Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 17 / 41

मौत को छोड़कर शेष के लिए 'कल' का ख्याल अवश्य आता है कि 'कल' क्या होगा, परीक्षा चार दिन की पर पाठ्यक्रम तो १२ महीने का, जज का फैसला आधा घंटे का पर १२ साल लड़ना पड़ता है, मंजिल छोटी पर रास्ता लम्बा होता है इसी तरह मौत चाहे एक पल की घटना है पर उसे सुधारने के लिए जिन्दगी भर सावधानी रखनी पड़ती है, संभव है, बिना पढ़े सिर्फ नकल करके कोई विद्यार्थी परीक्षा में पास हो जाए, रिश्वत देकर अदालत के चक्कर से बच जाए किन्तु बिना जागे मौत नहीं सुधर सकती, अतः जीवन में याद रखो शुभ कार्य आज अभी इसी समय और अशुभ कार्य फिर कभी किसी समय।
समाधि
आपकी सोच देखो–बेटी ससुराल में खुश है तो आप खुश होते हैं और बहु ससुराल में खुश है तो आपको खराब लगता है, दामाद बेटी की मदद करें तो आपको अच्छा लगता है और बेटा बहु की मदद करें तो जोरू का गुलाम कहा जाता है, बेटी जींस पहने तो खुश होते हैं कि मॉडर्न फैमिली है और बहु जींस पहने तो उसे बेशर्म कहते हैं, बेटी के ससुराल में अकेले काम करना पड़े तो सास खराब है कि मेरी बेटी थक जायेगी और बहू सारा दिन अकेले काम करे फिर भी कामचोर है, बेटी की सास और ननद काम न करे तो गुस्सा आता है और सब अपने घर में बहू की मदद न करे तो सही लगता है, बेटी की ससुराल वाले ताना मारे तो अच्छा नहीं लगता, स्वयं बहू को ताना मारो तो सही लगता है, बेटी को रानी बनाकर रखने वाली ससुराल चाहिए और स्वयं को बहू काम वाली चाहिए, लोग यह क्यों भूल जाते है कि बहू भी किसी के घर की बेटी है, वो भी तो अपने माता-पिता भाई-बहन दोस्तों को छोड़कर आयी है आपके साथ नया जीवन शुरू कर रही है।
परिवार
मांसाहार उनके लिए है जो लड़ेंगे और मरेंगे, शाकाहार उनके लिए है जो सुखमय जीवन जियेंगे एवं विचारशील बनेंगे। खून से कपड़ा व मन दोनों गंदे होते हैं। जरा विचार करो जब आपका अपना सगा सम्बन्धी समय पर घर नहीं आता, तो आप सिर पीट-पीट कर रोते हो, तो फिर दूसरे जीवों को मार कर उनका मांस कैसे खाते हो? क्योंकि कहीं पर उनके बच्चे अपने माँ-बाप का अथवा माँ-बाप अपने बच्चों का इन्तजार करते होंगे, अरे! जब आपको जरा सा काँटा चुभता है तो आप उसके दर्द में चीखते हो, तो फिर आपका हृदय दूसरे प्राणी के प्राण लेते समय क्यों नहीं चीखता है?
अहिंसा
विषयी जीव पहले प्राप्ति की आकांक्षा में दुःखी होता है फिर सेवन करने के बाद तृप्ति न होने से दुःखी फिर विषयों के अन्तरंग से छूट न पाने से दुःखी, फिर विषयों के सेवन के पाप के पश्चाताप में दुःखी होता है।
अनासक्ति
जब एक के विरोध से भी मनुष्य विपत्ति को प्राप्त होता है तो बहुतों के साथ विरोध होने पर क्या कहना? देखो चींटियाँ बड़े बलशाली सर्प को खा जाती हैं। निर्बल लोगों का समुदाय भी शक्ति शाली होता है, जैसे सार हीन तृणों से बनाई गयी रस्सी से हाथी भी बाँधा जाता है।
संगति
यदि भाव अच्छे हैं तो सदैव भाव मंगल आपके पास है और यदि भाव बुरे हैं तो मांगलिक द्रव्य, क्षेत्र, काल कुछ नहीं कर लेंगे। राजा श्रेणिक के भाव बुरे हुए तो यशोधर मुनिराज के गले में मरा सर्प डाला और नरक गति का बंध किया और जब भाव मंगल हुए तो उन्हीं से क्षमा माँगने लगा, मन में सोचने लगा अपनी गर्दन काटकर इनके चरणों में चढ़ा दूँ तब प्रायश्चित्त होगा, लेकिन उन्हीं मुनिराज के समझाने से मोक्षपुरी का रास्ता मिल गया, वही मुनिराज मंगल भूत हो गये, भाव परिवर्तन से भव परिवर्तन रुक गया।
कर्म
अविवेकी प्राणी धन के कमाने में तन को खराब कर लेता है फिर तन को सही करने के लिए धन को नष्ट कर देता है और मरते दम तक धन का सुख नहीं ले पाता है कभी अस्पताल में जाकर मरीज को देखना जो डॉक्टर से कहता है जितना पैसा चाहिए हो ले लो पर कुछ क्षण का जीवन बचा लो जबकि उसने पूरी पर्याय की कीमत ही नहीं की, अधिकतर समय गप्पों में, पेपर पढ़ने में, टी.व्ही. देखने में, बोलने में खो दिया, पूछा तो कहा समय पास कर रहे हैं।
समय
जैसे नदी बांधों से बँध जाती है तो सागर से नहीं मिल पाती है, वैसे ही नर किसी नारी से बंध जाता है तो सिद्धों से नहीं मिल पाता है। संयोग बाँध देता है और बँधा जीव परतंत्र होता है और परतंत्रता ही सबसे बड़ा दुःख है, अतः निर्बन्ध हो, स्वतंत्र हो, समुद्र बनो, सिद्धों से मिलो।
अनासक्ति
संसार स्वार्थ का है। जब तक पुण्य है, तब तक सब आपके साथ हैं, जैसे ही पुण्य क्षीण हुआ कि क्षणभर में सब छोड़कर चले जायेंगे। नारायण श्रीकृष्ण के वंश को देखो, जिसके यहाँ एक भाई तीर्थंकर हो, एक भाई बलभद्र हो, कामदेव हो, क्या वैभव होगा? क्या आनंद होगा? फिर भी उस क्षण को देखो जब द्वारिका जल रही होगी, वह क्षण कैसा होगा? कौन किसे बचा पाया?
अनासक्ति
इन चार संज्ञाओं की तो सीमा है ये तो शरीर के कमजोर होने पर शान्त हो जायेंगी, पर नाम की संज्ञा इतनी खोटी है कि अंतिम श्वासों तक सताती है कि मेरा नाम हो जाये। इस जीव ने नाम के लिए जितना किया, उसका सौवाँ अंश भी धर्म के लिए किया होता तो नाम हो ही जाता और कर्मातीत हो जाता।
अनासक्ति
जिन्दगी के पाँच सच—१. माँ के सिवा कोई वफादार नहीं। २. गरीब का कोई मित्र नहीं। ३. लोग अच्छी सीरत (स्वास्थ्य) को नहीं अच्छी सूरत को महत्त्व देते हैं। ४. इज्जत सिर्फ पैसे की है इंसान की नहीं। ५. इंसान जिस व्यक्ति को दिल से चाहता है वो ही व्यक्ति दुःख देता है।
परिवार
असफलता के कारण—योजना का अभाव, अनुभव का अभाव, अनुशासन का अभाव, उत्साह की कमी, आत्म विश्वास की हीनता, नकारात्मक सोच, अनुत्साह प्रवृत्ति, विपरीत संगति, अनेकों से शत्रुता, अपनों के प्रति द्रोह, अवसर पर चूक, ईर्ष्यालु स्वभाव, पुरुषार्थ और भाग्य की हीनता, रीति-नीति की अनभिज्ञता, समय सूचकता का अभाव, दूसरों को दोष देने की आदत इत्यादि।
समृद्धि
सफलता के सूत्र—व्यवहार कुशलता, मिलनसार प्रवृत्ति, मधुरवाणी, विनयशीलता, प्रसन्न मुद्रा, समय की पकड़, क्षमाशीलता, लक्ष्य निर्धारण, आशावादी सोच, स्वयं को प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति, उपकारियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करें, प्रशंसकों को पूँजी की तरह आदर दें, किसी की निंदा न करें, सबका सहयोग लेने की कला, प्रबल पुरुषार्थ करें, सही योजना बनायें, धैर्य रखें, बुद्धि का सही उपयोग करें, रीति-नीति से काम लें, आत्म विश्वास से भर जायें, अशुभ विचारों की उपेक्षा करें इत्यादि।
समृद्धि
साधु के नाम में भी सागर जुड़ा है अतः कभी अपनी मर्यादा नहीं खोना, जैसे सागर अपने अंदर के कचरे को किनारे पर फेंक देता है किन्तु अपने अन्दर के मोती को पास में रखता है वैसे ही आप भी अपने अंदर के विषय-कषाय को किनारे कर देना पर अपनी विशेषताओं को अपने मुँह से कहकर बाहर मत फेंकना।
विनम्रता
संसार में रहना चाहते हो तो माँ बनकर रहना और संसार से दूर होना चाहते हो तो महात्मा बनकर रहना सीख लो, बस क्षमा आपके रोम-रोम में बस जायेगी, जिससे जीवन स्वर्ग बन जायेगा, मन में कुछ भी आये उसे वचन से बोलना मत तो सारी दूरियाँ समाप्त हो जायेगी।
क्षमा
कोई भी क्षेत्र मंगल अमंगल नहीं होता, अतः किसी भी क्षेत्र को दोष मत दो जिस क्षेत्र में किसी को मंगल होता है उसी क्षेत्र में किसी को अमंगल होता है, हस्तिनापुर में पाण्डवों को विजयश्री मिली उन्हें मंगलभूमि रही और कौरवों के लिए अमंगल रही, पुण्यात्मा के लिए प्रत्येक क्षेत्र मंगल है।
कर्म
समाधि के समय कोई साधक से पूछता है कि किसी से मिलना है क्या? वह कहता है सबको जाने दो मुझे जिससे मिलना था वो मिल चुका है। ''सम्बन्धों में ही बंध है सम्बन्धों में ही कष्ट है।''
समाधि
सँभल के रहना पाप का उदय आते देर नहीं लगती, बुझते दीपक की लौ भी अंत समय तेज हो जाती है, यदि कोई गलत काम करने के बाद भी बढ़ता नजर आता है तो समझ लेना कि बुझने के दिन आ रहे हैं जैसे मरने के कुछ समय पहले प्राणी स्वस्थ हो जाता है।
कर्म
भगवान् किसी का भला-बुरा नहीं करते, यदि भगवान् भला करते तो मन्दिर के द्वार पर बैठा भिखारी जीवन भर क्यों हाथ फैलाता? रोज पूजा करने वाला पुजारी क्यों निर्धन रहता? और बुरा करते तो मंदिर मूर्ति को तोड़ने वाले क्यों महलों में सुख से रहते? अतः सत्य यह है सुख-दुःख स्वयं के भावों से किए कर्माधीन हैं।
कर्म
शत्रु कौन होता है? आप जो चाहते है वो मिलता रहे तब तो ठीक, आपने जो चाहा नहीं हुआ, जिससे चाहा नहीं किया, जैसा चाहा नहीं किया, बस वही शत्रु बन गया, शत्रु कोई वस्तु नहीं सिर्फ कल्पना है। 'शरीर की रक्षा करना पर अशरीरी होने के लिए'।
क्षमा
आप अपने घर ग्रन्थ जरूर रखना, यह मत सोचना की कोई पढ़ने वाला नहीं है क्योंकि हो सकता है आपके घर कोई ऐसा महापुरुष जन्म ले जो इस ग्रन्थ को पढ़कर निर्ग्रन्थ बन जाये और यदि संस्कृति पर उपसर्ग आया और जिनालय व जिनवाणी नष्ट हो गयी तो आपके घरों की जिनवाणी से जैन धर्म जयवंत हो सकेगा। क्योंकि पहले भी हमारे ग्रन्थों की छह माह तक होलियाँ जली हैं, जिनमंदिर व जिनबिम्ब तोड़े गये हैं।
ज्ञान
जहाँ चैत्यालय होता है वहाँ कितने ही गुणवान मनुष्य पूजा के द्वारा प्रतिदिन पुण्य उपार्जन करते हैं, कितने ही स्तुति करते हैं कितने ही बुद्धि मान उत्तम चंदोबा, दीप, धूप, कलश, झारी तथा घंटा आदि देकर दर्शन करते हैं तथा मुनिराजों का श्रेष्ठ आश्रय भी जिनालय होता है।
भक्ति
जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की जरूरत है, डिग्री की नहीं, हमारी सही डिग्री है—हमारा सेवाभाव, हमारी नम्रता, हमारे जीवन की सरलता, अगर यह डिग्री नहीं मिली और हमारी आत्मा जाग्रत नहीं हुई, तो कागज की डिग्री व्यर्थ है।
ज्ञान
साहित्य का लक्षण मनुष्यता ही है, जिस पुस्तक से यह उद्देश्य सिद्ध नहीं होता, जिससे मनुष्य का अज्ञान कुसंस्कार और अविवेक दूर नहीं होता, जिससे मनुष्य शोषण और अत्याचार के विरुद्ध सिर उठाकर खड़ा नहीं हो पाता, जिससे वह छीना-झपटी, स्वार्थ परता और हिंसा के दल-दल से उबर नहीं पाता वह पुस्तक किसी काम की नहीं है।
ज्ञान
क्या तुम अपना सर्वनाश करना चाहते हो? तो ज्ञानियों के सदुपदेश पर ध्यान न दो और जाकर उन लोगों के साथ छेड़खानी करो, जो जब चाहें तुम्हारा सर्वनाश करने की शक्ति रखते हैं जो दुर्बल मनुष्य बलवान् और सत्ताधारी पुरुषों का अपमान करता है, वह मानों यमराज को अपने पास आने के लिए संकेत करता है।
विवेक
झूठे की संगति करोगे तो ठगे जाओगे, मूर्ख हित का इच्छुक होने पर भी अहितकर ही होगा, कृपण अपने स्वार्थ के लिए दूसरे को अवश्य हानि पहुँचाएगा, नीच आपत्ति के समय दूसरे का नाश करेगा अतः कुसंगति छोड़कर सुसंगति करना चाहिए।
संगति
जितने अपरिचित रहोगे, उतने सुखी रहोगे। जब शादी नहीं हुई थी, तब मात्र आपको अपने घर का कष्ट समझ में आता था, शादी के बाद अब दस जगह के दुःखों में सम्मिलित होना पड़ता है। विषयों की मिठास में जिनमुद्रा धारण नहीं कर पाये, एक क्षण के सुख के पीछे भव-भव की शान्ति चली गयी।
अनासक्ति
जब मैं अल्पज्ञ था तो हाथी के समान मदांध था। तब मेरा मन अपने को सर्वज्ञ समझकर दंभ से भर गया, लेकिन जब मुझे पंडितों के संपर्क से कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि मैं मूर्ख हूँ और मेरा दंभ, ज्वर की तरह उतर गया।
संगति
दुष्ट की संगति कीर्ति नष्ट कर देती है, क्लेश उत्पन्न करती है, अशुभ गति प्रदान करती है, मनुष्यों में उद्वेग और खिन्नता उत्पन्न करती है, उपहास का पात्र बनाती है, बुद्धि को भ्रम में डाल देती है, प्रतिष्ठा का नाश कर देती है, प्राण शक्ति क्षीण कर देती है, इस प्रकार कुसंगति सकल मंगलों को नष्ट कर देती है।
संगति
संसार में चन्दन शीतल होता है, चन्दन से ज्यादा शीतल चन्द्रमा है, चन्दन और चन्द्रमा से शीतल साधु-सज्जनों की संगति है, चन्दन व चन्द्रमा तो बाहरी त्वचा को शीतल कर सकते हैं परन्तु सन्तों की संगति मन और आत्मा को शान्ति प्रदान करती है।
संगति