Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 16 / 41

गुण सर्वत्र पूजे जाते हैं, जन्म में क्या रखा है? रेशमी वस्त्र कीड़ों से उत्पन्न होता है, कमल कीचड़ में जन्म लेता है, नीलकमल गोबर से उद्भूत होता है, अग्नि काष्ठ से उत्पन्न होती है, मणि सर्प के फण से उपलब्ध होती है और गोरोचन गाय के पित्त से प्रकट होता है फिर भी गुणों के कारण मान्य हैं।
चरित्र
कितनी भी विपरीतता आये, पर आप विचलित मत होना क्योंकि लोगों का काम ही इतना है कि आपको निर्बल कर दें, संकट आते ही इसलिए हैं कि आप निर्बल हो जाओ, लोग आलोचना भी करेंगे कि आप निर्बल हो जाओ, पर आप निर्बल मत होना आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा।
पुरुषार्थ
चेहरा आपके अन्तःकरण के भावों को बता देता है। वैरागी का चेहरा अलग, कामी का अलग और रागी का चेहरा अलग दिखता है जन्म लेना और देना पशु भी जानते हैं, पर इनके चक्र से छूटना केवल मनुष्य ही जानता है।
अनासक्ति
पानी कीचड़ भी करता है और उसको साफ भी करता है उसी प्रकार ज्ञान जब अहंकार की धूल के साथ होता है तो कीचड़ करता है और चारित्र के साथ होता है तो भगवान् बनाता है।
ज्ञान
जिसे तनाव में डालना हो, उसे जिम्मेदारियाँ सौंप दो। खाली गाड़ी आवाज ज्यादा करती है व भरी शान्त निकल जाती है, ऐसे ही कोई ज्यादा बोले तो उसे समझाओ मत, जिम्मेदारी सौंप दो वह अपने आप शान्त हो जायेगा।
वाणी
दुःखी रहने के दस कारण—१. देरी से सोना-देरी से उठना, २. लेन-देन का हिसाब न रखना, ३. किसी के लिए कुछ न करना। ४. स्वयं की बात को ही सत्य मानना। ५. किसी का भी विश्वास न करना। ६. कोई भी कार्य समय पर न करना, ७. बिना कारण झूठ बोलना, ८. बिना माँगे सलाह देना ९. बीते हुए सुख को बार-बार याद करना। १०. हमेशा अपने लिए सोचना।
मन
मुसीबत की बेला में आँसू मत ढुलकाइए अपनी श्रेष्ठ बुद्धि का उपयोग कीजिए भाग्य के ९९ द्वार बंद होने के बावजूद भी आपके लिए कोई न कोई द्वार अवश्य खुला होगा।
पुरुषार्थ
असाता के उदय में नींद नहीं आती है, साता के उदय में नींद आती है, मुनि तो निद्रा जय के लिए तपस्या करते हैं। सहज निद्रा आ रही है तो आपका पुण्य है और निद्रा न आये तो स्वाध्याय करो, मंत्र जाप करो पर चिंता न करो। पाप के उदय में नींद न आये तो पुण्य तो किया जा सकता है।
कर्म
पूर्व की ओर मुख करके भोजन करें, दक्षिण की ओर मुख करके मल त्याग करें, उत्तर की ओर मुख करके मूत्र विसर्जन करें, पश्चिम की ओर मुख करके पैर धोयें।
स्वास्थ्य
जो व्याकरण शास्त्र के अध्ययन बिना पदार्थों का विवेचन करता है वह चन्द्रमा का चुम्बन करना चाहता है, सूर्य को ग्रहण करना चाहता है, समुद्र को भुजाओं से तैरना चाहता है।
ज्ञान
प्रार्थना और ध्यान इंसान के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि प्रार्थना में भगवान् भक्त की बात सुनता है और ध्यान में भक्त भगवान् की बात सुनता है। प्रार्थना प्राणों से होती है और ध्यान भावों से होता है। प्रार्थना प्रभु के साकार रूप की होती है और ध्यान प्रभु के निराकार रूप का होता है। प्रार्थना में भक्त भगवान् से जुड़ जाता है और ध्यान से भक्त भगवान् बन जाता है। गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए प्रार्थना और साधु जीवन जीने वालों के लिए ध्यान परमात्मा को पाने का सरल उपाय है।
ध्यान
छोटे से भी पाप का यदि प्रायश्चित्त नहीं किया तो वह एक दिन पहाड़ जैसे विशाल चारित्र को भी नष्ट कर देता है, जैसे छोटा सा बट का बीज यदि मुख से भी फूँक दें तो उड़ जायेगा लेकिन यदि वह अंकुरित होकर वृक्ष बना तो पहाड़ को भी फोड़ देता है।
कर्म
भेषधारी साधु को, गुरु को, ब्राह्मण को, राजा को, स्त्री को, मूर्ख को, बालक को और सर्प को पंडितजन कुपित नहीं करते हैं। समाधि निष्परिग्रही की होती है।
विवेक
ब्रह्मचर्य के बिना मोह नष्ट नहीं होता, मित्र के बिना दुःख, सूर्य के बिना अन्धकार, सन्तोष के बिना लोभ, पथ्य के बिना रोग, पुण्य के बिना दुःख नष्ट नहीं होता है पुण्य हीन को वस्तु मिलने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता किन्तु जो पुण्यवान होता है उसे जंगल में भी सुख/सम्मान प्राप्त होता है।
ब्रह्मचर्य
जैसे शादी का फल पुत्र है, शास्त्र का फल शान्ति है, सम्पत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है वैसे ही ज्ञान का फल वैराग्य है, वैराग्य का फल दीक्षा और दीक्षा का फल मुक्ति है।
ज्ञान
मीठे वचन से मित्रता, विनय से गुण, दान से यश, अभ्यास से विद्या, उदारता से विश्वास, श्रृंगार से अनुराग, संसर्ग से प्रेम, उद्यम से लक्ष्मी, न्याय से राज्य, लोभ से मोह, क्रोध से अपराध और सेवा से सम्मान बढ़ता है।
चरित्र
डोर लम्बी हो तो मतलब यह नहीं कि पतंग ऊपर तक जायेगी उड़ाने का तरीका आना चाहिए, दौलत ज्यादा होने का मतलब सफल जीवन नहीं, जीने का तरीका आना चाहिए।
समृद्धि
इस तरह न कमाओ की पाप हो जाये, इस तरह न गमाओ की कर्ज हो जाये, इस तरह न खाओ की मर्ज हो जाये, इस तरह न बोलो कि क्लेश हो जाये, इस तरह न चलो कि देर हो जाये, इस तरह न सोचो कि चिन्ता हो जाये।
विवेक
जो खाने में विवेक नहीं रखते वे मरने के बाद चींटी बनते हैं क्योंकि चींटी दुनिया में सर्वभक्षी हैं, जो मिश्री से लेकर मांस तक सब खाती है, उसकी कषाय इतनी तीव्र होती है कि यदि वह चिपक जाये तो प्राण दे देंगी पर छोड़ती नहीं है।
आहार
पश्चिम दिशा में मुख कर भोजन करने से रोग होते हैं, पूर्व या उत्तर में मुखकर भोजन करें, दक्षिण दिशा में मुख करके भोजन करने से शीघ्रमरण होता है।
आहार
मल-मूत्र वमन आदि के समान निन्दनीय मधु सेवन, जब भोजन में पड़ी हुई मक्खी को देखकर व्यक्ति उस भोजन को सेवन नहीं करता तो फिर मधुमक्खियों के घृणित वमन को कैसे खा सकता है?
आहार
मोक्ष जाना है तो मुनि बनकर मौन रहो, जैसे तीर्थंकर मुनि बनकर मौन हो जाते हैं। भोजन जल्दी वही पकता है जिस पर ढक्कन रखा होता है, जितना ढक्कन बंद रखोगे उतनी वाष्प बनेगी, उतनी ऊर्जा संचित होगी, उतने जल्दी मोक्ष में गमन होगा। मौन से धर्म और यश की वृद्धि होती है।
वाणी
जहाँ न सम्मान हो, न आजीविका हो, न बन्धुजन हो, न अपने धर्म की रक्षा हो, न धर्मात्मा, न दानी, न परोपकारी, न गुणवान हों और न विद्या प्राप्ति का साधन हो, न राजा हो अथवा बहुत राजा हों, जहाँ स्त्री राजा हो या बालक राजा हो या मूर्ख राजा हो वहाँ नहीं रहना चाहिए।
विवेक
इंसान सुखी होने के लिए घर बदलता है, कपड़े बदलता है, गाड़ी, मोबाइल नम्बर, पता और पता नहीं क्या-क्या बदलता है फिर भी वो सुखी नहीं हो पाता क्योंकि वो अपना स्वभाव नहीं बदलता है। खुद की नजरों में ईमानदार बनो।
चरित्र
मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना उसे झूठी तारीफ सुनकर बर्बाद होना तो पसंद है, पर सच्ची आलोचना सुनकर सम्भलना पसंद नहीं होता है।
विनम्रता
इतिहास साक्षी है कि आज तक जितने महापुरुष उपहास को प्राप्त हुए हैं, वे सब धन, धरती और स्त्री के कारण पवित्र यश पताका को नष्ट करके गये हैं।
अनासक्ति
आलसी, अज्ञानी, अविवेकी व्यक्ति ही कहते हैं कि भाग्य से अधिक और समय से पहले नहीं मिलता, जबकि वैज्ञानिक युग में जीने वाले पुरुषार्थी पुरुष कहते हैं समय से पहले भाग्य से अधिक मिलता है, आज किसान समय से पहले भाग्य से अधिक फसल पैदा करते हैं, बांझ स्त्री भी संतान सुख प्राप्त कर सकती हैं, यहाँ तक पुरुष स्त्री और स्त्री पुरुष बन सकते हैं।
पुरुषार्थ
हर अक्षर मंत्र है गीत भी मंत्र है और गाली भी मंत्र है, मंत्र का तात्पर्य प्रभावित कर देना है, यदि आपने किसी मुस्कुराते व्यक्ति को गाली दी तो वह भी रोने लगता है और यदि रोते व्यक्ति की प्रशंसा की तो वह प्रसन्न हो जाता है, मंत्र अनेक प्रकार के होते हैं। जैसे आकर्षण, सम्मोहन, वशीकरण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषीकरण, मारण आदि।
णमोकार
मंजिल मिल ही जायेगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो होते हैं जो घर से निकलते ही नहीं हैं। आज रोटी के पीछे भागता हूँ तो याद आता है कि मुझे एक रोटी खिलाने के लिए माँ मेरे पीछे भागती थी।
परिवार
यदि आपने नरक के दुःखों को नहीं देखा है, तो तिर्यंच गति के दुःखों को देख लो, तन पर छुरी चल रही है, तन को छीला जा रहा है, फिर भी मुख से आवाज नहीं निकाल पा रहा है, अपने आपको बचा भी नहीं सकता है, ये सब मायाचारी का परिणाम है।
कर्म