Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 21 / 41

परिस्थितियों के साथ सामञ्जस्य और समझौता करना सीखिए- विसङ्गतियाँ प्राणियों के कर्मानुसार बनती हैं, हमारी इच्छानुसार नहीं बन सकती हैं, अतः हम जिन चीजों को नियन्त्रित और परिवर्तित नहीं कर सकते हैं, उनके अनुसार अपने को ढालना और उनसे समझौता करना सीखना चाहिए।
विवेक
दूसरों को प्रभावित करने के चक्कर में मत पड़िए- दूसरों को प्रभावित करने के प्रयत्न और उससे खुशी पाने के चक्कर में आप अपनी प्रसन्नता की कुञ्जी अपरोक्ष रूप से दूसरों को सौंप देते हैं। कोई भी कार्य मुख्य रूप से आत्म सन्तोष पाने की दृष्टि से करना चाहिए। दूसरों की सराहना का इन्तजार नहीं करना चाहिए।
संतोष
अपनी समस्याओं व कठिनाइयों का विज्ञापन मत करिये- मानव की प्रकृति के अनुसार कोई भी आपकी समस्याओं में दिलचस्पी नहीं रखता, हर एक व्यक्ति सिर्फ अपनी समस्याओं में रुचि रखता है। आपकी समस्याएं सुनकर सामने वाला ऊब जायेगा या अपने से अधिक परेशान समझकर क्षणिक सन्तोष का अनुभव करेगा। आपकी मानसिक कमजोरी या बचपना समझेगा। अपनी समस्याओं का हल किसी समझदार से लीजिए। लगातार शिकायत व नोंक-झोंक से बचिए। विना पूँछे ज्यादा स्पष्टीकरण और सफाई न दीजिए। लोग अपनी मानसिकतानुसार जो सोचते हैं, सोचने दीजिए।
वाणी
सहनशीलता का विकास कीजिये- सहनशीलता सबसे महान गुण है, अपने प्रति कठोर बनें जबकि दूसरों के दोषों तथा कमियों के प्रति उदार, दूसरों के अपराधों को भूलने और क्षमा करने से मन और चेतना शक्तिशाली और शुद्ध बनती है, एक सहनशील व्यक्ति सभी सीमाओं को पार कर किसी भी ऊँचाई पर पहुँच सकता है।
क्षमा
हर विषय में न उलझें- एक विषय के ही विशेषज्ञ बनें, सांसारिक विषयों के ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, किसी भी व्यक्ति द्वारा हर चीज का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है, इसलिए केवल एक विषय के विशेषज्ञ बनिए और उसी से संसार की सेवा कीजिए, दूसरे क्षेत्रों में आम व्यवहार के लिए सामान्य ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, हमारा लक्ष्य आत्मज्ञान पाना है, संसार चलाना नहीं।
ज्ञान
खोजिये अपनी महान कमजोरी- अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को ढूँढकर और उसमें अपेक्षित सुधारकर व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा हो सकता है, जहाँ की एक गञ्जे व्यक्ति को भी कङ्घी खरीदने के लिए मजबूर कर सकता है।
पुरुषार्थ
रुचि के चयनित क्षेत्र में प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य कीजिए, पत्रिकाएँ पढ़िए, व्यवहारिक प्रयोग कीजिये, जो आपके लिए तो लाभप्रद हो, साथ ही आपके समाज एवं राष्ट्र के गौरव में भी अपना कुछ योग दान दे सकें, तभी आप सिर ऊँचा उठाकर गर्व की अनुभूति कर सकेंगे।
पुरुषार्थ
वही जीवन सही अर्थों में सौभाग्य शाली है, जिसने मात्र स्वयं के बारे में नहीं सोचा वरन् समस्त समाज के लिए अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है, अपने जीवन में ऐसे पुष्पों की फुलवारी सजाइये जिसकी सुगन्ध मात्र आपके घर की चारदीवारी तक ही सीमित न रहे बल्कि आसपास को भी लाभ दे सके।
चरित्र
आत्म विश्वास हो आपकी नींव- आत्म विश्वास वह सञ्जीवनी बूटी है, जो व्यक्ति के घोर तम निराशा जन्य, मरणासन्न हृदय में भी नवीन जीवन सञ्चार करने की क्षमता रखती है, आत्म विश्वास ही आपकी वह नींव है जिसका सम्बल पाकर आप विश्व विजय जैसा अति महत्त्वाकाङ्क्षी स्वप्न देखने का भी साहस कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
अपनी कमजोरियों की कभी भी अन्य व्यक्ति के शक्तिशाली बिन्दुओं से तुलना न करें, बल्कि आप ही श्रेष्ठ हैं, यह धारणा अपने मन में अमिट बनाइए। अपनी कमियों एवं अक्षमताओं को अधिक महत्त्व न दीजिए, बल्कि उनमें गुणात्मक सुधार करने का प्रयास जारी रखिए।
पुरुषार्थ
आप सफल तभी बनते हैं जब आप भी उस सङ्गठन का एक हिस्सा बन जाते हैं, उसके कार्यों में बढ़कर हाथ बँटाते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि आप मात्र हाथ बाँधे ही न खड़े रहें और अन्य लोग सङ्गठन के कार्यों को करते हुए वहाँ उपस्थित जनसमुदाय के आकर्षण का केन्द्र बन जायें। उन कार्यों को करने का अनुभव अर्जित कीजिए, यही अनुभव आपकी सफलता को शीघ्रता प्रदान करता है।
पुरुषार्थ
जहाँ चाह वहाँ राह- एक बार में मात्र एक ही कार्य करें और उसकी सफलता के लिए पूरी लगन, सम्पूर्ण साधन और सम्पूर्ण शक्ति लगा दें। आकांक्षा पूर्ति में सर्वाधिक सहायक साहित्य का अध्ययन करें। जो भी पढ़ें पूरे मनोयोग से धीरे-धीरे बड़े ही मनन पूर्वक और प्रत्येक वाक्य को आत्मसात करते हुए पढ़िए एवं उद्देश्य पूर्ण रुचि अपनाइए।
पुरुषार्थ
छोटे बच्चों को भी मित्र बनाइए- अपने अवकाश के समय में कुछ क्षण छोटे बच्चों के साथ रहने के लिए भी सुरक्षित रखिये, इनके साथ खेलने का आनन्द उठाइए। ये आनन्द के सागर हैं। इनकी मीठी-मीठी बातें, तुतलाती बोली, लड़खड़ाते शब्द, आपको आनन्द के सागर में डुबो देंगे। इनकी निश्छल जीवन शैली आपको प्रत्येक वस्तु के प्रति एक न एक दृष्टिकोण से परिचित करायेगी। इनके अजीवों-गरीब प्रश्न आपको अधिक गहराई से सोचने पर मजबूर कर देंगे।
संगति
विनम्र बनें- सबसे अधिक महान व्यक्ति वह है जो सबका सेवक है, महान व्यक्ति जैसे-जैसे अधिक धन, सम्मान, शक्ति, प्रतिष्ठा पाते हैं, वैसे-वैसे अधिक विनम्र बनते जाते हैं, अहङ्कार करना अविकसित व अस्वस्थ मन की निशानी है, घमण्ड और अक्खड़पन से व्यक्ति निश्चय से पतन की ओर जाता है, वास्तविक महानता गुणों और विशेषताओं से आती है न कि पद या धन से, वही शासन करने योग्य है, जो मुकुटको विना इच्छा के पहनता है।
विनम्रता
अपने निर्णय स्वयं लें- आप दूसरों से सलाह ले सकते हैं, लेकिन अन्तिम निर्णय खुद का होना चाहिए, महान बनने के लिए आपको अपने जीवन में एक न एक खाई खुद ही पार करनी पड़ेगी, किसी न किसी दरवाजे से आपको अकेला ही निकलना होगा।
विवेक
आप असहमत हो या सहमत जब लोग बोल रहें हों, तो उनके बीच में टोकने की प्रवृत्ति को रोकिए, चाहे वह चीज आप पहले से जानते हों या नहीं। ध्यान से और पूरी तरह सुनिये अपनी बारी आने पर ही बोलिये। एवं क्रोध किये विना असहमत होना सीखिए।
वाणी
जब निंदा करने का अवसर आये तो अपनी जुबान बन्द रखिए, दूसरों को सदैव गलत मत समझिए, निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों को सुन लीजिये, ये छोटी-छोटी बातें समय पर बहुत प्रभाव डालती हैं।
वाणी
सत्ता और शक्ति के पीछे भागें नहीं, उनको अपने आप आने दें, महानता सदैव अपने प्रयत्नों से प्राप्त की जाती है, यह किसी को उपहार में बहुत कम मिलती है। निषेध में आकर्षण होता ही है।
अनासक्ति
आँसू न बहाइये दुर्भाग्य पर- चींटियाँ कभी आँसू नहीं बहातीं, बल्कि पुरुषार्थ करके सफलता प्राप्त करती हैं, तराजू के एक पलड़े पर अरबों चींटियां दूसरी ओर मनुष्य, अर्थात् मनुष्य में अरबों चींटियों से ज्यादा बल है।
पुरुषार्थ
आप जो भी देते हैं, वह कई गुना होकर आपके पास वापस आता है, सलाह दें या भावना दें, यदि वापस कभी नहीं भी मिलते हैं तो आत्म सन्तोष का परम सुख दायक उपहार आप प्राप्त करते हैं।
दान
वह कौन सी गति है जो सैकड़ों बार प्राप्त न हुई हो, वह कौन सा सुख है जिसे पहले अनेक बार न भोगा हो और वे कौन सी लक्ष्मियाँ हैं जो अनेक बार प्राप्त न हुई हों, हे मन! फिर भी तुम्हारी इच्छायें बढ़ती जा रही हैं।
अनासक्ति
राजा का नाश खोटी मन्त्रणा से, मुनि का नाश परिग्रह से, कुल का नाश कुपुत्र से, लज्जा का नाश शराब से, स्नेह का नाश प्रवास से, समृद्धि का नाश अन्याय से, बालक का नाश लाड़-प्यार से, व्रतों का नाश अध्ययन नहीं करने से, ब्रह्मचर्य का नाश कुसङ्गति से, खेती का नाश देख-रेख न करने से, मैत्री का नाश स्नेह नहीं करने से, एवं धन का नाश आलस से हो जाता है।
विवेक
मोक्ष को प्राप्त कराती है वह विनय है, विनय से सब प्रकार के कल्याण नियम से प्राप्त होते हैं, 'विद्या ददाति विनयं' जब सामान्य विद्या विनय को देती है तो जिनवाणी के अध्ययन से तो विनय आना ही चाहिए, क्योंकि जिनवाणी में सद्गुणों का ही कथन है, मनुष्य पर्याय का सार जिन मुद्रा धारण करना है, जिनवाणी की शिक्षा सम्यक् विनय से समाधि आदि गुण प्राप्त होते हैं, विनयसम्पन्नता, विनयतप, मार्दव धर्मादि प्राप्त होते हैं।
विनम्रता
जो व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किये विना पदार्थों का विवेचन करना चाहता है, वह चन्द्रमा का चुम्बन करना चाहता है, सूर्य को ग्रहण करना चाहता है, चन्द्र और ताराओं से सहित आकाश को आच्छादित करना चाहता है और भुजाओं से अपार गहरे समुद्र को तैरना चाहता है।
ज्ञान
समस्याओं और कठिनाइयों का स्वागत करें- आप जीवन की प्रत्येक समस्या से शिक्षा और लाभ ले सकते हैं, और उससे अपने व्यक्तित्त्व का विकास कर सकते हैं। प्रत्येक सङ्कट और कठिनाई में अपने आप से पूछिये कि यह समस्या मुझे क्या सन्देश देती है तथा इससे मैं क्या लाभ उठा सकता हूँ? समस्या का सामना करने के बाद आपको पहले से अधिक बुद्धिमान और परिपक्व बनकर निकलना चाहिए। जीवन में जो भी बात आपके साथ घटित होती है वह अच्छाई के लिए होती है।
विवेक
हर बात का कोई न कोई कारण अवश्य होता है, अचानक कुछ नहीं होता। कर्मों के बन्धन से मुक्त होने के लिए सफलता-असफलता, लाभ-अलाभ, निन्दा-प्रशंसा में अपने मन को सन्तुलित रखिए। कोई घटना या प्रसङ्ग इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि उसके प्रति आपकी मानसिक प्रतिक्रिया या दृष्टिकोण होता है। संसार न अच्छा है न बुरा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं यह आपकी मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। जो आपके अन्दर है वही बाहर भी दिखाई देता है। प्रयोगों से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि विकास उन्हीं से होता है।
कर्म
धृतराष्ट्र ने मुनिराज से पूँछा मेरी आँखों के सामने मेरे सौ पुत्र मारे गये क्या कारण है? मुनिराज ने कहा कि तीन भव पूर्व तुमने सर्पिणी के सौ बच्चे मारे थे, यह उसका फल है।
कर्म
दुनिया में जितने धर्म हैं सभी ने जीना सिखाया, लेकिन जैन धर्म की विशेषता है कि उसने जीने के साथ मरना भी सिखाया है। राम-कृष्ण जीवन सुधारते हैं, तो महावीर मृत्यु भी सुधारते हैं, मृत्यु भी आदमी की परीक्षा है। घर में कैसे जीना राम से सीखिए, कैरियर कैसे बनाना यह कृष्ण से सीखिए और मरण को सुमरण कैसे बनाना है यह महावीर से सीखिए।
समाधि
वर्तमान के षडावश्यक- लोग देवपूजा नहीं डॉक्टर पूजा करते हैं, मन्दिर परिक्रमा नहीं अस्पताल की परिक्रमा करते हैं, गुरु उपासना नहीं टी.वी. की उपासना करते हैं, स्वाध्याय के नाम पर समाचार पत्र पलटाते हैं, संयम जेल या अस्पताल में करते हैं, तप पैसा कमाने के लिए मेले में या बाज़ार में धूप में बैठकर करते हैं, दान के नाम पर टेक्स या घूस देते हैं।
धर्म
भरतचक्रवर्ती की अपेक्षा राम के भाई भरत ज्यादा अच्छे हैं, क्योंकि उनको सिंहासन मिला पर बैरागी रहे, भरतचक्रवर्ती ने साठ हजार वर्ष दिग्विजय में ही गंवा दिये।
अनासक्ति