Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

जब मैं अल्पज्ञ था तो हाथी के समान मदांध था। तब मेरा मन अपने को सर्वज्ञ समझकर दंभ से भर गया, लेकिन जब मुझे पंडितों के संपर्क से कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि मैं मूर्ख हूँ और मेरा दंभ, ज्वर की तरह उतर गया।

When I knew little I was blind with pride like a rutting elephant, my mind swollen with conceit, thinking myself all-knowing. But when contact with the learned gave me some knowledge, I realised I was a fool, and my pride subsided like a fever.

— आराध्य सूत्र · #5677

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति