Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

प्रशंसा के लोभी इस तरह लुट जाते हैं- चार धूर्तों ने प्रशंसा के लोभी कञ्जूस राजा को लूटने का उपाय सोचा और स्यारों के बोलने के समय राजा के पास आये, राजा ने पूँछा स्यार क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! आपके राज्य में सभी प्रजा सुखी है केवल इन बेचारों के आवास की व्यवस्था नहीं है राजा ने प्रशंसा सुन कर बीस लाख रुपये दे दिये। बार-बार यही कहकर धूर्तों ने राजा से साठ लाख रुपये ऐंठ लिये, चौथी वार राजा ने पूछा अब क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! इनके रोने और गाने की आवाज एक जैसी ही है अतः अब ये रो नहीं रहे आपका गुणगान कर रहे हैं, राजा लुट कर के भी खुश हो गया।

Lovers of praise are plundered thus: four rogues plotted to loot a miserly king who craved praise, coming to him while jackals howled. The king asked why the jackals cried; the rogues said, 'Sire, all your subjects are happy — only these poor creatures lack housing.' Flattered, the king gave twenty lakh rupees. Repeating this ruse the rogues extracted sixty lakh. The fourth time the king asked why they cried; the rogues said, 'Sire, their crying and singing sound alike; now they are not crying but singing your praises.' Thus plundered, the king was yet pleased.

— आराध्य सूत्र · #17

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति