ने पूँछा, आपके कुंए का पानी गन्दा कैसे हुआ है? तब उसने कहा एक दिन चार कुत्ते लड़ते हुए आये और कुंए में गिर कर मर गये, महाराज ने कहा कुत्तों को बाहर निकाला कि नहीं? उसने कहा नहीं, तो फिर आपके कुंए का पानी स्वच्छ कैसे होगा? उसी प्रकार अनादिकाल से आत्मा रूपी कुँए में पड़े हुए चार कषाय रूपी कुत्ते यदि नहीं निकाले तो आत्मा रूपी कुंआ साफ नहीं हो सकता है।
संयम
ममत्व भाव से दुःख- सेठजी की वेश कीमती घड़ी नौकर के हाथ से फूट गयी, सेठ ने बहुत डाँटा, रात में नींद भी नहीं आयी और न ही भूख लगी, किन्तु नौकर भोजन करके निश्चिन्त सोया, दूसरे दिन सेठ ने नौकर से कहा कोई बात नहीं, फूट जाने दो, दुःख इस बात का है वह घड़ी तुम्हे देना थी, अब रात में सेठ चैन से सोया और नौकर को न तो भूख लगी और नींद भी नहीं आई, वास्तव में ममत्व भाव ही दुःख का कारण है।
अनासक्ति
अपनेपन से दुःख- सेठजी ने बहुत बढ़िया मकान शहर के बीच में बनाया, अचानक आग लग गयी, धूँ-धूँ कर मकान जल रहा था, सेठ सीना पीट-पीट कर रो रहा था, कि इतने में बड़ा लड़का आया और बोला! पिताजी क्यों रो रहे हो? यह मकान कल बिक गया था बयाना हो गया है, अब भी मकान जल रहा था, पर अब सेठ दर्शक के समान देख रहा था, छोटा लड़का आया और बोला पिताजी! खड़े-खड़े क्या देख रहे हो, आग बुझाओ पिताजी ने कहा, चिन्ता नहीं करो मकान बिक गया है, बेटा बोला सौदा केंसल हो गया है अब सेठ का पुनः रोना-धोना चालू हो गया, वास्तव में अपना पन ही दुःख का कारण है।
अनासक्ति
नींद हराम- एक व्यक्ति ने मन्त्र जाप किया, विद्या सिद्ध हो गयी, विद्या ने कहा जो चाहो सो माँग लो, तो उसने कहा कल माँगेंगे, घर जाकर रात भर सोचता रहा घर, नौकर धन, या स्वयं तहसील दार, कलेक्टर, मुख्यमन्त्री या प्रधान मन्त्री क्या माँगे? रात भर सोचता रहा सो नहीं सका, सुबह विद्या से कहा कि अभी धन हमारे पास आया नहीं, तब नींद उड़ गयी, आने पर क्या होगा, इसलिए उसने कहा हमें कुछ नहीं चाहिए।
संतोष
छछ पीकर घी जोड़ा- श्मश्रु नवनीत ने पहले धनार्जन किया, चोरों ने लूट लिया, गरीब हो गया, तो ग्वालों के यहाँ रहने लगा, वहाँ से मठा लाता था पीकर दिन निकालता, मूँछों में जो नवनीत लग जाता उसको निकाल कर इकट्ठा कर लेता था, कुछ महिनों में एक मटकी भरली और आशा के महल बनाने लगा, कि व्यापार करते-करते राजा चक्रवर्ती आदि बनूंगा, रानियाँ पैर दबायेंगी तो मैं कहूँगा तुमसे पैर दबाते नहीं बनता, और पैर छुड़ा लूँगा, उसने सपने में पैर झटकारा जैसे ही पैर मटकी में लगा, नवनीत अग्नि में गिरा, आग भड़की घास की झोपड़ी जल गयी और वह जल कर मर गया।
संतोष
सिक्का राजा को दिया- एक साधु जङ्गल में विराजे थे, उनको कोई दर्शनार्थी सिक्का चढ़ा गया, साधु ने सोचा यह सिक्का किस गरीब को देना चाहिए, इतने में राजा किसी पर चढ़ाई करने के लिये निकल रहा था, सन्त ने सोचा, इससे ज्यादा गरीब कोई नहीं, इसलिये साधु ने सिक्का राजा की पालकी पर फेंक दिया, तव राजा ने साधु से पूँछा आपने यह सिक्का यहाँ क्यों फेका? साधु ने कहा दूसरों को लूटने जा रहे हो इसलिये भिखारी हो अतः मैंने आपको भीख दी है।
अनासक्ति
बन्दर मुठ्ठी बाँध कर घड़े से चने निकालता है, जब हाँथ नहीं निकलता, तो कहता है इस घड़े ने पकड़ लिया, वास्तव में तो उसने घड़े को पकड़ रखा है, इसी प्रकार संसारी प्राणी ने स्वयं गृहस्थी को पकड़ रखा है और कहता है परिवार के लोग नहीं छोड़ते हैं।
अनासक्ति
मोह के भेदों को अपना व अपने रूप मानता है, इसलिए परिग्रह बन जाता है, पहले उसे उल्टा कर दें, जैसे पारसनाथ आदि के प्रति विशेष भक्ति रख अनायतन से बचना चाहिये, अनन्तर वस्तुस्वरुप का यथार्थ श्रद्धान कर मिथ्यात्व से बचना चाहिए, संसारी प्राणी कहता है, तुमने मेरे क्रोध को नहीं देखा, अर्थात् अज्ञान से क्रोध को अपना मानता है, पहले क्रोध पर क्रोध करना एवं ''क्षमा से क्रोध को जीतना चाहिए'', इसी तरह मान के उदय से कहता है, कि तुम मेरे को क्या समझते हो? जबकि पुण्य के उदय से कुछ शक्ति धन ज्ञानादि मिला है, अतः जैनत्व का स्वाभिमान रखकर आत्म कल्याण के विषय में सोचना चाहिए एवं ''विनय से मान को जीतना चाहिए'', इसी तरह दूसरे को ठग कर अपने आप को बुद्धिमान समझता है और कहता है मुझे किसी ने नहीं पकड़ पाया, पहले पाप से बचने के लिए मायाचारी करना चाहिए, और मायाचारी को तिर्यञ्चआयु का कारण समझकर ''सरलता से माया को जीतना चाहिए'', लोभ कषाय के उदय से पर पदार्थ को अपनाना चाहता है, जबकि लोभ को पाप का बाप कहा है, अतः पहले स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति का लोभ होना चाहिए, व ''सन्तोष से लोभ को जीतना चाहिए'', अज्ञानी प्राणी दूसरों की कमजोरियों की हँसी उड़ाता है, उसे ''स्वयं की कमियों पर हँसना चाहिए'', इसी प्रकार पहले ''पञ्च परमेष्ठी से रति होना चाहिए'' और विषयों से विरक्ति होना चाहिए, ''पाप के स्थानों से अरति होना चाहिए'', अपने द्वारा किये हुए ''पापों का शोक होना चाहिए'', नरक आदि ''दुर्गतियों में जाने का भय होना चाहिए'', अपने ''दोषों के प्रति जुगुप्सा (ग्लानि) होना चाहिए'', मुक्ति स्त्री की कामना रखते हुए, ''स्त्री मात्र से विरक्ति होना चाहिए'', ''गलत कार्य करने के विषय में नपुंसक बन जाना चाहिए'' एवं ''अपने को पुरुष अर्थात् आत्मा मानकर मोक्ष का पुरुषार्थ करना चाहिए'' और ''कषाय मात्र का त्याग करना चाहिए''।
संयम
छिपकली, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, जिन घरों में रहते हैं वे उसे अपना मानते हैं, और जमादार (मेहतर) भी जितने घरों की सफाई करता है, उन्हें अपने कहता है और हम भी उसे अपना घर मानते हैं, तो हमारी सोच भी कुत्ते आदि की तरह हुई, तथा शर्माजी का कुत्ता वर्माजी के कुत्ते से बोला कि मैं गाड़ी खींच रहा हूँ, पर उसे नहीं मालूम की गाड़ी खींचने वाला कोई और है, इसी प्रकार अज्ञानी प्राणी घर, परिवार आदि का कर्ता अपने को मानता है, पर उसे नहीं मालूम कि सबका अपना-अपना भाग्य और पुरुषार्थ होता है।
अनासक्ति
विजय का ब्रह्मचर्य- विजय जब पाठशाला पढ़ता था, तब शुक्लपक्ष में ब्रह्मचर्य से रहने का नियम ले लिया और विजया भी जब पाठशाला पढ़ती थी, तभी कृष्णपक्ष में ब्रह्मचर्य से रहने का नियम ले लिया था, आगे चलकर उन दोनों की शादी हो गयी, उन्होंने पूरे जीवन भर भाई बहन का व्यवहार किया। किसी गृहस्थ से जीवानी गिर गई थी, प्रायश्चित्त के रूप मे मुनि महाराज ने शीलव्रत धारी दम्पत्ति को भोजन कराने को कहा, अगर ऊपर का काला चँदोवा सफेद हो जाए, तो समझ लेना मेरा प्रायश्चित्त पूरा हो गया, विजय-विजया दम्पत्ति को भोजन कराने से काला चँदोवा सफेद हो गया था।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्माचारी के दर्शन से आँख ठीक हुई- एक जन्मान्ध ने मुनिराज से पूछा हमारी आँखें कब ठीक होगीं? तब मुनिराज ने कहा कि विवाह से बारह वर्ष तक जिसने ब्रह्मचर्य पाला हो उसके दर्शन से ठीक होंगी।
ब्रह्मचर्य
स्वप्न में गृहस्थी- एक सन्यासी पानी पीकर कुंए के पत्थर पर सो गया, उसने स्वप्न में देखा कि मैं अपनी स्त्री बच्चों के साथ सो रहा हूँ, इतने में स्त्री ने कहा थोड़ा खिसको गर्मी लग रही है, थोड़ी देर में पत्नी ने पुनः कहा थोड़ा और खिसको बच्चा पसीना-पसीना हो रहा है, जैसे ही सन्यासी खिसका तो कुंए में गिर गया, चिल्लाया तो किसान दौड़ कर आया और सन्यासी को बाहर निकाला, पूँछा आप कुंए में कैसे गिर गये थे? सन्यासी ने कहा स्वप्न में थोड़ी देर के लिये स्त्री के साथ सोया तो कुंए में गिर गया, जो लोग जीवन भर स्त्री के साथ सोते हैं तो क्या वे नरक रुपी कुंए में नहीं गिरेंगे?
ब्रह्मचर्य
ध्यान के लिये वीर्य शुद्धि और ब्रह्मचर्य बहुत आवश्यक है, दूध, घी, आदि रसों का अधिक मात्रा में सेवन करने से वीर्य पर्याप्त मात्रा में बढ़ता है, घी सर्वाधिक वीर्य वर्धक वस्तु है उसका सेवन काम वासना उत्तेजित करता है, चञ्चलता बनी रहती है, यदि वीर्य सञ्चित होता है तो चञ्चलता बढ़ती है और वीर्य का विसर्जन होता है जिससे दुर्बलता आती है, दुर्बलता से मन सन्तुलित नहीं हो पाता, अतः ध्यान की कल्पना भी नहीं हो सकती है, इसलिए रसों का प्रचुर मात्रा में सेवन करना ध्यानाभ्यासी के लिये हितकर नहीं है।
ब्रह्मचर्य
कालेज की लड़की- सागर जिला में एक लड़की बस से रोज कॉलेज जाती थी, कण्डक्टर से परिचय हो गया, दोनों प्रेम की डोर में बन्ध गये, दोनों के माँ-बाप ने रोका, नहीं माने और शादी कर ली, जब वधू घर पहुँची, तब लड़के के माँ-बाप ने स्वीकार नहीं किया, पिता ने कहा हमारे घर भर के लोगों का थूक पियो तो स्वीकार करेंगे, लड़की ने स्वीकार कर लिया, गिलास में परिवार के लोगों ने थूका, लड़की को दिया, उसने पी लिया, कुछ दिन बाद पति-पत्नी में अनबन हो गयी, मारना-पीटना शुरू हुआ, बहुत दुःखी हुयी और बाद में तलाक हो गया।
ब्रह्मचर्य
राजा ने रानी को अमृत फल दिया ताकि रानी हमेशा सुन्दर बनी रहे, रानी ने कोतवाल को दिया, उसने वेश्या को दिया, वेश्या ने राजा को दिया, राजा फल को देखकर चिन्तन करने लगा। मैं जिस रानी का निरन्तर चिन्तन करता हूँ, वह रानी मुझसे विरक्त है और वह कोतवाल को चाहती है कोतवाल वेश्या को चाहता है वेश्या मुझे चाहती है, इसीलिए उस रानी को धिक्कार...
ब्रह्मचर्य
गर्भपात कराने वाली महिला, गर्भपात की सलाह देने वाली महिला, अनुमोदना करने वाले, अस्पताल जाकर कराने वाले पुरूष को भी छः महीने तक पूजा, आहारदान, वैयावृत्ति, जिनवाणी का स्पर्श, पढ़ना और धार्मिक अनुष्ठान नहीं करना चाहिए, क्योंकि असहाय मनुष्य की हत्या करने बाला महापापी है।
अहिंसा
माँ नहीं राक्षसी- जब सक्ङ्शन पम्प (यन्त्र) भ्रूण के पास पहुँचता है तब बालक की प्रतिमिनट एक सौ चालीस बार होने वाली हृदय की धड़कन बढ़कर दो सौ बार प्रति मिनट हो जाती है, अपने जीवन रूपी दीपक को बुझाने के लिये आ रहे औजारों से बचने के लिये भ्रूण पीछे हटता है, परन्तु उसका आवरण यन्त्रों से छिद कर बाहर निकलने लगता है, बालक के मस्तक और धड़ को झटके से अलग कर दिया जाता है, तब वेदना से चीख उठता है, यह है गूँगी चीख, फिर फोरसेप यन्त्र से दबाकर कठिन खोपड़ी को चूर कर दिया जाता है, अपने हाथ से अपनी सन्तान का गला घोटने वाली माँ, माँ नहीं राक्षसी है, कसाई बकरे को एक झटके में मार डालता है, लेकिल गर्भपात में कोमल अङ्गों को तीक्ष्ण औजारों से टुकड़े-टुकड़े करके मारा जाता है।
अहिंसा
गर्भ में ही स्वर्ग की आयु- गर्भस्थ शिशु जो अभी कुछ घण्टों का है वह तीसरे-चौथे स्वर्ग की आयु बाँध सकता है, जो कुछ दिनों का है तो वह पाँचवे-छटवे स्वर्ग तक की आयु बाँध सकता है, तीन माह से लेकर सात-आठ माह का नौवें से बारह वे स्वर्ग तक की आयु बाँध सकता है, जब अविकसित दशा में देवायु का बन्ध कर सकता है, तो विकसित अवस्था में क्या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता ?
कर्म
ध.पु.सप्तम्- भवनत्रिक के देव तथा सौधर्म-ईशान स्वर्ग के देव मरकर मनुष्य या तिर्यञ्च के गर्भ में आकर अन्तर्मुहूर्त पश्चात् वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, तीसरे-चौथे स्वर्ग के देव पृथक्त्व (तीन से नौ तक की संख्या को पृथक्त्व कहते हैं) मुहूर्त पश्चात तीसरे-चौथे स्वर्ग में उत्पन्न हो सकते हैं, पाँचवे से आठवें स्वर्ग के देव पक्ष पृथक्त्व में वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, नौवें से बारहवें स्वर्ग के देव मास पृथक्त्व में वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, तेरहवे से सोलहवे स्वर्ग के देव तथा ग्रैवेयक, अनुदिश, अनुत्तर स्वर्ग के देव मनुष्य स्त्री के गर्भ में आकर वर्ष पृथक्त्व पश्चात् उन्हीं स्वर्गों में उत्पन्न हो सकते हैं।
कर्म
उपवास से ब्रह्मचर्य पाला- एक महिला की शादी के कुछ दिन बाद पति मर गया, कुछ समय बाद सास भी मर गयी, ससुर ने सोचा बहु को खराब न लगे इसलिये श्रृंगार का सामान और अच्छा भोजन बहु के लिये उपलब्ध कराया, गरिष्ट भोजन से बहु के परिणाम बिगड़ गये, उसने ससुर से कहा कि हमसे अकेले नहीं रहा जाता, ससुर को चिन्ता हुई, सोचा गलती हमने की है, कि बहु के आहार का ध्यान नहीं रखा, ससुर ने उपवास करना शुरू किये, बहु ने भी उपवास किये, कुछ समय बाद जब इन्द्रियाँ शिथिल हुयी, तो ब्रम्हचर्य का पालन होने लगा।
ब्रह्मचर्य
रानी अमृता का छल- अष्टावक्र महावत के मधुर गान पर आसक्त होकर विषय सेवन करने लगी, रहस्य खुलने को हुआ तो यशोधर राजा को जहर दे दिया, वैद्यों को बुलाया, आने के पहले रानी छल से बोली, राजा को दृष्टिविष उत्पन्न हुआ, बाल बिखेर कर रोने लगी और राजा की छाती पर गिर पड़ी, चुपके से गला दबा दिया, राजा मर गया, अष्टावक्र के साथ खूब भोग भोगने लगी, अन्त में गलित कुष्ट हुआ, मरकर नरक गयी, मधुर स्वर के श्रवण से वासना जाग्रत होती है, इसलिये नहीं सुनना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
रोगों का राजा एड्स- जो भौतिकवादी, विलासप्रिय अमेरिका आदि देश ब्रह्मचर्य का मखोल उड़ाते थे, वे अब ब्रह्मचर्य को महत्त्व देने लगे हैं, यह रोग वेश्यागमन से होता है, यह अजीब किस्म का वायरस यानि विषाणु है, यह वायरस इतना छोटा है कि इसका व्यास 100 नेनोमीटर या 0.1 माइक्रो मीटर से नापा गया है, ऐसे सूक्ष्माति सूक्ष्म जीव ने आज लगभग एक सौ तेतीस देशों में एड्स का असाध्य रोग फैला दिया है, इसका शोध 1983 में पेरिस के डॉ. तुक मोटारनीन ने और 1984 में अमेरिका के डॉ. रावर्ट गैली ने किया था।
स्वास्थ्य
वीर्य की बूँद निकालना याने शरीर को नीबू की भाँति निचोड़ना है, जैसे मथानी से दूध के परमाणु से मक्खन खींचा जाता है, उसी प्रकार हस्तमैथुन आदि से शरीर के सभी परमाणुओं से वीर्य खींचा जाता है नस-नस हिल जाती है जब तक दीपक में तैल ऊपर चढ़ता है तो दीपक प्रकाश करता है, जैसे ही तैल का नाश होता है दीपक मन्द होकर बुझ जाता है, उसी प्रकार जब तक शरीर में वीर्य ऊपर चढ़ता है तो शरीर में चमक, दमक, आनन्द बल दिखाई देता है।
ब्रह्मचर्य
माँ का कलेजा- वेश्यागामी की परीक्षा लेने के लिए, एक लड़की ने कहा कि आप अपनी माँ का कलेजा ले आओ, तो मैं तुम्हे पति बना लूँगी, कामासक्त रात में माँ को मारकर कलेजा ले आता है और लड़की के पास जाता है, लड़की ने मनाकर दिया, और कहा ! जो अपनी माँ का नहीं हुआ, वह हमारा क्या होगा ?
ब्रह्मचर्य
स्त्री के भाव- मनुष्य के शरीर में जितने रोम हैं, स्त्रियों के मन में उतने विकारी भाव होते हैं, जैसे वायु, उल्का, जल के बुलबुले, विद्युत आदि ये पदार्थ एक स्थान में ज्यादा देर तक नहीं ठहरते हैं, वैसे ही स्त्रियाँ एक पुरूष में ज्यादा समय तक प्रीति नहीं करती हैं, परमाणु पकड़ना सम्भव है पर स्त्रियों के भावों को पकड़ना असम्भव होता है।
ब्रह्मचर्य
माया का अजायब( चिड़िया ) घर- एक थानेदार एक स्त्री में आसक्त हो गया, अत्यधिक प्रेम करने लगा, उसका ट्रांसफर हो गया, तो उसने स्त्री से कहा ! तू हमारे साथ चल, उसने मना कर दिया, थानेदार को मना करने का बड़ा खेद हुआ, एक महिला ने थानेदार को दुःखी देखकर, कारण पूँछा तो उसने अपनी प्रेमिका का हाल बता दिया, उस महिला ने थानेदार को परदे के भीतर खड़ा करके उस महिला से पूछा तूने अभी तक कितने लोगों से प्रेम किया है ? उसने लिस्ट बताई साठ-पैंसठ लोगों के नाम बताये, थानेदार का नाम नहीं आया, पूँछा तुम भूली तो नहीं हो ? चार-पाँच नाम फिर बताए तब भी नाम नही आया, पुनः पूँछा दो-तीन नाम बताये तब भी थानेदार का नाम नहीं आया, वह सब सुन रहा था, थानेदार को उससे विरक्ति हो गयी।
ब्रह्मचर्य
यह राग आग दहे सदा- शक्कर के पहाड़ की चींटी ने नमक के पहाड़ की चींटी का निमन्त्रण किया, मुँह में नमक की डली दबाकर शक्कर के पहाड़ पर आई, इसलिए उसे शक्कर का आनन्द नहीं आ रहा था, इसी तरह वैराग्य में राग रूपी नमक हो तो वैराग्य का आनन्द नहीं आता है, ये विषय सम्बन्धी रागादि काले नाग की तरह हैं, जैसे कमरे में सर्प हो तो नींद नहीं आती है, उसी तरह राग की आग दहे तो नींद नहीं आती है।
अनासक्ति