Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

संसार स्वार्थ का है। जब तक पुण्य है, तब तक सब आपके साथ हैं, जैसे ही पुण्य क्षीण हुआ कि क्षणभर में सब छोड़कर चले जायेंगे। नारायण श्रीकृष्ण के वंश को देखो, जिसके यहाँ एक भाई तीर्थंकर हो, एक भाई बलभद्र हो, कामदेव हो, क्या वैभव होगा? क्या आनंद होगा? फिर भी उस क्षण को देखो जब द्वारिका जल रही होगी, वह क्षण कैसा होगा? कौन किसे बचा पाया?

The world runs on self-interest. As long as merit lasts, all are with you; the moment merit wanes, in an instant all abandon you and leave. Look at the lineage of Narayan Shri Krishna—where one brother was a Tirthankar, one a Balbhadra, and a Kamadev: what splendour, what joy there must have been! Yet behold the moment when Dwarka was burning—what a moment that was! Who could save whom?

— आराध्य सूत्र · #5385

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति