Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 20 / 41

कौन सा अनुयोग कब पढ़ना–यदि मन शङ्का शील हो तो द्रव्यानुयोग, प्रमादी हो तो चरणानुयोग, तीव्र कषाय हो तो प्रथमानुयोग और यदि मन जड़ हो गया हो तो करणानुयोग पढ़ना चाहिए, पञ्चम काल में प्रायः तीव्र कषायी लोग हैं अतः उन्हें प्रथमानुयोग पढ़कर कषाय मन्द करनी चाहिए।
विवेक
जिसे देखने से ऐसा प्रतीत हो मानो मूर्तिमान प्रशम गुण है, यही कायशुद्धि है, वीतराग संयम के विना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती और वीतराग संयम की साधना उत्कृष्ट तप के द्वारा ही सम्भव है, वह उत्कृष्ट तप स्वाध्याय से सम्भव है, स्वाध्याय से ध्यान का अभ्यास करना चाहिए और ध्यान से स्वाध्याय को चरितार्थ करना चाहिए।
ध्यान
सौ का नोट मैला भी हो, तो सौ में ही चलेगा, पर पाँचसौ का नया नोट हो, लेकिन गर्वनर के हस्ताक्षर न हों, तो पाँच रुपये में भी नहीं चलेगा, पकड़ा जावेगा तो जैल होगी इसी प्रकार अरहन्त की मुहर जिसमें लगी है, वही शास्त्र सत्य है।
धर्म
ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती के चार हाथ हैं जिनमें क्रम से वीणा, शास्त्र, माला और आशीर्वाद के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं जिनसे हमें निम्न लिखित सीख प्राप्त होती है- 1.कम बोलो, काम का बोलो, 2.मीठा बोलो, 3.धीरे बोलो, 4.जरुरत होने पर बोलो। 2.शास्त्र से-ज्ञानी, करे कर्म की हानि। 3.माला से मौन एवं मन साधा जाता है, कायक्लेश तप की साधना होती है, पञ्च परमेष्ठी की भक्ति होती है, ध्यान की साधना होती है। 4.आशीर्वाद सबको अभयदान करना, सब जीवो पर मैत्री भाव करना, हथेली की तरह सबके प्रति साफ़ दिल होना, हमेशा शत्रु पर भी प्रसन्न होना सिखाता है।
ज्ञान
रामचन्द्र जी बाल्यावस्था में पानी में चन्द्रमा को देखकर उसे पकड़ कर खेलना चाहते थे, नहीं पकड़ पाने पर रोने लगे, पूँछा क्यों रोते हो? मन्त्री ने कहा चन्द्रमा चाहिये, राजा ने कहा! ले आओ चन्द्रमा को, मन्त्री ने दर्पण रख दिया, उसमें बिम्ब पड़ा देखकर, रामचन्द्रजी प्रसन्न हो गये, दर्पण छाती से चिपका कर खेलने लगे, इसी प्रकार ज्ञानज्योति को पाकर ज्ञानी प्रसन्न होता है।
ज्ञान
दो प्रकार का ज्ञान-मुख का ज्ञान- 'शरीर अलग है आत्मा अलग है' पाठ कर लेते हैं। ह्रदय का ज्ञान- सुकुमाल स्वामी ने 'शरीर अलग है आत्मा अलग है' ऐसा चिन्तन करते हुए सियालनी को भगाया नहीं और सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग गए।
ज्ञान
गणेश प्रसाद वर्णीजी ने धर्म माता चिरोंजाबाई जी से कहा! हम शास्त्रपढ़ने नहीं जायेंगे, कुछ लोग आते हैं सोते रहते हैं, बाई जी ने कहा सारा कुँआ छानलोगे तो जिवानी कहाँ डालोगे? सभी लोग मोक्ष जानेवाले नहीं हैं, एक का भी कल्याण होता है, तो अच्छा है।
धर्म
साढ़ूमल में पण्डित हीरालालजी शास्त्री रोज प्रवचन करते थे, एक व्यक्ति रोज प्रवचन सुनता था, पर गरीब था, अत: अपने घर से पाँचवे घर में चोरी करने गया, पर पाप के डर से, इसमें कम पाप लगेगा ऐसा मानकर एक बोरा भूसा की चोरी की, बोरा फटा था, तो भूसा वहाँ से घर तक गिरता रहा ध्यान नही दिया, लाइन बन गयी, सुबह लोगों ने देखा तो वह पकड़ा गया, पञ्चायत हुयी, पूछा तुमने चोरी की है, उसने कहा! हाँ की है, क्यों की है? तब कहा! हम तीन दिन से पानी में आटा घोलकर पीकर दिन निकाल रहे हैं, हमारा बेटा तीन दिन से दूध मांग रहा है उसको कब तक दूध के स्थान पर पानी में आटा घोलकर पिलाते रहेंगे? हमने सोचा एक बोरा भूसा चार आना में बिकेगा, तीन-चार दिन दूध आयेगा, फिर आगे देखेंगे, क्योंकि पण्डित जी रोज प्रवचन में कहते हैं ज्यादा आसक्ति नहीं रखना चाहिये, प्रवचन सुनने का यह परिणाम था।
अनासक्ति
एक महिला सिनेमा के पर्दे पर आन्धी-तूफान-वर्षा देख कर सोचने लगी, मेरे छत पर कपड़े सूख रहे हैं वे उड़ जायेंगे और भींग जायेंगे, उन्हे चलकर उठा लूँ, वह सिनेमा घर से उठकर शीघ्रता से घर की ओर चल पड़ी, शीघ्रता के कारण एक मोटर से टकराई और मरगई, उसी प्रकार संसारी प्राणी नकली को असली समझ कर भ्रम बुद्धि से दु:खी होते हैं।
विवेक
एक सज्जन अत्यन्त गरीब थे, एक दिन बाजार से गुजर रहे थे, कोई व्यक्ति अत्यन्त उपयोगी दो पुस्तकें बेच रहा था, उसके पास पैसे नहीं थे, उधार देने को वह तैयार नहीं हुआ, अत: अपना कुर्ता गिरबी रख कर वे पुस्तकें खरीद लाये, चार छह दिन बाद जब पैसे आये तब कुर्ता बापस ले आये, क्या हम में ऐसी ज्ञान की ललक है? उन्होंने कुर्ता को नहीं, ज्ञान को कीमती समझा, हम धन रखने के लिए तिजोरियाँ खरीदते हैं, कार के लिये गैरिज बनवाते हैं, ड्राइवर रखते हैं, क्या कभी तत्त्व ज्ञान की पुस्तकें खरीदतें हैं व शास्त्रों के लिए अलमारी खरीदते हैं?
ज्ञान
मेले में बेटा गुम गया, पुलिस ने मेन गेट पर खड़ा कर दिया, अब जिस प्रकार बेटे को माँ को ढूँढ़ने की ललक है, हमें आत्मा को ढूँढ़ने की ललक होनी चाहिए अन्यथा जीवन की शाम में क्या होगा?
विवेक
पहली मूर्ति एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकाल देती थी, दूसरी मूर्ति कान से सुनती और देखकर मौन हो जाती, तीसरी मूर्ति कान से सुनती और मुँह से बता देती, चैथी मूर्ति कान से सुनती और ह्रदय में धारण कर लेती, इसलिए उनकी कीमत क्रमश: एक-दो-तीन-चार हजार थी, हम कौन सी और कितनी कीमत की मूर्ति हैं स्वयं पहचाने।
विवेक
बच्चे को गुलाबजामुन में रखकर दवा खिलाने की कोशिश की, माँ ने कहा बेटागुलाब जामुन खा लेना, मैं आ रही हूँ, और आकर पूछा! बेटा गुलाब जामुन खा ली? बच्चा बोला हाँ माँ गुलाबजामुन खा ली, गुठली बाहर थूक दी, उसी प्रकार लोग ख्याति पूजा लाभ की गुलाबजामुन खा लेते हैं, तत्त्वाभ्यास की गुठली थूक देते हैं।
विवेक
सेठ ने दो विद्वानों को प्रवचनार्थ बुलाया और अलग-अलग एक-दूसरे का परिचय पूछा, एक ने कहा वह पक्का बैल है, दूसरे ने कहा वह पक्का गधा है, सेठजी ने भोजन के समय दोनों को घास-भूसा का भोजन परोस दिया, विद्वानों के पूँछने पर सेठजी ने कहा! आप लोगों ने जैसा परिचय दिया वैसा हमने भोजन परोस दिया, दोनों विद्वान् लज्जा से नतमस्तक हो गए और ईर्ष्या छोड़ दी।
विनम्रता
तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न करना, उसका ज्ञान कराना और सदाचार मय जीवन होना जैसे- पञ्चतन्त्र में एक राजा के पाँच सौ मूर्ख लड़के थे, राजा ने घोषणा करा दी कि जो मेरे बेटों को विद्वान बनायेगा, उसे आधा राज्य और कन्या दी जायेगी 'विष्णुशर्मा' ने बच्चों को 'काव्य शास्त्र विनोदेन' इस कहानी के वाक्य से पढ़ाना शुरू किया, उसी प्रकार शिक्षक कहानी से पढ़ाना शुरू करे।
ज्ञान
एक राजा की चोरी हो गयी, मन्त्री को एक सेठ पर द्वेष के कारण शक था, मन्त्री ने कहा इसने चोरी की होगी, निर्णय हुआ कि चोर के हाथ में अग्नि का गोला दिया जाय जो जलेगा वह चोर कहलायेगा, सेठ के सामने बड़ी विपत्ति आ गयी, अग्नि में तो सब जलेंगे चाहे चोर हो या साहूकार, किसी ने सलाह दी तुम हाथ में काठ रखलेना वह कुछ कहे तो कहना तुम हाथ से दो तो मैं हाथ में लूँगा, तुम सण्डासी से दोगे तो मैं काठ पर लूँगा, इसी तरह शिक्षक जैसा पढ़ायेगा विद्यार्थी वैसा ही बनेगा, क्योंकि विद्यार्थी शिक्षक का आचरण सीखता है।
ज्ञान
सम्मइ सूत्र के कर्ता आचार्य सिद्धसेन बहुत बड़े वादी थे, नगर-नगर में जाकर वाद करते थे और जीत लेते थे, एक बार एक नगर में गये, पता लगा यहाँ कोई अत्यन्त निपुण वादी है, अभी जङ्गल गया है, सिद्धसेन जी जङ्गल चले गये जैसे-तैसे उसको ढूँढ़ लिया, सिद्धसेनजी ने कहा हमसे वाद करो, उसने कहा भाई राजा के सामने वाद करना ठीक है नहीं तो निर्णय कौन करेगा, सिद्धसेनजी नहीं माने बोले ग्वालों को बुलाओ गाय श्रोता होगीं ग्वाले जज होंगे, ऐसा ही किया, सिद्धसेनजी दो घण्टे तक संस्कृत में बोलते रहे, ग्वाले संस्कृत क्या जानें? प्रतिवादी आया उसने बढ़िया नाचना गाना प्रारम्भ किया, सब ग्वाले प्रसन्न हो गये, तब सिद्धसेनजी ने कहा भैया तुम जीते हम हारे, 'वक्ता को द्रव्य, क्षेत्र, काल का जानने वाला होना चाहिए'।
वाणी
मूर्ख बेटे से पिता ने बार-बार कहा कि तू व्यापार नहीं कर सकता, न मजदूरी न भीख माँग सकता है, अत: वेद पढ़ेविना तेरा जीवन बेकार है, वह घर से भागा गङ्गा किनारे जाकर बैठ गया, बोला हे गङ्गा मैया जब तक मैं विद्वान नहीं बन जाऊँगा तब तक आहार जल का त्याग है, कई दिन हो गये, इन्द्र का आसन कम्पायमान हुआ, इन्द्र ने अप्सराओं को भेजा, अप्सराएं विप्र का वेश बनाकर मुट्ठी में रेत भरकर गङ्गा में फेंकने लगी, लड़के ने देखा पूछा ये क्या कर रही हो? अप्सराओं ने कहा हमें गङ्गा पार जाना है इसलिये पुल बना रहे हैं, उसने कहा ऐसे पुल नहीं बनता तो अप्सराओं ने कहा उसी प्रकार कोई भोजन छोड़कर विद्वान नहीं बनता अक्षर-अक्षर रटता पढ़ता है।
पुरुषार्थ
कैसे अदा करेंगे उपकार हम तुम्हारे, हम तो बने सितारे, गुरु आपके सहारे। तन को रचा सम्हारा माता-पिता ने मेरे, जीवन सम्हारा तुमने, भर ज्ञान उर में मेरे।।कैसे।। तुम देवता से बढ़कर, मेरे लिये हो गुरुवर, चरणों में शीश मेरा है गुरु जी तुम्हारे।।कैसे।। जब तक है हम जमीं पर, विस्मृत न कर सकेंगे, पथ के प्रदीप मेरे, गुरुदेव हो सहारे।।कैसे।। तुमसे मिला है सब कुछ, तुम को क्या भेंट दूं मैं, सूरज के आगे जुगनू की बात क्या करुं मैं।।कैसे।। जीवन सजाने वाले बस इतनी आरजू है, नजरे न मोड़ लेना दर से कभी हमारे।।कैसे।।
भक्ति
एक बार पड़ोसन ने सास से पूँछा आपके घर की शान्ति का राज़ क्या है? सास ने कहा हमारी बेटी शक्कर है और बहु नमक के समान है, बहु ने सुना तो उसके व्यवहार में अन्तर आ गया, सास ने बहु से पूछा! बेटा क्या तुम्हारा स्वास्थ्य खराब है? बहु ने कहा कुछ नहीं हम तो पराये घर से आए हैं इसलिए नमक के समान हैं, और आपकी बेटी शक्कर के समान है, तब सास ने कहा! हमारा अभिप्राय यह था कि जैसे शक्कर पर्व के दिनों में विशेष रूप से काम आती है, उस प्रकार बेटी का कभी-कभी सुख मिलता है, किन्तु जैसे नमक प्रत्येक पदार्थ में काम आता है, वैसे ही हमारी बहु है, तब बहु प्रसन्न हुई, सही ज्ञान के अभाव में झगड़ा होता है।
परिवार
संसारी प्राणी गुरु से पूँछता है सुख कहाँ है? गुरु कहते हैं हमने अभी मगर को बताया है, उससे पूँछ लो, वह मगर से पूँछने गया, मगर ने कहा पहले हमें पानी पिला दो प्यास लग रही है, वह मनुष्य हँसता है कि पानी में रहकर भी प्यासा है, मगर भी कहता है, कि तुम भी हँसी के पात्र हो, सुख आत्मा का स्वभाव है तुम सुख को बाहर ढूँढ़ते हो। ज्यों तिली में तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा प्रभु तुममें बसे, जाग-जाग रे जाग॥
ध्यान
परेशानी में एकदम प्रतिक्रिया न करें- उत्तेजित अवस्था में मन की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है, लोगों के माँगने पर ही अपनी सफाई दीजिए, अपने निर्दोष होने को लोगों पर थोपिये नहीं, सलाह या उत्तर देते समय आपकी आवाज हमेशा नम्र, आदर पूर्ण और नियन्त्रित होनी चाहिए, आपकी चाहे कितनी भी आलोचना की जाए या दोष लगाया जाय, आपको कभी अनियन्त्रित तरीके से व्यवहार नहीं करना चाहिए और जबाव देते समय कभी चीखना या चिल्लाना नहीं चाहिए।
क्षमा
दूसरों की सन्तुष्टि से पहले आत्म सन्तुष्टि होना चाहिए- ध्यान रखिये आपके लिए यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप अपने सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, बजाय इसके कि दूसरे आपके सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, आपके बारे में दूसरे का निर्णय आवश्यक नहीं कि सही हो, क्योंकि निर्णय उसके मानसिक स्तर के अनुसार होता है, इसकी चिन्ता किये विना कि दूसरे आप के बारे में क्या विचार रखते हैं, सदा सरल-सुन्दर जीवन शैली से जीवन जीते हुए अपनी स्वभाविक स्थिति में रहिए और दूसरों को कृत्रिम रूप से प्रभावित करने का प्रयत्न मत कीजिए, आप जो नहीं है वैसा दिखाने का प्रयत्न करना मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण होता है।
संतोष
लालसा और इच्छाओं पर नियन्त्रण- भौतिक इच्छाओं और इन्द्रिय सुखों से प्राप्त तृप्ति अस्थायी और पीड़ा से युक्त होती है, हम इन क्षणिक सुखों से अधिक ऊँची किस्म की प्रसन्नता के अधिकारी हैं, जो स्थायी और सन्तोष जनक है, आवश्यकताएँ और आराम देने वाली मूल वस्तुएं जीवन को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं तथा प्रकृति से प्राप्त होने वाला सुख सात्विक है, जबकि इच्छाओं में तामसिक व राजसिक सुख गर्भित है अपने विकास और जीवन के सत्यों को जानने की इच्छाएं अच्छी इच्छाएं हैं।
अनासक्ति
छोटी-छोटी बातों पर परेशान मत होइये- उदार मन के बनिये, छोटी-छोटी बातों का बतङ्गड़ न बनाइये, भूलने और क्षमा करने के गुणों का विकास कीजिए, छोटी-छोटी बातों पर बिगड़ने से केवल आपके झूठे अहङ्कार को सन्तोष मिलता है।
क्षमा
अहम् त्यागिये- आपके विना भी संसार चल सकता है, संसार रूपी इस महान विद्यालय में कुछ प्रशिक्षण पाने के लिए आपका एक अस्थायी पड़ाव है, कोई महान कार्य करके आप मूल रूप से स्वयं अपनी सहायता कर रहे हैं, संसार की नहीं।
विनम्रता
बाह्य परिस्थितियों में तनाव पैदा करने की शक्ति नहीं- मानसिक तनाव बाह्य परिस्थितियों के कारण नहीं होता, बल्कि आपकी उनके प्रति प्रतिक्रिया के कारण होता है, आप अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को इस सीमा तक नियंत्रित कर सकते हैं कि बाहरी दुनिया में कुछ भी घटित होता रहे, पर आप पर उसका कोई प्रभाव न पड़े, इससे 'मन' दूसरों के आघातों से प्रभावहीन व स्वतन्त्र बनता है।
मन
अप्रिय घटनाओं से घबराइये मत- जब तक हम उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर नहीं समझें तब तक वे घटनाएं हमें विचलित नहीं कर सकतीं। शान्ति पूर्वक हर चीज को स्वीकार कर उसका सामना किया जा सकता है। किसी दुःखद घटना पर जरूरी ध्यान देना और उसके हानिकारक प्रभावों से बचने के लिए उपाय करना बिल्कुल अलग बात है, लेकिन जरूरत से ज्यादा चिन्ता करने और परेशान होने से समस्या खड़ी हो जाती है। यदि आप चीजों को कुछ दूर से देख सकें तो पायेंगे, कि वे चीजें उतनी भयानक नहीं है जितनी आपने उन्हें झूठे नजरिये से कल्पना करने पर पाया था।
मन
चीजों को त्यागना सीखिए- वास्तव में सच्चाई यह है कि खुशी चीजों को एकत्रित करने में नहीं वरन त्यागने अर्थात् उनका मोह छोड़ने में है। आप जब अपने को किसी विशेष चीज से जोड़ लेते हैं या आसक्त हो जाते हैं, तो आपके विचारों और कार्यों की स्वतन्त्रता खत्म हो जाती है। इससे आप सच्चाई को उस रूप में नहीं देख पाते हैं जैसी कि वह है और सच्चाई का वह अज्ञान कष्ट और विसङ्गति पैदा करता है।
अनासक्ति
क्या आप अपने को अकेला और ऊबा हुआ महसूस करते हैं? आध्यात्मिक शब्दावली में अकेला व्यक्ति वह है जिसे आत्मज्ञान नहीं है और जो स्वयं सत्य का सामना नहीं कर सकता है, केवल ऐसा ही व्यक्ति दूसरी वस्तुओं और व्यक्तियों के पीछे भागता है, ताकि वह अपने मन को स्वस्थ रख सके। जब उसके पास अपने मन को व्यस्त रखने के लिये कोई व्यक्ति या वस्तु नहीं होती है, तो वह ऊबने लगता है, 'वह यह अनुभव नहीं करता कि अपने ध्यान को अपने अन्दर केन्द्रित करके विना किसी वस्तु के भी खुशी पायी जा सकती है।' ऐसा व्यक्ति जो आत्मा में उपस्थित है अपने उस आन्तरिक आनन्द और शान्ति को पाने में सफल रहता है। यदि आप अकेले नहीं रह सकते तो इसका अर्थ है कि आपके मन में शान्ति नहीं है, जिस शान्ति को आप पाने के लिए बेचैन हैं, वह तभी मिल सकती है जब आप अपने साथ मित्रता कर लें, और देर सबेर आपको ऐसा करना ही पड़ेगा। अपने आप से भागना शान्ति की राह नहीं, इससे केवल शान्ति पाने में देर लगती है।
ध्यान