Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कर्म

पुरा गर्भादिन्द्रो मुकुलितकरः किङ्कर इव, स्वयं स्रष्टासृष्टेः पतिरथनिधिनां निज सुतः। क्षुधित्वाषण्मासान् स किल पुरुरप्याट जगती- महो केनाप्यस्मिन् विलसितमलङ्घ्यं हृत विधेः।।

इन्द्र गर्भ से पहले ही जिनको नौकर की तरह हाथ जोड़कर खड़ा रहता था और जो स्वयं कर्मभूमि में उपदेशक थे और जिनका पुत्र चक्रवर्ती था, ऐसे आदिनाथ भगवान् स्वयं छः माह तक भूखे रहकर पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे, कर्म का चरित्र बड़ा विचित्र है, उसका उल्लङ्घन करने में कोई समर्थन नहीं होता है।

Before He was even in the womb Indra stood with folded hands like a servant, He Himself was the teacher of the age of action, and His son was a Chakravarti — yet that very Lord Adinath wandered the earth hungry for six months. The play of karma is most strange; none has the power to transgress it.

— आराध्य सूत्र · #16

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