Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

इन चार संज्ञाओं की तो सीमा है ये तो शरीर के कमजोर होने पर शान्त हो जायेंगी, पर नाम की संज्ञा इतनी खोटी है कि अंतिम श्वासों तक सताती है कि मेरा नाम हो जाये। इस जीव ने नाम के लिए जितना किया, उसका सौवाँ अंश भी धर्म के लिए किया होता तो नाम हो ही जाता और कर्मातीत हो जाता।

These four instincts have a limit and subside as the body weakens, but the instinct for fame is so vile that it torments one till the final breath with the wish 'let my name endure.' Had this being done even a hundredth of what it did for fame for the sake of dharma, its name would have endured and it would have transcended karma.

— आराध्य सूत्र · #5389

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति