Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 18 / 41

सन्त का क्रोध भी कल्याणकारी होता है, जबकि दुष्ट का प्यार भी दुःख देने वाला होता है, सन्त अगर गुस्सा करके डाँट भी दें तो समझ लेना चाहिए कि इसमें भी भला है, दुष्ट आदमी प्यार की बात भी करे तो उसके प्यार में कुछ न कुछ मुसीबत छुपी होगी।
संगति
सत्संग में बिना कुछ किए उन्नति होती है और कुसंग में बिना कुछ किए पतन होता है। भगवान् में प्रेम होना भी सत्संग है और नाशवान का प्रेम (मोह) छूटना भी सत्संग है। हर हाल में खुश रहने की विद्या सत्संग से ही मिलती है।
संगति
जिन पुरुषों के यश और मान का लोभ अधिक हो, उनके साथ मुमुक्षु पुरुष को कभी नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके साथ में या तो उल्लू बनकर रहना होगा या अपमान सहना होगा और उसे भी यश का पिशाच लग जावेगा तथा प्रशंसा का आसक्त निर्दय चित्त होता है।
संगति
अनेक त्यागियों और धर्मात्माओं के बीच रहकर अपने को अकेला देखता हुआ प्रसन्न रह करके जीवन बिता, आज के युग में बाह्य में अकेला मत रह अन्तरङ्ग में अकेला रह, बहुत पुरुषों के समागम में कषाय वृद्धि और समाधिहीनता का भय है तो समागम छूटने में संयम हीनता का भय है, इस काल में समागम बहुत सहायक है।
संगति
सुखमय जीवन जीने के १७ सूत्र–१. आनंद के लिए संगीत, २. खाने के लिए गम, ३. पीने के लिए क्रोध, ४. निगलने के लिए अपमान, ५. व्यवहार के लिए नीति, ६. लेने के लिए ज्ञान, ७. देने के लिए दान, ८. दूसरों को जीतने के लिए प्रेम हो, ९. धारण करने के लिए धैर्य, १०. तृप्ति के लिए संतोष, ११. त्याग के लिए लोभ, १२. करने के लिए सेवा, १३. फैलाने के लिए स्व-पर का यश, १४. फेंकने के लिए ईर्ष्या, १५. छोड़ने के लिए मोह, १६. रखने के लिए इज्जत, १७. बोलने के लिए सत्य।
विविध
कल्पवृक्ष संकल्पित वस्तु को देता है, प्रसिद्ध कामधेनु इच्छित वस्तु को ही पूर्ण करती है और चिन्तामणि चिन्तित वस्तु को ही देता है परन्तु सत्संगति समस्त वस्तुओं को देती है। ऐसी संगति करना जिससे वैभव बढ़े या ना बढ़े पर भव अवश्य घटे और वीतराग शासन पर श्रद्धा बढ़े।
संगति
सत्संगति बुद्धि की जड़ता को हटाती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, सम्मान की वृद्धि करती है, पापों को दूर करती है, चित्त को प्रसन्न करती है और दसों दिशाओं में कीर्ति फैलाती है, बताओ सत्संगति मनुष्य के लिए क्या नहीं करती है? सज्जनों का संग स्वर्ग में वास के समान है।
संगति
सत्संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है, जो लोग साथ-साथ उठते बैठते हैं उनकी नैतिकता तथा चारित्र का स्तर भी समान हो जाया करता है, किसी व्यक्ति का चारित्र इतना सबल नहीं होता कि वह अपने आसपास की स्थितियों से प्रभावित न हो।
संगति
उन्नति के ३ सूत्र–स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन, सम्यक् साधना। सेहत सबसे बड़ी सम्पत्ति है, संतोष सबसे बड़ा धन है, आत्म विश्वास सबसे बड़ा खजाना व दोस्त है, अस्तित्व में न होना सबसे बड़ा आनन्द है।
स्वास्थ्य
शरीर स्वास्थ्य के इच्छुक व्यक्ति को समय पर मलमूत्र का क्षेपण करना चाहिए, मलमूत्रादि का वेग नहीं रोकना चाहिए, व्यायाम, शयन, स्नान, भोजन और ताजी हवा में घूमना आदि की यथासमय प्रवृत्ति नहीं रोकना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति अपने वीर्य, मल, मूत्र और अपान वायु के वेगों को रोकता है उसे पथरी, भगन्दर, गुल्म और बवासीर आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
स्वास्थ्य
भोजन के ४० मिनट पहले और एक घंटे बाद पानी पियें, पानी चाय की चुस्की की तरह घूंट-घूंट कर पियें, कभी भी ठंडा पानी न पियें, सुबह उठते ही २-३ गिलास पानी पियें, पानी का सही उपयोग अमृत है गलत उपयोग विष के समान है।
आहार
मानव शरीर का सब बीमारियों से बचने का एक ही सर्वश्रेष्ठ उपचार है आहार पर नियंत्रण। शरीर से ज्यादा चिंता ढाई इंच की जिह्वा की क्यों? हमें खाने की जरूरत है जीने के लिए, लेकिन हम जीते हैं खाने के लिए।
आहार
जब एक अंगुल शरीर में ९६ रोग हो सकते हैं तो आप शरीर से स्वस्थ कैसे रह सकते हैं, हाँ शरीर के अस्वस्थ होने पर चित्त को स्वस्थ रख सकते हो, शरीर अस्वस्थ हो जाये तो मोक्षमार्ग में कोई बाधा नहीं आती है, लेकिन यदि चित्त अस्वस्थ हो गया तो फिर शरीर भले ही स्वस्थ बना रहे तो भी मोक्षमार्ग में नियम से बाधा आती है।
स्वास्थ्य
संसार में किसी मनुष्य के तो स्त्री नहीं है, किसी के यदि है तो पुत्र नहीं है, किसी के पुत्र है तो शरीर रोगी है, यदि किसी के शरीर निरोग भी है तो धन धान्य नहीं है, यदि धन-धान्य भी है तो किसी की स्त्री दुराचारिणी है, किसी का पति जुआ आदि दुर्व्यसनों में रत है, किसी के दुर्योधन के समान कलह करने वाले भाई हैं, किसी की पुत्री दुराचारिणी है, किसी के पति का जवानी में शीघ्र ही मरण हो जाता है, अतः कह सकते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण सुखी नहीं है।
परिवार
भागकर माँ-बाप की मर्जी के बिना शादी करने वालों के दिल से भगवान् भी भाग जाते हैं, जिससे उसके भाग्य फूट जाते हैं क्योंकि जिसने जन्म देने वाले अपने माँ-बाप की बात नहीं मानी उसकी फिर परमात्मा भी बात नहीं मानता है।
परिवार
गृह के कार्यों में लगाए रखना, सीमित धन देना, अधिक स्वछन्द न होने देना, नीति व सदाचार की शिक्षा देते रहना और बड़ी वृद्ध स्त्रियों के मध्य रोके रहना अर्थात् अन्यत्र न जाने देना आदि ये सब कुल वधुओं की सुरक्षा के उपाय हैं।
परिवार
यदि लड़का कहना न माने तो परेशान मत होना बस उससे अपनापन छोड़ देना, सब चिन्ताएँ खत्म हो जायेंगी जैसे शरीर में जूँ पैदा हो जाती है तो उसे आप अपना नहीं मानते, इसी प्रकार बेटा पैदा हो गया है क्योंकि जो कहना न माने वह अपना कैसा?
परिवार
बालक अथवा कामिनी स्त्री के किसी कारण से मन में कुपित होने पर उनको मोदकादि भोज्य पदार्थ और अलंकारादि के देने से उनका शरीर प्रफुल्लित रोमांचित हो जाता है और अनेक इष्ट क्रियाओं को करते हुए वे अपने स्वामी के बारे में मधुर भाषण करती हैं।
परिवार
स्त्री की स्वतंत्रता के स्थान–सन्तान का परिपालन, गृहस्थी के दैनिक कार्यकलाप, शारीरिक श्रृंगार और पति के साथ शयन इन चार कार्यों में ही स्त्रियों को स्वतंत्रता देनी चाहिए, अन्य में नहीं। जैसे–अच्छी तरह स्वादिष्ट भोजन कराया हुआ कुत्ता अपवित्र हड्डियों को चबाना नहीं छोड़ सकता, सैकड़ों शिक्षाओं से समझाया गया बन्दर भी अपनी चंचलता नहीं छोड़ता, गन्ने के रस से सींचा गया नीम का वृक्ष अपना कड़वापन नहीं छोड़ता, सर्प मीठा दूध पीने पर भी अपनी विष प्रकृति नहीं छोड़ता ठीक उसी तरह वेश्याएँ भी धन के लोभ से अपनी व्यभिचार कराने की प्रकृति नहीं छोड़ सकती, स्त्रियाँ अपनी चंचलता नहीं छोड़ सकतीं अतः इनसे सदा दूर रहना चाहिए।
परिवार
कामासक्त होकर भी रजस्वला से समागम न करें और न ही उसके साथ एक शय्या पर शयन करें क्योंकि रजस्वला से समागम करने वाले पुरुष की प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि और आयु भी क्षीण हो जाती है किन्तु रजस्वला से दूर रहने वाले की प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि व आयु बढ़ती है।
ब्रह्मचर्य
बाला स्त्री खेलने के समय दिये फल और भोजन से प्रसन्न होती है, जवान स्त्री वस्त्र और आभूषणादि से हर्षित होती है, प्रौढ़ स्त्री रति क्रीड़ा की कुशलता से प्रमुदित होती है और वृद्ध स्त्री मधुर भाषण तथा आदर सत्कार से अनुरक्त होती है।
परिवार
स्त्री रूपी अग्नि के संयोग से पुरुषों का धैर्य, वीर्य के छल से घी के समान द्रवीभूत हो जाता है, पिघल कर बहने लगता है और विवेक पारे के समान कहीं चला जाता है।
ब्रह्मचर्य
जिन्होंने शास्त्र ज्ञान में अपना उपयोग लगाया है, जिनका समय प्रशम, यम, तप और ध्यान में व्यतीत होता है, जिन्होंने सदा के लिए परिग्रह का त्याग किया है, जो निर्मल गुणों के समूह हैं, ऐसे मुनि भी स्त्रियों के स्तन, जघन और मुख के देखने से भग्न हो मोहरूपी सागर में निमग्न होते हुए सुने जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
अपनी प्रशंसा सुनकर जो वास्तविकता को भूल जाते हैं, वे महामूर्ख हैं। अपनी निन्दा सुनकर मनुष्य अपने आपको सम्भालता है और प्रशंसा सुनकर स्वयं को खो देता है। प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होना एक बड़ा अवगुण है।
विनम्रता
यदि कोई हजार रुपये का नोट दे तो सभी लेने को तैयार हो जाते हैं किन्तु यदि वह उस नोट के टुकड़े-टुकड़े कर दे और फिर दे तो कोई लेने को तैयार नहीं होता इसका अर्थ अखंड की कीमत है, अखंड में शक्ति है, अतः हम सभी को एक होकर रहना चाहिए।
संगति
खोटी सलाह से राजा, परिग्रह से साधु, लाड़-प्यार से पुत्र, बिना अध्ययन से ब्रह्मण, कुपुत्र से कुल, दुर्जन की सेवा से शील, स्नेह न करने से मित्रता, अनीति से समृद्धि, अधिकतर प्रवास से स्नेह, मदिरापान से लज्जा, देखभाल न करने से खेती और प्रमाद करने से त्याग रूपी धन नष्ट हो जाता है।
विवेक
रात्रि भोजी सदा कुरूप, विकलांग, अल्पायु, रोग पीड़ित, भाग्यहीन और धरमहीन होता है तथा मरकर उल्लू, काक, बिलाव, गीध, सांवर, साँप बिच्छू तथा गोह होते हैं।
आहार
रात्रि भोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यंच तथा नरकादि गतियों में अन्धे बौने, विकलांग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःखों से परिपूर्ण कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता पीड़ित, अत्यन्त चंचल, अल्प आदर वाले होते हैं।
आहार
अगर इन्द्रिय सुख की इच्छा है तो पाप करना न चाहते हुए भी पाप होगा, इन्द्रिय सुख की इच्छा ही पाप करना सिखाती है, अतः पापों से छूटना हो तो इन्द्रिय सुख की इच्छा का त्याग करो।
अनासक्ति
इच्छा से पहले संतोष नहीं है अन्यथा इच्छा ही क्यों होती है? इच्छा के समय भी संतोष नहीं अन्यथा संतप्त क्यों होता? इच्छा के बाद भी संतोष नहीं अन्यथा चेष्टा करके व्याकुल नहीं होता, इच्छा के पूर्व, वर्तमान व भावी तीनों रूप दुःखदायी है, अतः इच्छा त्यागो।
संतोष