Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 19 / 41

जो मनुष्य को ठगने में चतुर, दूसरों से प्रेम करने वाली, पाप युक्त तथा कपट आदि सैकड़ों दुर्गुणों की खान ऐसी वेश्या नरक का घर होती है।
चरित्र
जो वचन द्वारा मुनियों का अनादर करते हैं, वे दूसरे भव में गूंगे होते हैं जो मन से अनादर करते हैं उनकी स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है, जो शरीर से तिरस्कार करते, उन्हें ऐसे कौन से दुःख हैं, जो प्राप्त नहीं होते हैं?
वाणी
गुरुओं के दर्शन न करने से सम्यक्त्व की हानि होती है, गुरुओं की आज्ञा भंग करने से आराधना की हानि होती है, समय पर प्रतिक्रमण न करने से व्रत की हानि होती है, साधर्मी की परस्पर वैय्यावृत्ति न करने से धर्म तीर्थ की हानि होती है, तप न करने से निर्जरा की हानि होती है, क्रोध-क्लेश करने से स्नेह की हानि होती है, मान करने से पुण्य की हानि होती है, मायाचार करने से पुण्य और यश की हानि होती है, लोभ से शान्ति की एवं स्त्री की आकांक्षा से ब्रह्मचर्य की हानि होती है।
धर्म
प्रशंसा के समय अध्यात्म दृष्टि रखने वाला प्रशंसा के अभाव में दुःख न पावेगा, अपनी प्रशंसा में रुचि होना पुण्य विनाश करना है और पाप को बुलाना है व संसार में भटकने के लिए अमंगल करना है।
चरित्र
जिसे आगे स्वप्नवत् मालूम करना पड़ेगा उसे वर्तमान में स्वप्नवत् समझो तो महती शान्ति प्राप्त होगी, इष्ट समागम में हर्षभाव की तपस्या करने वालों के अनिष्ट समागम में विषादाभाव की तपस्या करना सरल है।
अनासक्ति
यदि किसी ने धक्का मार दिया या उपसर्ग कर दिया तो हजारों लोग आ जायेंगे किन्तु परिणाम कलुषित हुए, जो विचारों का उपसर्ग अन्दर चल रहा है उससे सगा भाई भी नहीं बचा सकता है, आपको निज भावों की रक्षा स्वयं करनी है।
मन
कोई भी चालक गाड़ी को गड्ढे में गिराना नहीं चाहता है, खराब होने पर सुधार कर आगे बढ़ाता है उसी प्रकार साधक व्रत में दोष लगाना नहीं चाहता है लग जाये तो प्रतिक्रमण, प्रायश्चित लेकर मोक्षमार्ग में आगे बढ़ता है।
चरित्र
सिंह भले ही भूख से दुर्बल हो, प्यास से पीड़ित हो, शरीर से शिथिल हो, कष्टमय अवस्था में हो, प्राण नष्ट हो रहे हों फिर भी जीर्ण तृण को नहीं खाता है, उसी प्रकार सच्चा साधु कितना ही कष्टमय जीवन व्यतीत करे किन्तु अपने व्रतों में दोष नहीं लगाता है।
चरित्र
साधना का लक्ष्य है वासनाओं का नाश करना और सद्वृत्तियों का विकास करना/वासनाओं के नष्ट होते ही दिव्य भावों से हृदय परिपूर्ण हो जायेगा, हृदय में दिव्य भावों के प्रवेश करते ही समस्त दुर्बलताएँ भाग जायेंगी।
संयम
दुनिया में सर्वोत्तम दिन है–आज, अच्छे काम के लिए सबसे उपयुक्त समय है–अभी। व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल है–समय की बर्बादी। दोस्ती में सबसे बड़ी बाधा है–अधिक बोलना। दुनिया में सबसे बुरी भावना है–ईर्ष्या। दुनिया में सबसे बड़ा दिवालियापन है–निरुत्साह होना। दुनिया का खूबसूरत पौधा प्रेम का जो जमीन पर नहीं दिल में उगता है।
समय
मिलते हैं हजारों लोग, पर हजारों गलतियाँ माफ करने वाले माँ-बाप दुबारा नहीं मिलते हैं। लोगों से कह दो हमारी तकदीर से जलना छोड़ दें क्योंकि हम घर से दवा नहीं माँ की दुआ लेकर चलते हैं।
परिवार
देखो सच्चा प्यार! जब पति ने अपना पसीना पत्नि के दुपट्टे से पोछना चाहा तो पत्नि बोली दुपट्टा गंदा मत करो। जब माँ के दुपट्टे से पोछना चाहा तो माँ बोली ये गन्दा है साफ लाके देती हूँ।
परिवार
आप जो हैं उसका बहुत कम श्रेय आपको जाता है और याद रखें अगर लोग चिड़चिड़े, तार्किक या पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं तो इसमें उनका दोष भी बहुत कम है, अतः उनके साथ सहानुभूति रखिये और स्वयं से कहिए यदि मुझ पर ईश्वर की कृपा न होती तो मैं भी इसकी जगह पर हो सकता था इसलिए सामने वाले व्यक्ति के विचारों और इच्छाओं के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करें क्योंकि पूरी मानव जाति सहानुभूति चाहती है, बच्चा अपनी चोट दिखाता है और यदि उसे चोट न भी लगी हो तो वह जानबूझकर चोट लगा लेता है, जिससे उसे सहानुभूति मिल सके, महिलायें तो अत्यधिक सहानुभूति की भूखी रहती हैं और जब उन्हें सहानुभूति नहीं मिलती तो अक्सर बीमारी का बहाना बनाकर लेट जाती हैं जिससे पति दुकान आदि से आकर सिर के पास बैठकर पूछता है अब आपका स्वास्थ्य कैसा है?
विविध
हम बच्चों पर इतना बोझ डाल देते हैं कि उनकी सोचने की क्षमता क्षीण हो जाती हैं, अतः उन्हें पर्याप्त समय देकर उनकी प्रतिभा को उभारना और एक अच्छा विचारक बनाना ताकि वे भविष्य में समाज को नयी संरचनात्मकता दे सकें।
ज्ञान
आर्थिक शिक्षा–अमीर कैसे बनना? इसकी शिक्षा वह नहीं दे सकता जो खुद अमीर नहीं है और किसी ने पैसा कमा भी लिया हो तो उस पैसे को कैसे निवेश करना कि अमीरी बनी रहे।
धन
लोकप्रियता के लिए वाणी माधुर्य, अनुपम जादू है, वाणी व्यक्ति को रुला भी देती है हँसा भी देती, रागी को वैरागी व वैरागी को रागी, वाणी कर्म बंध भी करा देती, कर्म बंध से मुक्ति भी करा देती है। 'साधक की वाणी मृदु, मधुर व गंभीर हो।'
वाणी
तीर्थंकर जैसे महायोगी जिन्होंने सभी कार्य करना छोड़ दिया पर उपदेश करना नहीं छोड़ा और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि अशरीरी सिद्ध नहीं हो गये अत: जब तक शरीर में शक्ति हैं, जिह्वा में दम है, जब तक कण्ठ काम करना बंद न कर दे तब तक उपदेश देना बंद नहीं करना चाहिए।
धर्म
जगत् में सब भाषाओं को जन्म देने वाली कौन है? चमकती हुई संस्कृत। कहो वेद की जननी कौन है? ओजमयी संस्कृत। अनुपम व सरस साहित्य से सम्पन्न कौन हैं? श्रेष्ठ संस्कृत। कहो भारत के अनुरूप भाषा कौन है? सुरभारती संस्कृत।
ज्ञान
कुलीन व्यक्ति क्रोधित होने पर भी असभ्य नहीं बोलता है, निश्चय ही गन्ना निचोड़े जाने पर भी मीठा ही उगलता है। नीच व्यक्ति सैंकड़ों गुणों से सहित होने पर भी जो हँसी में कहता है, वह झगड़े में भी कथनीय नहीं होता है।
क्षमा
दो चीजें निंदनीय हैं–बोलने के समय चुप रहना और चुप रहने के समय बोलना। जो लोग विद्वानों की सभा में अपने सिद्धान्त श्रोताओं के हृदय में नहीं रख सकते है, उनका अध्ययन चाहे कितना ही विस्तृत हो, फिर भी वह निरुपयोगी है।
वाणी
दोषों को भूलकर भाइयों पर स्नेह एवं बन्धुओं पर प्रेम स्थापित करना चाहिए, पत्नि-पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले, मातापिता के प्रति पुत्र निष्ठावान हो, माता-पिता और बहन का दु:ख प्राण देकर भी दूर करना चाहिए।
परिवार
ऐसी कोई बात किसी आदमी के बारे में मत कहो, जो उस मनुष्य के मुँह पर नहीं कह सकते हैं। जो अभिमानी हैं, आदर के योग्य नहीं है, उचित अनुचित के विवेक से रहित हैं, अप्रिय वक्ता हैं, दु:ख और अपमान से संकुचित हो रहे हैं ऐसे व्यक्तियों से अत्यन्त गुणी मनुष्य संभाषण नहीं करते हैं।
वाणी
अगर सेवक सुख चाहें, भिखारी मान चाहें, व्यसनी धन की इच्छा करें, व्यभिचारी शुभ गति चाहें, लोभी यश चाहें तो समझो कि ये लोग आकाश से दूध दुहना चाह रहे हैं।
संतोष
मनुष्य के लिए इससे बढ़कर सुयश और कोई नहीं है कि लोगों में उसकी प्रसिद्धि हो कि वह झूठ बोलना जानता ही नहीं अर्थात् ऐसा पुरुष अपने शरीर को कष्ट दिये बिना ही सब तरह की सिद्धियों को पा जाता है।
सत्य
राजा, प्रधान श्रावक और साधु का मरण होने पर, ग्रहण आदि के समय तथा पर्व के दिनों में सिद्धान्त ग्रन्थों को नहीं बांचना चाहिए। अमावस्या और पूर्णिमा का पाठ गुरु घातक है, चतुर्दशी का पाठ शिष्य घातक है, अष्टमी का पाठ दोनों का घातक है और प्रतिपदा पाठ का घात करने वाली है।
ज्ञान
स्वाध्याय करने से सदाचार का पालन होता है, इन्द्रियों का दमन होता है, राग-द्वेष आदि विकारों की मंदता होती है, मन की चंचलता रुकती है, सद्गुणों का विकास होता है, वैराग्य दृढ़ होता है, परिणामों में निर्मलता होती है, आत्मा में विशुद्धि बढ़ती है और मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है। ''स्वाध्याय का फल शान्ति धारण करना है।''
ज्ञान
किसी भी सामाजिक संस्था की कुछ खास बातें– १. आप कुछ नहीं करेंगे तो आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। २. अगर आप सक्रिय हैं तो आप पर अँगुलियाँ उठेंगी। ३. अगर आप यह नहीं सोचेंगे कि श्रेय किसको मिलेगा तो आप बहुत कुछ कर सकते हैं। ४. आपके जितने विरोधी होंगे आपका उतना ज्यादा सम्मान होगा। ५. आप जितना ज्यादा काम करेंगे आपको उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा। ६. जिम्मेदारी उसी की तरफ खिंची आती है, जो उठाना चाहता है। ७. आप अपने मन में जो भी प्रोजेक्ट सोचेंगे उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी? ८. जो आपका सबसे अच्छा हितैषी हैं, वो आपके मुँह पर आपकी आलोचना करेगा। ९. आपको प्रशंसा तब मिलेगी जब आप उसकी उपेक्षा करें। १०. आप लोकप्रिय तब बनेंगे जब अपने साथियों को सराहेंगे और उनके काम में उत्साह बढ़ायेंगे। ११. आप कब सही थे कोई याद नहीं रखेगा, आप कब गलत थे कोई नहीं भूलेगा। १२. आप जितना नियम मान कर चलेंगे आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जायेगा। सबसे खास बात सामाजिक कार्यों का उद्देश्य मन की संतुष्टि होती है और इसके लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
विविध
मनुष्य के पास पाँच इन्द्रिय हैं। यथा–चक्षु (आँख), नाक, कान, रसना और स्पर्शन। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चक्षु अर्थात् आँख है। आँख के अभाव में मनुष्य का जीवन अत्यधिक कठिन है। आँख से मनुष्य के स्वभाव का परिचय मिल जाता है। मनुष्य स्वभाव से कठोर, क्रोधी, नम्र, वात्सल्य पूर्ण अथवा स्नेहमयी है, यह उसकी दृष्टि से झलक जाता है। मनुष्य दो प्रकार के कर्म करता है। १. शुभ अथवा पुण्य कर्म, २. पाप कर्म। आँखें मनुष्य के लिए वरदान है। उसके माध्यम से मनुष्य पुण्य एवं पाप कर्म का बंध करता है। जहाँ एक ओर अच्छी दृष्टि के द्वारा १०० प्रतिशत पुण्य कर्म अर्जित कर सकता है। वहीं मनुष्य को जितना पाप कर्म का बंध होता है, उसका बहुभाग लगभग ८३ प्रतिशत आँख (दृष्टि) के माध्यम से होता है। शेष लगभग १७ प्रतिशत पाप कर्म अन्य शेष चार इन्द्रियों से होता है। यथा–कान (कर्ण), नाक (घ्राण), रसना और स्पर्शन के माध्यम से होता है। मनुष्य आँख के माध्यम से ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है। जिनवाणी के पठन-पाठन में आँखों का योगदान महत्त्वपूर्ण है। ज्ञानार्जन के लिए आँखें आवश्यक हैं।
कर्म
बारह तपों में स्वाध्याय के समान तप न हुआ, न है, न होगा, जो कर्म अन्य तपस्वी करोड़ो भवों में निर्जीर्ण करता है, उसे स्वाध्यायी अन्तमुहूर्त में ही निर्जीर्ण करता है। स्वाध्याय के द्वारा भोजन करते हुए भी अनशन आदि से अनन्त गुणी विशुद्धि प्राप्त होती है, वह स्वाध्याय तप मरण के समय आराधना की सिद्धि के लिए सदा करना चाहिए, अतः श्रुत भावना से पृथक्त्व वितर्क और एकत्व वितर्क रूप शुक्ल ध्यान होते हैं, शुक्ल ध्यान से केवलज्ञान की प्राप्ति और केवलज्ञान से अन्त में मुक्ति की प्राप्ति होती है।
ज्ञान
हेय और उपादेय रूप तत्त्व के प्रकाश का इच्छुक भव्यजीव बोधि और समाधि को देने वाले तथा परमार्थ सत् वस्तुस्वरूप का कथन करने वाले पुराण और चरित्ररूप प्रथमानुयोग को अन्य तीन अनुयोगों से अधिक अध्ययन में लायें क्योंकि आँखों में पानी इसी अनुयोग से आता है।
ज्ञान