Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Karma

कर्म

370 सूत्र · पृष्ठ 5 / 5

दुकान में आय व्यय होते हैं किन्तु आय अधिक और व्यय कम होता है उसी प्रकार शुभोपयोग में आस्रव-बन्ध कम और संवर-निर्जरा अधिक होते हैं।
कर्म
पच्चीस क्रियाओं में कुछ पुण्यबन्ध का कारण हैं, कुछ पाप बन्ध का कारण हैं, जैसे प्रारम्भ की पाँच क्रियायें पुण्य-पाप दोनों का कारण हैं, छः से दस तक हिंसा की प्रधानता से हैं, ग्यारह से पन्द्रह तक इन्द्रिय विषयों की प्रधानता से हैं, सोलह से बीस तक धर्माचरण से वञ्चित रखने वाली हैं, इक्कीस से पच्चीस तक उच्च धर्माचरण से गिराने वाली हैं, प्रारम्भ की क्रियाएं क्रमशः सम्यक्त्व और मिथ्यात्व को बढ़ाने वाली हैं।
कर्म
तन्दुलमच्छ- एक राजा ने अपने रसोइया से मांस बनवाया, लेकिन खा नहीं पाया, दो-तीन बार ऐसा होता रहा, इतने में राजा की मृत्यु हो गयी, राजा मरकर तन्दुलमच्छ बना, रसोइया राघवमच्छ बना, दोनों मरकर सातवें नरक गये।
कर्म
तीव्र भाव से संज्ञी पञ्चेन्द्रिय जीव सत्तर कोड़ा-कोड़ी सागर की मिथ्यात्व की स्थिति का बन्ध करता है।
कर्म
'आओ चोर चोरी कर ले गओ, मोरी मूँदत मुगद फिरे' अर्थात् किसी के घर में चोरी हो गयी, दूसरे दिन उसने घर के पीछे की पानी बहने की मोरी बन्द कर दी, किन्तु खिड़की बन्द की ही नहीं, जहाँ से चोर आ सकता था, उसी प्रकार अज्ञानी प्राणी जिन भावों से कर्मों का बन्ध होता है उन्हें पहचानता ही नहीं है।
कर्म
फोटो बिगाड़ दी- फोटोग्राफर ने कहा! रेडी, तभी नाक पर मक्खी बैठी, उसे उड़ाने के लिये हाथ आगे आ गया, अब कहता तुमने फोटो बिगाड़ दी, इसी तरह आयु कर्म का बन्ध त्रिभाग (जीवन का दो हिस्सा बीत जाने पर) होता है, कब त्रिभाग पड़े, यह मालूम नहीं इसलिए सावधान रहना चाहिए अन्यथा भव विगड़ जाता है।
कर्म
एक-डेढ़ वर्ष की बच्ची रेंगते-रेंगते गयी और टी.वी. खोल कर देखने लगी, किसी ने पूँछा कैसे सीख गयी? उत्तर मिला! उसकी मम्मी देखती थी, इसलिए पेट से ही सीख कर आई है।
कर्म
जैसे विभीषण राक्षस वंश का होते हुए भी, राक्षस वंश के विनाश का कारण बना, लकड़ी काटने में कुल्हाड़ी में लगा लकड़ी का बेंट ही कारण है तथा लोहे को लोहा काटता है उसी प्रकार तीर्थंकर प्रकृति कर्म के वंश की होते हुए भी कर्मों के वंश को नष्ट करने वाली है।
कर्म
पाँच मार्ग- 'बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह' 'नरकायु' के आस्रव के कारण हैं। 'अल्प आरम्भ और अल्पपरिग्रह' 'मनुष्यायु' के आस्रव के कारण हैं। 'मायाचारी' 'तिर्यञ्चायु' का कारण है। 'सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा, बालतप और सम्यग्दर्शन' 'देवायु' के आस्रव के कारण हैं। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र की एकता ही मोक्ष का मार्ग है।
कर्म
हेतुओं का संक्षेप-बन्ध के पाँच कारणों का सङ्क्षेप दो रूप में हो सकता है, मोह और योग।
कर्म
कर्म सूक्ष्म हैं जैसे शब्द बोलते समय दिखते नहीं, पकड़ नहीं सकते, किन्तु टेप पूरा ग्रहण कर लेता है, इसी प्रकार कर्म दिखते नहीं किन्तु फल देते हैं, तब पता चलता है।
कर्म
तेली और क्षत्रिय का झगड़ा हो गया, तेली ने क्षत्रिय को पटक कर दबा दिया, जाति पूँछने पर जोश आया, क्षत्रिय ने तेली को क्षणभर मे नीचे दबा दिया, इसी प्रकार आत्मा क्षत्रिय है, कर्म तेली है, लेकिन अभी कर्मों की जाति नहीं जानी इसलिए आत्मा दबी हुई है।
कर्म
इन पाँचों का वर्णन पहले हो चुका है, ''तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्'' इसका प्रतिपक्षी मिथ्यात्व। 'हिंसानृतस्तेयाब्रह्म परिग्रहेभ्योव्रतिर्व्रतं' यहाँ अविरति का। ''प्रमत्तयोगात्प्राण व्यपरोपणंहिंसा'' यहाँ प्रमाद का। 'गतिकषायलिङ्ग' इत्यादि एवं 'इन्द्रिय कषायाव्रतक्रिया' इत्यादि सूत्र में कषाय का। 'काय वाङ्मनः कर्मयोगः' यहाँ योग का वर्णन हो गया है।
कर्म
पाँच अङ्क का कर्ज- 99999 रूपये का कर्ज है, मिथ्यात्व चला जाता है तो एक अङ्क हट जाता है तो नब्बे हजार का कर्ज उतर जाता है, 9999 का कर्ज रह जाता है, जो क्रमशः अविरति, प्रमाद, कषाय और योग के अभाव में उतरता है।
कर्म
लोहे में खिचने की शक्ति है, तांबा, पीतल आदि में नहीं इसलिए चुम्बक लोहे को खींचती है। इसी तरह योग चुम्बक है और कर्म, नौकर्म वर्गणा में खिचने की शक्ति है और कषाय सहित जीव कर्मों को खींचता है।
कर्म
कर्म का फल नोकर्म के विना नहीं मिलता, जैसे लीड और करण्ट के विना माइक आवाज नहीं करता, कर्म और नोकर्म का चेतन के साथ वैभाविक सम्बन्ध है।
कर्म
गरम लोहा पानी को बहुत जल्दी खींचता है, उसी प्रकार तीव्र कषाय से स्थिति, अनुभाग तीव्र होता है।
कर्म
उभयबन्ध और भावबन्ध-दूध और पानी की तरह आत्मा और कर्म का संश्लेष सम्बन्ध है, जीव और कर्म का उभयबन्ध कहलाता है। जीव में मिथ्यात्व आदि भाव होना भाव बंध है।
कर्म
स्थिति और अनुभाग का होना द्रव्यबन्ध है तथा कषाय और योग से भावबन्ध होता है।
कर्म
एकेन्द्रिय जीव की मिथ्यात्व की स्थिति एक सागर है और जघन्य स्थिति पल्य का संख्यातवां भाग कम एक सागर होती है।
कर्म
नोकर्म की स्थिति उपभोक्ता के अनुसार होती है, जैसे जिस नक्षत्र में कपड़े पहनना शुरू करोगे, उसके अनुसार कपड़े की स्थिति रहेगी।
कर्म
योगों से हुआ बन्ध तत्काल झड़ जाता है, कषाय से हुआ बन्ध करण परिणामों से झड़ाना पड़ता है।
कर्म
एकेन्द्रिय तेजकाय वायुकाय में उच्च गोत्र का बन्ध नहीं होता वहाँ उसकी उद्वेलना होती है।
कर्म
सातवें नरक का जीव सम्यक्त्व के काल में उच्च गोत्र का बन्ध करता है।
कर्म
प्रकृतिबन्ध को द्रव्य बन्ध, प्रदेशबन्ध को क्षेत्र बन्ध, स्थितिबन्ध को काल बन्ध, अनुभागबन्ध को भाव बन्ध कहते हैं।
कर्म
पानी की अपेक्षा अमृतधारा की शक्ति अधिक और प्रदेश कम होते हैं।
कर्म
लालटेन पर कपड़ा- प्रकाश को आवृत करना प्रकृति है, कपड़े की लम्बाई चौड़ाई प्रदेश है, कपड़ा कब तक पड़ा रहेगा स्थिति है, पतला-मोटा कपड़ा अनुभाग है।
कर्म
आठ कर्मों का दृष्टान्त- देवता के मुख पर ढके वस्त्र के समान ज्ञानावरण, द्वारपाल के समान दर्शनावरण, शहद लपेटी तलवार के सामान वेदनीय, मदिरा के समान मोहनीय, बेड़ी के समान आयु, चित्रकार के समान नाम, कुम्भकार के समान गोत्र और भण्डारी के समान अन्तराय कर्म है, जिस प्रकार इनके भाव होते हैं उसी प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों का स्वभाव भी जानना चाहिए।
कर्म
प्रतिपक्षी की भी प्रसिद्धि होती है- ज्ञान आत्मा का गुण है, आवरण विरोधी है पौद्गलिक है, फिर भी उसकी प्रसिद्धि है जैसे- राम के साथ रावण की, कृष्ण के साथ कंस की, गाँधी के साथ गोडसे की भी प्रसिद्धि है।
कर्म
स्त्यानगृद्धि निद्रा के उदय में सोता हुआ व्यक्ति उठा, नींद में ही दुकान खोली और कपड़ों को फाड़ कर आ गया, और उसे स्वयं पता नहीं चला कि कपड़ा किसने फाड़ा है।
कर्म
उदयपुर विद्यालय में एक बालक रात को नींद में उठकर नदी में नहाकर आता था, बच्चों ने पूँछा कहा जाते हो? उसने कहा! कहीं नहीं, बच्चों ने गुरुजी से कहा, गुरूजी उसके पीछे-पीछे नदी गये, बालक ने नदी में प्रवेश किया, गुरुजी ने आवाज दी, बालक की निद्रा भङ्ग हो गयी, भय के कारण बालक डूब कर मर गया।
कर्म
यथायोग्य उदय- मनुष्य के शरीर में चमड़ी का रङ्ग अलग, आँख की पुतली का अलग, नाखून का अलग, जीभ का अलग इनमें यथायोग्य उदय लगाना, पचरङ्गी फूल के समान, वर्तमान में पचरङ्गी मनुष्य नहीं किन्तु तीर्थंकर हुये हैं।
कर्म
उपयोग- राम ने शुद्धोपयोग के फल को, सीता ने शुभोपयोग के फल को, लक्ष्मण ने अशुभोपयोग के फल को प्राप्त किया था। रावण ने अशुभोपयोग के फल को, मन्दोदरी ने शुभोपयोग के फल को एवं इन्द्रजीत और मेघनाद ने शुद्धोपयोग के फल को प्राप्त किया था।
कर्म
स्तवुक सङ्क्रमण- विरोधी राजा ने चढ़ाई की और कहा कोई पुरूष नहीं निकल सकता लेकिन स्त्रियाँ निकल सकती हैं, राजा ने स्त्री का वेश धारण किया और नगर के बाहर चला गया, इसी प्रकार जो प्रकृतियाँ अन्य प्रकृति रूप परिणमन करके उदय में आती हैं उसे स्तवुक सङ्क्रमण कहते हैं।
कर्म
एक समय में होने वाले कार्य को फाली कहते हैं, अन्तर्मुहूर्त में होने वाले कार्य को काण्डक कहते हैं।
कर्म
दशकरण दृष्टान्त- 1.बन्ध- रविवार को भोजन का निमन्त्रण है उसे स्वीकार करना बन्ध है। 2.सत्ता- सोमवार से रविवार के बीच का समय सत्ता है। 3.उदय- रविवार को ठीक समय भोजनार्थ आना उदय है। 4.उपशम- भोजन में देर होने से थोड़ी देर प्रतीक्षा करना उपशम है। 5.उदीरणा- 10 बजे के स्थान में 9:30 पर आना उदीरणा है। 6.अपकर्षण- रविवार के स्थान पर शुक्रवार को आना अपकर्षण है। 7.उत्कर्षण- रविवार को न आकर मङ्गलवार को आना उत्कर्षण है। 8.सङ्क्रमण- जिसको निमन्त्रण दिया उसके बदले में किसी दूसरे को भेजना सङ्क्रमण है। 9.निधत्ति- ठीक उसी दिन 10 बजे भोजन में स्वयं आना निधत्ति है। 10.निकाचित- रविवार को स्वयं समय पर घर आना, न अगले दिन न पिछले दिन निकाचित है। 11.उदयाभावी क्षय- भोजन को आना किन्तु अस्वस्थ होने से भोजन नहीं करना उदयाभावी क्षय है। 12.देशघाती- फलाहार लिया, भोजन नहीं किया देशघाती है। 13.सर्वघाती- भरपेट भोजन करना सर्वघाती है। 14.क्षय- भोजन से पहले स्वर्गवास हो जाना क्षय है।
कर्म
दशकरण के अन्य दृष्टान्त- 1.बन्ध- 50 थान कपड़ा गोदाम में रखा है। 2.उदय- कुछ माल बिक गया है। 3.सत्ता- जितना रखा वह सत्ता है। 4.उपशम- भाव गिरने से बेचना बन्द करना। 5.उदीरणा- समय से पहले दुकान खोलना। 6.सङ्क्रमण- उसके स्थान पर दूसरा माल बेंचना। 7.अपकर्षण- भाव बढ़ने से, समय से पहले ही बेंचना। 8.उत्कर्षण- भाव घटने से कुछ दिन बाद बेंचना। 9.निधत्ति- उसी समय उसी भाव से माल बेंचना। 10.निकाचित- समय पर वही माल बेंचना, न आगे, न पीछे।
कर्म
गुणस्थानों के उदाहरण- 1.मिथ्यात्व गुणस्थान- ज्वर पीड़ित रोगी को मधुर रस भी कटु लगता है, उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि को धर्म नहीं रुचता है। 2.सासादन गुणस्थान- पर्वत के शिखर से गिरना भूमि के सम्मुख होना। 3.मिश्र गुणस्थान- दही-गुड़ के समान मिश्रित स्वभाव होना। 4.सम्यक्त्व गुणस्थान- फिटकरी युक्त स्वच्छ जल उपशम, पूर्ण स्वच्छजल क्षायिक, कुछ मलिन जल क्षयोपशम। 5.देशविरत गुणस्थान- सङ्कल्पी त्रसहिंसा से विरत तथा आरम्भी-उद्योगी-विरोधी एवं स्थावर की हिंसा से अविरत। 6.प्रमत्तविरत गुणस्थान- व्यक्ताव्यक्त प्रमाद, चितकबरे मृगवत्। 7.अप्रमत्तविरत गुणस्थान- अधःकरण, मोटी धार वाला आरा, यहाँ स्थिति बन्धापसरण (पाप प्रकृतियों की स्थिति का घटना) होता है। 8.अपूर्वकरण गुणस्थान- अपूर्वकरण परिणाम, पैनी धार वाला आरा, स्थिति काण्डक घात (पाप प्रकृतियों की स्थिति का तेजी से घटना) होता है। 9.अनिवृत्तिकरण गुणस्थान- तेज धार वाला छोटा आरा, कम समय में अधिक कार्य होता है। 10.सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान- हल्दी से रङ्गे हल्के रङ्गीन वस्त्र के समान सूक्ष्म कषाय होती है। 11.उपशान्तमोह गुणस्थान- फिटकरी युक्त जल या शरदऋतु के निर्मल जल के समान परिणाम होते हैं। 12.क्षीणमोह गुणस्थान- स्फटिक के पात्र में रखे निर्मल जल के समान वीतराग भाव होता है। 13.सयोगकेवली गुणस्थान-केवलज्ञान अन्धकार नाशक सूर्य के समान होता है। 14.अयोग केवली गुणस्थान-शरद ऋतु की पूर्णमासी के चन्द्रमा की कलाओं के समान, शील के अठारह हजार भेदों का स्वामी एवं शुद्ध स्वर्ण के समान होता है।
कर्म
एक समय में जो समय प्रबद्ध बँधता है, उसकी इतनी स्थिति पड़ सकती है कि असंख्यात भवों में भोगना पड़ सकता है, जैसे हाटबाजार के दिन कमाता है, कई दिन बैठ के खाता है, अनेक भवों में कर्म सञ्चित करता है और तपस्या से एक क्षण में नष्ट कर देता है, जैसे वर्षों में धन कमाता है और लड़की की शादी में सब चला जाता है या बीमारी में चला जाता है।
कर्म
ततश्चनिर्जरा-कर्म आता है तो पता नहीं चलता, जब जाता है तो कष्ट होता है, तीर्थंकर भी उसके फल से नहीं छूटते हैं।
कर्म
राजा श्रेणिक की तेतीस सागर की आयु पश्चात्ताप से चौरासी हजार वर्ष सिंधु में बिंदु के समान रह गयी थी।
कर्म
जिस प्रकार ताला खोलने के लिये चाबी सीधी घुमाई जाती है और लगाने के लिये उल्टी, उसी प्रकार ''जिन रागादि भावों से कर्म आश्रव किया था, अब उनसे विपरीत 'वीतराग' भावों को बनाओ तो संवर निर्जरा होती है''।
कर्म
पुद्गल द्रव्य की कोई अपूर्व शक्ति है, जिसने जीव के केवलज्ञान स्वभाव का नाश कर दिया है।
कर्म
पुण्य-पाप को धूप-छांव की तरह मानकर मध्यस्थ रहना चाहिये।
कर्म
गीले कपड़ों को फ़ैलाने से जल्दी सूखता है उसी प्रकार समुद्घात से कर्मों की निर्जरा शीघ्र होती है।
कर्म
बन्धापसरण और बन्धव्युच्छित्ति में अन्तर-बन्धापसरण में संवर नहीं होता है, जैसे एक व्यक्ति आठ दिन की छुट्टी लेकर गया। बन्धव्युच्छित्ति में संवर हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति रिटायर्ड हो गया।
कर्म
तीन करण- मिथ्यात्व पर तीन करण रूपी थप्पड़ पड़े, वह मर गया लेकिन अनन्तानुबन्धी छिप गयी, जैसे ऊधम करने वालों में एक बच्चे पर थप्पड़ पड़ा तो शेष बच्चे भाग गये।
कर्म
प्रायोग्यलब्धि में, चौतीस बन्धापसरणों में, छठवे गुणस्थान में बँधने वाली प्रकृतियों का भी बन्ध रुक जाता है।
कर्म
अनन्तानुबन्धी का पहले गुणस्थान में बन्ध प्रथम समय से होने लगता है, उदय एक आवली तक नहीं होता है।
कर्म
उदयावली के कर्म की नियम से निर्जरा होती है जैसे टिकिट खरीदने जो रेलिङ्ग में चला गया वह इधर-उधर नहीं होता है।
कर्म
कृत्यकृत्य वेदक के पहले भाग में मरकर देव, दूसरे भाग में मरकर देव-मनुष्य, तीसरे भाग में मरकर देव-मनुष्य-तिर्यञ्च, चौथे भाग में मरकर चारों गतियों में जा सकते हैं।
कर्म
ईर्यापथ आस्रव का समय प्रबद्ध आठ कर्मों के समय प्रबद्ध से असंख्यात गुणा होता है।
कर्म
गर्भज मत्स्य पाँच सौ धनुष की अवगाहना वाला होता है, वह सप्तम नरक नहीं जाता है, सम्मूर्च्छन मत्स्य एक हजार योजन की अवगाहना वाला होता है, वह सप्तम नरक जाता है।
कर्म
भोगभूमि में भी अकाल मरण होता है (ध.15,पृ.299)।
कर्म
श्लोकवार्तिक में नोकर्म द्रव्य परिवर्तन के आधे को अर्द्धपुद्गल परावर्तन माना है।
कर्म
त्रसनाली में उत्पन्न होने वाले जीवों को तीन समय लगते हैं, त्रसनाली के बाहर उत्पन्न होने वाले जीवों को चार समय लगते हैं।
कर्म
पुण्य से अत्यन्त दूर वस्तु भी पास आ जाती है, पाप से हाँथ की वस्तु भी नष्ट हो जाती है।
कर्म
मैनासुन्दरी ने तप के प्रभाव से दसवें स्वर्ग में स्त्रीपर्याय को छेदकर इन्द्र पद को प्राप्त किया, आगे मोक्ष जावेंगी। सिद्धचक्र के प्रभाव से अनन्त संसारी श्रीपाल जी ने मुक्ति पद को पाया था।
कर्म
षट्कर्म की व्यवस्था के समय, आदिकुमार ने बैल के मुख में मुसीका लगाने का नियम बनाया था, जिसके कारण अन्तराय कर्म का बन्ध किया था, इसलिए उनको तेरह माह छः दिन तक आहार नहीं मिला था।
कर्म
इन्द्र गर्भ से पहले ही जिनको नौकर की तरह हाथ जोड़कर खड़ा रहता था और जो स्वयं कर्मभूमि में उपदेशक थे और जिनका पुत्र चक्रवर्ती था, ऐसे आदिनाथ भगवान् स्वयं छः माह तक भूखे रहकर पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे, कर्म का चरित्र बड़ा विचित्र है, उसका उल्लङ्घन करने में कोई समर्थन नहीं होता है।
कर्म
गृहस्थ के द्वारा मरण पर्यन्त जो पाप सञ्चित किया जाता है, उस सब पाप को एक रात्रि का दीक्षित साधु नियम से भस्म कर देता है।
कर्म
आलोचना एवं प्रायश्चित्त किये विना महान तप भी संवर के साथ होने वाली निर्जरा को नहीं करता है, प्रायश्चित्त कर लेने पर निर्मल दर्पण में मुख की तरह तप निर्मल होता है।
कर्म
भील से भगवान् और मारीच से महावीर- जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी के मधु नामक वन में 'पुरूरवा' नामक भीलों का राजा हुआ, उसकी कलिका नाम की स्त्री थी। उसी वन में सागरसेन मुनि ध्यान मग्न थे। भील ने उनको मारना चाहा। स्त्री ने रोका, भील ने प्रभावित होकर मुनि से मद्यादि का त्याग किया। भील मरकर सौधर्म स्वर्ग में उत्पन्न हुआ, स्वर्ग से अयोध्या में भरत चक्रवर्ती की रानी अनन्तमति से ज्येष्ठ पुत्र मारीच हुआ। भगवान् आदिनाथ के साथ दीक्षित हुआ, फिर भ्रष्ट होकर परिव्राजक बनकर स्वर्ग गया, वहाँ से आकर करीब पाँच भव तक परिव्राजक होता रहा और स्वर्ग जाता रहा। उसके बाद असंख्यात भव तक त्रस-स्थावरों में भटककर ब्राह्मण हुआ, फिर परिव्राजक होकर पाँचवे स्वर्ग गया। सुरम्या देश के पौदनपुर में त्रिपृष्ठनारायण हुआ, वहाँ से मरकर सात वे नरक गया, वहाँ से सिंह बनकर प्रथम नरक गया, वहाँ से निकल कर फिर सिंह हुआ। अजितञ्जय, अरिञ्जय नामक रिद्धिधारी मुनियों के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्त किया, 'दस' भव बाद में तीर्थंङ्कर होंगे 'ऐसा श्रीधर तीर्थंङ्कर से मैंने सुना है'। मुनिराज ने शेर से कहा, शेर ने श्रावक के व्रत लिये और सन्यास पूर्वक मरणकर, पहले स्वर्ग में सिंहकेतु नामक देव हुआ, चौथे भव में धातकी खण्ड की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा सुमित्र और मनोरमा रानी के प्रियमित्र नाम का चक्रवर्ती हुआ। दो हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो बारहवे स्वर्ग गया, छत्रपुर में नन्दिवर्धन राजा के नन्द नामक पुत्र हुआ। सोलह कारण भावना भाकर तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया, फिर सोलहवें स्वर्ग गया, भरत क्षेत्र में विदेह देश के कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ की प्रियकारिणी (त्रिशला) रानी ने सोलह स्वप्न देखे। फल पूँछा, गर्भकल्याणक, रत्नवृष्टि, नगरी रचना, आश्विन शुक्ल षष्ठी को, छप्पन कुमारी देवियों ने आकर सेवा की।
कर्म
मुनि दीक्षा होते ही संसार आधा हो जाता है, गुणस्थान सात हो जाते हैं, मोक्ष के लिये चौदह गुणस्थान पार करना होते हैं, मोहनीय की अट्ठाईस प्रकृति में से चौदह समाप्त हो जाती हैं।
कर्म
''जैसी करनी वैसा फल, आज नहि तो निश्चित कल''। ज्ञान रुपी दीप में तप रुपी तेल भरकर, भ्रम छोड़कर आत्मा रुपी घर का अवलोकन करना चाहिए, इसके विना पहले के बैठे हुए कर्म रुपी चोर नहीं निकल सकते हैं।
कर्म
भगवान् कर्मों से मुक्त हुए थे इस दिन साधु भी चतुर्मास के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं, भगवान् ने कर्मजाल को साफ किया था, लोग घरों से मकड़ी के जाल को साफ कर लेते हैं।
कर्म
जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो निश्चित कल।
कर्म
संसारी प्राणी सन्त की तरह जन्मता है, कंस की तरह जीता है और कष्ट से मरता है एवं जन्म के समय दोनों हाथ कानों के पास होते हैं, अर्थात् कहता है कि हे भगवान्! अब मैं कान पकड़ता हूँ कोई पाप नहीं करूँगा, मुट्ठी बाँध के आता है अर्थात् पुण्य लेकर आता है और खाली करके अर्थात् पाप लेकर जाता है।
कर्म
मोक्ष मार्ग में उतावली करने से कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा, संसार का वियोग ही मोक्ष का संयोग है।
कर्म
पहले जो कमाया उसे भोगने में आनाकानी मत करो, सम्यग्दृष्टि वही है जो पाप से स्वयं को अलिप्त रखे।
कर्म