Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 38 / 41

एक समय में जो समय प्रबद्ध बँधता है, उसकी इतनी स्थिति पड़ सकती है कि असंख्यात भवों में भोगना पड़ सकता है, जैसे हाटबाजार के दिन कमाता है, कई दिन बैठ के खाता है, अनेक भवों में कर्म सञ्चित करता है और तपस्या से एक क्षण में नष्ट कर देता है, जैसे वर्षों में धन कमाता है और लड़की की शादी में सब चला जाता है या बीमारी में चला जाता है।
कर्म
प्रतिक्रमण- घर की सफाई प्रति दिन की जाती है फिर भी पक्ष आदि बीतने पर विशेष रूप से सफाई की जाती है वैसे ही प्रतिक्रमण भी प्रतिदिन किया जाता है पर पाक्षिक विशेष रूप से किया जाता है, जो साधु भाव प्रतिक्रमण से युक्त होकर और उसके अर्थ में मन लगाकर सदा प्रतिक्रमण सूत्र को पढ़ता है, वह कर्मों की महान निर्जरा करता है।
धर्म
प्रतिक्रमण विधान- आदिनाथ भगवान् व महावीर भगवान् के समय प्रतिदिन प्रतिक्रमण करने का विधान है, शेष बाईस तीर्थंकरों के समय सब व्रतों में आहार, विहार, दुःस्वप्न, ईर्यापथ आदि में दोष लगें तब प्रतिक्रमण करते थे, मध्यम तीर्थंकरों के समय शिष्यों के बुद्धिकौशल था, पराक्रम सुदृढ़ था, चित्त एकाग्र और स्वलक्ष्य में दृष्टि रहती थी, किन्तु प्रथम और ''अन्तिम तीर्थंकर के समय शिष्य अज्ञानी व चञ्चल चित्त हैं, अपने अपराधों की स्मृति नहीं रहती है, अतः सबका प्रतिक्रमण करते हैं''।
धर्म
मोक्ष के साधन में अनुपयोगी नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का परमार्थ से सेवन नहीं करना चाहिए, परमार्थ से अर्थात् उपसर्ग आदि के कारण अयोग्य का सेवन होने पर भी प्रत्याख्यान में हानि नहीं होती है, शुद्धोपयोग में सहायक नामादि का सेवन मन को पवित्र करता और ''सदा अपराध की गन्ध से दूर रहने वाला साधु रत्नत्रय का आराधक होता है''।
धर्म
आचार्य शिवसागर जी ने स्वाध्याय किया, पण्डित पन्नालाल जी शास्त्र विराजमान करने गये तो आचार्यश्रीजी पीछे से आये और कहा! रुको, उन्होंने मार्जन किया, फिर शास्त्र जी विराजमान किया और कहा! प्रतिष्ठापन समिति हमारी है भैया।
विनम्रता
पवनञ्जय के पास रावण का पत्र आया, वरूण से युद्ध हो रहा है, पवनञ्जय ने हनुमान से कहा, बेटा तुम राज्य सम्भालो, मैं युद्ध को जा रहा हूँ, हनुमान ने कहा पिता जी, आप घर पर रहो मैं युद्ध को जाऊँगा, पिता ने कहा बेटा, तुमने कभी युद्ध देखा नहीं, तुम मत जाओ, तब हनुमान ने कहा! पिताजी क्या कोई पहले मोक्ष को देखकर आता है बाद में मोक्ष जाता है?
पुरुषार्थ
पुष्पडाल मुनि ने दीक्षा लेकर बारह वर्ष तक साधना की, लेकिन स्त्री का मोह नहीं छूटा, किन्तु वे ही बाद में घोर तप कर जम्बूस्वामी बने, महावैरागी बने और केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष चले गए।
अनासक्ति
वृषभसेन महाराज आठ वर्ष की उम्र में मुनि बन गये, किसी बैरी ने शिला को ऊष्ण कर दिया, महाराज ने नियम लिया था कि इसी शिला पर बैठेंगे, आहार के बाद आये शिला पर पैर रखते ही जलने लगे, ध्यान में लीन हो गये और केवलज्ञान प्राप्त हो गया था।
ध्यान
महावीर भगवान् के समवसरण में सात सौ केवली थे, वे सभी पञ्चमकाल में बासठ वर्ष के भीतर मोक्ष चले गये, तीन अनुबद्ध केवली, महावीर भगवान् के निर्वाण होने के बाद, गौतम स्वामी बारह वर्ष, सुधर्मा स्वामी बारह वर्ष जम्बूस्वामी अड़तीस वर्ष तक विहार करते रहे।
धर्म
एक मत के अनुसार जम्बूस्वामी को मिलाकर पाँच केवली हुए हैं जिनमें अन्तिम श्रीधरकेवली हुए हैं। पाँच श्रुतकेवली हुए हैं, 1.विष्णु जी, 2.नन्दिमित्र जी, 3.अपराजित जी, 4.गोवर्धन जी, 5.भद्रबाहु जी, इनके द्वारा सौ वर्ष तक प्रभावना हुयी। इनके बाद ग्यारह अङ्ग चौदह पूर्व के पाठी नहीं हुये। फिर ग्यारह अङ्ग दस पूर्व के पाठी मुनि हुये। फिर ग्यारह अङ्ग के पाठी हुये। फिर दस अङ्ग के पाठी हुये।
ज्ञान
छः सौ तेरासी वर्ष के बाद एक अङ्ग के भी पाठी नहीं हुये, फिर अंग के अंश के ज्ञाता हुये, उनमें धरसेन जी, पुष्पदन्त जी, भूतबली जी, गुणधर जी, माघनन्दि जी, यतिवृषभ जी, कार्तिकेय जी, जिनचन्द्र जी, समन्तभद्र जी, पूज्यपाद जी, अकलङ्क जी हुये जिनके द्वारा धर्म तीर्थ आज तक सुरक्षित है।
ज्ञान
1. शुक्रवार में गुरूवार का अभाव- प्रागभाव कहलाता है, 2.शुक्रवार में शनिवार का अभाव- प्रध्वंसाभाव कहलाता है, 3. एक अङ्गुलिका दूसरी अङ्गुलि में, एक फल का दूसरे फल में, एक तन्तु का दूसरे तन्तु में अभाव- अन्योन्याभाव कहलाता है, 4. एक परमाणु का दूसरे परमाणु में और एक जीव का दूसरे जीव में अभाव- अत्यन्ताभाव कहलाता है।
ज्ञान
तीन करण- मिथ्यात्व पर तीन करण रूपी थप्पड़ पड़े, वह मर गया लेकिन अनन्तानुबन्धी छिप गयी, जैसे ऊधम करने वालों में एक बच्चे पर थप्पड़ पड़ा तो शेष बच्चे भाग गये।
कर्म
अनुभवी से समझे विना शास्त्र पढ़ने से कोई सफल नहीं होता, जैसे ज्योतिषी ने कहा! मन्दिर के कलश में इतनी सम्पत्ति है, वह श्रावण कृष्ण एकम् को मिलेगी, उस नासमझ ने कलश तोड़ डाला, ज्योतिषी को झूठा ठहराया, किसी अनुभवी ने कहा भैया! इस तिथि को कलश की जहाँ छाया पड़े वहाँ खोदो, भाग्य से मिल मिलती है, कार्य की सिद्धि समझदार की होती है।
ज्ञान
गधों के बीच में शेर का बच्चा अपने स्वभाव को भूलकर बोझा ढो रहा था, शेर की दहाड़ सुनकर उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया, इसी प्रकार संसारी प्राणी संसार में रुल रहा है, जब गुरु रूपी सिंहों कि दहाड़ सुनता है तव अपने स्वरूप का ज्ञान होता है और फिर सिद्धों की श्रेणी मे जाकर मिल जाता है।
ज्ञान
रामचन्द्र जी का मोह हटा तो लक्ष्मण के मृत शरीर को छोड़ने में देर नहीं लगी, शत्रुघ्न से कहा! भैया राज्य सम्भालो, शत्रुघ्न ने कहा जो राज का लोभी हो उसे दो, मैं तो मुनि बनूँगा।
अनासक्ति
बारह प्रकार का समयसार- 1.समयपाहुड, 2.आत्मख्याति, 3.तात्पर्यवृत्ति, 4.समयसारनाटक, 5.छहढाला, 6.सकलज्ञेयज्ञायक की विनती, 7.मेरीभावना, 8.सहजानन्दी शुद्धस्वरूपी, 9.ध्यानसूत्राणि, 10.हूँ स्वतन्त्र निश्चल निष्काम, 11.सोऽहम्, 12.अहम्। 'यों है सकल संयम चरित, सुनिए स्वरूपाचरण अब' छहढाला में यहाँ से समयसार प्रारम्भ होता है।
ज्ञान
छह प्रकार की भूलें सकलज्ञेयज्ञायक विनती में बतायीं हैं- पहले अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग स्तुति की, फिर भक्त अपने दुःख रोने लगा 'उचरो निज दुःख जो चिर लहाय' 1. मैं भ्रम्यो, अपन पो बिसरि आप, 2. अपनाये विधि-फल पुण्य-पाप, 3. निज को पर का करता पिछान, 4. पर में अनिष्टता इष्ट ठान, 5. आकुलित भयो अज्ञान धारि, 6. तन परिणति में आपो चितार।
ज्ञान
एक रुद्र की इक्यासी लाख वर्ष पूर्व की आयु थी, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व गृहस्थ अवस्था में रहे, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व भावलिङ्गी मुनी रहे, सत्ताईस लाख वर्ष पूर्व भ्रष्ट होकर भोग भोगकर, मरकर नरक में गए।
चरित्र
मैनासुन्दरी की सीख- 1.पञ्चपरमेष्ठी का स्मरण करना, 2.चार प्रकार का दान, 3.पूजा आदि अपने षडावश्यकों का पालन करना, 4.धीरे बोलो-शान्ति मिलेगी, 5.भक्ति करो-मुक्ति मिलेगी, 6.सेवा करो-शक्ति मिलेगी, 7.दान करो-सम्मान मिलेगा, 8.सन्तोष रखो-सुख मिलेगा, 9.सहन करो-साथ मिलेगा, 10.अहं छोड़ो चमन खिलेगा।
चरित्र
माता की सीख- 1.पञ्चपरमेष्ठी ही मङ्गल एवं शरणाधार हैं, 2.सिद्धचक्र की आराधना करना, 3.तात्कालिक चमत्कार में नहीं फँसना, 4.स्त्रियाँ स्वभाव से चञ्चल होती हैं उनका सहसा विश्वास नहीं करना, 5.परदेश में ढोंगी, कपटी, मिथ्याचारी कौन है इसे समझकर विवेक से आत्मरक्षा करना, 6.परदेश में अत्यन्त सावधानी की जरूरत है, 7.परधन व परस्त्री पर भूलकर भी दृष्टिपात नहीं करना, 8.सप्त व्यसनों से सदैव दूर रहना, 9.जल, ठग, कञ्जूस, हठी, शस्त्रधारी, नेत्रहीन, नख सींग वाले पशु, वेश्या, रोगी, ऋणि, बन्दी, शत्रु, जुआँरी, चोर, झूठ बोलने वालों का विश्वास नहीं करना, इनके मिष्ट व्यवहार को गुड़ लपेटी तलवार समझना, 10.जटाधारी, मुण्डितशिर भस्मधारी, तान्त्रिक वनवासी, कुबड़ा, बोना, काना, छोटी गर्दन वाला, डाकिनी, शाकिनी, दूतों, दासियों का विश्वास नहीं करना, 11.धन प्राप्त होने पर अहङ्कार नहीं करना, 12.सबको माता बहिन तुल्य समझना, 13.स्थान, वन, नगर, राजकुल का विश्वास नहीं करना, 14.घोड़े से सात हाथ, सींग वाले पशु से पाँच हाथ, नारी से बीस हाथ, हाथी से साठ हाथ की दूरी बनाए रखना, क्रूर पशु का और चार्वाक् मत का विश्वास नहीं करना, 15.बोलना कम-विचारना ज्यादा, 16.बैठना कम-चलना ज्यादा, 17.लेना कम-देना ज्यादा, 18.उपदेश कम देना-आचरण ज्यादा करना, 19.आज्ञा कम देना-सेवा ज्यादा करना, 20.खेद कम करना-प्रसन्न ज्यादा रहना।
विवेक
किसकी आँखों में क्या रहता है- 1.माँ की आँखों में ममता, 2.पिता की आँखों में फर्ज, 3.पत्नी की आँखों में कर्तव्य, 4.भाई की आँखों में प्यार, 5.बहिन की आँखों में दुलार, 6.अमीर की आँखों में अहङ्कार, 7.गरीब की आँखों में दीनता, 8.मित्र की आँखों में सहयोग, 9.दुश्मन की आँखों में बदला, 10.कामी की आँखों में वासना, 11.क्रोधी की आँखों में ललिमा, 12.मानी की आँखों में बड़प्पन, 13.लोभी की आँखों में स्वार्थ, 14.कपटी की आँखों में चंचलता, 15.ज्वाँरी की आँखों में धन, 16.मांसभक्षी की आँखों में क्रूरता, 17.सज्जन की आँखों में दया, 18.शिष्य की आँखों में आदर, 19.गुरु की आँखों में 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की भावना ही रहती है।
विवेक
सर्व सिद्धिदायक सिद्धचक्र का व्रत करो और प्राण नाश होने पर भी व्रतों का त्याग मत करो, सिद्धचक्र की विधि-पञ्चरत्नों से मण्डल माँड़कर चारों कोणों में प्रतिमाएं विराजमान कर अष्टद्रव्य से भक्ति करें, बारह वर्षों तक तीनों कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ माह के शुक्लपक्ष में सिद्धचक्र का स्मरण करें, श्रावक श्राविकाओं को बड़ी विनय पूर्वक भोजन करावें, ऐसा करने से स्वर्ग/मोक्ष की सम्पदा प्राप्त होती है। इसी व्रत के माहात्म्य से अनन्त सिद्ध हुये हैं। नन्दीश्वर की महिमा तीनों लोकों मे अपूर्व है।
भक्ति
भरत क्षेत्र में अठारह कोड़ाकोड़ी सागर तक दाता-पात्र का अभाव था, इतने काल तक भोगभूमि थी, (षट्काल का वर्णन)।
दान
जघन्य भोगभूमि के काल में पल्य का आठवां भाग शेष रहने पर कुलकरों की उत्पत्ति हुयी थी, उन्होंने कर्मभूमि का परिचय कराया था, चौदहवें कुलकर नाभिराय के यहाँ प्रथम तीर्थंङ्कर सर्वार्थसिद्धि से पधारे थे।
धर्म
इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने गर्भ के छः माह पूर्व नगरी की रचना की थी, रोज तीन या चार बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा पन्द्रह माह तक करता रहा।
विविध
सौधर्मेंन्द्र जन्म के समय ऐरावत हाथी पर कल्याणक मनाने आता है। हाथी की अवगाहना विक्रिया से एक लाख योजन होती है। सौ मुख, एक-एक मुख में आठ-आठ दाँत, एक-एक दाँत पर एक-एक सरोवर, एक-एक सरोवर में एक हजार आठ पाँखुड़ी के एक सौ आठ कमल, एक-एक पाँखुड़ी पर एक-एक अप्सरा नृत्य करती हुई आती है।
विविध
आदिनाथ भगवान् की चौरासी लाखवर्ष पूर्व की आयु थी। बीस लाखवर्ष पूर्व की कुमारावस्था थी। तिरेसठ लाखवर्ष पूर्व राज्य किया, एक लाखवर्ष पूर्व तक तप किया था।
विविध
नीलाञ्जना की मृत्यु से वैराग्य हुआ था, पञ्चमुष्ठि केशलोंच कर दिगम्बर बने थे, साथ में चार हजार राजा दीक्षित हुये थे।
अनासक्ति
छह माह का उपवास लेकर ध्यान में स्थित रहे, इसके बाद सात माह सात दिन अर्थात् तेरह महीने सात दिन में आहार चर्या हुई थी।
पुरुषार्थ