Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Karma

कर्म

370 सूत्र · पृष्ठ 4 / 5

कार्य की सिद्धि माया से नहीं पूर्व पुण्य से होती है।
कर्म
जिनको पचास वर्ष शास्त्र सुनते हो गये हैं, फिर भी उन्हे धर्म का ज्ञान नहीं हुआ, यह सब अन्याय का धन और अभक्ष्य भक्षण का फल है।
कर्म
सम्पत्ति की मित्रता पुण्य से है, व्यक्ति से नहीं।
कर्म
जैसे तुषारपात से कमल मुरझा जाते हैं वैसे ही लोभ कषाय के उदय में सम्यग्दर्शनादि गुण नष्ट हो जाते हैं।
कर्म
कर्म कमण्डलु कर गहे, ज्ञानी मन पछताय। वापी–कूप-तड़ाग में, बूँद न अधिक समाय।।
कर्म
धन की आशा से मलिन चित्त जीव जो कर्म बांधता है, उसकी शान्ति करोड़ों जन्म की तपस्या से होती है।
कर्म
पक्के रङ्ग की तरह जिसका लोभ होता है वह नरक गति में जाता है, रथ के चक्र के मल की तरह जिसका लोभ होता है वह पशुगति में जाता है, शरीर के मेल की तरह जिसका लोभ होता है वह मनुष्य गति में जाता है और हल्दी के रङ्ग की तरह जिसका लोभ होता है वह देवगति में उत्पन्न होता है।
कर्म
असत्य बोलने से मुख सम्बन्धी रोग, गूँगा, तोतला, दुःस्वर, तथा वाणी सम्बन्धी दुर्गुण एवं एकेन्द्रियादि में जन्म होता है।
कर्म
झूठ बोलने से प्राणी नरकों के पशुगति के और निगोद अवस्था के अत्यन्त दुःख पाते हैं।
कर्म
पर का अनादर व निन्दा और अपनी प्रशंसा से जो नीच गोत्र कर्म का बन्ध होता है, वह अनेक करोड़ों जन्मों में नष्ट करना दुष्कर है।
कर्म
असत्य से प्राणी अगले जन्म में अल्पज्ञानी, मूर्ख, ज्ञान रहित, बहरा व मुख के अनेक रोगों वाला होता है।
कर्म
कर्तृत्व बुद्धि- पड़ोसी राजा ने चढ़ाई कर दी, राजा सामना करने में असमर्थ था, अतः रानी को घोड़े पर बैठा कर भाग गया, रानी गर्भवती थी, उसने रास्ते में बच्ची को जन्म दिया, सम्भाल न सकने से बच्ची को झाड़ी में फेक दिया, झाड़ी के ऊपर मधुमक्खी का छत्ता था, जिसका शहद उसके मुँह में गिरता रहा, जिससे वह सात दिन तक जीवित रही, राजा ने लौटते समय उसे बापस उठा लिया, आगे चलकर भारत सम्राट जहाँगीर की पत्नि नूरजहाँ बनी सोचो किसने किया उसका पालन? बालिका के पुण्य ने।
कर्म
रक्षक कौन- अञ्जना को उसकी सास ने घर से निकाल दिया था, जिससे वह भटकती–भटकती एक गुफा में अपनी दासी के साथ पहुँची, उसी गुफा में हनुमान जी का जन्म हुआ था, वहाँ से आकाश में जाते हुए प्रतिसूर्य विद्याधर ने गुफा में देखा, तो वह नीचे गुफा की ओर आया, और उसे अपनी बहन बनाकर अपने साथ ले जाने लगा, अञ्जना को विमान में बैठाया, हनुमान माँ की गोद में थे, अचानक माँ की गोद से नीचे गिर गये, नीचे घना जङ्गल था, सब लोग घबराए और विमान को जङ्गल में उतारा गया, सब लोग रोते हुए हनुमान की खोज करने लगे, माँ को हनुमान की आवाज आई, सुनकर पास गयी, वहाँ हनुमान एक चट्टान पर पड़े थे, जिस चट्टान पर गिरे थे उस चट्टान के टुकड़े–टुकड़े हो गये थे, और हनुमान हँस–खेल रहे थे, इतनी ऊँचाई से गिरने पर भी उनको चोट तक नहीं लगी, किसने की हनुमान की रक्षा? हनुमान के पुण्य ने।
कर्म
ऐसे अनन्त जीव हैं, जिन्होंने आज तक त्रस पर्याय को प्राप्त नहीं किया, भावों की कलुषता के कारण वे निगोदवास को नहीं छोड़ते हैं।
कर्म
आज तक आयु और नोकर्म की निर्जरा की है, पर कर्म निर्जरा का लक्ष्य होना चाहिए।
कर्म
जिसकी दृष्टि निर्जरा पर होती है, वह हर प्रसङ्ग हँस कर निकाल देता है।
कर्म
जो यह संसारी जीव है उसके यह राग-द्वेष आदि अशुद्ध भाव होते हैं, उनसे ज्ञानावरणादि आठ कर्मों का बन्ध होता है, कर्मों से एक गति से दूसरी गति को प्राप्त होता है, गति को प्राप्त हुए जीव के औदारिकादि शरीर होता है, शरीर में इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, इन्द्रियों से विषय ग्रहण होता है और उससे राग तथा द्वेष उत्पन्न होते हैं, संसार रुपी चक्र में भ्रमण करने वाले जीव के ऐसे अशुद्ध भाव अभव्य के अनादि-अनन्त और भव्य के अनादि-सान्त होते हैं, ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है।
कर्म
गृहस्थ की निर्जरा गजस्नान या मथानी की रस्सी की तरह है, एक ओर से निर्जरा होती है और दूसरी ओर असंयम से पुनः कर्म बँध जाते हैं।
कर्म
विषयासक्ति से देव भी एकेन्द्रियों में जन्म ले लेता है और नारकियों को वहाँ की सामग्री में राग न होने से पञ्चेन्द्रियों में ही उत्पन्न होते हैं।
कर्म
पाँचमार्ग हैं- 1.मोक्ष मार्ग, 2.नरकमार्ग, 3.तिर्यञ्चमार्ग, 4.मनुष्यमार्ग, 5.देवमार्ग मनुष्य पर्याय जंक्शन हैं, यहाँ से चौरासी लाख योनियों के द्वार खुलते हैं।
कर्म
पाप त्याग के बाद भी अल्प रहे संस्कार। झालर बजना बन्द हो, फिर भी हो झङ्कार।।
कर्म
जीव ने अज्ञान पूर्वक जो दुःखदायी कर्म बाँधे हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है, उसी तरह उपवास उन सब पापों को जला देता है।
कर्म
जल से उत्पन्न हुआ कीचड़ जल से ही शुद्ध होता है और मन से उत्पन्न हुआ पाप मन से पश्चाताप करने से ही शुद्ध हो जाता है और शरीर से किया हुआ पाप शरीर से तप करने पर ही शुद्ध होता है।
कर्म
निकाचित कर्म तब तक भस्म नहीं होते जब तक जिनागम में कथित तपरूपी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती है।
कर्म
प्रमाद से भरी हुई प्रवृत्ति, कलुषता (कषाय की तीव्रता), विषयों की लोलुपता, दूसरों को पीड़ा देना और पर की निन्दा करना ये सब पाप आस्रव के कारण हैं।
कर्म
जो जीर्णोद्धार, प्रतिष्ठा, जिनपूजा और तीर्थ यात्रा के अवशिष्ट धन निर्माल्य को भोगता है, वह बाद में नरक के दुःख भोगता है।
कर्म
जो मूर्ख दूसरे का धन लेते हैं वे पाप के उदय से अपनी लक्ष्मी का भी नाशकर जन्म-जन्म में दरिद्री होते हैं।
कर्म
जितनी भी वस्तुएँ दुःख का कारण होती हैं वह सब पाप का फल है, इस अनिष्ट का कारण पाप को प्राण जाने पर भी नहीं करना चाहिए।
कर्म
सच है अधिक पाप का अथवा अधिक पुण्य का उदय उसी वक्त हो जाता है, पूजा करने वाले स्वर्ग में जाते हैं, निर्माल्य खाने वाले नरक में जाते हैं, विष खा लेना अच्छ परन्तु निर्माल्य खाना अच्छा नहीं है।
कर्म
अन्याय करने से थोड़े ही दिनों में जितना पुराना और नवीन धन था सब नष्ट हो गया।
कर्म
पुण्य से राज वैभव आदि मिलता है, देवता मुख्य जान सत्कार करते हैं, अतः पुण्य करना चाहिए।
कर्म
गर्भ में ही स्वर्ग की आयु- गर्भस्थ शिशु जो अभी कुछ घण्टों का है वह तीसरे-चौथे स्वर्ग की आयु बाँध सकता है, जो कुछ दिनों का है तो वह पाँचवे-छटवे स्वर्ग तक की आयु बाँध सकता है, तीन माह से लेकर सात-आठ माह का नौवें से बारह वे स्वर्ग तक की आयु बाँध सकता है, जब अविकसित दशा में देवायु का बन्ध कर सकता है, तो विकसित अवस्था में क्या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता ?
कर्म
ध.पु.सप्तम्- भवनत्रिक के देव तथा सौधर्म-ईशान स्वर्ग के देव मरकर मनुष्य या तिर्यञ्च के गर्भ में आकर अन्तर्मुहूर्त पश्चात् वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, तीसरे-चौथे स्वर्ग के देव पृथक्त्व (तीन से नौ तक की संख्या को पृथक्त्व कहते हैं) मुहूर्त पश्चात तीसरे-चौथे स्वर्ग में उत्पन्न हो सकते हैं, पाँचवे से आठवें स्वर्ग के देव पक्ष पृथक्त्व में वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, नौवें से बारहवें स्वर्ग के देव मास पृथक्त्व में वहीं उत्पन्न हो सकते हैं, तेरहवे से सोलहवे स्वर्ग के देव तथा ग्रैवेयक, अनुदिश, अनुत्तर स्वर्ग के देव मनुष्य स्त्री के गर्भ में आकर वर्ष पृथक्त्व पश्चात् उन्हीं स्वर्गों में उत्पन्न हो सकते हैं।
कर्म
उपचरित असद्भूत व्यवहार नय से एक निगोदया जीव की दो सौ पचास आवलि प्रमाण आयु होती है, पौन सेकेण्ड में चार हजार चार सौ सैतालिस आवलियाँ होती हैं, पौन सेकेन्ड का एक श्वाँस होता है, उसमें निगोदिया जीव अट्ठारह बार जन्म और मरण करता है, स्वस्थ पुरूष की एक मिनिट में अठत्तर बार श्वाँस चलती है।
कर्म
ध्रुव बन्धी प्रकृतियों की अपेक्षा शुद्धोपयोगी को भी पाप प्रकृति का बन्ध होता है और अशुभोपयोगी को भी पुण्य प्रकृति का बन्ध होता है।
कर्म
सन्तान किसी एक की नहीं होती, उसी प्रकार रागादि एक से नहीं बल्कि आत्मा और कर्मोदय दोनों से होते हैं।
कर्म
शुभोपयोग से कर्म बन्धता भी है निर्जरा भी होती है, जैसे काँटे से काँटा निकलता है, उसी सीढ़ी से चढ़ना भी होता है उतरना भी होता है, पानी से मकान गिरता भी है बनता भी है, फसल पानी से उगती भी है और नष्ट भी होती है, हँसने और रोने की आँखे एक ही होती हैं, दवाई मुख्य है, पर साधन के रूप में इञ्जेक्शन भी महत्त्व पूर्ण होता है।
कर्म
एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता नहीं है तो इसका यह अर्थ नहीं कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य के लिये निमित्त भी नहीं है।
कर्म
निमित्त और उपादान-राधा ने कृष्ण जी से कहा मुझे बाँसुरी सुनाओ, सुनने की तीव्र इच्छा थी, दुनिया का ये स्वभाव है कि जिसको जो कला आती है, उसे करने को कहो तो वह पहले फूलता है, कृष्णजी ने कहा आज हमारा सुनाने का मन नहीं है, किसी को अपने पक्ष में करना है तो उसकी प्रशंसा कर दो, तब राधा ने कहा, 'अर्थ तो है तुम्हारी श्वाँस का, वरना ये टुकड़ा है बाँस का' असंख्यात जीव भगवान् के चरणों में बैठते हैं, तो भी क्षायिक सम्यक्त्व सबको नहीं होता, निमित्त तो सबके लिए बराबर है पर उपादान नहीं है, इसलिए जरूरी नहीं कि निमित्त है तो उपादान जाग ही जाए, कृष्णजी प्रशंसा सुनकर बजाने बैठ गए, घण्टों निकल गये, अब राधा को भूख लगी यदि काम बन्द कराना है तो निन्दा कर दो, राधा ने कहा- 'अर्थ क्या है तुम्हारी श्वाँस का, गर न होता ये टुकड़ा बाँस का', कृष्ण जी ने बाँसुरी बजाना बन्द कर दिया, बताओं दोनों में कौन मुख्य है ? वस्तुत: यदि श्वाँस में जुकाम हो जाए तब कितनी अच्छी बाँसुरी हो स्वर नहीं आयेगा, श्वाँस अच्छी है और बाँसुरी फटी है तो भी सुर नहीं आता, अत: निमित्त उपादान की बहुत बड़ी महिमा है, बाँसुरी की उतनी ही कीमत जितनी श्वाँस की।
कर्म
जीवविपाकी= भाव है, पुद्गलविपाकी= द्रव्य है, क्षेत्रविपाकी= क्षेत्र है, भवविपाकी= काल है।
कर्म
सासादन गुणस्थान में मनुष्यों की संख्या बावन करोड़, अन्य गति के जीवों की संख्या पल्य के असंख्यातवे भाग है।
कर्म
अनन्तकाल से संसारी थे, कोई देव या नारकी बना, कोई क्रोधी, कोई सज्जन, कोई हिंसक, कोई अहिंसक, कोई समतावान, कोइ विषमतावान ये सब भावों का खेल हैं।
कर्म
ये रागद्वेष आदि औदयिक भाव हैं, अवग्रहादि क्षायोपशमिक भाव हैं।
कर्म
लेश्या- एक मिथ्यादृष्टि मुनि पर आरा चला रहा है और एक मिथ्यादृष्टि मुनिव्रत पालन कर आरा के कष्ट को सह रहा है, दोनों का गुणस्थान एक है, पर लेश्या भिन्न है।
कर्म
उपशम सम्यक्त्व, क्षयोपशम सम्यक्त्व, अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना और देशसंयम, ये चारों असंख्यात बार भी होकर छूट सकते हैं।
कर्म
आदि के तीन और अन्त के तीन गुणस्थानों में औपशमिक भाव नहीं होता है।
कर्म
द्वितीय अध्याय में मोहनीय कर्म की अठ्ठाईस प्रकृतियों का वर्णन है, आनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान क्रोध मान माया लोभ, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये चौदह सर्वघाती प्रकृतियाँ हैं, सञ्ज्वलन क्रोध मान माया लोभ, हास्य आदि नौ और सम्यग्प्रकृति ये चौदह देशघाती प्रकृतियाँ हैं।
कर्म
उदयाभावी क्षय- सर्वघाती स्पर्धकों का अनुभाग अनन्त गुणा क्षीण होकर देशघाती रूप से उदय में आता है, सर्वघाती रूप से उदय का अभाव है, अत: उन सर्वघाती स्पर्धकों की उदयाभावी क्षय संज्ञा है।
कर्म
भाँग के नशे का नीबू का रस लेने से अनन्त गुणा हीन स्थिति अनुभाग वाला होकर उदयावली में आना उदयाभावी क्षय कहलाता है।
कर्म
जो असंख्यात भव के बाद मोक्ष जायेंगे उनको भी निकट भव्य कहते हैं।
कर्म
जो भव्य ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह भव में मोक्ष जाते हैं, उन्हें भव्य पुण्डरीक कहते हैं।
कर्म
आसन्न भव्य-जो पृथक्त्व(3से लेकर 9के बीच) भव में मोक्ष चला जाता है, दूर भव्य अर्ध पुद्गल परावर्तन में, दूरानुदूर भव्य हमेशा नित्यनिगोद में रहते हैं उनको मोक्ष के निमित्त ही नहीं मिलते हैं, अभव्य तो चारों गतियों में घूमते हैं।
कर्म
उनतीस अङ्ग प्रमाण पर्याप्तक मनुष्यों में दो या तीन अभव्य होंगे, देवों में पाँच-छ: अभव्य होंगे, नारकियों में तीन-चार अभव्य होंगे, बाकी एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय में अभव्य पाए जाते हैं।
कर्म
विसंयोजना का उदाहरण- किरायेदार मकान छोड़ के गया, अपना कुछ सामान पड़ोसी को दे गया यदि वह पुन: वहाँ आता है तो फिर अपना सामान ले लेता है।
कर्म
नित्य निगोदिया जीव के पञ्च परावर्तन नहीं होते हैं क्योंकि 66,336 बार जन्म-मरण नहीं होते हैं।
कर्म
संसारी जीव राशि अक्षय अनन्त है, छ: माह आठ समय में छ: सौ आठ जीव मोक्ष जाते हैं, सिद्धों की वृद्धि तथा संसार की हानि होने पर भी कभी संसार खाली नहीं होगा, जैसे लवणसमुद्र का पानी एक तृण में एक बूँद लेकर कालोदधि में डालने से, कालोदधि की वृद्धि हुयी, और लवणसमुद्र एक बूँद खाली हुआ।
कर्म
लिफाफा को टिकिट ले जाता है या टिकिट को लिफाफा, कर्म जीव को विग्रह गति में ले जाता है उसे अनुश्रेणि गति कहते हैं।
कर्म
सूक्ष्म निगोदिया मनुष्य पर्याय धारण कर देशव्रती बन सकता है, पर अग्निकाय, वायुकाय जीव तिर्यञ्च ही बनते हैं।
कर्म
जिस प्रकार भार ढोने वाला पुरुष कांवर के द्वारा भार ढोता है, उसी प्रकार संसारी जीव शरीर रूपी कांवर के द्वारा कर्मों के भार को ढोता है।
कर्म
व्यक्ति अपराध बाहर करता है, भोगता जेल में है, उसी प्रकार अपराध यहाँ करता भोगता नरक में है।
कर्म
देव और नारकी दोनों का उप्पाद जन्म होता है पर देवों का सुखकर है, नारकियों का दु:खकर है, नरक में कोई दु:ख की कथा सुनने वाला नहीं, जिसको सुनावें वही भाला बनकर दु:ख देता है, यहाँ चींटी आदि को तो सुख है, किन्तु वहाँ क्षण मात्र भी सुख नहीं है, वहाँ का शोरगुल सुनलें, तो मनुष्य का हार्ट फेल हो जाये।
कर्म
अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना का काल छ्यासठ सागर है, दो छ्यासठ सागर भी सम्भव है जितना क्षयोपशम सम्यग्दर्शन का है, अन्तर्मुहूर्त के लिये तीसरे गुणस्थान में आकर पुन: ऊपर जा सकता है, प्रथमोपशम सम्यक्त्व वाला भी विसंयोजना करता है।
कर्म
नरक में आठ प्रकार के दु:ख- 1.पृथ्वी, 2.नदी, 3.वृक्ष, 4.गर्मी, 5.ठण्डी, 6.परस्पर में लड़ने का दु:ख, 7.भूख, 8.प्यास।
कर्म
'परिणाम' स्पर्श- हजार बिच्छू काटें उससे अधिक पृथ्वी के स्पर्श का कष्ट है। रस- हलाहल जहर के समान रस का कष्ट है। गन्ध- सप्तम नरक की मिट्टी का चने के बराबर दाना मध्यलोक में आ जाये, तो 'साड़े चौबीस' कोस के पञ्चेन्द्रिय जीव उसकी दुर्गन्ध से मर जायेंगे। रूप- नारकियों का रूप देखने मात्र से हार्टफैल हो जाये। देह- नारकियों का शरीर समस्त रोगों से ग्रसित होता है एवं नरक में कोई औषधि नहीं मिलती है।
कर्म
नरक में ऊपर के बिलों में ऊष्ण वेदना और नीचे के बिलों में शीतवेदना होती है, तथा वहाँ अपृथक् विक्रिया होती है जो भी विक्रिया करते हैं स्वयं के शरीर में ही होती है।
कर्म
जैसे पानी में डण्डा मारें तो पानी उचटता है और फिर उसी में मिल जाता है, उसी प्रकार नारकियों का शरीर तिल-तिल बराबर टुकड़े होने पर फिर से मिल जाता है मरते नहीं हैं पर पीड़ा अत्यधिक होती है।
कर्म
जैसे उल्लू को रात्रि में स्पष्ट दिखता है उसी प्रकार नरक में अन्धकार होने पर भी नारकियों को स्पष्ट दिखाई देता है।
कर्म
अम्बावरीष जाति के असुर अगर लड़ाई कराना बन्द कर दें, तो तीसरे नरक तक आधा दु:ख कम हो जायेगा।
कर्म
नरकों में तीर्थङ्कर प्रकृति की सत्ता वाले जीव के छह माह पूर्व साता का उदय आता है तब परकोटा बन जाता है, अर्थात् सुरक्षा हो जाती है।
कर्म
मनुष्य प्रतिदिन आहार करता हुआ भी सङ्कल्प के कारण छठवें-सातवें गुणस्थान वाला हो सकता है, सङ्कल्प के अभाव में इन्द्र प्रतिदिन आहार नहीं करता है तो भी छठवें-सातवें गुणस्थान वाला नहीं होता है।
कर्म
जीव और पुद्गल की कुश्ती होती रहती है, जीत-हार किसी की भी हो, लेकिन हानि जीव की ही होती है।
कर्म
जीव कहता है, हे भगवन्! इन कर्म रूपी दुष्टों ने हमें बेहाल कर दिया है, जाँच हुयी तो पुद्गल कहता है, कि भगवन्! इन्होंने राग-द्वेष से कर्मों का कर्जा लिया है, वो चुका देवें तो हम चले जायेंगे।
कर्म
परमार्थ से यदि काय से पाप हुआ है तो सौ प्रतिशत दण्ड, वचन से हजार प्रतिशत दण्ड, मन से दस हजार प्रतिशत दण्ड भोगना पड़ता है। लोकव्यवहार में मन से पाप हुआ है तो कोई दण्ड नहीं मिलता, वचन से पाप हुआ है तो हजार प्रतिशत दण्ड मिलता है और काय से पाप हुआ है तो दस हजार प्रतिशत दण्ड मिलता है।
कर्म
जो पाप मन से होता है वह मन से आलोचना करने से धुल जाता है, जैसे पानी से उत्पन्न कीचड़ पानी से धुल जाता है।
कर्म
ईर्यापथ आश्रव- बन्द घर में आये अतिथि तत्काल वापस हो जाते हैं तथा दीवाल पर पत्थर फेंकने से तत्काल नीचे गिर जाता है, उसी प्रकार ईर्यापथ आस्रव में स्थिति बन्ध नहीं होता है।
कर्म