Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

साढ़ूमल में पण्डित हीरालालजी शास्त्री रोज प्रवचन करते थे, एक व्यक्ति रोज प्रवचन सुनता था, पर गरीब था, अत: अपने घर से पाँचवे घर में चोरी करने गया, पर पाप के डर से, इसमें कम पाप लगेगा ऐसा मानकर एक बोरा भूसा की चोरी की, बोरा फटा था, तो भूसा वहाँ से घर तक गिरता रहा ध्यान नही दिया, लाइन बन गयी, सुबह लोगों ने देखा तो वह पकड़ा गया, पञ्चायत हुयी, पूछा तुमने चोरी की है, उसने कहा! हाँ की है, क्यों की है? तब कहा! हम तीन दिन से पानी में आटा घोलकर पीकर दिन निकाल रहे हैं, हमारा बेटा तीन दिन से दूध मांग रहा है उसको कब तक दूध के स्थान पर पानी में आटा घोलकर पिलाते रहेंगे? हमने सोचा एक बोरा भूसा चार आना में बिकेगा, तीन-चार दिन दूध आयेगा, फिर आगे देखेंगे, क्योंकि पण्डित जी रोज प्रवचन में कहते हैं ज्यादा आसक्ति नहीं रखना चाहिये, प्रवचन सुनने का यह परिणाम था।

In Sadhumal, Pandit Hiralalji Shastri gave a discourse daily; a poor man attended every day. Out of poverty he went to steal from the fifth house from his own, but fearing sin he thought stealing straw would be a lesser sin, so he stole a sack of chaff. The sack was torn, so chaff kept trickling from there all the way home unnoticed, leaving a trail. In the morning people saw it and he was caught. At the village council he admitted the theft. Asked why, he said: 'For three days we have been surviving on flour mixed in water; my son has been begging for milk for three days — how long can I give him flour-water instead? I thought a sack of chaff would sell for four annas and buy milk for three or four days, then I would see. For the Panditji says daily in his sermon that one should not hold too much attachment.' Such was the result of listening to the discourse.

— आराध्य सूत्र · #138

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति